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मित्र पुलिस का घटता इकबाल

सात सितम्बर 2025 को भाजपा के पार्षद अमित बिष्ट उर्फ चिंटू को पुलिस ने एक झगड़े के सम्बंध में थाने में बंद कर दिया था। तब बिष्ट को छुड़ाने के लिए पूर्व मंत्री और कालाढुंगी के विधायक बंशीधर भगत कोतवाली में धरने पर बैठ गए थे। पुलिस कप्तान प्रहलाद मीणा के देरी से पहुंचने पर भगत ने तंज करते हुए कहा था कि ‘‘कप्तान साहब तुमको तो पंख लगाकर आना चाहिए था।’’ तब मीणा का जवाब था कि वह दौड़कर आए हैं। इस घटना के बाद भगत समर्थक बड़े गर्व से कहते सुने गए कि हमारे नेता ने कप्तान को घुटने पर ला दिया। लेकिन जिस व्यक्ति के कारण ‘घुटने’ पर ले आए थे उसने 5 जनवरी को बंशीधर भगत और भाजपा की साख को ही घुटने पर ला दिया। बिष्ट ने एक व्यक्ति नितिन लोहानी की हत्या कर डाली जो ‘घुटने पर आई पुलिस और उसके घटते इकबाल’ का परिणाम है। 56 इंच के सीने वाली सरकार में नितिन लोहानी की पीठ पर 56 से कुछ कम 50 से अधिक छर्रों के निशान थे। बात-बात पर ‘बुलडोज’ करने वाली सरकार का बुलडोजर अपने पूर्व नेता अमित बिष्ट के घर पर न पहुंचना भी सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है


‘‘कप्तान साहब तुमको तो पर लगाकर आना चाहिए था कप्तान बोले मैं तो दौड़ कर आया हूं’’

ये बातें नैनीताल के तत्कालीन कप्तान प्रहलाद मीणा और कालाढूंगी के विधायक बंशीधर भगत के बीच की है। द
रअसल 7 सितम्बर 2025 के दिन भाजपा के एक पार्षद अमित बिष्ट उर्फ चिंटू को पुलिस ने एक झगड़े के सम्बंध में उठाकर थाने में बंद कर दिया था। अमित बिष्ट को छुड़ाने के लिए बंशीधर भगत कोतवाली में धरने पर बैठ गए थे। कप्तान के देरी से पहुंचने पर भगत ने तंज करते हुए कहा था कि ‘‘कप्तान साहब तुमको पंख तो लगाकर आना चाहिए था।’’ तब कप्तान मीणा ने जवाब दिया था कि वह दौड़कर आए हैं। इस घटना के बाद बड़े गर्व से कहा जाने लगा था कि बंशीधर भगत ने कप्तान को घुटने पर ला दिया। बंशीधर भगत नैनीताल पुलिस के कप्तान को जिस व्यक्ति के कारण घुटने पर ले आए थे, उसने अब 5 जनवरी को एक व्यक्ति नितिन लोहानी की निर्मम हत्या कर बंशीधर भगत और भाजपा की साख को ही घुटने पर ला दिया। 7 सितम्बर को अमित बिष्ट उर्फ चिंटू के खिलाफ कार्रवाई के विरोध में बंशीधर भगत के सामने नैनीताल पुलिस के कप्तान प्रहलाद सिंह मीणा का कथित रूप से घुटने पर आना किसी व्यक्ति के घुटने पर आना नहीं था बल्कि उसे कानून व्यवस्था की नियामक संस्था जिसे कानूनी भाषा में पुलिस कहा जाता है, का सत्ता के नुमाइंदों के सामने घुटने पर आना था, जिसने पुलिस के इकबाल को भी कुछ क्षणों तक घुटनों पर ला दिया और नितिन लोहानी की हत्या घुटने पर आए पुलिस और उसके घटते इकबाल का परिणाम थी। 56 इंच के सीने वाली सरकार में नितिन लोहानी की पीठ पर 56 से कुछ कम 50 से अधिक छर्रों के निशान थे।


इस पूरे हत्याकांड पर सवाल कई हैं लेकिन सबसे जरूरी सवाल कि क्या हल्द्वानी फिर से 80-90 के दशक वाले
गैंगवार की स्थिति में तो वापस नहीं जा रहा? जिसने हल्द्वानी की शांति भंग कर दी थी। सवाल उठना
लाजिमी है कि क्या गैंग अब हल्द्वानी में फिर से सिर उठाने लगे हैं? क्या 80-90 के दशक की अराजकता की दस्तक हल्द्वानी के दरवाजे पर फिर से तो नहीं है? नैनीताल जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में कथित अपहरण कांड, आईटीआई गैंग की गुंडागर्दी, रामनगर, हल्द्वानी में गौवंश रक्षा के नाम पर अराजकता या कहें गौरक्षा गैंग की एंट्री। इन सभी बातों की ओर इशारा करती है। 5 सितम्बर की रात को जजफार्म निवासी नितिन लोहानी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। रात को नितिन लोहानी अपने दोस्त कमल भंडारी के साथ पार्टी से लौटते वक्त अमित बिष्ट के घर पहुंचे थे। अमित बिष्ट का बेटा और नितिन लोहनी आपस में दोस्त थे। बिष्ट ने आपसी कहा-सुनी के बाद लोहानी को अपनी दो नाली बंदूक से छेद कर मार डाला।

