कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, कांग्रेस वर्किंग कमेटी के विशेष आमंत्रित सदस्य, पूर्व महासचिव, उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री और मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे हरीश रावत ने एक बार फिर अपनी राजनीतिक सक्रियता को लेकर उठ रहे सवालों पर उसी अंदाज में जवाब दिया है जो उनकी राजनीतिक पहचान रही है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखी अपनी पोस्ट में उन लोगों पर तीखा व्यंग्य किया है जो उन्हें सक्रिय राजनीति से संन्यास दिलाने की कोशिश में लगे हुए हैं। रावत ने साफ कहा है कि यदि कभी पार्टी नेतृत्व या देहरादून में बैठे उनके सहयोगी उनसे सक्रिय राजनीति से संन्यास की अपेक्षा करेंगे तो वह उस सलाह को सार्वजनिक रूप से साझा करेंगे लेकिन फिलहाल वह राजनीति से पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। उनकी पोस्ट को केवल व्यक्तिगत प्रतिक्रिया मानना उत्तराखण्ड कांग्रेस की मौजूदा राजनीति को समझने के लिहाज से पर्याप्त नहीं होगा। इससे पार्टी के अंदर बदलते शक्ति-समीकरण, नेतृत्व की होड़ और 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हरीश रावत की राजनीतिक भूमिका को लेकर चल रही खींचतान के संकेत साफ दिखाई देते हैं
‘ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे कुछ रुचितकबरे चहेतों ने मुझसे सक्रिय राजनीति से संन्यास दिलवाने की ‘सुपारी’ ले रखी है। वैसे मैं संन्यास को जीवन की उच्चतम स्थिति मानता हूं और मैं भविष्य में उस अवस्था में जाने का अभिलाषी भी हूं। मगर हाल-फिलहाल मैं उन्हें स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि जिस दिन पार्टी का नेतृत्व या देहरादून के मेरे सहयोगी मुझसे सक्रिय राजनीति से संन्यास की अपेक्षा करेंगे, मैं उन्हें ससम्मान धन्यवाद देते हुए उस सलाह को सबके साथ साझा करूंगा। लगभग 60-62 वर्षों के संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन से संन्यास कोई छुप-छुपाकर तो नहीं होगा न? जिस दिन संन्यास घोषित करूंगा, पूरे गाजे-बाजे के साथ करूंगा। उत्तराखण्ड के सभी भाई-बहनों और सक्रियतापूर्वक राजनीतिक जीवन में मेरा साथ देने के लिए कार्यकर्ता साथियों को धन्यवाद दूंगा और खुशी- खुशी जीवन के शेष बचे हुए दिनों के लिए अपना नया रोड मैप भी घोषित करूंगा। यूं बताते चलूं कि कुछ दूसरी पार्टी के सक्रिय और अर्ध सक्रिय शुभचिंतकों ने भी मुझे राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दी है। मेरे ये चितकबरे चहेते मुझे संन्यास भी दिलवाना चाहते हैं और साथ-साथ कांग्रेस की समस्त चुनावी हारों का, चाहे उत्तराखण्ड की हो या कहीं और राज्य की हो, उनकी गठरी भी मेरे सर पर रखना चाहते हैं। उन्होंने मेरी राजनीतिक यात्रा का गम्भीरता से गहन अध्ययन किया है, उसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं और यह सत्यता है कि मैं जितने चुनाव जीता हूं, उससे अधिक चुनाव हारा हूं। मगर यह भी सत्यता है कि हर हार के बाद मैं जीत के नए संकल्प के साथ खड़ा हुआ हूं, आगे बड़ा हूं और आज भी जीत के संकल्प के साथ डटा हुआ हूं। हार और जीत जनता जनार्दन के हाथ में है। जो प्रारब्ध में लिखा होगा, वही होगा लेकिन प्रारब्ध के लिखे को बदलने की कोशिश करना, उसके लिए संघर्ष और प्रार्थना करना ही हरीश रावत की खासियत है। मोहनरी के छोटे से गांव से लेकर राष्ट्रीय फलक तक की मेरी राजनीतिक यात्रा का यही मर्म भी है और मुझे अपनी इस यात्रा पर गर्व है। मैंने इस राजनीतिक में कुछ लोगों को अवश्य चिड़कौवा बना दिया है, कइयों को राजनीतिक नुकसान भी महसूस हुआ होगा, पर सच्चाई यह भी है कि जो भी मेरे पास आया, मैंने सदैव उसकी मदद की और आज भी मैं लोगों की हर सम्भव मदद के लिए तत्पर रहता हूं।’
