प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को दुनिया की बड़ी खेल शक्ति बनाने और ओलम्पिक में अधिक खेलों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। खेल बजट में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है लेकिन झारखंड के थ्रो बाॅल खिलाड़ी अमरदीप कुमार की कहानी इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू सामने लाती है। देश के लिए चार अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीत चुके अमरदीप आज सब्जियां बेचकर गुजर-बसर करने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि बढ़ते खेल बजट का लाभ क्या वास्तव में जमीनी स्तर के खिलाड़ियों तक पहुंच रहा है? क्या देश के लिए पदक जीतने वाले खिलाड़ियों के सम्मानजनक भविष्य की कोई ठोस गारंटी है?
भारत को दुनिया की खेल महाशक्ति बनाने का लक्ष्य अब देश की खेल नीति के केंद्र में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि भारत को ओलम्पिक में केवल कुछ चुनिंदा खेलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि ज्यादा से ज्यादा खेलों में अपनी भागीदारी बढ़ानी चाहिए। इसके पीछे सोच साफ है कि यदि भारत को दुनिया के शीर्ष खेल राष्ट्रों में पहुंचना है तो अधिक खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार करना होगा और खेलों का दायरा भी बढ़ाना होगा। सरकार खेलों के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने और खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं देने पर भी जोर दे रही है। केंद्रीय बजट 2026-27 में युवा मामले एवं खेल मंत्रालय के लिए 4,479.88 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है जो 2025-26 के 3,346 करोड़ रुपए से करीब 1,133 करोड़ रुपये अधिक है। सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य 2036 तक भारत को दुनिया के शीर्ष 10 खेल राष्ट्रों और 2047 तक शीर्ष पांच खेल राष्ट्रों में शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ना है लेकिन इन बड़े लक्ष्यों के बीच थ्रो बाॅल में भारत का प्रतिनिधित्व करने और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश के लिए चार स्वर्ण पदक जीत चुके झारखंड के 29 वर्षीय अमरदीप कुमार की सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
असल में वायरल वीडियो में रांची के अरगोड़ा चैक पर सड़क किनारे सब्जियां बेचता एक युवक पहली नजर में किसी सामान्य दुकानदार जैसा दिखाई देता है। हाथ में तराजू, सामने सब्जियां और ग्राहकों को सामान तौलता हुआ यह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि अमरदीप कुमार हैं। उन्होंने थ्रो बाॅल में भारत का प्रतिनिधित्व किया है और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश के लिए स्वर्ण पदक जीते हैं। उनके घर की दीवार पर टंगे मेडल आज भी उनकी खेल उपलब्धियों की गवाही देते हैं। एक ओर चमकते स्वर्ण पदक हैं और दूसरी तरफ परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए सब्जियां बेचने की मजबूरी। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने अमरदीप की इस जिंदगी को देश के सामने लाने का काम किया। इसके बाद सोशल मीडिया, मीडिया और खेल जगत में सवाल उठने लगे कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ी को आर्थिक संघर्ष से क्यों गुजरना पड़ रहा है? क्या बढ़ते खेल बजट का लाभ वास्तव में जमीनी स्तर के खिलाड़ियों तक पहुंच रहा है? क्या किसी खिलाड़ी का भविष्य केवल उसके जज्बे और संघर्ष पर निर्भर होना चाहिए? क्या देश के लिए पदक जीतने वाले हर खिलाड़ी के लिए सम्मानजनक भविष्य की कोई गारंटी है? क्या गैर-ओलम्पिक खेलों के खिलाड़ियों को कम महत्व मिलेगा? आखिर पदकों की कीमत खिलाड़ी को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में क्यों चुकानी पड़ रही है? ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत ओलम्पिक में अधिक से अधिक खेलों में अपनी भागीदारी बढ़ाने और दुनिया की खेल महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है।
खेल विश्लेषकों का कहना है कि अमरदीप अकेले ऐसे खिलाड़ी नहीं हैं जिनके सामने आर्थिक चुनौतियां हैं। क्रिकेट जैसे बेहद लोकप्रिय खेलों में व्यावसायिक अवसर अधिक हैं लेकिन कई अन्य खेलों के खिलाड़ियों के लिए करियर बनाना और उसे लम्बे समय तक जारी रखना मुश्किल होता है। कई खिलाड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए परिवार से आर्थिक मदद लेते हैं। कुछ कर्ज लेते हैं तो कुछ नौकरी या छोटा व्यवसाय करते हुए अभ्यास जारी रखते हैं। आर्थिक दबाव के कारण कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी खेल ही छोड़ देते हैं।
