यूसीसी लगाएगा भाजपा की नैय्या पार?

भारतीय जनता पार्टी के लिए समान नागरिक संहिता अब केवल वैचारिक मुद्दा नहीं बल्कि आने वाले चुनावी वर्षों की बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बीते 13 सितम्बर को मुम्बई में बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव 2029 से पहले भाजपा और एनडीए शासित सरकार वाले सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में यूसीसी लागू किया जा चुका है और उन्हें भरोसा है कि बाकी भाजपा और एनडीए शासित राज्य भी इस दिशा में आगे बढ़ेंगे। शाह का यह बयान ऐसे समय आया है जब 2027 में कई महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और उसके बाद 2029 का लोकसभा चुनाव सामने होगा। इसलिए इस घोषणा को महज कानून बनाने की प्रक्रिया के बजाय भाजपा के अगले बड़े राजनीतिक एजेंडे के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। सियासी गलियारों और मीडिया में सवाल उठे रहे हैं कि क्या उत्तराखण्ड बना माॅडल? इसका 2027 के चुनावों में कितना असर होगा? क्या यूसीसी विपक्ष के सामने नई मुश्किल पैदा करेगा? भाजपा के सहयोगी दल कितने साथ? क्या 2029 की फील्डिंग अभी से सेट हो गई है? यह मुद्दा भाजपा के लिए फायदे का सौदा या जोखिम का? क्या यूसीसी आगामी लोकसभा चुनाव तक भाजपा के लिए वैसा ही बड़ा राजनीतिक नैरेटिव तैयार कर पाएगा जैसा पार्टी के दूसरे प्रमुख वैचारिक मुद्दों ने किया है? सबसे बड़ा सवाल क्या भाजपा यूसीसी को उसी तरह राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाएगी जिस तरह उसने अयोध्या, अनुच्छेद 370 और तीन तलाक जैसे मुद्दों को अपने व्यापक वैचारिक एजेंडे में रखा?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लम्बे समय से भाजपा के प्रमुख
वैचारिक मुद्दों में शामिल रहा है। पार्टी का तर्क है कि अलग- अलग धर्मों के लिए अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में समान नागरिक नियम होने चाहिए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी यूसीसी को समान अधिकारों और समान नागरिक व्यवस्था से जोड़कर पेश किया है। भाजपा के लिए यूसीसी का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि पार्टी को 2027 और 2029 के चुनावों के लिए ऐसे मुद्दों की तलाश है जिन्हें राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ राज्य स्तर पर भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया जा सके।
यूसीसी को लागू करने के मामले में उत्तराखण्ड भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन चुका है। इसके बाद गुजरात और असम में भी कानून पारित होने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। अब शाह के बयान के बाद सवाल यह है कि इन राज्यों के बाद अगला नम्बर किसका होगा? हालांकि हर राज्य की सामाजिक संरचना, स्थानीय कानून और राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए सभी राज्यों में एक जैसी गति से कानून बनना आसान नहीं
होगा।

उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। इनमें से कई राज्यों में भाजपा के सामने सत्ता बचाने या सत्ता हासिल करने की चुनौती होगी। भाजपा यूसीसी को सीधे चुनावी घोषणा-पत्र के मुद्दे के रूप में ही नहीं बल्कि ‘समान अधिकार और समान कानून’ के नैरेटिव के रूप में भी पेश कर सकती है। खासकर उन राज्यों में जहां भाजपा को अपने पारम्परिक समर्थन आधार को मजबूत करने की जरूरत है। ऐसे में यूसीसी राजनीतिक ध्रुवीकरण का मुद्दा बन सकता है। दूसरी तरफ विपक्ष के लिए चुनौती होगी कि वह यूसीसी का विरोध करे, उसके प्रावधानों पर सवाल उठाए या फिर इसे सामाजिक सुधार के मुद्दे के रूप में स्वीकार करते हुए भाजपा की राजनीतिक व्याख्या को चुनौती दे।
यदि यूसीसी लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों की रणनीति भी महत्वपूर्ण होगी। विपक्ष के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक तरफ उसे अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार को बनाए रखना होगा, दूसरी ओर भाजपा के उस नैरेटिव का जवाब देना होगा जिसमें यूसीसी को समानता और नागरिक अधिकारों से जोड़ा जा रहा है। यदि विपक्ष अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रुख अपनाता है तो भाजपा को राजनीतिक लाभ मिल सकता है लेकिन यदि कांग्रेस और क्षेत्रीय दल यूसीसी के प्रावधानों पर साझा रणनीति बनाते हैं तो मुद्दा भाजपा के लिए उतना आसान नहीं रहेगा। यानी आने वाले समय में यूसीसी केवल भाजपा बनाम विपक्ष का मुद्दा नहीं रहेगा बल्कि यह केंद्र बनाम राज्य, सामाजिक सुधार बनाम व्यक्तिगत कानून और समानता बनाम विविधता जैसे व्यापक सवालों को भी जन्म दे सकता है। हालांकि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में ऐसे दल भी हैं जिनकी अपनी क्षेत्रीय और सामाजिक राजनीति है। ऐसे में 21 राज्यों में यूसीसी लागू करने का लक्ष्य पूरा करने के लिए भाजपा को सहयोगी दलों के साथ राजनीतिक सहमति बनानी होगी।