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की यह पोस्ट सोशल मीडिया ऐसे समय सामने आई है जब उत्तराखण्ड कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है और पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर पुराने सवाल फिर सतह पर आने लगे हैं। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड कांग्रेस की राजनीति लम्बे समय से कई शक्ति-केंद्रों में बंटी रही है और हरीश रावत इस राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक रहे हैं। एक तरफ उनके समर्थक उन्हें उत्तराखण्ड कांग्रेस का सबसे बड़ा जनाधार वाला नेता मानते हैं, वहीं पार्टी के भीतर एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि कांग्रेस को अब नई पीढ़ी और नए नेतृत्व के साथ आगे बढ़ना चाहिए। यही टकराव 2027 से पहले और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस ने हरीश रावत को औपचारिक तौर पर किनारे नहीं किया है। पार्टी के केंद्रीय संगठन में उन्हें अभी भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और उत्तराखण्ड की नई प्रदेश कांग्रेस टीम में भी उनका नाम शामिल है लेकिन राजनीतिक महत्व केवल पद से तय नहीं होता। असली सवाल यह है कि प्रदेश संगठन में निर्णय लेने की प्रक्रिया में किस नेता की बात कितनी सुनी जाती है और किस नेता के समर्थकों को संगठन तथा टिकट वितरण में कितनी जगह मिलती है। यहीं हरीश रावत की बेचैनी और उनके विरोधी खेमे की सक्रियता को समझा जा सकता है।
आज प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल हैं और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य विधानसभा में पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। प्रदेश प्रभारी के रूप में कुमारी शैलजा की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। इन तीनों के अलावा प्रीतम सिंह, हरक सिंह रावत और अन्य वरिष्ठ नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक आधार हैं। यानी उत्तराखण्ड कांग्रेस अब उस दौर में नहीं है जब किसी एक नेता की छाया में संगठन की पूरी राजनीति संचालित हो। यह बहु-केंद्रीय सत्ता-संतुलन हरीश रावत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
कभी रावत की पसंद गणेश गोदियाल, आज स्वतंत्र राजनीतिक धुरी
गणेश गोदियाल का उदाहरण उत्तराखण्ड कांग्रेस की बदलती राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। जुलाई 2021 में कांग्रेस ने गणेश गोदियाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। उस समय हरीश रावत को चुनाव अभियान समिति की जिम्मेदारी दी गई थी और इसे रावत के राजनीतिक प्रभाव के रूप में भी देखा गया था लेकिन पांच साल में परिस्थितियां बदल चुकी हैं। आज गोदियाल स्वयं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं और संगठन में उनकी अपनी
राजनीतिक पहचान तथा समर्थकों का नेटवर्क है।
यही राजनीति का स्वाभाविक बदलाव है। जिस नेता को कभी किसी वरिष्ठ नेता ने आगे बढ़ाया हो, वह समय के साथ अपनी स्वतंत्रराजनीतिक जमीन बना सकता है। इसलिए आज गणेश गोदियाल और हरीश रावत के बीच
राजनीतिक दूरी को केवल व्यक्तिगत मतभेद के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह उत्तराखण्ड कांग्रेस में शक्ति-संतुलन के परिवर्तन का हिस्सा भी है। कभी रावत के राजनीतिक प्रभाव से संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका पाने वाले गोदियाल का आज स्वयं एक स्वतंत्र शक्ति केंद्र बन जाना इस बात का संकेत है कि उत्तराखण्ड कांग्रेस की राजनीति में रावत का पुराना प्रभाव अब निर्विवाद नहीं रहा।
