दिल्ली से बदला ब्रिक्स का एजेंडा भारत ने दिखाई ग्लोबल साउथ की नई ताकत

नई दिल्ली में 12-13 सितम्बर को हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने भारत को सिर्फ मेजबान देश की भूमिका तक सीमित नहीं रखा बल्कि वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने का मंच बना डाला है। सम्मेलन में आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट रुख, संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक संस्थाओं में सुधार, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वैश्विक शासन तथा विकासशील देशों के हितों को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। सबसे बड़ी बात यह रही कि मतभेदों के बावजूद सदस्य देशों ने नई दिल्ली घोषणा-पत्र को सर्वसम्मति से स्वीकार किया और भारत की कई पहलों को ब्रिक्स के साझा एजेंडे में जगह मिली

नई दिल्ली में भारत की अध्यक्षता में 18वें ब्रिक्स सम्मेलन का सफलतापूर्वक आयोजन 12 और 13 सितम्बर को किया गया। गौरतलब है कि ब्रिक्स मूल रूप से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक और राजनीतिक सहयोग का मंच है। ब्रिक शब्द का इस्तेमाल शुरुआत में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के लिए किया गया था और 2009 में इन देशों का पहला शिखर सम्मेलन हुआ। दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद 2011 में इसका नाम ब्रिक्स हुआ। पिछले वर्षों में इसका विस्तार हुआ और अब इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब शामिल हैं। भारत सरकार के अनुसार ये 11 देश मिलकर दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।

