कॉलेजियम पर सुप्रीम सवाल ‘कारण नहीं बताए तो गलत लोग भी पहुंचेंगे’
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर गम्भीर सवाल उठाकर उस बहस को फिर जीवित कर दिया है जो पिछले तीन दशकों से भारतीय न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव का केंद्र रही है। उनका कहना है कि यदि काॅलेजियम अपने निर्णयों के कारण सार्वजनिक नहीं करेगा तो योग्य न्यायाधीशों के साथ अन्याय होगा और ऐसे लोगों के न्यायपालिका में प्रवेश का रास्ता भी खुल सकता है जिनकी संवैधानिक समझ और सार्वजनिक आचरण बाद में विवाद का कारण बन जाए। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत द्वारा छात्रों को ‘काॅकरोच’ कहा जाना एक बड़े छात्र आंदोलन का कारण बना है और काॅलेजियम प्रणाली, एनजेएसी विवाद, न्यायिक नियुक्तियों में देरी, सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव तथा न्यायपालिका की जवाबदेही को लेकर बहस भी तेज हो चली है
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को संविधान का अंतिम संरक्षक माना जाता है। संसद कानून बनाती है, सरकार उन्हें लागू करती है लेकिन यदि इन दोनों में से कोई भी संविधान की सीमा लांघता है तो अंतिम निर्णय न्यायपालिका का होता है। यही कारण है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना गया है लेकिन न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सबसे महत्वपूर्ण आधार उसके न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया है। यदि नियुक्तियां निष्पक्ष, पारदर्शी और योग्यता के आधार पर नहीं होंगी तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी सवालों के घेरे में आ जाएगी।
इसी मूल प्रश्न को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जवल भुइयां ने राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। उन्होंने न्यायाधीशों की नियुक्ति करने वाली कॉलेजियम प्रणाली की कार्यप्रणाली पर खुलकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यदि कॉलेजियम अपने निर्णयों के पीछे कारण दर्ज नहीं करता तो इससे केवल पारदर्शिता प्रभावित नहीं होती बल्कि योग्य न्यायाधीशों के साथ भी अन्याय होता है। इतना ही नहीं, ऐसी अपारदर्शिता भविष्य में उन लोगों के न्यायपालिका तक पहुंचने का रास्ता भी खोल सकती है जिनकी संवैधानिक प्रतिबद्धता बाद में सवालों के घेरे में आ जाए। इससे स्पष्ट है कि उनका इशारा मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत द्वारा छात्रों को ‘काॅकरोच’ कहे जाने की तरफ था।
28 जुलाई को कानूनी शोध संस्था ‘विधि’ की रिपोर्ट ‘द ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स: असेसिंग डिस्क्लोजर ऑफ इंफॉर्मेशन बाय द सुप्रीम कोर्ट एंड द हाई कोर्ट्स’ के विमोचन के अवसर पर आयोजित पैनल चर्चा में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम के निर्णयों में कारण दर्ज न करना न्यायपालिका और लोकतंत्र, दोनों के हित में नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब किसी न्यायाधीश की नियुक्ति या पदोन्नति के पीछे कारण नहीं बताए जाते तब उन न्यायाधीशों के उत्कृष्ट कार्य का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं बन पाता, जिन्होंने वास्तव में न्यायपालिका को मजबूत किया है।
उन्होंने कहा कि ‘जब हम कारण नहीं बताते तो वास्तव में हम कई बेहतरीन न्यायाधीशों के साथ अन्याय करते हैं। दूसरी ओर इसी अपारदर्शिता के कारण ऐसे लोगों के लिए भी जगह बनती है जो बाद में पूरी तरह असंवैधानिक और संविधान के मूल्यों के विपरीत टिप्पणियां करते हैं।’
जस्टिस भुइयां ने किसी न्यायाधीश का नाम नहीं लिया लेकिन उनके बयान को हाल की उन घटनाओं के संदर्भ में देखा जा रहा है जिनमें अदालत की कार्यवाही के दौरान आंदोलनकारियों के लिए ‘काॅकरोच’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। इन टिप्पणियों को लेकर देशभर में तीखी बहस तो हुई ही, एक बड़े छात्र आंदोलन को भी न्यायमूर्ति सूर्यकांत की इस टिप्पणी ने पैदा करने का काम किया।