यशपाल आर्य और कुमारी शैलजा का समीकरण
वर्तमान उत्तराखण्ड कांग्रेस में यशपाल आर्य का महत्व भी बढ़ा है। नेता प्रतिपक्ष के रूप में वह विधानसभा के भीतर पार्टी का सबसे प्रमुख चेहरा हैं। दूसरी ओर प्रदेश प्रभारी और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव कुमारी शैलजा संगठन को 2027 के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। पार्टी के भीतर यह धारणा है कि दोनों के बीच बेहतर राजनीतिक समन्वय है और संगठनात्मक फैसलों में इसका असर दिखाई देता है और जिसके चलते हरीश रावत के लिए चुनौती पैदा होती है। उनके समर्थकों की शिकायत बढ़ रही है कि संगठन में उनके लोगों को वह राजनीतिक जगह नहीं मिल रही जिसकी अपेक्षा उन्हें है। दूसरी ओर पार्टी के अन्य नेता इसे किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ अभियान के बजाय संगठन को सामूहिक नेतृत्व देने की प्रक्रिया के रूप में सामने रख रहे हैं। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं लेकिन इतना तय है कि 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस के भीतर रावत बनाम गैर-रावत राजनीतिक ध्रुवीकरण का असर टिकट और संगठनात्मक नियुक्तियों पर पड़ सकता है।
कुमारी शैलजा और यशपाल आर्य के बीच बेहतर समन्वय की
राजनीतिक चर्चा को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। यदि पार्टी की चुनावी रणनीति में आर्य का राजनीतिक कद और शैलजा की संगठनात्मक भूमिका लगातार मजबूत होती है तो स्वाभाविक रूप से हरीश रावत के लिए अपने समर्थकों को आगे बढ़ाना पहले की तुलना में कठिन हो सकता है। यही कारण है कि रावत की ताजा पोस्ट को केवल संन्यास की अफवाहों का जवाब मानना अधूरा होगा। इसमें उनके राजनीतिक अस्तित्व और प्रभाव को लेकर चल रही अंदरूनी बेचैनी भी पढ़ी जा सकती है।
रामनगर में संजय नेगी को लेकर टकराव
रामनगर के युवा नेता
संजय नेगी का मामला इस अंतर्कलह का ताजा उदाहरण है। संजय नेगी को कांग्रेस में शामिल कराने के लिए हरीश रावत ने जिस तरह सक्रियता दिखाई, उससे यह संकेत मिला कि वह रामनगर में अपने राजनीतिक प्रभाव को फिर मजबूत करना चाहते हैं। नेगी कीराजनीतिक पृष्ठभूमि और क्षेत्र में सक्रियता को देखते हुए रावत उन्हें भविष्य के लिए एक उपयोगी युवा चेहरा मानते हैं।
कांग्रेस में उनकी एंट्री को लेकर पार्टी के भीतर विरोध सामने आया। प्रस्तावित ज्वाइनिंग को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि मामला पार्टी नेतृत्व तक पहुंचा और इसके बाद हरीश रावत ने 15 दिन के राजनीतिक अवकाश की घोषणा तक कर दी। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे यह स्पष्ट हुआ कि रावत की इच्छा और प्रदेश संगठन की प्राथमिकताओं के बीच अब पहले जैसी सहजता नहीं रह गई है। रामनगर हरीश रावत के लिए केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है। यह उनके राजनीतिक प्रभाव और पुराने संगठनात्मक सम्बंधों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। 2022 में रामनगर से टिकट को लेकर कांग्रेस के भीतर जो विवाद हुआ था, उसने रावत और रणजीत रावत के बीच मतभेदों को भी सार्वजनिक कर दिया था। ऐसे में संजय नेगी की एंट्री को लेकर विवाद उसी पुराने राजनीतिक संघर्ष की नई कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।