अमित शाह ने यूसीसी पर स्पष्ट संकेत दे दिया है लेकिन सभी राज्यों में राजनीतिक सहमति कितनी तेजी से बनेगी, यह बड़ा सवाल है। ऐसे में भाजपा की संगठनात्मक क्षमता और गठबंधन प्रबंधन की भी इसे लागू करने की परीक्षा है। शाह के बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 2029 की समय सीमा है। 2027 के विधानसभा चुनावों के बाद लोकसभा चुनाव की तैयारी तेज होनी है। ऐसे में यदि अगले डेढ़-दो वर्षों में कई एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी कानून बनते हैं तो भाजपा 2029 के चुनाव में इसे अपने शासन और वैचारिक प्रतिबद्धता के उदाहरण के तौर पर पेश कर सकती है। भाजपा के लिए असली चुनौती यूसीसी की घोषणा करना नहीं बल्कि इसे जमीन पर लागू करना और उसके बाद पैदा होने वाली सामाजिक-राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को सम्भालना होगी। भाजपा को यूसीसी एक स्पष्ट राजनीतिक पहचान और मुद्दा दे सकता है। इससे पार्टी अपने समर्थक वर्ग को संदेश दे सकती है कि लम्बे समय से उठाए जा रहे वैचारिक मुद्दों पर सरकार लगातार आगे बढ़ रही है लेकिन इसके साथ जोखिम भी जुड़े हैं। यदि किसी राज्य में यूसीसी को लेकर व्यापक विरोध होता है तो विपक्ष इसे भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति के रूप में पेश कर सकता है। इसके अलावा जनजातीय और क्षेत्रीय समुदायों से जुड़े अलग-अलग प्रावधानों को लेकर भी राज्यों में राजनीतिक बहस हो सकती है। हालांकि शाह ने जनजातीय समूहों की परम्पराओं को संरक्षित रखने के लिए उन्हें यूसीसी से छूट दिए जाने की बात भी कही है।

भाजपा के सामने अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि यूसीसी लागू होगा या नहीं। असल सवाल यह है कि क्या यूसीसी 2027 के विधानसभा से लेकर 2029 के लोकसभा चुनाव तक भाजपा के लिए वैसा ही बड़ा राजनीतिक नैरेटिव तैयार कर पाएगा जैसा पार्टी के दूसरे प्रमुख वैचारिक मुद्दों ने किया है? अमित शाह ने 21 राज्यों और 2029 की समयसीमा तय करके संकेत जरूर दे दिया है। अब निगाहें उन राज्यों पर रहेंगी जहां सरकारें इस दिशा में कदम बढ़ाती हैं। यदि एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी का विस्तार तेजी से होता है तो भाजपा इसे ‘एक देश, एक कानून’ के बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में आगे बढ़ा सकती है लेकिन अगर राज्यों में राजनीतिक और सामाजिक अड़चनें सामने आती हैं तो यही मुद्दा विपक्ष के लिए भाजपा को घेरने का हथियार भी बन सकता है। बहरहाल, यूसीसी अब सिर्फ कानून का सवाल नहीं रहा। यह भाजपा की 2027 से 2029 तक की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। असली परीक्षा यही होगी कि पार्टी इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ में कितना बदल पाती है।

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