भागवत के शब्द और संघ का सच
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का अमेरिका दौरा और वहां उनके द्वारा कही गई बातें बहुतों को हैरान कर रही हैं तो बहुत सारे ऐसे भी हैं जिन्हें उनके हालिया कथन सुहा नहीं रहे हैं। इसलिए नहीं कि संघ प्रमुख ने पहली बार हिंदू समाज, मुसलमानों और भारत की विविधता को लेकर कोई बात कही है बल्कि इसलिए कि आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वह संगठन नहीं है जिसे केवल नागपुर के एक वैचारिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में देखा जा सकता है। पिछले कुछ दशकों में संघ का विस्तार समाज के लगभग हर महत्वपूर्ण क्षेत्र तक हुआ है। राजनीति, शिक्षा, संस्कृति, छात्र राजनीति, सामाजिक संगठनों और सार्वजनिक विमर्श में उसकी उपस्थिति लगातार बढ़ी है। ऐसे समय में जब संघ के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति अमेरिका की धरती पर यह कहते हैं कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं होने की बात हिंदुत्व नहीं हो सकती तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि क्या यह केवल एक सार्वजनिक वक्तव्य है या संघ के वैचारिक सफर में किसी महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत भी है।
मोहन भागवत ने अमेरिका में भारत की विविधता, सह अस्तित्व और एकता की बात की। उन्होंने हिंदू समाज को संकीर्णता से बाहर निकलने का संदेश दिया और यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि भारत में रहने वाले मुसलमान भी भारत के ही नागरिक हैं। पहली नजर में यह बात भारतीय संविधान की मूल भावना के बिल्कुल अनुरूप दिखाई देती है। भारत किसी एक धर्म, भाषा, जाति या समुदाय का देश नहीं है। इस देश की सभ्यता का निर्माण सदियों से अलग-अलग विश्वासों, परम्पराओं, भाषाओं और संस्कृतियों के मेल से हुआ है। इसलिए यदि संघ प्रमुख स्वयं हिंदू समाज से यह कहते हैं कि किसी मुसलमान के लिए भारत में जगह नहीं होने की सोच हिंदुत्व की सोच नहीं है तो यह बात निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है लेकिन यहीं एक गम्भीर प्रश्न जन्म लेता है कि क्या संघ इस विचार को अपने संगठनात्मक व्यवहार में भी उतारने के लिए तैयार है?
किसी भी संगठन की वास्तविक विचारधारा उसके मंच से दिए गए भाषणों से नहीं बल्कि उसके कार्यकर्ताओं और उससे जुड़े संगठनों के व्यवहार से दिखाई देती है। कोई संगठन मंच से जितनी उदार बातें कर सकता है, समाज उसके बारे में उतना ही उसके व्यवहार से निष्कर्ष निकालता है। इसलिए मोहन भागवत के अमेरिका में दिए गए वक्तव्य को लेकर उत्साह व्यक्त करने से पहले यह पूछना जरूरी है कि क्या भारत लौटने के बाद संघ की राजनीति, उसकी भाषा, उसके सामाजिक हस्तक्षेप और उससे जुड़े संगठनों की गतिविधियों में भी वही उदारता दिखाई देगी। यदि दिखाई देती है तो यह मानने के पर्याप्त कारण होंगे कि संघ अपने सौ वर्ष के पड़ाव पर अपने भीतर एक गम्भीर वैचारिक पुनर्विचार कर रहा है लेकिन यदि शब्द वही रहते हैं और जमीन पर व्यवहार पुराना ही दिखाई देता है तो फिर सवाल उठेगा कि आखिर इस नए कथन का वास्तविक अर्थ क्या है।
मोहन भागवत की बात को इसी संदर्भ में समझने की जरूरत है। यदि वह कहते हैं कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है तो यह केवल मुसलमानों के लिए आश्वासन नहीं है। यह संघ के लिए भी एक वैचारिक चुनौती है। विविधता का अर्थ केवल अलग- अलग समुदायों का एक साथ रहना नहीं है। विविधता का अर्थ विचारों की विविधता भी है। भारत में केवल धार्मिक विविधता नहीं है बल्कि राजनीतिक, सामाजिक, भाषाई और वैचारिक विविधता भी है। इसलिए यदि संघ हिंदू समाज के भीतर अपनी बात रखने का अधिकार चाहता है तो उसे उन लोगों के अधिकार को भी स्वीकार करना होगा जो संघ की विचारधारा से असहमति रखते हैं। लोकतंत्र में किसी संगठन की ताकत का असली प्रमाण यह नहीं होता कि उसके समर्थक कितने हैं बल्कि यह होता है कि वह अपने
आलोचकों के लिए कितनी जगह छोड़ता है।
