सोलह दिन में धंसी सोलह करोड़ की उम्मीद!

देहरादून के प्रेमनगर स्थित टौंस नदी पर करीब 16 करोड़ रुपए की लागत से बने नए पुल की एप्रोच रोड पहली ही तेज बारिश में धंस गई है। हालांकि लोक निर्माण विभाग ने दस घंटे के भीतर यातायात बहाल कर दिया लेकिन इस घटना ने उत्तराखण्ड में सार्वजनिक निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, डिजाइन और निगरानी व्यवस्था पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा का असर था या फिर इंजीनियरिंग और योजना में कहीं कोई चूक भी हुई?

उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी देहरादून के प्रेमनगर क्षेत्र में नंदा की चैकी के पास टौंस नदी पर बने नए पुल की एप्रोच रोड का धंसना महज एक स्थानीय घटना नहीं है। यह उस बहस का नया अध्याय है जो पिछले कुछ वर्षों से देशभर में सार्वजनिक निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, इंजीनियरिंग मानकों और सरकारी परियोजनाओं की जवाबदेही को लेकर लगातार चल रही है। लगभग 16 करोड़ रुपए की लागत से तैयार यह पुल क्षेत्र के हजारों लोगों के लिए वर्षों से चली आ रही यातायात की समस्या का समाधान माना जा रहा था। लोगों को उम्मीद थी कि इससे प्रेमनगर, नंदा की चैकी और आसपास के इलाकों का सम्पर्क अधिक सुरक्षित और सुगम होगा लेकिन उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद सामने आई घटना ने इन उम्मीदों पर सवालिया निशान लगा दिया है।

