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‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ से खुलेंगे नए बाजार

भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता वैश्विक व्यापार व्यवस्था में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। दोनों पक्ष इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ बता रहे हैं लेकिन अमेरिका ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए यूरोप पर रणनीतिक मुद्दों से ऊपर व्यापार को रखने का आरोप लगाया है। यह समझौता आने वाले वर्षों में व्यापार, निवेश, तकनीक और भू-राजनीतिक संतुलन को गहराई से प्रभावित कर सकता है


भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते की औपचारिक घोषणा जनवरी 2026 में नई दिल्ली में की गई। यह समझौता लगभग दो दशकों तक चली लम्बी वार्ताओं का परिणाम है जो कई बार अटकती रही लेकिन अंततः बदलते वैश्विक हालात और साझा आर्थिक हितों के कारण आगे बढ़ सकी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत के इतिहास का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता बताया जबकि यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वाॅन डेर लेयेन ने इसे भरोसेमंद साझेदारी का प्रतीक कहा। इस डील ने दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को एक संरचित आर्थिक ढांचे में जोड़ दिया है।

समझौते का दायरा और आर्थिक महत्व

यह समझौता केवल टैरिफ में कमी तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें सेवाओं का व्यापार, निवेश सुरक्षा, बौद्धिक सम्पदा, तकनीकी सहयोग, डिजिटल व्यापार और नियामक समन्वय जैसे कई आयाम शामिल हैं। इसका मकसद भारत और यूरोप के बीच व्यापार को सरल, पारदर्शी और एक-दूसरे के अनुकूल बनाना है। यूरोप को भारत जैसे बड़े और तेजी से बढ़ते बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी वहीं भारत को यूरोपीय संघ के उच्च क्रय-शक्ति वाले बाजार में अपने उत्पाद और सेवाएं विस्तार से बेचने का अवसर मिलेगा।
 
किन क्षेत्रों को होगा सबसे ज्यादा फायदा

भारतीय निर्यात के लिए यह समझौता विशेष रूप से अहम माना जा रहा है। टेक्सटाइल, परिधान, चमड़ा, रत्न आभूषण, इंजीनियरिंग सामान और दवाइयों जैसे क्षेत्रों को यूरोपीय बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलने की उम्मीद है। सेवाओं के क्षेत्र में भी भारतीय आईटी कम्पनियों, डिजिटल सेवा प्रदाताओं और पेशेवरों के लिए नए अवसर खुल सकते हैं। दूसरी ओर यूरोप की ऑटोमोबाइल, हरित ऊर्जा, मशीनरी और उच्च तकनीक उद्योगों को भारतीय बाजार में अधिक सुगम प्रवेश मिल सकता है।
 
नियामक सहयोग और व्यापार सुगमता दिक्क

व्यापार में अक्सर टैरिफ से ज्यादातर गैर-टैरिफ बाधाओं से होती है जैसे अलग-अलग मानक, लाइसेंसिंग नियम और जटिल प्रक्रियाएं। इस समझौते में इन बाधाओं को कम करने के लिए नियामक सहयोग और मानकों के तालमेल का प्रावधान है। इससे खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों को फायदा होगा जो अब तक जटिल नियमों के कारण यूरोपीय बाजार में प्रवेश करने से हिचकते थे।
 
अमेरिका की तीखी प्रतिक्रिया

इस समझौते पर अमेरिका की प्रतिक्रिया ने इसे केवल आर्थिक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक मुद्दा भी बना दिया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्काॅट बेसेंट ने इसे ‘बेहद निराशाजनक’ बताते हुए कहा कि यूरोप ने रणनीतिक मुद्दों की बजाय व्यापारिक हितों को प्राथमिकता दी है। उनका संकेत यूक्रेन- रूस युद्ध और रूस से ऊर्जा व्यापार के मुद्दों की ओर था। ऐसे समय में पश्चिमी देशों को एकजुट रुख अपनाना चाहिए था।
 
भारत-अमेरिका व्यापार तनाव की पृष्ठभूमि

भारत द्वारा रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिका पहले ही भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगा चुका है। ऐसे में यूरोप का भारत के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार समझौता करना अमेरिकी नीति-निर्माताओं को असहज कर रहा है। हालांकि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीयर ने अपेक्षाकृत संतुलित बयान देते हुए कहा कि यह समझौता भारत के लिए लाभकारी दिखता है लेकिन अमेरिका और भारत के बीच भी व्यापार वार्ता जारी है।
 
वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव

विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता एक व्यापक संकेत है कि दुनिया अब एकध्रुवीय व्यापार ढांचे से आगे बढ़ रही है। अमेरिका-केंद्रित व्यापार व्यवस्था के समानांतर अब क्षेत्रीय और बहुध्रुवीय आर्थिक साझेदारियां उभर रही हैं। भारत और यूरोप का यह कदम बताता है कि वे अपने आर्थिक फैसले वैश्विक दबावों से इतर, अपने दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर ले रहे हैं।
 
भारत के लिए दीर्घकालिक अवसर

भारत के लिए यह समझौता केवल निर्यात बढ़ाने का अवसर नहीं बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत भूमिका निभाने का मौका भी है। विदेशी निवेश, तकनीकी साझेदारी और विनिर्माण सहयोग में वृद्धि की सम्भावना है। भारत की युवा आबादी और सेवा क्षेत्र की क्षमता यूरोपीय कम्पनियों को आकर्षित कर सकती है।
 
चुनौतियां भी कम नहीं

इस समझौते से सम्भावनाएं बड़ी हैं लेकिन कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना, गुणवत्ता मानकों को बेहतर बनाना और लाॅजिस्टिक्स ढांचे को मजबूत करना जरूरी होगा। कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर सावधानी बरती गई है ताकि अचानक आयात दबाव से किसानों पर असर न पड़े।

कुल मिलाकर भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता वैश्विक व्यापार में एक नए अध्याय की शुरुआत जैसा है। अमेरिका की नाराजगी यह दर्शाती है कि यह डील महज आर्थिक दस्तावेज नहीं बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन को प्रभावित करने वाला कदम है। आने वाले वर्षों में इसका वास्तविक असर तब सामने आएगा जब व्यापार आंकड़े, निवेश प्रवाह और औद्योगिक विस्तार ठोस रूप में दिखाई देंगे। फिलहाल इतना तय है कि भारत और यूरोप ने मिलकर वैश्विक आर्थिक मानचित्र पर एक नई रेखा खींच दी है।

  • यह समझौता लगभग 20 साल की लम्बी और रुक-रुक कर चलने वाली बातचीत के बाद पूरा हुआ (वार्ता 2007 में शुरू हुई थी, 2013 में रुकी, 2022 में फिर शुरू हुई)।
  • यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण व्यापार समझौता है जो दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत जीडीपी और 2 अरब लोगों के बाजार को कवर करता है।
  • दोनों पक्षों ने टैरिफ (शुल्क) को काफी हद तक कम या खत्म करने पर सहमति जताई है।
  • ईयू भारत से आने वाले 99 प्रतिशत से अधिक निर्यात (मूल्य के हिसाब से) पर शुल्क हटा देगा या बहुत कम करेगा (99.5 प्रतिशत तक कवरेज, ज्यादातर तुरंत शून्य)।
  • भारत ईयू से आने वाले 93 प्रतिशत आयात (मूल्य के हिसाब से) पर शुल्क हटाएगा या कम करेगा (कुछ क्षेत्रों में 3-10 साल में)।
  • संवेदनशील क्षेत्र जैसे डेयरी, अनाज, कुछ कृषि उत्पाद को समझौते से बाहर रखा गया है ताकि घरेलू किसानों को सुरक्षा मिले।
  • ऑटोमोबाइल सेक्टर में विशेष व्यवस्था: भारत ने ईयूकी लग्जरी कारों के लिए सालाना 2.5 लाख वाहनों का कोटा रखा है जहां शुल्क 110 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत हो जाएगा।
  • ईयू के वाइन, बीयर, चाॅकलेट, पास्ता, जैतून तेल आदि पर भारत में शुल्क कम होंगे।
  • भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों (टेक्सटाइल, लेदर, फुटवियर, जेम्स एंड ज्वेलरी, टाॅयज, स्पोर्ट्स गुड्स, मरीन प्रोडक्ट्स आदि) को बड़ा फायदा होगा, क्योंकि ईयू में ये अब जीरो ड्यूटी पर जा सकेंगे।