खतरे में ब्रांड मोदी

जिस युवा पीढ़ी को ‘काॅकरोच’ कहे जाने की टिप्पणी ने आहत किया था, उसी पीढ़ी के आंदोलन ने कुछ ही महीनों में भारतीय राजनीति को एक असाधारण मोड़ पर लाने का काम कर दिखाया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया और अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा जुलाई के छात्र आंदोलनों से जुड़ी देशभर में दर्ज एफआईआर बंद करने का आदेश इस आंदोलन के प्रभाव को बताने के लिए पर्याप्त है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों, ‘टाइम’, ‘द न्यूयाॅर्क टाइम्स’, ‘द गार्जियन’, ‘फाइनेंशियल टाइम्स’, ‘राॅयटर्स’ और ‘एसोसिएटेड प्रेस’ आदि इस घटनाक्रम को केवल एक छात्र आंदोलन नहीं मान रहा है बल्कि नरेंद्र मोदी की वर्षों से निर्मित राजनीतिक छवि, मीडिया नियंत्रण और युवाओं के बीच उनकी स्वीकार्यता के लिए उभरती चुनौती के रूप में देख रहा है। दिलचस्प बात यह है कि भारत के टेलीविजन स्टूडियो में दिखाई गई तस्वीर और दुनिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों के विश्लेषण में काफी अंतर दिखाई देता है
इतिहास गवाह है कि कुछ घटनाएं अपने तत्काल परिणामों से कहीं अधिक बड़ा अर्थ पैदा करती हैं। जुलाई में शुरू हुआ छात्र आंदोलन भी अब ऐसा ही एक घटनाक्रम बन चुका है। जिस आंदोलन की शुरुआत शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा में गड़बड़ी, प्रश्नपत्र लीक और रोजगार के संकट से नाराज युवाओं के बीच हुई थी, वह देखते ही देखते केंद्र सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन गया। इसका सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक अध्याय 1 सितम्बर को सामने आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के बीच हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी देशभर में दर्ज प्राथमिकी यानी एफआईआर को बंद करने का आदेश दिया।

संविधान के अनुच्छेद 142 में मिली अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन घटनाओं के सम्बंध में दर्ज मामलों को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा और उन्हीं घटनाओं को लेकर भविष्य में नई एफआईआर भी दर्ज नहीं की जाएगी। अदालत ने इस राहत को केवल दिल्ली या कुछ राज्यों तक सीमित नहीं रखा है बल्कि इसे पूरे देश के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक प्रभावी बना दिया है। हालांकि गम्भीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले तथा हिंसा या सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे गम्भीर मामलों में कथित रूप से शामिल कुछ लोगों को इस राहत से बाहर रखा गया है। अदालत ने साफ किया कि यह आदेश विशेष परिस्थितियों में युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखकर दिया गया है।

इस फैसले की अहमियत इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि आंदोलन किसी स्थापित राजनीतिक दल के नेतृत्व में शुरू नहीं हुआ था। न यह कांग्रेस का आंदोलन था, न भारतीय जनता पार्टी का और न किसी दूसरे पारम्परिक राजनीतिक संगठन का। यह सोशल मीडिया पर जन्मा एक ऐसा आंदोलन था, जिसने कुछ ही समय में लाखों युवाओं को जोड़ दिया और फिर सड़क पर उतरकर सरकार के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। यही वह आंदोलन था जिसकी पहचान एक ऐसे शब्द से बनी, जो बाद में सत्ता के खिलाफ व्यंग्य का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया ‘काॅकरोच’।

मई में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की एक टिप्पणी को लेकर विवाद हुआ था। मीडिया के एक हिस्से ने इसे बेरोजगार युवाओं और विभिन्न प्रकार के कार्यकर्ताओं के संदर्भ में ‘पैरासाइट’ और ‘काॅकरोच’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल के रूप में रिपोर्ट किया। हालांकि बाद में मुख्य न्यायाधीश ने इस पर सफाई देते हुए कहा था कि उनकी टिप्पणी को गलत संदर्भ में पेश किया गया तथा उनका आशय फर्जी डिग्री के आधार पर पेशे में प्रवेश करने वालों से था लेकिन तब तक वह शब्द युवाओं के हाथ में एक राजनीतिक हथियार बन चुका था।
बोस्टन में पढ़ रहे भारतीय छात्र अभिजीत दिपके ने इसी टिप्पणी को व्यंग्य में बदलते हुए ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ नाम का आॅनलाइन संगठन बनाया। शुरुआत में यह एक मजाक था लेकिन कुछ ही दिनों में यह मजाक लाखों युवाओं की डिजिटल पहचान बन गया। ‘राॅयटर्स’ की शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक संगठन के इंस्टाग्राम फाॅलोवर्स की संख्या कुछ ही दिनों में करीब डेढ़ करोड़ तक पहुंच गई और उसने उस समय भारतीय जनता पार्टी के आधिकारिक खाते को भी पीछे छोड़ दिया।