अमरदीप ने अभी खेल से अपना रिश्ता खत्म नहीं किया है। वह रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के बावजूद खेल से जुड़े रहना चाहते हैं और भविष्य में फिर देश के लिए पदक जीतने का सपना देखते हैं लेकिन असली सवाल यही है कि क्या किसी खिलाड़ी का भविष्य केवल उसके जज्बे और संघर्ष पर निर्भर होना चाहिए? खेल में पदक जीतना किसी भी खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है लेकिन पदक जीतने के बाद खिलाड़ी का जीवन खत्म नहीं होता। उसके सामने परिवार, रोजगार, प्रशिक्षण और भविष्य की वही चुनौतियां रहती हैं जो किसी दूसरे व्यक्ति के सामने होती हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों की उपलब्धियों का व्यवस्थित रिकाॅर्ड होना चाहिए और पात्रता के आधार पर उन्हें रोजगार, पुरस्कार, प्रशिक्षण सहायता या अन्य सरकारी सुविधाओं तक पहुंच मिलनी चाहिए। विशेष रूप से उन खेलों में, जहां व्यावसायिक अवसर सीमित हैं, सरकारी और संस्थागत सहयोग की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। अमरदीप की कहानी यही सवाल छोड़ जाती है कि क्या भारत के खेल बजट की बढ़ती चमक अब उन खिलाड़ियों की जिंदगी तक भी पहुंचेगी जिनके पदकों ने कभी देश का सिर गर्व से ऊंचा किया था।
महज 13 साल की उम्र से शुरू हुआ खेल का सफर
अमरदीप का खेल सफर बेहद साधारण परिस्थितियों में शुरू हुआ। कम उम्र में थ्रो बाॅल के प्रति उनकी रुचि देखकर स्थानीय स्तर के एक खिलाड़ी ने उनकी प्रतिभा पहचानी और रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में उन्हें प्रशिक्षण का अवसर मिला। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि प्रशिक्षण, यात्रा और प्रतियोगिताओं पर लगातार बड़ी रकम खर्च की जा सके। इसके बावजूद अमरदीप ने अभ्यास नहीं छोड़ा। परिवार की सब्जी की दुकान पर मदद करने के बाद वह मैदान में प्रशिक्षण के लिए जाते थे। यानी बचपन से ही उनके सामने दो जिम्मेदारियां थीं, परिवार की मदद करना और खिलाड़ी बनने का सपना पूरा करना। वर्ष 2013 के आस-पास शुरू हुआ उनका खेल सफर धीरे-धीरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। वर्ष 2015 उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव बना, जब मलेशिया में आयोजित एशियन जूनियर थ्रो बाॅल चैम्पियनशिप में उन्होंने भारत के लिए स्वर्ण पदक हासिल किया।
मलेशिया से रांची तक स्वर्णिम यात्रा
वर्ष 2015 की सफलता के बाद अमरदीप ने कई प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2017 में काठमांडू में आयोजित इंडो-नेपाल थ्रो बाॅल चैम्पियनशिप और 2019 में बेंगलुरु में हुई साउथ एशियन थ्रो बाॅल चैम्पियनशिप में भी उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल किया। 2026 में रांची में आयोजित प्रतियोगिता में भी उनके खाते में स्वर्ण पदक आया। इस तरह उनके नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चार स्वर्ण पदक हैं लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद उन्हें ऐसी स्थायी आर्थिक सुरक्षा नहीं मिल सकी, जिससे परिवार की जरूरतें आसानी से पूरी हो सकें। अमरदीप की कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि मैदान पर पदक तो हैं लेकिन मैदान के बाहर आर्थिक संघर्ष जारी है।
पदकों के साथ बढ़ता गया कर्ज
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंचना अमरदीप के लिए आसान नहीं था। यात्रा, प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं से जुड़े खर्चों की व्यवस्था करने के लिए परिवार को कई बार कर्ज लेना पड़ा। आर्थिक स्थिति सीमित होने के बावजूद माता-पिता ने बेटे के खेल करियर में पूरा सहयोग किया। पिता सब्जी बेचते हैं, मां घर सम्भालने के साथ जरूरत पड़ने पर घर-घर सब्जियां बेचती हैं और बड़े भाई छोटी दुकान चलाते हैं। जब खेल से पर्याप्त आमदनी नहीं हुई तो अमरदीप ने परिवार की जिम्मेदारी सम्भालने के लिए खुद भी सब्जी बेचने और कैब चलाने का काम शुरू कर दिया। इस तरह उनकी कहानी केवल एक खिलाड़ी की उपलब्धियों की कहानी नहीं है, बल्कि उस परिवार के संघर्ष की भी कहानी है, जिसने बेटे के खेल के सपने के लिए अपनी आर्थिक क्षमता से आगे जाकर प्रयास किया।
क्या गैर-ओलम्पिक खेलों के खिलाड़ियों को कम महत्व मिलेगा?