ब्रिक्स की अहमियत केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह मंच विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक शासन व्यवस्था में अधिक प्रभावी आवाज देने की कोशिश करता है। इसके तीन व्यापक सहयोग स्तम्भ हैं, राजनीतिक एवं सुरक्षा सहयोग, आर्थिक एवं वित्तीय सहयोग तथा सांस्कृतिक और जन-से-जन संपर्क। 2026 में भारत ने चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता सम्भाली और इसी के तहत नई दिल्ली में 18वां शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। इस वर्ष ब्रिक्स के गठन के दो दशक भी पूरे हुए।
नई दिल्ली घोषणा बनी सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि
दिल्ली सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि नई दिल्ली घोषणा-पत्र का सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाना रहा। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिक्स अब पहले की तुलना में कहीं अधिक बड़ा और विविध समूह है और इसके सदस्य देशों के बीच कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर मतभेद भी हैं। इसके बावजूद 13 सितम्बर को सम्मेलन के समापन के साथ नेताओं ने ऐसी साझा घोषणा को स्वीकार किया जिसमें वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, बहुपक्षवाद को मजबूत करने और विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया गया।
घोषणा-पत्र में संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता दोहराई गई। इसका मूल संदेश यह है कि आज की वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को देखते हुए इन संस्थाओं में विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व और प्रभाव मिलना चाहिए। भारत के लिए यह मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि वह लम्बे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता सहित वैश्विक संस्थाओं में व्यापक सुधार की मांग करता रहा है।
भारत के लिए आतंकवाद पर बड़ा कूटनीतिक लाभ
भारत के लिहाज से सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट और कठोर भाषा का इस्तेमाल रहा। नई दिल्ली घोषणा में 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई और आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ सामूहिक प्रतिबद्धता दोहराई गई। घोषणा में आतंकवादियों, उनके समर्थकों और आतंकवाद के वित्तपोषण तथा सुरक्षित ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि ब्रिक्स में चीन और रूस जैसी शक्तियां शामिल हैं। ऐसे में इतने बड़े बहुपक्षीय मंच पर पहलगाम हमले की निंदा और आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख भारत की कूटनीतिक स्थिति को मजबूती देता है। हालांकि इसे आतंकवाद के मुद्दे पर सभी देशों की नीतियों में पूर्ण समानता के रूप में देखना उचित नहीं होगा लेकिन साझा घोषणा में भारत की प्राथमिकता का स्थान बनना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है।
ब्रिक्स की अपनी मुद्रा नहीं लेकिन स्थानीय मुद्राओं को बढ़ावा
सम्मेलन से पहले ब्रिक्स की साझा मुद्रा को लेकर काफी चर्चा थी लेकिन दिल्ली में ऐसा कोई निर्णय नहीं हुआ। इसके बजाय सदस्य देशों ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान को आसान बनाने पर जोर दिया। ब्रिक्स भुगतान कार्यबल को सदस्य देशों की भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर सम्पर्क और तेज, सुरक्षित तथा कम लागत वाले सीमा-पार भुगतान के रास्ते तलाशने को कहा गया है।
यह भारत के लिए आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण पहल है। यदि ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ता है और भुगतान प्रणालियों में बेहतर सम्पर्क आता है तो भविष्य में डाॅलर पर निर्भरता कुछ हद तक कम करने के विकल्प बढ़ सकते हैं। हालांकि इसे डाॅलर व्यवस्था के तत्काल विकल्प के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक पर भारत की छाप
इस सम्मेलन का एजेंडा केवल पारम्परिक आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा, क्वांटम तकनीक, अर्धचालक और डिजिटल सम्पर्क जैसे विषयों को भी प्रमुखता मिली। ब्रिक्स नेताओं ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वैश्विक शासन से जुड़े साझा सिद्धांतों और सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई तथा भारत की कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी पहलों को समर्थन मिला।
भारत की अध्यक्षता के दौरान डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के लिए ब्रिक्स संग्रह, स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रशिक्षण नेटवर्क और उद्योग 4.0 से जुड़े सहयोग जैसे कई प्रस्ताव आगे बढ़े। भारत ने अपने अध्यक्षीय वर्ष में कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, स्टार्टअप, शहरी विकास और तकनीक सहित कई क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग की दिशा में पहल की।
भारत की अध्यक्षता में 350 से ज्यादा बैठकें
दिल्ली सम्मेलन की उपलब्धि केवल दो दिन की बैठक का परिणाम नहीं है। भारत ने पूरे 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान 350 से अधिक बैठकें और उच्च स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए। ये कार्यक्रम देश के 25 से अधिक शहरों में हुए और इनमें मंत्रिस्तरीय बैठकों से लेकर कारोबारी, विशेषज्ञ और जन-से-जन सम्पर्क तक के कार्यक्रम शामिल रहे। नई दिल्ली घोषणा में भारत की अध्यक्षता के दौरान हुई व्यापक गतिविधियों और सहयोग की प्रगति की विशेष सराहना की गई।
भारत ने कृषि क्षेत्र में ब्रिक्स उत्कृष्टता केंद्र, डिजिटल कृषि नेटवर्क और कृषि इनपुट से जुड़े सहयोग की पहल की। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम और स्टार्टअप क्षेत्र में सहयोग, वैश्विक मूल्य श्रृंखला, रसद, सीमा शुल्क और मानकों से जुड़े ढांचे तथा शहरी परिवहन और जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे पर भी काम आगे बढ़ाया गया।
नई दिल्ली से ग्लोबल साउथ को क्या संदेश गया?
ब्रिक्स के विस्तार के बाद यह संगठन अब एशिया, अफ्रीका, यूरोप और लैटिन अमेरिका की उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक ही मंच पर लाता है। ऐसे में दिल्ली सम्मेलन का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह रहा कि ब्रिक्स स्वयं को केवल आर्थिक क्लब के रूप में नहीं बल्कि वैश्विक दक्षिण के सामूहिक हितों के प्रतिनिधि मंच के रूप में स्थापित करना चाहता है। पश्चिम एशिया के संघर्ष, व्यापार प्रतिबंधों, एकतरफा शुल्क, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, वैश्विक आपूर्ति श्ृंखलाओं और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर भी घोषणा में विकासशील देशों की चिंताओं को प्रमुखता दी गई। पश्चिम एशिया के मुद्दे पर, जहां ब्रिक्स के भीतर अलग-अलग देशों के हित और दृष्टिकोण हैं, नेताओं ने अधिकतम संयम, संवाद और कूटनीति का आह्वान किया।
भारत को आखिर क्या मिला?
अगर पूरे सम्मेलन को भारत के नजरिए से देखा जाए तो तीन बड़े लाभ सामने आते हैं। पहला, वैश्विक मंच पर भारत की कूटनीतिक स्वीकार्यता और नेतृत्व क्षमता मजबूत हुई। दूसरा, आतंकवाद, पहलगाम हमले और आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ साझा भाषा भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बनी। तीसरा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित वैश्विक संस्थाओं में सुधार की दिशा में ब्रिक्स का समर्थन भारत की दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीति के अनुकूल है।
इसके साथ ही भारत ने ब्रिक्स के आर्थिक एजेंडे को अपनी
प्राथमिकताओं, डिजिटल सार्वजनिक ढांचा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्टार्टअप, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, स्वास्थ्य, कृषि और सतत् विकास से जोड़ने में सफलता हासिल की। यह तत्काल किसी बड़े आर्थिक समझौते या नई मुद्रा के रूप में दिखाई नहीं देता लेकिन आने वाले वर्षों में यदि इन पहलों को जमीन पर लागू किया जाता है तो भारत के लिए इसके आर्थिक और रणनीतिक लाभ महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सिर्फ घोषणा नहीं, अब असली परीक्षा अमल की
दिल्ली सम्मेलन को भारत की कूटनीतिक सफलता कहना उचित है लेकिन इसकी वास्तविक परीक्षा अब शुरू होगी। नई दिल्ली घोषणा में कई बड़े लक्ष्य तय किए गए हैं लेकिन ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों के आर्थिक हित, राजनीतिक प्राथमिकताएं और विदेश नीति के रुख कई मामलों में अलग-अलग हैं। इसलिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, साझा भुगतान व्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन, आतंकवाद विरोधी सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर सहमति को ठोस परिणाम में बदलना आसान नहीं होगा।
फिर भी दिल्ली सम्मेलन ने यह साफ कर दिया है कि ब्रिक्स अब केवल चार-पांच देशों का आर्थिक संवाद मंच नहीं रह गया है। भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली ने इसे विकास, तकनीक, वित्त, सुरक्षा और वैश्विक शासन के व्यापक मंच के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की है। 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता चीन को मिलने जा रही है लेकिन 2026 का नई दिल्ली सम्मेलन भारत के लिए इस मायने में महत्वपूर्ण रहेगा कि उसने बढ़ते और विविधतापूर्ण ब्रिक्स के भीतर अपनी प्राथमिकताओं को साझा एजेंडे का हिस्सा बनाने में सफलता हासिल की।

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