परीक्षा से शुरू हुआ असंतोष व्यवस्था के खिलाफ गुस्से में बदला
इस आंदोलन की जड़ में केवल राजनीति नहीं थी। इसके पीछे भारत के युवाओं के बीच वर्षों से जमा हो रहा शिक्षा और रोजगार का असंतोष था। मेडिकल प्रवेश परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक होने और उसके बाद परीक्षा रद्द किए जाने से यह गुस्सा खुलकर सामने आया। लाखों छात्रों ने जिस परीक्षा के लिए वर्षों तैयारी की थी, उसमें गड़बड़ी सामने आई और उन्हें दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। जिन परिवारों ने कोचिंग, फीस और तैयारी पर अपनी बचत खर्च की थी, उनके सामने यह सवाल खड़ा हुआ कि यदि परीक्षा की निष्पक्षता की कोई गारंटी नहीं है तो उनके बच्चों का भविष्य किस भरोसे पर टिका है।

ब्रिटेन के प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने इस आंदोलन को इसी व्यापक आर्थिक और सामाजिक असंतोष से जोड़कर देखा है। उसके विश्लेषण में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की बढ़ती संख्या और उनके अनुरूप गुणवत्तापूर्ण रोजगार के सीमित अवसरों के बीच पैदा हुआ अंतर महत्वपूर्ण है। डिग्रियां बढ़ रही हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है लेकिन स्थायी और सम्मानजनक रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ रहे। ऐसे में परीक्षा में गड़बड़ी केवल परीक्षा की समस्या नहीं रह जाती बल्कि वह पूरे भविष्य के प्रति अविश्वास में बदल जाती है। यही कारण है कि आंदोलन का दायरा धीरे-धीरे बढ़ता गया। शिक्षा मंत्री से शुरू हुआ विरोध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंच गया क्योंकि युवाओं की नजर में केंद्र सरकार ही उस व्यवस्था की सर्वोच्च राजनीतिक जिम्मेदार थी जो उन्हें शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर लगातार निराश कर रही थी।

‘टाइम’ ने काॅकरोच से शुरू की मोदी की कहानी
इस आंदोलन पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सबसे तीखी राजनीतिक व्याख्या न्यूयॉर्क (अमेरिका) से प्रकाशित होने वाले महत्वपूर्ण साप्ताहिक ‘टाइम’ पत्रिका में प्रकाशित भारतीय राजनीतिक विश्लेषक असीम अली के लेख ‘काॅकरोचों का विद्रोह: कैसे भारत की जनरेशन जी ने मोदी को झुका दिया’ (Revolt of the Cockroaches: How India’s Gen Z Humbled Modi) में दिखाई देती है।

असीम अली ने अपने लेख की शुरुआत अमेरिकी लेखक स्टीफन किंग की डरावनी कहानियों की श्रृंखला ‘क्रीपशो’ (Creepshow) के एक पात्र अपसन प्रैट से की है। प्रैट एक बेहद शक्तिशाली और नियंत्रण प्रिय व्यक्ति है, जिसने अपने घर को निगरानी कैमरों, नियंत्रण प्रणालियों और सुरक्षा व्यवस्था से इस तरह घेर रखा है कि उसे लगता है कि उसके आस-पास होने वाली हर चीज उसके नियंत्रण में है। फिर उसके घर में एक कॉकरोच घुसता है। वह उसे मार देता है लेकिन इसके बाद काॅकरोच खत्म नहीं होते बल्कि बढ़ते जाते हैं और अंततः वही व्यक्ति अपने बनाए हुए नियंत्रण तंत्र के भीतर असहाय हो जाता है।

