जागेश्वर का महासंग्राम गुरु-शिष्य, चाचा-भतीजे और सियासी विरासत की जंग
उत्तराखण्ड की सबसे राजनीतिक रूप से सजग विधानसभा सीटों में शुमार जागेश्वर में 2027 का चुनाव केवल कांग्रेस और भाजपा के बीच सत्ता की लड़ाई नहीं होगा। यह एक ओर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल की राजनीतिक विरासत बचाने की चुनौती होगी, दूसरी तरफ उनके पूर्व राजनीतिक शिष्य एवं मौजूदा विधायक मोहन सिंह महरा के सामने जीत दोहराने की परीक्षा। इसी बीच उत्तराखण्ड क्रांति दल से चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे भतीजे दिनेश कुंजवाल इस मुकाबले को चाचा-भतीजे की प्रतिष्ठा की लड़ाई में भी बदल सकते हैं। ऐसे में जागेश्वर का चुनाव उत्तराखण्ड की सबसे दिलचस्प चुनावी लड़ाइयों में शामिल होने जा रहा है
उत्तराखण्ड राज्य का जागेश्वर विधानसभा क्षेत्र जागेश्वर धाम जैसे धार्मिक महत्व और सालम क्रांति की ऐतिहासिक विरासत वाला इलाका है, जो हमेशा राजनीतिक रूप से जागरूक रहा है। राज्य बनने से पूर्व यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश की अल्मोड़ा (बारामंडल) विधानसभा का हिस्सा था। उत्तराखण्ड राज्य के गठन के बाद अस्तित्व में आई जागेश्वर विधानसभा सीट पर 2002 से 2017 तक कांग्रेस के गोविंद सिंह कुंजवाल का लगभग एकछत्र राजनीतिक वर्चस्व रहा। उन्होंने लगातार चार विधानसभा चुनाव जीतकर इस क्षेत्र में अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ साबित की।
2002 के पहले विधानसभा चुनाव में गोविंद सिंह कुंजवाल ने भाजपा के वरिष्ठ नेता रघुनाथ सिंह चैहान को पराजित किया। दिलचस्प बात यह रही कि रघुनाथ सिंह चैहान स्वयं अल्मोड़ा सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन भाजपा की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों के चलते उन्हें जागेश्वर से मैदान में उतरना पड़ा। 2007 में भी गोविंद सिंह कुंजवाल ने रघुनाथ सिंह चैहान को हराकर अपनी स्थिति और मजबूत कर ली।
2012 में भाजपा ने सभी स्थानीय दावेदारों को दरकिनार कर प्रवासी नेता बची सिंह नेगी को उम्मीदवार बनाया लेकिन वह भी गोविंद सिंह कुंजवाल के मजबूत राजनीतिक किले को भेदने में असफल रहे। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के युवा चेहरे सुभाष पाण्डे ने उन्हें कड़ी चुनौती दी। मोदी लहर के बावजूद गोविंद सिंह कुंजवाल ने अपने राजनीतिक अनुभव और संगठनात्मक पकड़ के दम पर मुकाबला अपने पक्ष में कर लिया और लगातार चैथी बार विधायक बनने में सफल रहे। हालांकि यह जीत उनके लिए आसान नहीं थी। 2016 में हरीश रावत सरकार के राजनीतिक संकट के दौरान विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनके निर्णयों को लेकर भाजपा लगातार हमलावर रही और पूरे चुनाव में उन्हें निशाने पर रखा गया। इसके बावजूद उन्होंने अपनी सीट बचा ली लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में पहली बार उनका राजनीतिक किला ढह गया। कभी उनके सबसे विश्वस्त सहयोगी और राजनीतिक शिष्य रहे मोहन सिंह महरा ने भाजपा प्रत्याशी के रूप में उन्हें लगभग छह हजार मतों से पराजित कर दिया।
अब 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आते-आते जागेश्वर में भी चुनावी सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। कांग्रेस,
भाजपा, उत्तराखण्ड क्रांति दल, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, आम आदमी पार्टी सहित सभी दल अपने-अपने स्तर पर सक्रिय हैं। भाजपा के सामने 2022 की जीत दोहराने की चुनौती है जबकि कांग्रेस अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश में जुटी है। दूसरी ओर क्षेत्रीय दल भी अपनी प्रासंगिकता साबित करने का प्रयास कर रहे हैं।
भाजपा, उत्तराखण्ड क्रांति दल, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, आम आदमी पार्टी सहित सभी दल अपने-अपने स्तर पर सक्रिय हैं। भाजपा के सामने 2022 की जीत दोहराने की चुनौती है जबकि कांग्रेस अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश में जुटी है। दूसरी ओर क्षेत्रीय दल भी अपनी प्रासंगिकता साबित करने का प्रयास कर रहे हैं।