संजय नेगी का मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि यह केवल एक व्यक्ति के कांग्रेस में आने का सवाल नहीं है। इसके पीछे यह सवाल छिपा है कि 2027 में किस नेता के समर्थक संगठन और टिकट की राजनीति में जगह पाएंगे। हरीश रावत अगर अपने प्रभाव वाले इलाकों में नए चेहरों को आगे बढ़ाना चाहते हैं और संगठन के दूसरे शक्ति केंद्र अपने राजनीतिक समीकरण के हिसाब से फैसले लेना चाहते हैं तो टकराव होना स्वाभाविक है।
काजी निजामुद्दीन और बदलते राजनीतिक रिश्ते
उत्तराखण्ड कांग्रेस के बदलते राजनीतिक समीकरणों में मंगलौर से विधायक
काजी निजामुद्दीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। काजी निजामुद्दीन के पिता काजी मोहम्मद मोहिउद्दीन उत्तर प्रदेश सरकार में वन एवं उप कारागार मंत्री रह चुके थे। उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद उन्हें प्रदेश विधानसभा का पहला प्रोटेम स्पीकर यानी कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया था। काजी मोहम्मद मोहिउद्दीन को हरीश रावत के पुराने और करीबी
राजनीतिक सहयोगियों में माना जाता रहा है। यही वजह है कि काजी परिवार और हरीश रावत के राजनीतिक सम्बंधों की चर्चा उत्तराखण्ड कांग्रेस की पुरानी राजनीति का हिस्सा रही है।
2007 के विधानसभा चुनाव के समय भी काजी मोहम्मद मोहिउद्दीन का राजनीतिक महत्व था। उस दौर में काजी परिवार और हरीश रावत के बीच राजनीतिक निकटता को उत्तराखण्ड कांग्रेस के समीकरणों में महत्वपूर्ण माना जाता था। बाद में काजी निजामुद्दीन स्वयं राजनीति में आगे बढ़े और मंगलौर क्षेत्र से एक मजबूत राजनीतिक चेहरा बनकर उभरे। उन्होंने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई और कांग्रेस संगठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका हासिल की।
राजनीति में पुराने व्यक्तिगत सम्बंध हमेशा स्थायी राजनीतिक समीकरणों में नहीं बदलते। समय के साथ नेताओं की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं, संगठनात्मक जिम्मेदारियां और नए शक्ति केंद्र विकसित होते हैं। यही वजह है कि आज काजी निजामुद्दीन की राजनीतिक भूमिका को केवल हरीश रावत के पुराने सम्बंधों के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। मौजूदा कांग्रेस संगठन में वह जिस राजनीतिक धुरी के साथ खड़े दिखाई देते हैं, वह इस बात का संकेत है कि उत्तराखण्ड कांग्रेस में पुराने रिश्तों के ऊपर नए राजनीतिक समीकरण आकार ले रहे हैं। रावत संग काजी निजामुद्दीन के सम्बंध अच्छे नहीं बताए जाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिमी हरिद्वार में हरीश रावत का प्रभाव काजी को खास नहीं सुहाता है और अब वे प्रदेश कांग्रेस भीतर मौजूद एंटी हरीश रावत टीम का हिस्सा बन चुके हैं।
हरीश रावत की सबसे बड़ी ताकत आखिर क्या है?
हरीश रावत की राजनीति को केवल उनके पिछले चुनावी परिणामों से मापना गलत होगा। यह सही है कि पिछले कुछ चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा है और 2022 में लालकुआं की हार ने उनके राजनीतिक प्रभाव पर गम्भीर सवाल भी खड़े किए। लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत किसी एक विधानसभा क्षेत्र में जीतने की क्षमता नहीं बल्कि उत्तराखण्ड के अलग-अलग हिस्सों में दशकों में बनाया गया व्यक्तिगत सम्पर्क और राजनीतिक नेटवर्क है।
रावत की शैली भी दूसरे नेताओं से अलग रही है। वह स्थानीय मुद्दों को अपनी राजनीतिक भाषा का हिस्सा बनाते हैं, गांवों और छोटे सामाजिक समूहों से संवाद करते हैं और अपने समर्थकों से व्यक्तिगत सम्बंध बनाए रखने की