अतीत के पन्नों को पलटें तो 80 और 90 का दशक गैंगवार का दौरा था। शुरुआत में भूपाल सिंह रावत की दहशत के चलते जिसकी लकड़ी, खनन, शराब सब पर एकाधिकार जमा लेने की भूख ने भूपाल सिंह रावत जैसे माफिया को जन्म दिया, जिसके चलते उत्तर प्रदेश का छोटा सा इलाका हल्द्वानी क्राइम कैपिटल के नाम से मशहूर हो गया। 90 के दशक में रमेश बम्बईया, प्रकाश पांडे (पी पी) जैसे लोगों की दहशत हल्द्वानी में रही। पाॅन्टी चड्डा के रेता-खनन के कारोबार में उतरने के बाद खनन माफियाओं का भी दौर शुरू हो गया। मुम्बईया ने शुरुआत में शराब के काम में हाथ आजमाया जिसके चलते पाॅन्टी चड्डा के शराब कारोबार पर असर पड़ता था। बाद में रेता खनन और शराब कारोबार पर पाॅन्टी चड्डा के कब्जे के बाद जिसे सिंडिकेट भी कहा जाता था ने शराब के कारोबार में नुकसान से बचने के लिए बम्बईया को खनन के कारोबार में शीशमहल का गेट सौंप कर उसे शराब कारोबार से अलग करने की कोशिश जरूर की लेकिन पीपी गैंग के उदय ने एक नए समीकरण को जन्म दिया जिसके चलते कई हत्याएं हुई। जिसमें मुम्बईया पर दो बार जानलेवा हमले, पवन और विनीत जोशी की हत्या, रऊफ सिद्दीकी की हत्या, सब खनन कारोबार से जुड़ी कड़ियां थीं। रऊफ हत्याकांड में अब्दुल मलिक का नाम उछला था। उस वक्त अतीत में ही सही अब्दुल मलिक भाजपा के शासन में उतना ही ताकतवर था, उसकी  सत्ता में ऊपर तक पहुंच का अंदाजा  इस बात से लगाया जा सकता था कि उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के दूसरे मुख्यमंत्रित्वकाल में हरियाणा के सूरजभान को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बनाया गया था। जब सूरजभान राज्यपाल बनने के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश पहुंचे तो उनके साथ अमौसी हवाई अड्डे पर सरकारी हेलीकॉप्टर में अब्दुल मलिक भी था। पीपी और बम्बईया ने आम लोगों को परेशान नहीं किया उनसे आम आदमी को खतरा नहीं था जो दबंगई कर रहे थे उन्हें ही आपस में खतरा था।

जानकारों का मानना है कि आज सत्ता दल का पूरा संरक्षण इनको है। दरम्वाल गैंग, आईटीआई गैंग और न जाने कितने गैंग भाजपा के संरक्षण में पल रहे हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि यह आशंका उसी दिन पैदा हो गई थी जब बंशीधर भगत ने कप्तान को घुटने के बल ला दिया था, आशंका थी कि या तो कभी अमित मरेगा या किसी को मारेगा। उसकी हरकतें लगातार ऐसी ही रही थीं। भाजपा का एक वर्ग उसके साथ खड़ा था। पुलिस मूकदर्शक थी। हत्या के आरोपियों के घर बुलडोजर चलाने की नीति यहां पर गायब हो गई। ऊधमसिंह नगर के खटीमा सहित कई ऐसे मुस्लिम लोगों के घर पर बुलडोजर चलाया गया जो हत्या के आरोपी थे लेकिन भाजपा से जुड़ा होने के कारण सरकार का बुलडोजर अमित बिष्ट के घर की ओर अब तक नहीं जा पाया है। खास बात ये है कि भाजपा के विधायक और अन्य नेता हत्या के आरोपी के लिए कठोर दंड जैसे शब्दों तक सीमित रह गए। कोई अन्य होता तो फांसी की सजा से कम पर ये नहीं मानते। जब जिले के कप्तान घुटने पर आ जाएं और पुलिस का मनोबल क्या रहेगा इसमें बंशीधर भगत की जवाबदेही भी क्यों ना हो?