अपने सम्बोधन में जस्टिस भुइयां ने वर्ष 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश द्वारा विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में दिए गए विवादित भाषण का भी उल्लेख किया। उस भाषण में मुस्लिम समुदाय को लेकर की गई टिप्पणियों पर देशभर में विवाद हुआ था। जस्टिस भुइयां ने बिना नाम लिए कहा कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया अधिक गम्भीर, तथ्याधारित और पारदर्शी होती तो सम्भव है कि भविष्य में इस प्रकार की परिस्थितियों से बचा जा सके। उन्होंने कहा कि न्यायिक नियुक्तियां केवल वरिष्ठता या व्यक्तिगत राय के आधार पर नहीं बल्कि ठोस कारणों, वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर होनी चाहिए।
उन्होंने एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया कि ‘यदि कॉलेजियम के निर्णयों पर तथ्य आधारित सार्वजनिक बहस हो तो उससे नुकसान क्या है?’ उनके अनुसार लोकतंत्र में जानकारीपूर्ण सार्वजनिक विमर्श किसी संस्था को कमजोर नहीं करता बल्कि उसे अधिक विश्वसनीय बनाता है।
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह किसी राजनीतिक दल, सरकार या बाहरी आलोचक की नहीं बल्कि स्वयं सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान न्यायाधीश की है। गौरतलब है कि पिछले कई वर्षों से सरकार और न्यायपालिका के बीच नियुक्तियों को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। सरकार कॉलेजियम की कार्यप्रणाली में अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग करती रही है जबकि न्यायपालिका का तर्क रहा है कि उसकी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए नियुक्तियों में कार्यपालिका की भूमिका सीमित रहनी चाहिए लेकिन पहली बार स्वयं सुप्रीम कोर्ट के भीतर से इतनी स्पष्ट आवाज उठी है कि पारदर्शिता की कमी न्यायपालिका के लिए भी चिंता का विषय बनती जा रही है।
जस्टिस भुइयां ने अपने वक्तव्य में वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ
कृपाल के मामले का भी उल्लेख किया। दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट काॅलेजियम ने दो बार की थी लेकिन केंद्र सरकार ने लम्बे समय तक उस पर निर्णय नहीं लिया। उन्होंने कहा कि उस मामले में काॅलेजियम ने अपने निर्णय के पीछे स्पष्ट और विश्वसनीय कारण दर्ज किए थे और वे स्वयं उन कारणों से पूरी तरह सहमत थे। उनका संकेत स्पष्ट था कि यदि कारण सार्वजनिक किए जाते हैं तो निर्णयों की विश्वसनीयता भी बढ़ती है और अनावश्यक विवाद भी कम होते हैं।
उन्होंने एक और महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार पहले कॉलेजियम के प्रस्तावों में भले ही संक्षिप्त भाषा होती थी लेकिन नियुक्ति के पीछे कुछ न कुछ आधार अवश्य दर्ज किया जाता था परंतु हाल की तीन कॉलेजियम बैठकों के प्रस्तावों में किसी प्रकार का कारण दर्ज नहीं किया गया। उन्होंने प्रश्न किया कि क्या यह न्यायपालिका द्वारा स्वयं अपनाए गए पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटने का संकेत है?
उनका यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं है। पिछले एक दशक में सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं कॉलेजियम के निर्णयों को अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करना शुरू किया था। इसे न्यायपालिका में पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार माना गया था। यदि अब कारणों का उल्लेख ही समाप्त होने लगे तो यह पूरी प्रक्रिया को फिर उसी गोपनीयता की ओर ले जा सकता है, जिसकी आलोचना वर्षों से होती रही है।
पैनल चर्चा में मौजूद वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल ने भी जस्टिस भुइयां की बात का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि नियुक्तियों के पीछे दिए जाने वाले कारण वास्तविक होने चाहिए, केवल औपचारिक या ‘काॅपी-पेस्ट’ नहीं। उनके अनुसार बार, विधि समुदाय और समाज को यह जानने का अधिकार है कि समान योग्यता रखने वाले अन्य उम्मीदवारों की तुलना में किसी एक व्यक्ति का चयन किन कारणों से किया गया।
दरअसल, जस्टिस उज्जवल भुइयां की यह टिप्पणी केवल एक भाषण नहीं है। इसने एक बार फिर उस प्रश्न को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है जो पिछले तीन दशकों से भारतीय न्यायपालिका का सबसे विवादास्पद विषय बना हुआ है कि क्या काॅलेजियम प्रणाली वास्तव में पारदर्शी और जवाबदेह है? या अब समय आ गया है कि इसकी कार्यप्रणाली की व्यापक समीक्षा की जाए?