कोशिश करते हैं। पहाड़, किसान, पलायन, उत्तराखण्डियत और स्थानीय अस्मिता जैसे मुद्दों को उन्होंने लम्बे समय तक अपनी राजनीति से जोड़ा है। यही कारण है कि चुनाव हारने के बावजूद उनकी राजनीतिक चर्चा समाप्त नहीं होती।
उनका दूसरा बड़ा गुण है, हार के बाद वापसी। स्वयं उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा है कि वह जितने चुनाव जीते हैं, उससे अधिक चुनाव हारे हैं लेकिन हर हार के बाद जीत के नए संकल्प के साथ खड़े हुए। यही उनका राजनीतिक चरित्र है। 2017 में मुख्यमंत्री रहते हुए कांग्रेस की हार, 2022 में लालकुआं की पराजय और उसके बाद भी लगातार सक्रिय बने रहना बताता है कि वह चुनावी हार को राजनीतिक जीवन का अंत नहीं मानते।
हरीश रावत का जनाधार भी एक जटिल राजनीतिक वास्तविकता है। उन्हें उत्तराखण्ड का सर्वमान्य नेता कहना अतिशयोक्ति होगी लेकिन उन्हें अप्रासंगिक मान लेना भी उतनी ही बड़ी राजनीतिक भूल होगी। कहा जा सकता है कि उनका जनाधार सभी सीटों पर नहीं है जिसके चलते उनके व्यक्तिगत समर्थक, पुराने कार्यकर्ता और सामाजिक सम्पर्क आज भी कांग्रेस के लिए उपयोगी हो सकते हैं। चुनाव में यही नेटवर्क उम्मीदवारों के पक्ष में माहौल बनाने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और स्थानीय समीकरणों को प्रभावित करने में भूमिका निभा सकता है।
रावत को नजरअंदाज करना कांग्रेस को पड़ सकता है भारी यही सबसे बड़ा सवाल है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस हरीश रावत को पूरी तरह नजरअंदाज करके 2027 में चुनाव लड़ सकती है? सैद्धांतिक रूप से पार्टी ऐसा कर सकती है लेकिन राजनीतिक रूप से इसके जोखिम कम नहीं हैं। रावत के समर्थकों का एक बड़ा वर्ग आज भी उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, अगर उसे लगातार उपेक्षित महसूस कराया गया तो उसका असर कई सीटों पर पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ सकता है।
उत्तराखण्ड की राजनीति में विधानसभा सीटों के परिणाम अक्सर बहुत बड़े अंतर से तय नहीं होते। ऐसे में कुछ सौ वोटों का झुकाव भी कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है। यदि हरीश रावत के समर्थक संगठन में सम्मानजनक भूमिका से वंचित होते हैं, टिकट वितरण में उन्हें लगातार नजरअंदाज किया जाता है और रावत स्वयं पार्टी की रणनीति से अलग-थलग पड़ते हैं तो यह कांग्रेस के लिए भीतर से कमजोर होने की स्थिति पैदा कर सकता है।
दूसरी तस्वीर भी है। यदि कांग्रेस केवल हरीश रावत के व्यक्तिगत प्रभाव के भरोसे चुनाव लड़ने की कोशिश करती है तो यह भी पर्याप्त नहीं होगा। 2022 का परिणाम बताता है कि व्यक्तिगत लोकप्रियता अपने आप विधानसभा चुनाव में जीत की गारंटी नहीं बनती। इसलिए कांग्रेस के लिए सही रणनीति रावत को किसी एक धड़े के नेता के रूप में देखने के बजाय उनके अनुभव, सम्पर्क और जनाधार को पार्टी के व्यापक चुनावी अभियान से जोड़ना हो सकती है।
2027 में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि वह अपने भीतर के इन सभी शक्ति-केंद्रों को किस तरह एक मंच पर लाती है। गणेश गोदियाल की संगठनात्मक भूमिका, यशपाल आर्य की विधानसभा में नेतृत्वकारी भूमिका, कुमारी शैलजा की केंद्रीय निगरानी, प्रीतम सिंह और अन्य वरिष्ठ नेताओं का अपना आधार तथा हरीश रावत का लम्बा राजनीतिक अनुभव, इन सभी को एक साथ इस्तेमाल किया जाए तो कांग्रेस के पास भाजपा को चुनौती देने की बेहतर सम्भावना होगी लेकिन अगर चुनाव से पहले पार्टी का अधिकांश समय इस बात पर खर्च होता रहा कि किस नेता को कमजोर करना है और किस नेता को आगे बढ़ाना है तो इसका सीधा फायदा विपक्ष को मिल सकता है।
फीनिक्स क्यों हैं हरीश रावत?