28 जुलाई की सुबह हुई मूसलाधार बारिश के बाद अचानक पुल के एक छोर की एप्रोच रोड का हिस्सा धंस गया। सड़क के नीचे की मिट्टी बह जाने से एप्रोच रोड का हिस्सा हवा में लटक गया और यातायात तत्काल रोकना पड़ा। राहत की बात यह रही कि घटना के समय कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ और न ही किसी के हताहत होने की सूचना मिली। सूचना मिलते ही प्रशासन, पुलिस और लोक निर्माण विभाग की टीमें मौके पर पहुंचीं तथा युद्धस्तर पर मरम्मत कार्य शुरू कर दिया गया। करीब दस घंटे की मशक्कत के बाद क्षतिग्रस्त हिस्से को अस्थायी रूप से दुरुस्त कर यातायात दोबारा शुरू करा दिया गया।
हालांकि यातायात बहाल हो जाने से लोगों को तत्काल राहत जरूर मिली लेकिन इसके साथ ही कई ऐसे सवाल भी उठ खड़े हुए, जिनका जवाब केवल मरम्मत कर देने से नहीं मिल सकता। आखिर ऐसा क्या हुआ कि करोड़ों रुपए की लागत से बना नया पुल पहली ही बड़ी बारिश की परीक्षा में सवालों के घेरे में आ गया? यदि पुल का मुख्य ढांचा सुरक्षित था तो एप्रोच रोड इतनी जल्दी क्यों धंस गई? क्या परियोजना की योजना बनाते समय नदी के बहाव, मिट्टी की प्रकृति और मानसून के प्रभाव का पर्याप्त आकलन किया गया था? या फिर कहीं निर्माण के दौरान गुणवत्ता से समझौता हुआ?
तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी पुल की मजबूती केवल उसके पिलरों और सुपर स्ट्रक्चर से नहीं आंकी जाती। एप्रोच रोड, रिटेनिंग वाॅल, जल निकासी व्यवस्था, मिट्टी का स्थिरीकरण और नदी के कटाव से सुरक्षा की व्यवस्थाएं भी परियोजना का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। यदि इनमें से किसी एक हिस्से में भी कमी रह जाए तो पूरी परियोजना पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही कारण है कि इंजीनियरिंग की दृष्टि से एप्रोच रोड का धंसना भी उतनी ही गम्भीर घटना मानी जाती है, जितनी मुख्य पुल संरचना में आई कोई तकनीकी खामी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पुल का निर्माण लम्बे इंतजार के बाद पूरा हुआ था। बरसात के दिनों में टौंस नदी का जलस्तर बढ़ने से क्षेत्र के लोगों को वर्षों तक आवागमन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। ऐसे में नए पुल के निर्माण से लोगों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद थी लेकिन उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद सामने आई इस घटना ने लोगों के मन में निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर संदेह पैदा कर दिया है। कई स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि पहली ही तेज बारिश में एप्रोच रोड को नुकसान पहुंच गया तो भविष्य में और अधिक वर्षा या बाढ़ जैसी स्थिति में क्या होगा? लोगों की चिंता यह भी है कि यदि समय रहते स्थायी समाधान नहीं किया गया तो यह समस्या बार-बार सामने आ सकती है।
गुणवत्ता पर बार-बार उठते सवाल
यह पहली बार नहीं है जब उत्तराखण्ड में किसी सार्वजनिक निर्माण परियोजना को लेकर गुणवत्ता पर सवाल उठे हों। पर्वतीय राज्य होने के कारण यहां सड़क और पुल निर्माण स्वाभाविक रूप से चुनौतीपूर्ण है। तेज बारिश, भूस्खलन, नदियों का बदलता बहाव और कमजोर भूगर्भीय संरचना निर्माण कार्यों को जटिल बना देते हैं लेकिन यही कारण है कि यहां इंजीनियरिंग मानकों और सुरक्षा उपायों का स्तर मैदानी क्षेत्रों की तुलना में और अधिक मजबूत होना चाहिए। यदि परियोजना की डिजाइन स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार नहीं की जाती या निर्माण के दौरान आवश्यक तकनीकी मानकों का पूरी तरह पालन नहीं होता तो प्राकृतिक परिस्थितियां छोटी-सी कमी को भी बड़े संकट में बदल सकती हैं। इसी वजह से टौंस नदी पुल की यह घटना अब केवल एक एप्रोच रोड के धंसने तक सीमित नहीं रह गई है। इसने उत्तराखण्ड में सार्वजनिक निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, डिजाइन, निगरानी और रखरखाव की पूरी व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है। सवाल केवल इस पुल का नहीं है बल्कि उस व्यवस्था का भी है जिसके भरोसे करोड़ों रुपए की परियोजनाएं तैयार होती हैं और जिन पर लाखों लोगों की सुरक्षा निर्भर करती है।
उत्तराखण्ड में सड़क और पुल केवल विकास की परियोजनाएं नहीं हैं बल्कि जीवनरेखा हैं। राज्य का अधिकांश हिस्सा पर्वतीय है जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, सेना की आवाजाही और आपदा प्रबंधन सब कुछ सड़कों और पुलों पर निर्भर करता है। यही कारण है कि यहां बनने वाली प्रत्येक सड़क और पुल से अपेक्षा की जाती है कि वह केवल सामान्य परिस्थितियों में नहीं बल्कि भारी वर्षा, भूस्खलन और तेज नदी प्रवाह जैसी विषम परिस्थितियों में भी सुरक्षित रहे।
पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम इस अपेक्षा पर लगातार सवाल खड़े करते रहे हैं। हर मानसून में राज्य के विभिन्न हिस्सों से सड़कें धंसने, पहाड़ दरकने, पुलों के क्षतिग्रस्त होने और करोड़ों रुपए की लागत से बनी परियोजनाओं के बार-बार मरम्मत की आवश्यकता पड़ने की खबरें सामने आती रही हैं। चारधाम यात्रा मार्ग पर कई स्थानों पर सड़क धंसने और भूस्खलन की घटनाएं हर वर्ष सामने आती हैं। ऋषिकेश-बदरीनाथ और ऋषिकेश-गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्गों पर कई हिस्सों में बार-बार यातायात बाधित होता है। कुमाऊं और गढ़वाल मंडल में अनेक मोटर मार्ग ऐसे हैं, जिन पर हर बरसात के बाद बड़े पैमाने पर मरम्मत करनी पड़ती है।
सरकार का तर्क रहता है कि उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियां असाधारण हैं। यहां पहाड़ युवा हैं, मिट्टी कमजोर है और मानसून के दौरान अत्यधिक वर्षा होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह तथ्य सही है लेकिन दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि भौगोलिक परिस्थितियां पहले से ज्ञात हैं तो क्या परियोजनाओं की योजना और डिजाइन उसी के अनुरूप नहीं बनाई जानी चाहिए? क्या नदी के सम्भावित बहाव, मिट्टी की वहन क्षमता, जल निकासी व्यवस्था और कटाव के जोखिम का आकलन डीपीआर तैयार करते समय पर्याप्त रूप से नहीं किया जाना चाहिए? यदि किया गया था तो फिर बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों सामने आती हैं?
बदहाल है देशभर में इन्फ्रा की कहानी
यह बहस केवल उत्तराखण्ड तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग राज्यों से भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने सार्वजनिक निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा छेड़ी। बिहार में आगुवानी-सुल्तानगंज पुल निर्माण के दौरान दो बार ढह गया। लगभग 1,700 करोड़ रुपए की इस परियोजना ने देशभर में इंजीनियरिंग और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। गुजरात में मोरबी पुल हादसे ने 141 लोगों की जान ले ली और रखरखाव तथा फिटनेस प्रमाणन की प्रक्रिया पर गम्भीर प्रश्न उठे। दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल-1 पर भारी बारिश के दौरान छत का हिस्सा गिरने की घटना ने आधुनिक सार्वजनिक ढांचों की गुणवत्ता पर नई बहस छेड़ दी। विभिन्न राज्यों में नई सड़कों, फ्लाईओवरों और एक्सप्रेसवे के कुछ हिस्सों में शुरुआती महीनों में ही धंसाव या क्षति की घटनाएं भी समय-समय पर सामने आती रही हैं।
इन सभी मामलों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं और प्रत्येक घटना के कारण भी अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा लेकिन जब अलग-अलग राज्यों में सार्वजनिक निर्माण कार्यों को लेकर लगातार प्रश्न उठने लगें तो यह केवल संयोग नहीं माना जा सकता। इससे यह आवश्यकता अवश्य महसूस होती है कि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, तकनीकी परीक्षण, स्वतंत्र निरीक्षण और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था की गम्भीर समीक्षा की जाए।
सरकार का दावा ‘ऑल इज वेल’
टौंस नदी पुल की एप्रोच रोड धंसने की घटना के बाद उठे सवालों के बीच अब लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने भी अपना पक्ष सार्वजनिक किया है। विभाग का कहना है कि यह घटना निर्माण गुणवत्ता में कमी के कारण नहीं बल्कि टौंस नदी के असामान्य तेज बहाव और उससे हुए मिट्टी के कटाव का परिणाम है। विभाग ने इसे गम्भीरता से लेते हुए न केवल तत्काल मरम्मत कर यातायात बहाल किया बल्कि अब स्थायी समाधान की दिशा में भी काम शुरू कर दिया है। पीडब्ल्यूडी का कहना है कि पुल का मुख्य ढांचा पूरी तरह सुरक्षित है तथा किसी भी प्रकार की संरचनात्मक क्षति नहीं हुई है। विभाग के अनुसार प्रभावित हिस्सा केवल एप्रोच रोड तक सीमित था, जिसे करीब दस घंटे के भीतर दुरुस्त कर यातायात सामान्य कर दिया गया।
प्रश्न अभी बाकी हैं
विभाग की यह तकनीकी व्याख्या अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है लेकिन इससे कुछ मूलभूत प्रश्न स्वतः सामने आते हैं। यदि नदी का बहाव पहले से इसी दिशा में था तो क्या विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करते समय इस जोखिम का पर्याप्त आकलन किया गया था? क्या हाइड्रोलाॅजिकल अध्ययन में यह सम्भावना दर्ज थी कि मानसून के दौरान नदी का दबाव सीधे एप्रोच रोड पर पड़ेगा? यदि इसका आकलन किया गया था तो उसके अनुरूप सुरक्षा उपाय कितने प्रभावी साबित हुए? और यदि ऐसा आकलन नहीं किया गया था तो क्या परियोजना की योजना में कोई कमी रह गई?
फिलहाल टौंस नदी पुल पर यातायात सामान्य है और विभाग स्थायी सुरक्षा कार्यों की तैयारी में जुटा हुआ है लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि सार्वजनिक धन से बनने वाली परियोजनाओं की असली परीक्षा उद्घाटन के दिन नहीं बल्कि पहली बारिश, पहली बाढ़ और समय की कसौटी पर होती है। यदि इस घटना से सबक लेकर निर्माण मानकों, तकनीकी निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था को और मजबूत किया जाता है तो यह केवल एक पुल की कहानी नहीं रहेगी बल्कि भविष्य की बेहतर और अधिक सुरक्षित आधारभूत संरचनाओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण सीख साबित हो सकती है।