मोहन भागवत की बात को इसी संदर्भ में समझने की जरूरत है। यदि वह कहते हैं कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है तो यह केवल मुसलमानों के लिए आश्वासन नहीं है। यह संघ के लिए भी एक वैचारिक चुनौती है। विविधता का अर्थ केवल अलग- अलग समुदायों का एक साथ रहना नहीं है। विविधता का अर्थ विचारों की विविधता भी है। भारत में केवल धार्मिक विविधता नहीं है बल्कि राजनीतिक, सामाजिक, भाषाई और वैचारिक विविधता भी है। इसलिए यदि संघ हिंदू समाज के भीतर अपनी बात रखने का अधिकार चाहता है तो उसे उन लोगों के अधिकार को भी स्वीकार करना होगा जो संघ की विचारधारा से असहमति रखते हैं। लोकतंत्र में किसी संगठन की ताकत का असली प्रमाण यह नहीं होता कि उसके समर्थक कितने हैं बल्कि यह होता है कि वह अपने
आलोचकों के लिए कितनी जगह छोड़ता है।
मोहन भागवत की अमेरिका वाली बात इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि मुसलमानों के लिए भारत में जगह है तो यह केवल इतना कह देने से सिद्ध नहीं होगा कि वे भारत के नागरिक हैं। यह उनके साथ व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। यदि संघ हिंदू समाज को उदार और आत्मविश्वासी बनाना चाहता है तो उसे यह भी देखना होगा कि हिंदू समाज की शक्ति दूसरे समुदाय के प्रति भय पैदा करने में नहीं बल्कि अपनी संस्कृति और परम्परा के प्रति आत्मविश्वास में है जो समाज अपने विश्वास को लेकर आश्वस्त होता है, वह दूसरे के विश्वास से डरता नहीं है। वह दूसरे की प्रार्थना, भाषा, खानपान और संस्कृति के अस्तित्व को अपने लिए खतरा नहीं मानता।
इसी तरह हिंदुत्व की व्यापकता की परीक्षा भी यहीं होगी। यदि हिंदुत्व वास्तव में भारतीय सभ्यता की व्यापक अवधारणा है तो उसमें असहमति के लिए भी जगह होनी चाहिए। उसमें नास्तिक के लिए जगह होनी चाहिए, दूसरे धर्म के अनुयायी के लिए जगह होनी चाहिए, वामपंथी के लिए जगह होनी चाहिए, उदारवादी के लिए जगह होनी चाहिए और उस व्यक्ति के लिए भी जगह होनी चाहिए जो संघ की हर बात से असहमत है। यदि कोई विचार इतना व्यापक है कि वह अपने आलोचक को भी अपने भीतर स्थान दे सके तो उसकी शक्ति पर संदेह नहीं किया जा सकता लेकिन यदि किसी विचार को मजबूत करने के लिए आलोचना को ही देशविरोधी करार देना पड़े तो फिर उस विचार की ताकत पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यहां संघ के चाल, चरित्र और चेहरे में बदलाव का प्रश्न भी सामने आता है। लम्बे समय से संघ के बारे में उसके समर्थक कहते रहे हैं कि संघ स्वयं राजनीतिक संगठन नहीं है और उसका उद्देश्य राष्ट्र निर्माण तथा सामाजिक संगठन है। इस तर्क को स्वीकार करते हुए भी यह सच है कि आज संघ का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बहुत व्यापक है। इसलिए उसका नैतिक दायित्व भी पहले से कहीं बड़ा है। जब कोई संगठन समाज के इतने बड़े हिस्से को प्रभावित करता है तो उसे केवल यह कहकर अपने प्रभाव की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता कि वह प्रत्यक्ष रूप से चुनावी राजनीति नहीं करता।
संघ का प्रभाव जितना बढ़ा है, उसके सामने आत्ममंथन की आवश्यकता भी उतनी ही बढ़ी है। उसे यह तय करना होगा कि वह सत्ता के साथ खड़ा रहने वाला संगठन बनना चाहता है या सत्ता से ऊपर एक वैचारिक-सामाजिक संस्था के रूप में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना चाहता है। लोकतंत्र में सत्ता आती-जाती रहती है। सरकारें बदलती रहती हैं। राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं लेकिन यदि कोई सामाजिक संगठन अपनी पहचान को किसी एक सत्ता के साथ बहुत गहराई से जोड़ लेता है तो उसकी वैचारिक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। संघ के लिए यह आत्ममंथन इसलिए और आवश्यक है क्योंकि उसका प्रभाव आज उस स्तर पर पहुंच चुका है जहां समाज उससे केवल सांस्कृतिक गतिविधियों की अपेक्षा नहीं करता बल्कि सार्वजनिक जीवन के अनेक प्रश्नों पर उसकी नैतिक स्थिति जानना चाहता है।