कोलेजियम व्यवस्था और विवादों का इतिहास
आज जिस कॉलेजियम व्यवस्था को लेकर बहस हो रही है उसका उल्लेख संविधान में कहीं नहीं मिलता। संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। राष्ट्रपति यह नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा आवश्यकतानुसार अन्य न्यायाधीशों से परामर्श के बाद करते हैं। संविधान निर्माताओं की मंशा यह थी कि नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों की भूमिका होगी ताकि किसी एक संस्था का पूर्ण वर्चस्व न बन सके लेकिन समय के साथ इस व्यवस्था की व्याख्या बदलती गई और अंततः एक ऐसी प्रणाली अस्तित्व में आई जिसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति का अंतिम अधिकार लगभग पूरी तरह न्यायपालिका के हाथों में आ गया।
इस परिवर्तन की शुरुआत वर्ष 1981 में हुए ‘प्रथम जज मामला’ (First Judges Case) से हुई। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नियुक्तियों में सरकार की राय को प्राथमिकता प्राप्त होगी और मुख्य न्यायाधीश की सलाह बाध्यकारी नहीं है। अर्थात नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका की भूमिका अधिक प्रभावी मानी गई।
करीब बारह वर्ष बाद 1993 में आए ऐतिहासिक ‘द्वितीय जज मामला’ (Second Judges Case) ने पूरी तस्वीर बदल दी। नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को प्राथमिकता मिलेगी। इसी फैसले के साथ पहली बार ‘काॅलेजियम’ की अवधारणा सामने आई। अदालत ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश अकेले नहीं बल्कि अपने दो वरिष्ठतम सहयोगी न्यायाधीशों के साथ मिलकर नियुक्तियों की सिफारिश करेंगे। इसके बाद 1998 में राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘तृतीय जज मामला’ (ज्ीपतक श्रनकहमे ब्ंेम) में काॅलेजियम का दायरा और बढ़ा दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की सामूहिक राय आवश्यक होगी। यदि इनमें से दो न्यायाधीश भी किसी नाम पर असहमति जताते हैं तो सामान्यतः उस नाम की सिफारिश नहीं की जाएगी।
करीब बारह वर्ष बाद 1993 में आए ऐतिहासिक ‘द्वितीय जज मामला’ (Second Judges Case) ने पूरी तस्वीर बदल दी। नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को प्राथमिकता मिलेगी। इसी फैसले के साथ पहली बार ‘काॅलेजियम’ की अवधारणा सामने आई। अदालत ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश अकेले नहीं बल्कि अपने दो वरिष्ठतम सहयोगी न्यायाधीशों के साथ मिलकर नियुक्तियों की सिफारिश करेंगे। इसके बाद 1998 में राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘तृतीय जज मामला’ (ज्ीपतक श्रनकहमे ब्ंेम) में काॅलेजियम का दायरा और बढ़ा दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की सामूहिक राय आवश्यक होगी। यदि इनमें से दो न्यायाधीश भी किसी नाम पर असहमति जताते हैं तो सामान्यतः उस नाम की सिफारिश नहीं की जाएगी।
यहीं से आज की काॅलेजियम व्यवस्था अस्तित्व में आई। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाना था। माना गया कि यदि सरकार को निर्णायक भूमिका मिल गई तो वह अपनी पसंद के न्यायाधीश नियुक्त कर सकती है, जिससे संविधान की रक्षा करने वाली संस्था की स्वतंत्रता प्रभावित होगी लेकिन समय बीतने के साथ इस व्यवस्था पर भी उतने ही गम्भीर सवाल उठने लगे।
सबसे बड़ा आरोप यह लगा कि काॅलेजियम की कार्यप्रणाली पूरी तरह गोपनीय है। किस नाम पर विचार हुआ? किसे क्यों चुना गया? किसे क्यों अस्वीकार किया गया? और किस आधार पर किसी की पदोन्नति रोकी गई? इनमें से किसी प्रश्न का सार्वजनिक उत्तर उपलब्ध नहीं होता था। यहां तक कि कई बार सम्बंधित न्यायाधीश या वरिष्ठ अधिवक्ता को भी यह पता नहीं चलता था कि उनका नाम क्यों खारिज हुआ। यही वह स्थिति थी जिसे अनेक पूर्व न्यायाधीशों ने ‘ब्लैक बॉक्स सिस्टम’ कहा। अर्थात निर्णय तो सामने आता है लेकिन उसके पीछे की प्रक्रिया किसी को दिखाई नहीं देती।
पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर.एम. लोढ़ा, जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ सहित अनेक पूर्व न्यायाधीशों ने भी अलग- अलग समय पर माना कि कॉलेजियम प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है हालांकि वे इसे समाप्त करने के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखते हुए अधिक पारदर्शिता लाई जा सकती है। समय के साथ कॉलेजियम पर एक और आरोप लगने लगा जिसे ‘अंकल जज सिंड्रोम’ कहा जाता है। इसका सीधा अर्थ है भाई-भतीजावाद। आलोचकों का कहना है कि कई बार न्यायिक परिवारों से आने वाले लोगों को प्राथमिकता मिलती है जबकि अनेक प्रतिभाशाली अधिवक्ता पीछे रह जाते हैं। हालांकि इस आरोप को सिद्ध करना आसान नहीं है लेकिन यह बहस वर्षों से न्यायिक जगत में चलती रही है। कॉलेजियम के निर्णयों को लेकर कई बार खुले विवाद भी सामने आए।
सबसे चर्चित मामलों में जस्टिस के. एम. जोसेफ का मामला था। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उन्होंने वर्ष 2016 में राष्ट्रपति शासन को निरस्त करने का ऐतिहासिक फैसला दिया था। बाद में जब कॉलेजियम ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने की सिफारिश की तो केंद्र सरकार ने उनकी फाइल वापस भेज दी। सरकार ने वरिष्ठता और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का तर्क दिया जबकि न्यायिक हलकों में इसे अलग नजरिए से देखा गया। अंततः कॉलेजियम ने दोबारा उनकी सिफारिश की और बाद में उनकी नियुक्ति हुई। इस पूरे घटनाक्रम ने सरकार और न्यायपालिका के बीच तनाव को सार्वजनिक कर दिया।
इसी प्रकार जस्टिस अकील कुरैशी का मामला भी लम्बे समय तक चर्चा में रहा। कॉलेजियम ने पहले उन्हें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की थी लेकिन बाद में उसमें बदलाव हुआ और अंततः उन्हें त्रिपुरा हाई कोर्ट भेजा गया। इस निर्णय को लेकर भी न्यायिक हलकों में अनेक सवाल उठे कि आखिर मूल सिफारिश क्यों बदली गई।
जस्टिस जयंत पटेल का मामला भी कम विवादास्पद नहीं था। गुजरात हाई कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश रहे जयंत पटेल का स्थानांतरण पहले कर्नाटक और फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट किया गया। बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उस समय अनेक वरिष्ठ अधिवक्ताओं और बार संगठनों ने इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठाए थे। इसी तरह वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल की नियुक्ति भी वर्षों तक लम्बित रही। उनके मामले में कॉलेजियम ने दो बार सिफारिश की लेकिन केंद्र सरकार ने लम्बे समय तक उसे मंजूरी नहीं दी। यह मामला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और नियुक्ति प्रक्रिया, तीनों मुद्दे एक साथ जुड़े हुए थे। इन विवादों के बीच एक और गम्भीर समस्या सामने आती रही, देशभर के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के सैकड़ों पद वर्षों तक खाली रहना। जब नियुक्तियां समय पर नहीं होतीं तो अदालतों में लम्बित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जाती है। यही कारण है कि कॉलेजियम पर बहस केवल नियुक्तियों की प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। इसका सीधा सम्बंध आम नागरिक को समय पर न्याय मिलने से भी है। जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। उनका कहना केवल इतना नहीं है कि कारण लिखे जाएं बल्कि उनका मूल संदेश यह है कि यदि निर्णय पारदर्शी होंगे तो योग्य लोगों को सम्मान मिलेगा, अनुचित नियुक्तियों की आशंका कम होगी और जनता का विश्वास न्यायपालिका में और मजबूत होगा।
क्या कॉलेजियम में सुधार का समय आ गया है?