बात अपनी-अपनी
प्रेमनगर का टौंस नदी का पुल की एप्रोच रोड का 16 दिन में ही धराशायी होना साफ दर्शाता है कि कार्य की गुणवत्ता निम्न स्तरीय रही है। किसी भी पुल की एप्रोच रोड कंक्रीट से बनाई जाती है जिससे कटाव न हो सके लेकिन यहां तो अजीबो-गरीब स्थिति है। बात प्रेमनगर के पुल की ही नहीं है, जितने भी पुल इस सरकार के समय बनाए गए सभी में यही स्थिति बनी हुई है। पहले भी थानो देहरादून रोड के दो पुलों की हालत ऐसी ही हुई थी। प्रदेश में भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुंच गया है। जिन-जिन पुलों को क्षति पहुंची है सबसे पहले ठेकेदारों को ब्लैक लिस्ट कर देना चाहिए। अधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी से कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए लेकिन इस सरकार ने तो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंखें ही मूंदी हुई हैं और सरकार स्वयं भ्रष्टाचार में संलिप्त है जिसके कारण ऐसे मामले सामने आ रहे हैं।
प्रीतम सिंह, विधायक एवं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड कांग्रेस
नदी में बाढ़ आने से कटाव हुआ जिस कारण पुल की एप्रोच रोड धंस गई। अब इसकी जांच हो रही है, क्या कमियां थीं यह सब सामने आ जाएगा।
सहदेव पुंडीर, विधायक, सहसपुर
हमें जांच रिपोर्ट मिल गई है। हम जांच रिपोर्ट का अध्ययन कर रहे हैं। उसी के आधार पर आगे की कार्यवाही की जाएगी।
डाॅ. पंकज कुमार पाण्डे, सचिव, लोक निर्माण विभाग, उत्तराखण्ड
हम अभी जांच कर रहे हैं। जांच में टाइम तो लगता ही है। घटनास्थल और सभी डॉक्यूमेंट का अध्ययन किया जाता है। हम जांच रिपोर्ट शासन को भेजने वाले हैं।
दयानंद, सी.ई., लोक निर्माण विभाग, उत्तराखण्ड

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