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ग्रामीण महिला सशक्तिकरण की नई इबारत

भारत सरकार द्वारा ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के उद्देश्य से चलाई जा रही ‘लखपति दीदी’ पहल राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का एक महत्वपूर्ण आयाम है। इसका मुख्य उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की वार्षिक आय को एक लाख रुपए या उससे अधिक तक पहुंचाना है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ मजबूत कर सकें।

इस पहल के तहत महिलाओं को संगठित कर उन्हें बैंक लिंकेज, सामुदायिक निवेश कोष (सीआईएफ), कौशल प्रशिक्षण, विपणन सहायता, ब्रांडिंग, पैकेजिंग, डिजिटल लेन- देन, वित्तीय साक्षरता और विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़ने का कार्य किया जाता है। ‘लखपति दीदी’ केवल आय बढ़ाने की योजना नहीं है, बल्कि यह महिलाओं को निर्णय लेने की क्षमता, नेतृत्व कौशल और सामाजिक सम्मान प्रदान करने की दिशा में एक व्यापक आंदोलन है। इस योजना को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि ‘स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं विकसित भारत की मजबूत नींव हैं। ‘लखपति दीदी’ पहल का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है ताकि वे अपने परिवार और समाज की दिशा बदल सकें।’ उन्होंने यह भी रेखांकित किया है कि ग्रामीण महिलाओं की आय में वृद्धि देश की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती देगी और यह अभियान महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने का माध्यम बनेगा। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से महिलाओं को कृषि आधारित उद्यम, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, सूक्ष्म उद्योग, वनोपज प्रसंस्करण तथा स्थानीय उत्पादों की मार्केटिंग जैसी गतिविधियों से जोड़ा जाता है। सरकार का लक्ष्य लाखों महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ के रूप में स्थापित करना है, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सके और महिलाओं की भागीदारी आर्थिक विकास के केंद्र में आए।

उत्तराखण्ड में इस योजना को विशेष गति देते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि ‘‘राज्य सरकार का लक्ष्य अधिक से अधिक महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाना है। यह केवल आय बढ़ाने की योजना नहीं बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर और आत्मसम्मान से परिपूर्ण बनाने का अभियान है।’’ उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को प्रशिक्षण, विपणन मंच और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराकर उन्हें मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। इसी पहल की जीवंत मिसाल हैं प्रदेश के ऊधमसिंह नगर जिले की खटीमा विकासखंड की सुरेंद्री राणा, जिनकी कहानी संघर्ष से सफलता तक की प्रेरक यात्रा है।
 
सुरेंद्री राणा की प्रेरक कहानी

उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर जनपद के खटीमा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत रतनपुर की रहने वाली सुरेंद्री राणा का जीवन कुछ वर्ष पहले तक संघर्षों से भरा था। सीमित संसाधन, अनियमित आमदनी और परिवार की आर्थिक तंगी ने उनके जीवन को लगभग निराशा में धकेल दिया था। बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही थी, पोषण की स्थिति कमजोर थी और भविष्य धुंधला दिखाई देता था।

गांव की अधिकांश महिलाओं की तरह वे भी कृषि पर निर्भर थीं लेकिन मौसमी कार्य और कम आमदनी के कारण आर्थिक स्थिरता सम्भव नहीं हो पा रही थी। ऐसे कठिन समय में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन उनके जीवन में आशा की किरण बनकर आया।

सुरेंद्री राणा ‘महिला कल्याण’ स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं, जो ‘रोशनी ग्राम संगठन’ तथा ‘उज्ज्वल महिला क्लस्टर संगठन’ से संबद्ध है। समूह की नियमित बैठकों में भाग लेने से उन्हें सरकारी योजनाओं, वित्तीय सहायता और उद्यमिता के अवसरों की जानकारी मिलने लगी। यहीं से उनके जीवन में बदलाव की शुरुआत हुई। उन्होंने ठान लिया कि अब वे पीछे मुड़कर नहीं देखेंगी। सबसे पहले उन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के तहत 20 हजार रुपए की सहायता लेकर मसाला निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया। विकासखंड स्तर पर उन्हें ब्रांडिंग और पैकेजिंग की सुविधा मिली, जिससे उनके उत्पाद स्थानीय बाजार में बिकने लगे। आय में शुरुआती वृद्धि ने उनके आत्मविश्वास को नई उड़ान दी। इसके बाद उन्होंने सामुदायिक निवेश कोष से 40 हजार रुपए लेकर पारम्परिक डलिया-टोकरी बनाने का कार्य शुरू किया। यह कार्य उनकी पारम्परिक कला से जुड़ा था, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत मिला और स्थानीय स्तर पर उनके उत्पादों की मांग भी बढ़ी।

खटीमा क्षेत्र में सरसों की अच्छी पैदावार होती है। इस अवसर को पहचानते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत प्रधानमंत्री वन धन विकास केंद्र के माध्यम से ग्राम पंचायत में सरसों तेल निकालने की मशीन स्थापित की गई। सुरेंद्री राणा ने सामुदायिक क्रेडिट लिंकेज  से 50 हजार रुपए का ऋण लेकर सरसों तेल उत्पादन का कार्य प्रारम्भ किया। शुद्ध और स्थानीय स्तर पर तैयार सरसों तेल की मांग तेजी से बढ़ी और उनका व्यवसाय मजबूत होता गया। आज सुरेंद्री राणा के उत्पाद ‘मुख्यमंत्री सशक्त बहना उत्सव योजना’, विभिन्न सरस मेलों तथा ट्राइफेड देहरादून जैसे मंचों के माध्यम से व्यापक बाजार तक पहुंच रहे हैं। उनकी मासिक आय अब 12 से 15 हजार रुपए तक पहुंच चुकी है जो पहले की तुलना में कई गुना अधिक है। वार्षिक आय एक लाख रुपए से ऊपर पहुंचने के साथ वे ‘लखपति दीदी’ के रूप में पहचानी जाने लगी हैं। सुरेंद्री राणा की कहानी केवल व्यक्तिगत सफलता की कथा नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण महिला सशक्तिकरण की सशक्त मिसाल है। उनकी मेहनत और दृढ़ संकल्प ने न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारा बल्कि गांव की अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी है।

आज वे अपने समूह की बैठकों में अन्य महिलाओं को उद्यम शुरू करने, सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। जिस जीवन में कभी अंधकार था, वहां अब आत्मनिर्भरता और सम्मान का प्रकाश फैल चुका है। सुरेंद्री राणा की यह यात्रा साबित करती है कि जब अवसर, मार्गदर्शन और दृढ़ निश्चय एक साथ मिलते हैं तो ग्रामीण महिलाएं न केवल अपने परिवार का भविष्य बदल सकती हैं, बल्कि पूरे समाज के विकास की दिशा भी तय कर सकती हैं। यही है ‘लखपति दीदी’ पहल की असली सफलता।

बात अपनी-अपनी

मैं लखपति दीदी से तो एक साल पहले ही जुड़ी हूं लेकिन समाज सेवा और महिलाओं के उत्थान के लिए वर्ष 2009 से काम कर रही हूं। मुझे राष्ट्रपति से भी सम्मान मिला है। यह सम्मान 23 अगस्त 2011 को मुझे दिल्ली में दिया गया था। मैं 30-30 महिलाओं के ग्रुप को तीन-तीन दिन की ट्रेनिंग देती हूं जिसमें मैं उन्हें हैंडीक्राफ्ट से सम्बंधित काम का प्रशिक्षण देती हूं। इससे महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं। सरस मेले में मेरे रुद्रपुर और देहरादून में स्टॉल भी लगाए जा चुके हैं।