कांग्रेस की स्थिति देखें तो फिलहाल पार्टी के भीतर ऐसा कोई चेहरा दिखाई नहीं देता जो गोविंद सिंह कुंजवाल की जगह ले सके। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के सबसे विश्वस्त नेताओं में गिने जाने वाले गोविंद सिंह कुंजवाल लगातार छठी बार विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। 2002 में नारायण दत्त तिवारी सरकार में उद्यान मंत्री रहे कुंजवाल का कांग्रेस संगठन में हमेशा विशेष महत्व रहा है। जागेश्वर क्षेत्र में सड़क, शिक्षा और अन्य विकास कार्यों का राजनीतिक श्रेय भी काफी हद तक उन्हें दिया जाता है। 2016 में कांग्रेस में बगावत के दौरान हरीश रावत सरकार को बचाने में विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका भी कांग्रेस आज तक याद करती है।
2022 की हार के पीछे सबसे बड़ा कारण उनके ही पूर्व सहयोगी मोहन सिंह महरा माने जाते हैं। महरा और उनकी पत्नी की राजनीतिक पहचान भी गोविंद सिंह कुंजवाल के संरक्षण में ही बनी थी। कांग्रेस ने उन्हें जिला पंचायत अध्यक्ष तक बनाया था। बाद में कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति ने दोनों नेताओं के रिश्तों में दरार पैदा कर दी।
2017 में कांग्रेस की हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष बने प्रीतम सिंह ने गोविंद सिंह कुंजवाल से सलाह किए बिना मोहन सिंह महरा को अल्मोड़ा जिला कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया। इसे गोविंद सिंह कुंजवाल ने अपने राजनीतिक प्रभाव को कमजोर करने की कोशिश माना। विवाद इतना बढ़ा कि उन्होंने पार्टी छोड़ने तक की चेतावनी दे दी। अंततः कांग्रेस नेतृत्व को झुकना पड़ा और मोहन सिंह महरा की जगह गोविंद सिंह कुंजवाल की पसंद पीताम्बर दत्त पाण्डे को जिला अध्यक्ष बनाया गया। यहीं से दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दूरी स्थायी हो गई।
फिलहाल जिस तरह गोविंद सिंह कुंजवाल क्षेत्र में सक्रिय हैं, उससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि कांग्रेस 2027 में भी उन्हीं पर दांव लगाने की तैयारी में है। हालांकि पार्टी की नई पीढ़ी में इसे लेकर कुछ असंतोष भी दिखाई देता है, लेकिन कांग्रेस के बड़े वर्ग का मानना है कि फिलहाल उनके विकल्प के रूप में कोई प्रभावी चेहरा मौजूद नहीं है।
भाजपा की स्थिति भी पूरी तरह निर्विवाद नहीं है। मौजूदा विधायक होने के नाते मोहन सिंह महरा की दावेदारी सबसे मजबूत मानी जा रही है लेकिन 2017 में बेहद कम अंतर से चुनाव हारने वाले सुभाष पाण्डे भी इस बार पूरी तैयारी के साथ टिकट की दौड़ में हैं। 2022 में जब भाजपा ने कांग्रेस से आए मोहन सिंह महरा को टिकट दिया था, तब भी सुभाष पाण्डे के समर्थकों ने उन्हें निर्दलीय चुनाव लड़ने का दबाव बनाया था लेकिन उन्होंने संगठन के निर्णय को स्वीकार करते हुए मोहन सिंह महरा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बताया जाता है कि उस समय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी स्वयं जागेश्वर पहुंचे थे और सुभाष पाण्डेय को भविष्य में उचित राजनीतिक सम्मान तथा 2027 में टिकट पर विचार का भरोसा दिया गया था। हालांकि हाल ही में घोषित दायित्वधारियों की सूची में उनका नाम शामिल नहीं होने से उनके समर्थकों में नाराजगी है। इसके बावजूद सुभाष पाण्डे अपनी दावेदारी को लेकर पूरी तरह आश्वस्त बताए जाते हैं।
सुभाष पाण्डे की व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2012 में उत्तराखण्ड क्रांति दल के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए उन्होंने नौ हजार से अधिक मत प्राप्त किए थे। उस चुनाव में उक्रांद के सबसे अधिक वोट पाने वाले उम्मीदवार प्रीतम सिंह पंवार के बाद सुभाष पाण्डे दूसरे स्थान पर थे। कुमाऊं विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा परिसर के छात्रसंघ अध्यक्ष और उपाध्यक्ष रह चुके सुभाष पाण्डे का युवाओं में भी अच्छा प्रभाव माना जाता है।
भाजपा के एक अन्य सम्भावित दावेदार गौरव पाण्डेय भी सक्रिय हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से निकले गौरव पाण्डेय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भाजपा में आए और भारतीय जनता युवा मोर्चा में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। जम्मू-कश्मीर में युवा मोर्चा के प्रभारी के रूप में भी उन्होंने काम किया है। हालांकि उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्षेत्र में उनकी सक्रियता सीमित मानी जाती है और उन पर ‘प्रवासी नेता’ होने का ठप्पा भी लग सकता है। 2012 में प्रवासी उम्मीदवार बची सिंह नेगी को जनता द्वारा नकारे जाने का उदाहरण भाजपा के सामने मौजूद है।