‘टाइम’ ने इसी रूपक को नरेंद्र मोदी की 12 वर्ष की सत्ता और जनरेशन जी के आंदोलन के बीच रखकर सामने रखा है। लेख का तर्क है कि मोदी ने वर्षों के दौरान भारत की संस्थागत राजनीति और सूचना तंत्र पर व्यापक प्रभाव स्थापित किया है लेकिन ऐसी राजनीति जिसे संस्थागत ढांचे के बाहर अचानक उभरने वाला जन आंदोलन संचालित करता है, उसे नियंत्रित करना कहीं अधिक कठिन होता है। नागरिकता कानून के खिलाफ आंदोलन, किसान आंदोलन और अब जनरेशन जी के आंदोलन को इसी तरह के गैर-पारम्परिक जन उभारों के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

‘टाइम’ के लेख का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि क्या नरेंद्र मोदी की वर्षों से बनाई गई राजनीतिक छवि पर पहली बार गम्भीर चोट लगी है? क्या ‘ब्रांड मोदी’ अब उतना अजेय दिखाई देता है, जितना पिछले एक दशक में दिखाई देता रहा है?

‘56 इंच की छाती’ से ‘भाग नरेन्दर’ तक पहुंचा व्यंग्य
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक छवि में मजबूत और निर्णायक नेता की पहचान लम्बे समय से केंद्रीय रही है। 2014 के चुनाव अभियान में ‘56 इंच की छाती’ इसी मजबूत नेतृत्व का प्रतीक बनी थी। जेनरेशन जी के प्रदर्शनकारियों ने इसी प्रतीक को उलटकर मोदी के खिलाफ इस्तेमाल किया और आंदोलन के दौरान नारा गूंजा ‘छप्पन इंच का छोटा बंदर, भाग नरेन्दर, भाग नरेन्दर।’

‘टाइम’ के अनुसार यह महज एक नारा नहीं है बल्कि मोदी की वर्षों से निर्मित मजबूत नेता वाली छवि को उलटने का सफल प्रयास है। प्रदर्शनकारियों ने मोदी के ‘फकीर’ वाले व्यक्तित्व पर व्यंग्य किया, उनके कपड़ों, चश्मों और विमानों को लेकर पोस्टर बनाए और ‘मेक इन इंडिया’ की तर्ज पर ‘लीक इन इंडिया’ जैसे नारे इस्तेमाल किए। एक पोस्टर में उनकी राजनीतिक चुप्पी पर व्यंग्य करते हुए लिखा गया कि डेटिंग ऐप पर किसी को नजरअंदाज करना चल सकता है लेकिन नागरिकों को नजरअंदाज करना नहीं।

यहां आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण सीमा पार की। प्रदर्शनकारी अब केवल शिक्षा मंत्री से जवाब नहीं मांग रहे थे। वे सीधे प्रधानमंत्री की उस छवि को निशाना बना रहे थे, जिसे वर्षों की राजनीतिक मेहनत, विज्ञापन और संचार रणनीति के जरिए तैयार किया गया था। प्रधानमंत्री की छवि आंदोलनकारियों के पोस्टरों, नारों और मीम में बदल रही थी और यही ‘ब्रांड मोदी’ के लिए सबसे असहज स्थिति थी

‘द न्यूयाॅर्क टाइम्स’ ने देखा मोदी के मीडिया नियंत्रण को चुनौती
जहां ‘टाइम’ ने ‘ब्रांड मोदी’ पर ध्यान केंद्रित किया, वहीं ख्याति प्राप्त अमेरिकी अखबार ‘द न्यूयाॅर्क टाइम्स’ ने इस आंदोलन का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सामने रखा है। 24 जुलाई को प्रकाशित उसकी रिपोर्ट का शीर्षक था ‘हाथों में फोन, भारत के युवा प्रदर्शनकारियों ने मोदी के मीडिया नियंत्रण को तोड़ दिया’ (Phones in Hand, India’s Young Protesters Blast Through Modi’s Media Control)।
रिपोर्ट के अनुसार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दशक से अधिक समय में सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक छवि बनाने और जनता तक सीधे पहुंचने के लिए बेहद प्रभावी तरीके से किया लेकिन इस बार वही माध्यम सरकार के खिलाफ इस्तेमाल हो गया।