अमरदीप के मामले में थ्रो बाॅल का ओलम्पिक खेल न होना भी एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में सामने आता है। उनका कहना है कि थ्रो बाॅल को लोकप्रिय खेलों की तुलना में कम महत्व मिलता है और विभागीय स्तर पर उन्हें यह भी बताया गया कि यह ओलम्पिक खेल नहीं है। यह स्थिति उस समय और बड़ा सवाल खड़ा करती है, जब भारत ज्यादा से ज्यादा ओलम्पिक खेलों में अपनी भागीदारी बढ़ाने की बात कर रहा है। हर खेल का ओलम्पिक में शामिल होना सम्भव नहीं है लेकिन किसी गैर-ओलम्पिक खिलाड़ी की उपलब्धि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खेल प्रतिभा को केवल ओलम्पिक पदक की सम्भावना के आधार पर देखने से देश की कई प्रतिभाएं व्यवस्था से बाहर हो सकती हैं।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने लिया संज्ञान
अमरदीप का वीडियो वायरल होने के बाद मामला झारखंड सरकार तक पहुंचा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मामले का संज्ञान लेते हुए खेल विभाग को आवश्यक निर्देश दिए हैं। अमरदीप ने आर्थिक सहायता और रोजगार के लिए सम्बंधित विभागों के सामने आवेदन भी किए हैं। उनका कहना है कि सरकारी नौकरी और नकद पुरस्कार के लिए उन्होंने कई बार प्रयास किया लेकिन अभी तक ऐसी ठोस मदद नहीं मिल सकी, जिससे उनकी आर्थिक परेशानी स्थायी रूप से दूर हो सके।
राज्य के खेल विभाग की ओर से संकेत दिया गया है कि थ्रो बाॅल खिलाड़ियों के लिए कुछ प्रावधान मौजूद हैं और अमरदीप को किस योजना या मद के तहत सहायता दी जा सकती है, इस पर विचार किया जा रहा है। सवाल यह है कि सरकारी संज्ञान के बाद अमरदीप को वास्तविक सहायता कब और किस रूप में मिलती है।
बजट बढ़ना ही काफी नहीं
भारत का लक्ष्य दुनिया के शीर्ष खेल राष्ट्रों में शामिल होना है। इसके लिए बड़े स्टेडियम, आधुनिक सुविधाएं और बढ़ता बजट निश्चित रूप से जरूरी हैं। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि देश के खिलाड़ियों को यह भरोसा हो कि उनका भविष्य सुरक्षित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ज्यादा से ज्यादा खेलों में भारत की भागीदारी बढ़ाने का संदेश देश के खेल भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। बढ़ता खेल बजट भी इसी दिशा में उम्मीद पैदा करता है लेकिन इन लक्ष्यों की असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब छोटे और कम लोकप्रिय खेलों के खिलाड़ी भी इस बदलाव का हिस्सा बनें।
अमरदीप कुमार की कहानी इसी बहस को सामने लाती है। एक तरफ भारत ओलम्पिक में ज्यादा पदक जीतने और दुनिया की खेल महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है, तो दूसरी ओर चार अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीत चुका खिलाड़ी परिवार का खर्च चलाने के लिए सब्जी बेच रहा है और कैब चला रहा है। यह तस्वीर केवल भावुक करने वाली नहीं है। यह खेल व्यवस्था के सामने एक गम्भीर सवाल है।
भारत को पदक जीतने वाले खिलाड़ी चाहिए लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि पदक जीतने के बाद खिलाड़ी का जीवन भी सम्मानजनक और सुरक्षित हो क्योंकि खेल शक्ति केवल मेडल टैली से नहीं बनती। असली खेल शक्ति तब बनेगी, जब देश का खिलाड़ी मैदान में उतरते समय यह भरोसा महसूस करे कि उसके पीछे उसका परिवार ही नहीं बल्कि पूरा खेल तंत्र भी खड़ा है।
जरूरत ऐसी खेल नीति की है जिसमें प्रतिभा की पहचान, प्रशिक्षण, प्रतियोगिता खर्च, रोजगार और खेल के बाद की आर्थिक सुरक्षा को भी महत्व दिया जाए। खेल बजट में वृद्धि निश्चित रूप से सकारात्मक कदम है। आधुनिक स्टेडियम, बेहतर कोचिंग, खेल विज्ञान, पोषण और अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी के लिए पर्याप्त संसाधन जरूरी हैं लेकिन खेल बजट की सफलता केवल करोड़ों रुपए के आवंटन से तय नहीं होती। असली सवाल यह है कि योजनाओं का लाभ उस खिलाड़ी तक कितना पहुंच रहा है, जो सीमित संसाधनों में अभ्यास कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना देख रहा है। किसी छोटे शहर या सामान्य परिवार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। ऐसे खिलाड़ियों के पीछे परिवार, स्थानीय प्रशिक्षक और छोटे खेल संगठन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए खिलाड़ियों के लिए प्रतियोगिता खर्च के साथ-साथ करियर सुरक्षा, रोजगार और खेल के बाद सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था भी जरूरी है। आखिर भारत को सिर्फ पदक जीतने वाले खिलाड़ी नहीं बल्कि पदक जीतने के बाद भी सम्मान से जीने वाले खिलाड़ी चाहिए। यही किसी भी खेल महाशक्ति की असली पहचान होगी।