काॅलेजियम व्यवस्था को लेकर बढ़ते विवादों के बीच वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया था। संसद ने लगभग सर्वसम्मति से 99वां संविधान संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम पारित किया। उस समय सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ने माना कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। अधिकांश राज्यों ने भी इस संशोधन का अनुमोदन किया और ऐसा लगा कि अब देश में न्यायाधीशों की नियुक्ति का एक नया मॉडल लागू होगा।
एनजेएसी में छह सदस्य प्रस्तावित किए गए थे। भारत के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री तथा दो ‘प्रतिष्ठित व्यक्ति’। सरकार का तर्क था कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी बनी रहेगी और नियुक्ति प्रक्रिया में जवाबदेही तथा पारदर्शिता भी आएगी लेकिन इस व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोध स्वयं न्यायपालिका के भीतर से हुआ। अनेक वरिष्ठ अधिवक्ताओं और पूर्व न्यायाधीशों ने आशंका जताई कि यदि सरकार को नियुक्ति प्रक्रिया में औपचारिक भूमिका मिल गई तो भविष्य में वह अपनी पसंद के न्यायाधीशों को आगे बढ़ाने या असहमति रखने वाले नामों को रोकने का प्रयास कर सकती है।
अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने चार-एक के बहुमत से एनजेएसी को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और कोई भी ऐसा कानून, जिससे यह स्वतंत्रता प्रभावित हो, संविधान की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता। अदालत ने कॉलेजियम प्रणाली को बहाल तो रखा लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार किया कि इस व्यवस्था में अनेक कमियां हैं और इसमें सुधार आवश्यक है। अदालत ने सुझाव आमंत्रित किए और बाद में कॉलेजियम की कार्यवाही को पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कुछ कदम उठाए। कॉलेजियम के प्रस्तावों और उनके कारणों को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने की परम्परा भी उसी सुधार प्रक्रिया का परिणाम थी। यही वजह है कि जस्टिस उज्जल भुइयां की हालिया टिप्पणी विशेष महत्व रखती है। यदि स्वयं कॉलेजियम अब कारण लिखना कम कर दे तो यह उस सुधार प्रक्रिया से पीछे लौटने जैसा माना जाएगा, जिसे न्यायपालिका ने स्वयं शुरू किया था।
पारदर्शिता बनाम गोपनीयता की बहस
कोलेजियम व्यवस्था के समर्थकों का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हो सकती। किसी उम्मीदवार के बारे में खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट, उसके पेशेवर आचरण, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या अन्य संवेदनशील सूचनाओं को सार्वजनिक करना न केवल अनुचित होगा बल्कि कई बार निर्दोष व्यक्तियों की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचा सकता है।
यही तर्क इस कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सोंधी ने भी रखा। उनका कहना है कि पारदर्शिता का अर्थ यह नहीं है कि हर दस्तावेज सार्वजनिक कर दिया जाए। कुछ सूचनाएं गोपनीय रहनी चाहिए लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि केंद्र सरकार काॅलेजियम द्वारा दोबारा भेजी गई सिफारिशों को वर्षों तक लम्बित रखती है तो सरकार को भी उसका कारण सार्वजनिक करना चाहिए। अर्थात जवाबदेही केवल न्यायपालिका की नहीं बल्कि कार्यपालिका की भी है।
दूसरी ओर पारदर्शिता के पक्षधर विशेषज्ञों का कहना है कि कारण बताने और गोपनीय जानकारी उजागर करने में अंतर है। कॉलेजियम यह बता सकता है कि किसी उम्मीदवार का चयन उसकी उत्कृष्ट न्यायिक क्षमता, संवैधानिक समझ, निष्पक्षता, ईमानदारी और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर किया गया है जबकि संवेदनशील व्यक्तिगत सूचनाओं को गोपनीय रखा जा सकता है। इससे पारदर्शिता भी बनी रहेगी और निजता का उल्लंघन भी नहीं होगा।
जनता का विश्वास ही सबसे बड़ी पूंजी