काॅकरोच जनता पार्टी के इंस्टाग्राम अनुयायियों की संख्या लगभग 2.6 करोड़ तक पहुंच गई थी। यह भारतीय जनता पार्टी के इंस्टाग्राम अनुयायियों की संख्या से करीब तीन गुना थी।

प्रदर्शन स्थल से वीडियो बनाने वाले छोटे डिजिटल मंचों के वीडियो को करोड़ों लोगों ने देखा। यानी जिस समय पारम्परिक टेलीविजन चैनल आंदोलन को वह जगह नहीं दे रहे थे जिसकी प्रदर्शनकारी अपेक्षा कर रहे थे, उसी समय मोबाइल फोन की स्क्रीन पर आंदोलन का अपना मीडिया तंत्र खड़ा हो चुका था। प्रदर्शनकारी खुद वीडियो बना रहे थे, पुलिस कार्रवाई रिकाॅर्ड कर रहे थे, उन्हें सोशल मीडिया पर डाल रहे थे और अपने शब्दों में आंदोलन की कहानी बता रहे थे।

यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी डिजिटल ताकत बनी। सरकार या टेलीविजन चैनल अब यह पूरी तरह तय नहीं कर सकते थे कि जनता आंदोलन को किस रूप में देखेगी। एक प्रदर्शनकारी का मोबाइल फोन कैमरा बन गया, वही फोन संपादकीय कक्ष बन गया और वही प्रसारण केंद्र भी।

‘द गार्जियन’ ने इसे राजनीतिक कथा पर नियंत्रण की लड़ाई माना
ब्रिटेन के प्रमुख समाचार पत्र ‘द गार्जियन’ ने इस आंदोलन को नरेंद्र मोदी सरकार के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना क्योंकि इसके जरिए एक गैर-पारम्परिक समूह ने उस राजनीतिक कथा को चुनौती दी, जिस पर सरकार का वर्षों से प्रभाव रहा है। उसके विश्लेषण में आंदोलन के आॅनलाइन विस्तार और मुख्यधारा के टेलीविजन से दूरी दोनों महत्वपूर्ण थे।

‘द गार्जियन’ ने अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक आशुतोष वार्ष्णेय के हवाले से यह सवाल उठाया है कि क्या सरकार ने इस आंदोलन के दौरान राजनीतिक नैरेटिव पर अपना नियंत्रण खो दिया। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। 12 वर्ष की मोदी सरकार में सार्वजनिक दबाव के सामने किसी केंद्रीय मंत्री का इस तरह जाना अपने आप में एक असाधारण राजनीतिक घटना है। बकौल ‘द गार्जियन’ आंदोलन ने यह धारणा भी तोड़ दी कि मोदी सरकार राजनीतिक दबाव में आसानी से पीछे नहीं हटती। कुछ ही सप्ताह पहले पैदा हुआ आंदोलन अब केंद्र सरकार के एक महत्वपूर्ण फैसले को प्रभावित कर चुका था।

‘राॅयटर्स’ ने शुरुआत में ही देख ली थी डिजिटल ताकत
ब्रिटेन समाचार एजेंसी  ‘राॅयटर्स’ ने आंदोलन की शुरुआती सफलता में ही इसकी असाधारण डिजिटल क्षमता को पहचान लिया था। मई में ही काॅकरोच जनता पार्टी के इंस्टाग्राम अनुयायियों की संख्या तेजी से बढ़कर करीब डेढ़ करोड़ हो गई थी। बड़ी संख्या में युवा इससे जुड़ रहे थे और संगठन पारम्परिक राजनीतिक दलों की तुलना में बिल्कुल अलग तरीके से विस्तार कर रहा था।

इसका महत्व केवल अनुयायियों की संख्या में नहीं था। पारम्परिक राजनीतिक संगठनों को लाखों युवाओं तक पहुंचने के लिए वर्षों तक संगठन खड़ा करना पड़ता है। यहां एक व्यंग्यात्मक नाम ने कुछ ही दिनों में ऐसा डिजिटल नेटवर्क बना लिया, जिसने आगे चलकर सड़क के आंदोलन को राष्ट्रीय दृश्यता प्रदान की।