फिर भी भाजपा की कार्यशैली को देखते हुए अंततः आलाकमान जिस उम्मीदवार पर भरोसा करेगा, बाकी दावेदारों के सामने उसके निर्णय को स्वीकार करने के अलावा बहुत अधिक विकल्प नहीं होंगे। फिलहाल टिकट की लड़ाई मोहन सिंह महरा और सुभाष पाण्डे के बीच सिमटती दिखाई देती है, हालांकि चुनाव तक राजनीतिक समीकरण बदल भी सकते हैं।
इसी बीच एक नया नाम तेजी से चर्चा में है, दिनेश कुंजवाल। गोविंद सिंह कुंजवाल के बड़े भाई केदार सिंह कुंजवाल के पुत्र दिनेश कुंजवाल पूर्व में गोविंद सिंह कुंजवाल के ओएसडी भी रह चुके हैं। अब उनके उत्तराखण्ड क्रांति दल में शामिल होकर चुनाव लड़ने की चर्चा है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय दल पर्वतीय क्षेत्रों के हितों की रक्षा करने में असफल रहे हैं और लगातार होने वाले परिसीमन में पहाड़ की सीटें कम होती जा रही हैं। उनका मानना है कि क्षेत्रीय दलों को मजबूत किए बिना पर्वतीय राज्य की मूल अवधारणा सुरक्षित नहीं रह सकती। इसी सोच के साथ वे 9 अगस्त, अगस्त क्रांति दिवस के अवसर पर उत्तराखण्ड क्रांति दल में शामिल होने जा रहे हैं और जागेश्वर से उनकी दावेदारी लगभग तय मानी जा रही है।
यद्यपि उत्तराखण्ड क्रांति दल कभी इस सीट पर बड़ी ताकत नहीं रहा, लेकिन यदि दिनेश कुंजवाल क्षेत्रीय अस्मिता और व्यक्तिगत सम्पर्कों को राजनीतिक समर्थन में बदलने में सफल रहे तो चुनावी समीकरणों पर उनका असर पड़ सकता है। सबसे अधिक निगाह इस बात पर रहेगी कि वह कांग्रेस प्रत्याशी गोविंद सिंह कुंजवाल के पारम्परिक वोट बैंक में कितनी सेंध लगा पाते हैं।
अन्य दलों की बात करें तो बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव समय के साथ लगातार घटा है। आम आदमी पार्टी और उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी की मौजूदगी फिलहाल इतनी मजबूत नहीं दिखती कि वे सीधे चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकें। क्षेत्रीय दृष्टि से लमगड़ा और धौलछीना ब्लाॅक इस विधानसभा के चुनावी गणित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जागेश्वर विधानसभा का चुनाव हमेशा व्यक्तित्व आधारित राजनीति और स्थानीय संगठनात्मक ताकत के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। यही कारण है कि यहां दलों से अधिक उम्मीदवारों की व्यक्तिगत स्वीकार्यता चुनाव परिणामों को प्रभावित करती रही है। 2027 में भी यही तस्वीर दिखाई दे रही है। कांग्रेस अपनी परम्परागत राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश में है, भाजपा सत्ता के दम पर सीट बचाने की चुनौती से जूझ रही है जबकि उत्तराखण्ड क्रांति दल क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे पर अपनी प्रासंगिकता साबित करने का प्रयास करेगा। ऐसे में यह मुकाबला केवल दलों का नहीं बल्कि व्यक्तित्व, संगठन और राजनीतिक विरासत की परीक्षा भी होगा।
अगर वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया तो 2027 का जागेश्वर विधानसभा चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक हो सकता है। एक ओर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल और उनके भतीजे दिनेश कुंजवाल दो पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करते हुए अलग-अलग राजनीतिक मंचों से आमने-सामने होंगे तो दूसरी तरफ कभी गुरु-शिष्य रहे गोविंद सिंह कुंजवाल और मोहन सिंह महरा फिर एक बार चुनावी रणभूमि में एक-दूसरे के सामने दिखाई दे सकते हैं। यही नहीं, भाजपा के लिए भी यह चुनाव इसलिए दिलचस्प होगा क्योंकि रघुनाथ सिंह चैहान के बाद पार्टी ने स्थानीय कैडर की अपेक्षा अन्य दलों से आए नेताओं या अपेक्षाकृत बाहरी चेहरों पर अधिक भरोसा किया है। ऐसे में जागेश्वर का महासंग्राम केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं बल्कि उत्तराखण्ड की बदलती राजनीति, राजनीतिक विरासत और नए नेतृत्व की परीक्षा भी साबित हो सकता है।