आज जब भाजपा राजनीतिक रूप से ताकतवर पार्टी है तो ऐसे तत्वों का सहारा लेने की जरूरत क्यों आन पड़ी? इंदिरा हृदयेश के जाने के बाद एक भगत ही ऐसे गम्भीर राजनेता हैं जिन पर साम्प्रदायिक या जातिगत की राजनीति करने का आरोप कभी नहीं लगा लेकिन इस घटना से भगत की छवि पर असर पड़ा है। भाजपा के अंदर ही उनके विरोधी उनकी भूमिका को हवा देने में लगे हैं।

नितिन लोहानी की हत्या सिर्फ एक घटना के रूप में मान लेना इस घटना को कम करके आंकना भूल होगी। सत्तारूढ़ पार्टी का अराजक तत्वों से खुला गठजोड़ का यह नतीजा है और अगर ऐसा ही चलता रहा तो हल्द्वानी में खुलेआम दबंगई, मारपीट, अपराध, अपहरण जैसे पैटर्न बन चुके होंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सारी कवायत कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में बंशीधर भगत के तिलस्म को तोड़ने की है। भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं की राजनीतिक गतिविधियां कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र के आसपास घूम रही हैं। यह मसला कालाढूंगी विधानसभा में भाजपा के अंदर वर्चस्व कायम करने की लड़ाई का नतीजा भी है। पिछले एक साल में खासकर नगर निगम चुनावों और पंचायत चुनावों के बाद भाजपा के अंदर राजनीतिक परिस्थितियां बदली हैं। तमाम अड़ंगों के बावजूद गजराज बिष्ट का हल्द्वानी का मेयर चुना जाना, बंशीधर भगत के तमाम प्रयासों के बाद भी जिला पंचायत अध्यक्ष रही बेला तोलिया का जिला पंचायत चुनाव में छवि कांडपाल बोरा से हार जाना और फिर दीपा दरम्वाल का जिला पंचायत अध्यक्ष बन जाना बंशीधर भगत के लिए बड़ा झटका जरूर था। पिछले कुछ समय से कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में गजराज बिष्ट मजबूत जरूर हुए हैं और उनके समर्थक बंशीधर भगत के खिलाफ मुखर भी बहुत हैं। अपनी राजनीतिक विरासत अपने पुत्र विकास भगत को सौंपने के साथ ही 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए विकास भगत की कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में सक्रियता ने टिकट की आस में बैठे भाजपाइयों के कान चैकन्ने कर दिए हैं। अगर सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं का यूं ही संरक्षण ऐसे तत्वों को मिलता रहा तो भविष्य में व्यापक स्तर पर अराजकता से इनकार नहीं किया जा सकता।

बात अपनी-अपनी

आप दोनों घटनाओं से मुझे जोड़कर मत देखिए। अमित बिष्ट भाजपा का मंडल उपाध्यक्ष और दो बार का पार्षद था उस वक्त। एक घटना में दोनों पक्षों में समझौते के बाद भी उसे पुलिस ने नहीं छोड़ा था, तब मैं उसके लिए धरने पर बैठा था। जब उसने नितिन लोहनी वाला कांड किया तो हमने उसकी कड़ी निंदा की, उसका कृत्य कहीं से माफी लायक नहीं है, उसे जितनी कड़ी सजा हो सकती है मिलनी चाहिए।  हमने उसे पार्टी से भी निकाल दिया। मैंने अपने इतने लम्बे राजनीतिक जीवन में अपराधी तत्वों को कभी प्रश्रय नहीं दिया।

बंशीधर भगत, विधायक कालाढूंगी

पूरे प्रदेश में कानून व्यवस्था ध्वस्त व लचर हो चुकी है। भाजपा का मंतव्य पूरे देश और उत्तराखण्ड की राजनीति में नफरत के बीज बोना है, अब उसकी झलक दिखाई दे रही है। एक पुरोहित के बेटे की निर्मम हत्या ऐसे तत्वों द्वारा कर दी गई जिन्हें भरपूर राजनीतिक संरक्षण मिला है। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंसात्मक रवैया रखने वाले लोगों को राजनीतिक संरक्षण मिला है। कालाढूंगी विधानसभा की विशेष रूप से बात करें तो यहां गैंग संस्कृति को राजनीतिक आकाओं द्वारा प्रमोट किया जा रहा है और ये आका सरकार और भाजपा में बड़े स्टेकहोल्डर हैं। नितिन लोहनी हत्याकांड के तार उन लोगों से भी कहीं न कहीं जुड़े हैं जो जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव की हिंसा में शामिल थे। इन गैंगों को किसका संरक्षण हासिल है ये सब को पता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि 90 के दशक की हल्द्वानी में पुनरावृत्ति न हो।

सुमित हृदयेश, विधायक, हल्द्वानी

देखिए, ये घटना दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है और आरोपी को हमने भाजपा से निकाल दिया है।

प्रताप बिष्ट, जिलाध्यक्ष, भाजपा, नैनीताल