हरीश रावत की ताजा पोस्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि वह अपने राजनीतिक जीवन की समाप्ति का फैसला किसी दूसरे के हाथ में देने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने संन्यास की सम्भावना से इनकार नहीं किया है लेकिन साफ किया है कि जब भी ऐसा होगा, वह उनकी अपनी घोषणा होगी। यह वही आत्मविश्वास है जिसने उन्हें दशकों तक उत्तराखण्ड की राजनीति के केंद्र में बनाए रखा।
मोहनरी के छोटे से गांव से शुरू हुई उनकी राजनीतिक यात्रा राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंची। वह केंद्रीय मंत्री बने, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बने, कांग्रेस संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रहे और कई चुनावी हारों के बावजूद राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे। उनकी राजनीति में संघर्ष, महत्वाकांक्षा, पराजय और वापसी चारों तत्व हमेशा साथ रहे हैं।
इसीलिए हरीश रावत को उत्तराखण्ड की राजनीति का ‘फीनिक्स’ कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। फीनिक्स वह पौराणिक पक्षी है जिसके बारे में माना जाता है कि राख में बदल जाने के बाद भी वह फिर जन्म लेता है। रावत की राजनीति में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। जब लगता है कि उनका राजनीतिक प्रभाव समाप्त हो रहा है, वह किसी नए मुद्दे, नए अभियान या नए राजनीतिक संघर्ष के साथ फिर सामने आ जाते हैं।
2027 का चुनाव इसलिए हरीश रावत और कांग्रेस दोनों के लिए निर्णायक होगा। रावत के सामने चुनौती अपनी राजनीतिक उपयोगिता और जनाधार को साबित करने की है जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती यह तय करने की है कि वह अपने सबसे अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं में से एक को प्रतिद्वंद्वी की तरह देखेगी या चुनावी संसाधन की तरह। अगर कांग्रेस संगठनात्मक वर्चस्व की लड़ाई में हरीश रावत को पूरी तरह हाशिए पर डाल देती है तो इसका खामियाजा उसे कुछ सीटों पर भुगतना पड़ सकता है लेकिन यदि रावत को पार्टी की सामूहिक रणनीति में सम्मानजनक भूमिका मिलती है और उनके अनुभव तथा नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है तो वही व्यक्ति, जिसे आज कुछ लोग राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक साबित करना चाहते हैं, 2027 में कांग्रेस के लिए सबसे उपयोगी चुनावी चेहरों में से एक साबित हो सकता है।
हरीश रावत की ताजा पोस्ट कम से कम इतना तो स्पष्ट करती ही है कि उनकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। वह खुद लिख रहे हैं कि प्रारब्ध में जो लिखा होगा वही होगा लेकिन प्रारब्ध को बदलने की कोशिश करना और उसके लिए संघर्ष करना ही उनकी खासियत है। यानी राजनीतिक संन्यास की चर्चाओं के बीच ‘हरदा’ का संदेश साफ है, अभी राख ठंडी नहीं हुई है और फीनिक्स ने उड़ान भरने की उम्मीद छोड़ी नहीं है।
हरीश रावत की राजनीति को केवल उनके पिछले चुनावी परिणामों से मापना गलत होगा। यह सही है कि पिछले कुछ चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा है और 2022 में लालकुआं की हार ने उनके राजनीतिक प्रभाव पर गम्भीर सवाल भी खड़े किए। लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत किसी एक विधानसभा क्षेत्र में जीतने की क्षमता नहीं बल्कि उत्तराखण्ड के अलग-अलग हिस्सों में दशकों में बनाया गया व्यक्तिगत सम्पर्क और राजनीतिक नेटवर्क है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस हरीश रावत को पूरी तरह नजरअंदाज करके 2027 में चुनाव लड़ सकती है? सैद्धांतिक रूप से पार्टी ऐसा कर सकती है लेकिन राजनीतिक रूप से इसके जोखिम कम नहीं हैं। रावत के समर्थकों का एक बड़ा वर्ग आज भी उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, अगर उसे लगातार उपेक्षित महसूस कराया गया तो उसका असर कई सीटों पर पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ सकता है। उत्तराखण्ड की राजनीति में विधानसभा सीटों के परिणाम अक्सर बहुत बड़े अंतर से तय नहीं होते। ऐसे में कुछ सौ वोटों का झुकाव भी कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है। यदि हरीश रावत के समर्थक संगठन में सम्मानजनक भूमिका से वंचित होते हैं, टिकट वितरण में उन्हें लगातार नजरअंदाज किया जाता है और रावत स्वयं पार्टी की रणनीति से अलग- थलग पड़ते हैं तो यह कांग्रेस के लिए भीतर से कमजोर होने की स्थिति पैदा कर सकता है