‘एसोसिएटेड प्रेस’ ने अजेय मोदी की छवि पर चोट देखी
अमेरिकी समाचार संस्था ‘एसोसिएटेड प्रेस’ ने इस आंदोलन को नरेंद्र मोदी की राजनीतिक अजेयता की छवि के संदर्भ में देखा है। उसके अनुसार पिछले 12 वर्षों में मोदी भारतीय राजनीति के सबसे शक्तिशाली नेताओं में रहे हैं लेकिन इस आंदोलन ने दिखाया कि एक गैर-पारम्परिक युवा समूह भी सरकार को राजनीतिक प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर कर सकता है। ‘एसोसिएटेड प्रेस’ की रिपोर्टिंग में भारत की विशाल युवा आबादी को विशेष महत्व दिया गया है। युवा वर्ग के लिए शिक्षा और रोजगार केवल आर्थिक प्रश्न नहीं हैं बल्कि राजनीतिक भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं। जब यही युवा सोशल मीडिया पर अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हैं तो वह असंतोष पारम्परिक राजनीतिक भाषण से कहीं अधिक तेजी से फैल सकता है।

‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने आंदोलन के पीछे रोजगार संकट देखा
‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने इस आंदोलन को केवल नरेंद्र मोदी के खिलाफ गुस्सा मानने के बजाय इसके पीछे मौजूद आर्थिक असंतोष पर जोर दिया है। भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की संख्या बढ़ी है लेकिन सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार के अवसर उस गति से नहीं बढ़ पाए हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में युवा वर्षों बिताते हैं, परिवार अपनी बचत खर्च करते हैं और फिर प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा रद्द होने या भर्ती प्रक्रिया में देरी जैसी घटनाएं उनके भरोसे को तोड़ देती हैं।

इस दृष्टि से नरेंद्र मोदी आंदोलन के एकमात्र कारण नहीं थे लेकिन वे उस व्यवस्था के सर्वोच्च राजनीतिक चेहरे जरूर बन गए थे। इसलिए शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ गुस्सा प्रधानमंत्री की राजनीतिक छवि तक पहुंच गया। दुनिया के मीडिया ने जो देखा, वह भारतीय टेलीविजन से कितना अलग था।
भारत के एक बड़े टेलीविजन मीडिया वर्ग में आंदोलन को जिस नजरिए से प्रस्तुत किया गया और दुनिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने इसे जिस नजरिए से समझा, उनमें स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। भारतीय टेलीविजन बहसों में ध्यान अक्सर इस बात पर रहा कि प्रदर्शन के पीछे कौन है, कौन राजनीतिक दल इसका फायदा उठा रहा है, क्या इसमें बाहरी ताकतों की भूमिका है और कानून-व्यवस्था की स्थिति क्या है।
इसके विपरीत ‘टाइम’ ने पूछा है कि क्या ‘ब्रांड मोदी’ कमजोर हुआ है? ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने पूछा कि क्या मोदी की मीडिया और डिजिटल नियंत्रण की रणनीति को जेनरेशन जी ने चुनौती दी है। ‘द गार्जियन’ ने राजनीतिक कथा पर सरकार के नियंत्रण की बात की। ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने बेरोजगारी और युवा असंतोष को आंदोलन की जड़ माना। ‘एसोसिएटेड प्रेस’ ने मोदी की अजेयता की छवि पर सवाल उठाया और ‘राॅयटर्स’ ने दिखाया कि यह आंदोलन डिजिटल माध्यम पर कितनी तेजी से खड़ा हुआ।
अंतर केवल शब्दों का नहीं है। अंतर कहानी के केंद्र का है। एक दृष्टिकोण में सवाल है कि प्रदर्शनकारी कौन हैं और उन्हें कौन चला रहा है। दूसरे दृष्टिकोण में सवाल है कि भारत के युवा इतने नाराज क्यों हैं और उनके असंतोष ने प्रधानमंत्री की राजनीतिक छवि को क्यों निशाना बनाया।

विदेश यात्रा की चमक और देश के भीतर उठता सवाल
इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा की तस्वीरें भारतीय टेलीविजन पर प्रमुखता से दिखाई जा रही हैं। शंघाई सहयोग संगठन के मंच पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मोदी की मुलाकातों को भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और प्रधानमंत्री की कूटनीतिक सफलता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ दूरी को भी राजनीतिक संदेश के रूप में दिखाया गया।