जस्टिस उज्जल भुइयां के वक्तव्य का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है, जिसमें उन्होंने कहा कि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उनके न्यायाधीश कौन हैं और वे किन आधारों पर चुने गए हैं। यह बात भारतीय लोकतंत्र के एक मूल सिद्धांत की याद दिलाती है कि सार्वजनिक संस्थाओं की वैधता केवल संवैधानिक प्रावधानों से नहीं बल्कि जनता के विश्वास से भी बनती है।
आज देश में न्यायपालिका के सामने कई गम्भीर चुनौतियां हैं। सर्वोच्च न्यायालय से लेकर जिला अदालतों तक करोड़ों मुकदमे लम्बित हैं। अनेक उच्च न्यायालयों में स्वीकृत पदों का बड़ा हिस्सा खाली है। नियुक्तियों में देरी, काॅलेजियम और सरकार के बीच लगातार खींचतान तथा चयन प्रक्रिया को लेकर उठते सवाल न्यायिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। ऐसे में यह बहस केवल इस बात की नहीं रह जाती कि नियुक्ति का अधिकार किसके पास हो। असली प्रश्न यह है कि क्या नियुक्ति प्रक्रिया ऐसी है, जिस पर जनता बिना किसी संदेह के भरोसा कर सके?
सिर्फ आलोचना नहीं, सुधार का अवसर
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी को न्यायपालिका की आलोचना के रूप में नहीं बल्कि आत्ममंथन के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने काॅलेजियम व्यवस्था को समाप्त करने की बात नहीं कही है। उन्होंने केवल यह कहा कि यदि निर्णयों के पीछे कारण नहीं होंगे तो योग्य लोगों के साथ अन्याय होगा और भविष्य में गलत चयन की आशंका भी बनी रहेगी।
उनकी बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ऐसे समय आई है जब हाल के वर्षों में कई न्यायिक टिप्पणियों और सार्वजनिक बयानों को लेकर न्यायपालिका स्वयं चर्चा के केंद्र में रही है। ऐसे मामलों ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या नियुक्ति प्रक्रिया में केवल वरिष्ठता और पेशेवर योग्यता पर्याप्त है, या उम्मीदवार की संवैधानिक दृष्टि, सार्वजनिक आचरण और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का भी अधिक गम्भीर मूल्यांकन होना चाहिए।
दरअसल, न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं है, वह संविधान की आत्मा की संरक्षक भी है। इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में केवल कानूनी दक्षता ही नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
दरअसल, न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं है, वह संविधान की आत्मा की संरक्षक भी है। इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में केवल कानूनी दक्षता ही नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी जवाबदेही एक-दूसरे की विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। स्वतंत्र न्यायपालिका तभी मजबूत होगी जब उसकी नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष होने के साथ-साथ पारदर्शी भी होगी। इसी प्रकार पारदर्शिता तभी सार्थक होगी जब वह न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता को कमजोर किए बिना लागू की जाए।
तीन दशक पहले कॉलेजियम प्रणाली न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनाई गई थी। आज वही व्यवस्था स्वयं अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग का सामना कर रही है। यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत भी है कि अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि ‘न्याय कौन करेगा?’ बल्कि यह भी है कि ‘न्याय करने वालों का चयन किन मानकों पर होगा?’
सम्भव है कि आने वाले समय में काॅलेजियम व्यवस्था बनी रहे, सम्भव है उसमें व्यापक सुधार हों या भविष्य में कोई नया संवैधानिक माॅडल सामने आए लेकिन एक बात निर्विवाद है, जब तक न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर जनता का भरोसा मजबूत नहीं होगा, तब तक न्यायपालिका की नैतिक शक्ति भी पूरी तरह सुदृढ़ नहीं हो सकती और शायद यही वह केंद्रीय संदेश है, जिसे जस्टिस उज्जल भुइयां ने अपने संक्षिप्त लेकिन दूरगामी महत्व वाले वक्तव्य के माध्यम से पूरे देश के सामने रखा है।