यदि समाज में धार्मिक घृणा बढ़ती है तो संघ क्या करेगा? यदि किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा होती है तो संघ का रुख क्या होगा? यदि किसी राजनीतिक नेता की भाषा समाज में विभाजन पैदा करती है तो संघ क्या करेगा? यदि किसी विश्वविद्यालय में असहमति को दबाने की कोशिश होती है तो संघ क्या करेगा? यदि किसी विद्यार्थी को केवल उसकी विचारधारा के कारण राष्ट्रविरोधी कहा जाता है तो संघ क्या करेगा? इन सवालों के जवाब बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन्हीं से पता चलेगा कि मोहन भागवत की अमेरिका में कही गई बातें केवल संदेश थीं या संघ के भीतर उभर रही नई सोच का हिस्सा।
भारतीय परम्परा को लेकर भी संघ के सामने यही चुनौती है। भारतीय ज्ञान परम्परा का गौरव तभी सार्थक है जब उसमें प्रश्न पूछने की परम्परा भी जीवित रहे। भारत की सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह रही है कि यहां दर्शन की अलग-अलग धाराएं एक-दूसरे से असहमति रखते हुए भी अस्तित्व में रही हैं। आस्तिक और नास्तिक परम्पराएं साथ चलीं। अनेक दार्शनिक मतों ने एक-दूसरे को चुनौती दी। बहस और शास्त्रार्थ भारतीय बौद्धिक परम्परा का हिस्सा रहे हैं। इसलिए यदि आज भारतीय संस्कृति के नाम पर केवल एक निश्चित विचार को अंतिम सत्य मान लिया जाए और बाकी सभी प्रश्नों को अस्वीकार कर दिया जाए तो यह भारतीय परम्परा की रक्षा नहीं बल्कि उसकी आत्मा को सीमित करना होगा।
मोहन भागवत के लिए यह समय अपने संगठन के भीतर भी ऐसे सवाल उठाने का है। संघ ने सौ वर्षों में बहुत कुछ हासिल किया है लेकिन हर बड़ी संस्था के लिए सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब वह अपनी उपलब्धियों से इतना संतुष्ट हो जाए कि अपने भीतर की कमजोरियों को देखना बंद कर दे। संघ का विस्तार हुआ है, प्रभाव बढ़ा है, राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ी है लेकिन इसके साथ यह भी देखना जरूरी है कि क्या उसका मूल चरित्र भी उसी अनुपात में विकसित हुआ है? क्या आज भी उसके भीतर उतनी ही वैचारिक स्वतंत्रता है? क्या वह अपने ही कार्यकर्ताओं के बीच असहमति को सुनता है? क्या वह बदलते भारत की नई सामाजिक आकांक्षाओं को समझ रहा है? क्या वह युवाओं के बदलते सवालों का सामना करने के लिए तैयार है? सबसे महत्वपूर्ण सवाल कि क्या संघ अपने बारे में आलोचनात्मक प्रश्नों को सुनने के लिए तैयार है?
किसी संगठन के बदलने का सबसे बड़ा प्रमाण उसके समर्थकों की संख्या नहीं होती। उसका सबसे बड़ा प्रमाण यह होता है कि उसके आलोचक उसके बारे में कितनी स्वतंत्रता से बोल सकते हैं। यदि संघ के आलोचक विश्वविद्यालयों में बोल सकते हैं, अखबारों में लिख सकते हैं, सार्वजनिक मंचों पर सवाल उठा सकते हैं और संघ इन सवालों का जवाब तर्क से देता है तो यह संघ की ताकत का प्रमाण होगा लेकिन यदि आलोचना को रोकना, आलोचक को बदनाम करना या असहमति को राष्ट्रविरोध से जोड़ना जरूरी हो जाए तो यह बदलाव की नहीं, असुरक्षा की निशानी होगी।
इसलिए मोहन भागवत के अमेरिका में दिए गए वक्तव्य को लेकर न तो तुरंत उत्साहित होने की जरूरत है और न ही उसे खारिज कर देने की। उसे कसौटी पर कसने की जरूरत है। यदि यह संघ के भीतर बदलती सोच का संकेत है तो आने वाले समय में उसका प्रभाव संगठन की भाषा और व्यवहार दोनों में दिखाई देना चाहिए। संघ को धार्मिक सद्भाव के प्रश्न पर अधिक स्पष्ट होना चाहिए। उसे घृणा की भाषा के खिलाफ अपनी आवाज को और मजबूत करना चाहिए। उसे विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता का समर्थन करना चाहिए। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके प्रभाव वाले छात्र संगठनों और संस्थाओं में असहमति के लिए भी जगह हो। सबसे बढ़कर उसे यह दिखाना चाहिए कि वह सत्ता के करीब रहते हुए भी सत्ता से स्वतंत्र होकर सोच सकता है।
मोहन भागवत ने अमेरिका में एक दरवाजा खोला है। अब देखना यह है कि उस दरवाजे से संघ स्वयं भी भीतर आता है या नहीं। यदि वह आता है तो यह केवल संघ का परिवर्तन नहीं होगा बल्कि भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत हो सकती है। तब शायद आने वाली पीढ़ियां संघ के सौ वर्ष पूरे होने को केवल उसके विस्तार की कहानी के रूप में नहीं बल्कि उसके आत्ममंथन और वैचारिक परिवर्तन के मोड़ के रूप में याद करेंगी क्योंकि आखिरकार सवाल यह नहीं है कि मोहन भागवत ने अमेरिका में क्या कहा। असली सवाल यह है कि भारत लौटकर संघ क्या करता है।
