सोना शिफ्ट कर रहे देश, किस खतरे का डर?

यूरोप के केंद्रीय बैंक सैकड़ों टन सोना अमेरिका से निकालकर लंदन और अपने देशों के बीच पुनव्र्यवस्थित कर रहे हैं। वजह सिर्फ सोने की बढ़ती कीमत नहीं बल्कि बदलती भू-राजनीति, अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर बढ़ती निर्भरता को लेकर सावधानी और किसी बड़े संकट की स्थिति में अपने रिजर्व को तुरंत इस्तेमाल करने की तैयारी है लेकिन इसे किसी आसन्न आर्थिक तबाही का संकेत मानना जल्दबाजी होगी

यूरोप के कुछ केंद्रीय बैंकों का अपने सोने के भंडार को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना पहली नजर में महज एक तकनीकी और वित्तीय प्रबंधन का मामला लग सकता है लेकिन इसके पीछे जिस तरह की वैश्विक परिस्थितियां हैं, उन्होंने इस पूरी कवायद को खासा महत्वपूर्ण बना दिया है। नीदरलैंड्स ने हाल में अमेरिका और कनाडा में रखे अपने सोने के एक हिस्से को लंदन स्थानांतरित किया है। फ्रांस भी अमेरिका में रखे अपने सोने को वापस यूरोप ले जा चुका है जबकि जर्मनी कई साल पहले न्यूयाॅर्क और पेरिस से बड़ी मात्रा में अपना सोना वापस ला चुका है। सवाल इसलिए उठ रहा है कि आखिर यूरोप के केंद्रीय बैंक ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या उन्हें अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर भरोसा कम हो रहा है? या फिर दुनिया किसी ऐसे आर्थिक और भू-राजनीतिक दौर में प्रवेश कर रही है जहां केंद्रीय बैंक अपने सबसे महत्वपूर्ण रिजर्व एसेट को अपने ज्यादा करीब रखना चाहते हैं?

सबसे ताजा मामला नीदरलैंड्स का है। नीदरलैंड्स के केंद्रीय बैंक डी नीदरलैंड्स बैंक यानी डीएनबी ने 2 सितम्बर को बताया कि मार्च से अगस्त 2026 के बीच अमेरिका और कनाडा में रखे लगभग 313 टन सोने में से करीब 86 टन को लंदन स्थानांतरित किया गया। डीएनबी के मुताबिक इसका उद्देश्य बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच संकट से निपटने की अपनी तैयारी को मजबूत करना और सोने को जरूरत पड़ने पर अधिक आसानी से इस्तेमाल करने योग्य बनाना है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। नीदरलैंड्स ने यह नहीं कहा है कि उसे अमेरिका में रखा अपना सोना असुरक्षित लगता है या अमेरिका से कोई तत्काल खतरा है। आधिकारिक बयान में जोर ‘क्राइसिस प्रिपेयर्डनेस’, यानी संकट की स्थिति के लिए तैयारी और सोने की ‘ट्रेडेबिलिटी’ यानी उसे तेजी से बाजार में इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ाने पर है। डीएनबी का कहना है कि सोने को उत्तरी अमेरिका, ब्रिटेन और
नीदरलैंड्स के बीच ज्यादा संतुलित तरीके से रखने से जोखिमों का वितरण बेहतर होता है और संकट के समय रिजर्व ज्यादा आसानी से उपलब्ध हो सकता है।
सवाल अमेरिका से ज्यादा लंदन का क्यों?
पहली नजर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर यूरोपीय देश
अमेरिका से सोना निकाल रहे हैं तो उसे लंदन क्यों ले जा रहे हैं? क्या इसका मतलब यह है कि अमेरिका से भरोसा हट रहा है और ब्रिटेन पर भरोसा बढ़ रहा है?

तस्वीर इतनी सीधी नहीं है
लंदन दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण सोना कारोबार केंद्र है। बैंक आॅफ इंग्लैंड स्वयं दुनिया के प्रमुख गोल्ड कस्टोडियन में शामिल है। उसके भूमिगत वाॅल्ट में लगभग चार लाख गोल्ड बार रखे हुए हैं, जिनकी कुल कीमत 200 अरब पाउंड से अधिक बताई जाती है। इन वाॅल्ट में ब्रिटेन के अलावा दूसरे केंद्रीय बैंकों और वित्तीय संस्थानों का सोना भी रखा जाता है। यानी लंदन में सोना रखना सिर्फ उसे किसी सुरक्षित तिजोरी में बंद कर देना नहीं है। वहां सोने को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपेक्षाकृत तेजी से खरीदा-बेचा या एक वित्तीय केंद्र से दूसरे केंद्र में समायोजित किया जा सकता है। किसी भी केंद्रीय बैंक के लिए संकट के समय यही ‘लिक्विडिटी’ बेहद महत्वपूर्ण होती है। यही कारण है कि नीदरलैंड के फैसले को अमेरिका से पूरी तरह दूरी बनाने के बजाय अपने रिजर्व के भौगोलिक और वित्तीय वितरण को बदलने की रणनीति के रूप में देखना अधिक उचित है।