इन अंतरराष्ट्रीय तस्वीरों के बीच भारत के भीतर चल रही यह कहानी भी मौजूद है। एक तरफ मोदी विश्व मंच पर चीन और रूस के शीर्ष नेताओं के साथ दिखाई देते हैं, दूसरी ओर कुछ सप्ताह पहले देश की राजधानी में हजारों युवा उनकी राजनीतिक छवि का सार्वजनिक व्यंग्य कर रहे थे। एक तस्वीर में प्रधानमंत्री वैश्विक शक्ति के नेताओं के बीच खड़े हैं, दूसरी तस्वीर में उनके खिलाफ ‘भाग नरेन्दर, भाग नरेन्दर’ का नारा लग रहा है। इन दोनों तस्वीरों में से कोई एक अपने आप में पूरी सच्चाई नहीं है। दोनों को साथ रखकर देखने पर ही नरेंद्र मोदी की वर्तमान राजनीतिक स्थिति की जटिल तस्वीर सामने आती है।

मोदी की सत्ता खतरे में नहीं लेकिन ‘ब्रांड मोदी’ जरूर सवालों में
इस आंदोलन के आधार पर यह कहना कि नरेंद्र मोदी की सत्ता समाप्त होने वाली है, जल्दबाजी होगी। भारतीय जनता पार्टी का संगठन अभी भी मजबूत है, उसका व्यापक राजनीतिक आधार मौजूद है और विपक्ष भी एकजुट स्थिति में नहीं है। ‘टाइम’ ने स्वयं अपने विश्लेषण में यह माना है कि यह आंदोलन तत्काल मोदी सरकार की स्थिरता के लिए खतरा नहीं है लेकिन ‘मोदी सरकार’ और ‘ब्रांड मोदी’ को एक ही चीज मानना भी सही नहीं होगा। कोई सरकार सत्ता में रह सकती है और फिर भी उसकी राजनीतिक छवि कमजोर हो सकती है। यही इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण कहानी है।

जेनरेशन जी ने मोदी को चुनाव में नहीं हराया, सरकार नहीं गिराई और न ही भारतीय राजनीति का संतुलन बदल दिया लेकिन उसने उस अजेयता की छवि को जरूर चुनौती दी जो लम्बे समय से नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पहचान का हिस्सा रही है। उसने सोशल मीडिया के उसी मैदान में प्रधानमंत्री की राजनीतिक मशीन को चुनौती दी, जिसे कभी मोदी की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था।

फिर उसने सड़क पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, पुलिस कार्रवाई के बाद और बड़ी संख्या में लोग जुटे, आंदोलन राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना, शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और अंततः प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू हुई। अब सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई की घटनाओं से जुड़े देशभर के मुकदमों को बंद करने का आदेश देकर इस आंदोलन को एक असाधारण न्यायिक परिणाम तक पहुंचा दिया है।

‘काॅकरोच’ से शुरू हुई कहानी अभी खत्म नहीं हुई है
जिस शब्द का इस्तेमाल युवाओं को छोटा करने के लिए किया गया था, उसी शब्द को युवाओं ने अपनी राजनीतिक पहचान बना लिया। जिस सोशल मीडिया को नरेंद्र मोदी की राजनीतिक ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था, उसी सोशल मीडिया पर युवाओं ने उनके खिलाफ अपना समानांतर मंच खड़ा कर दिया। जिस सरकार को सार्वजनिक दबाव के सामने झुकने वाली सरकार नहीं माना जाता था, उसी सरकार के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और प्रदर्शनकारियों के मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू हुई।

अब सुप्रीम कोर्ट का आदेश इस कहानी में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ चुका है। जिन युवाओं पर आंदोलन के दौरान मुकदमे दर्ज हुए थे, उन्हीं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए देशभर की प्राथमिकी बंद करने का आदेश दिया गया है। गम्भीर अपराधों से जुड़े सीमित मामलों को छोड़कर अदालत ने इन घटनाओं को लेकर आगे कानूनी कार्रवाई और नई एफआईआर पर भी रोक लगा दी है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी की सत्ता खत्म होने जा रही है। ऐसा कहना तथ्यों से आगे निकल जाना होगा। असली सवाल यह है कि क्या नरेंद्र मोदी अब भी उतने ही अजेय दिखाई देते हैं, जितने पिछले एक दशक में दिखाई देते रहे हैं?

आज यह सवाल भारत की जेनरेशन जी पूछ रही है।
इस सवाल के केंद्र में खड़ा है, खतरे में ब्रांड मोदी।

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