नीदरलैंड्स के मामले में तो यह भी सामने आया है कि 86 टन की पूरी मात्रा को भौतिक रूप से अटलांटिक पार नहीं ले जाया गया। कुछ सोना अमेरिका में बेचा गया और लंदन में उतनी ही मात्रा खरीदी गई। इससे वास्तविक भौतिक परिवहन की जरूरत कम हो जाती है। कुछ मात्रा को वास्तव में उत्तरी अमेरिका से नीदरलैंड्स लाया गया और फिर लंदन भेजा गया। यह बताता है कि केंद्रीय बैंक सोने की ‘लोकेशन’ बदलने के लिए हमेशा ट्रकों या विमानों में गोल्ड बार भरकर भेजने पर निर्भर नहीं होते, अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मार्केट की व्यवस्था के जरिए भी रिजर्व को एक वित्तीय केंद्र से दूसरे में स्थानांतरित किया जा सकता है।

फ्रांस और जर्मनी पहले ही कर चुके हैं यही काम
नीदरलैंड्स का कदम इसलिए ज्यादा चर्चा में है क्योंकि यह ऐसे समय में आया है जब यूरोप के दूसरे बड़े देश भी पहले से अपने गोल्ड रिजर्व की लोकेशन को लेकर सक्रिय रहे हैं। फ्रांस हाल के वर्षों में अमेरिका में रखे अपने सोने का एक हिस्सा वापस यूरोप लाया है। जर्मनी ने भी अपने विशाल गोल्ड रिजर्व का बड़ा हिस्सा देश में वापस स्थानांतरित किया था। बुंडेसबैंक ने न्यूयाॅर्क से 111 टन और पेरिस से 105 टन सोना वापस जर्मनी लाने की प्रक्रिया पूरी की थी। जर्मनी का मामला खास तौर पर दिलचस्प है क्योंकि वह दुनिया के सबसे बड़े सरकारी गोल्ड होल्डरों में है। इसके बावजूद जर्मन केंद्रीय बैंक ने न्यूयाॅर्क में अपने सोने का एक हिस्सा बनाए रखा है। इसका अर्थ यह है कि यूरोपीय केंद्रीय बैंकों की रणनीति पूरी तरह ‘सोना घर वापस लाओ’ वाली नहीं है। रणनीति ज्यादा व्यापक है, सोने को अलग-अलग सुरक्षित वित्तीय केंद्रों में इस तरह रखना कि किसी एक देश, बाजार या भौगोलिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता न हो।

क्या अमेरिका पर भरोसा कम हो रहा है?
यह इस कहानी का सबसे राजनीतिक और संवेदनशील पहलू है। अमेरिका दशकों से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का केंद्र रहा है। डाॅलर दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी है और न्यूयाॅर्क दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय बाजारों में से एक है। अमेरिकी संस्थानों में विदेशी केंद्रीय बैंकों के अरबों-खरबों डॉलर के रिजर्व और परिसम्पत्तियां रहती हैं। इसलिए अगर यूरोप के केंद्रीय बैंक अपने गोल्ड रिजर्व की लोकेशन पर दोबारा विचार कर रहे हैं तो इसे केवल सोने की तिजोरी बदलने की घटना मानना पर्याप्त नहीं होगा। हालांकि यह कहना भी सही नहीं होगा कि यूरोप अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था से बाहर निकल रहा है। असल बदलाव शायद ‘निर्भरता कम करने’ की दिशा में है।

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने देखा है कि भू-राजनीतिक संघर्ष किस तरह वित्तीय सम्पत्तियों तक पहुंच को प्रभावित कर सकते हैं। रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और उसके विदेशी रिजर्व के फ्रीज किए जाने के बाद दुनिया के कई केंद्रीय बैंकों ने इस बात पर नए सिरे से विचार किया कि उनके विदेशी मुद्रा भंडार और रिजर्व एसेट्स कितने सुरक्षित, उपलब्ध और राजनीतिक जोखिमों से मुक्त हैं।

सोना इस लिहाज से अलग परिसम्पत्ति है। यह किसी दूसरे देश की देनदारी नहीं है। इसके लिए किसी सरकार या बैंक की भुगतान क्षमता पर उसी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ता जिस तरह किसी विदेशी बाॅन्ड या करेंसी रिजर्व के लिए पड़ता है। इसी वजह से पिछले कुछ वर्षों में केंद्रीय बैंकों की सोने में दिलचस्पी तेजी से बढ़ी है।
केंद्रीय बैंक आखिर इतना सोना खरीद क्यों रहे हैं?

विश्व गोल्ड काउंसिल के 2026 के केंद्रीय बैंक सर्वे के मुताबिक पिछले चार वर्षों में केंद्रीय बैंकों ने औसतन करीब 1,000 टन सोना सालाना जमा किया है। इससे पहले के दशक में यह औसत करीब 500 टन था। यानी केंद्रीय बैंकों की औसत वार्षिक खरीद लगभग दोगुनी हो गई है।

यह कोई अचानक पैदा हुआ रुझान नहीं है। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से केंद्रीय बैंकों की सोने के प्रति दिलचस्पी धीरे-धीरे बढ़ी। 2022 और 2023 में वैश्विक केंद्रीय बैंकों की खरीद एक हजार टन से ऊपर चली गई। 2024 में भी केंद्रीय बैंकों ने 1,045 टन सोना खरीदा था। 2025 में खरीद घटकर 863 टन रही लेकिन यह अभी भी 2010-2021 के 473 टन के औसत से काफी अधिक थी। इसका अर्थ है कि केंद्रीय बैंक सोने को अब सिर्फ पुराने जमाने की निष्क्रिय सम्पत्ति नहीं मान रहे। वे इसे विदेशी मुद्रा भंडार में एक रणनीतिक सम्पत्ति के रूप में देख रहे हैं।

विश्व गोल्ड काउंसिल के सर्वे में भू-राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता को इस बढ़ती भूमिका के महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में रेखांकित किया गया है।

क्या दुनिया डाॅलर से दूरी बना रही है?
यहां भी जवाब ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना गलत होगा। दुनिया रातोंरात डाॅलर को छोड़ने नहीं जा रही। अमेरिकी डाॅलर अभी भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण करेंसी है। अमेरिकी वित्तीय बाजारों की गहराई और तरलता का मुकाबला करना आसान नहीं है लेकिन केंद्रीय बैंक अपने रिजर्व को अधिक विविध बनाना चाहते हैं। सोना इस रणनीति का एक हिस्सा है।

सोना किसी दूसरे देश की करेंसी नहीं है और इसकी कीमत किसी एक सरकार की मौद्रिक नीति पर निर्भर नहीं करती। यही वजह है कि जब महंगाई, मुद्रा संकट, युद्ध, प्रतिबंध या वित्तीय अस्थिरता जैसी स्थितियां पैदा होती हैं तो सोना केंद्रीय बैंकों के लिए एक रणनीतिक सुरक्षा कवच बन सकता है। इसी संदर्भ में नीदरलैंड्स का फैसला महत्वपूर्ण है। उसने अमेरिकी और कनाडाई भंडार को पूरी तरह खाली नहीं किया है। बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में अपने सोने का वितरण बदला है।

सोने की कीमत और इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू
इस पूरी कवायद का एक और महत्वपूर्ण कारण सोने की कीमत है। 2026 में सोना अभूतपूर्व ऊंचाइयों के आस-पास कारोबार कर रहा है। अगस्त के अंत में गोल्डमैन सैक्स ने वर्ष के अंत तक सोने की कीमत 4,900 डाॅलर प्रति ट्राॅय औंस तक पहुंचने का अनुमान लगाया था। बैंक ने केंद्रीय बैंकों की मजबूत मांग को इस अनुमान के प्रमुख आधारों में शामिल किया।  हालांकि बाजार में कीमत लगातार ऊपर नहीं जा रही। सितम्बर की शुरुआत में अमेरिकी रोजगार आंकड़ों और ब्याज दरों को लेकर बदली उम्मीदों के बीच सोने में गिरावट भी देखी गई। 7 सितम्बर को स्पाॅट गोल्ड लगभग 4,405 डाॅलर प्रति औंस के आस-पास था। इससे एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है कि केंद्रीय बैंक सोने को सिर्फ इसलिए नहीं खरीद रहे कि इसकी कीमत कल और बढ़ेगी। उनके लिए यह दीर्घकालिक रिजर्व रणनीति का हिस्सा है। गोल्डमैन सैक्स के हालिया विश्लेषण में भी केंद्रीय बैंकों की मांग को सोने की दीर्घकालिक मजबूती के प्रमुख कारकों में माना गया है।

क्या यूरोप को किसी बड़े संकट का डर है?
सबसे बड़ा सवाल यही है और इसका जवाब सावधानी से देना होगा। अभी उपलब्ध सूचनाओं से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि यूरोपीय केंद्रीय बैंकों को किसी निश्चित तारीख पर आने वाली आर्थिक तबाही की जानकारी है।
नीदरलैंड्स ने खुद कहा है कि उसे उम्मीद है कि उसके संकट संबंधी इंतजामों का कभी इस्तेमाल न करना पड़े लेकिन केंद्रीय बैंक मानते हैं कि अगर कोई गंभीर संकट आता है तो उसके पास तुरंत कार्रवाई करने की क्षमता होनी चाहिए। इसलिए यह कदम ‘तबाही आने वाली है’ का संकेत कम और ‘अगर तबाही आई तो हम तैयार रहें’ की रणनीति ज्यादा है।

आज की दुनिया में संकट का अर्थ केवल युद्ध नहीं है। यह बैंकिंग संकट, मुद्रा संकट, प्रतिबंध, व्यापार युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगाई, सम्प्रभु ऋण संकट या वित्तीय बाजारों में अचानक पैदा हुई तरलता की समस्या भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक के लिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि उसका रिजर्व सिर्फ कागज पर मौजूद न हो बल्कि जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल भी किया जा सके।

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