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क्या गुल खिलाएंगे ठाकरे बंधु?

महाराष्ट्र की राजनीति में एक अहम मोड़ तब आया जब लगभग बीस वर्षों बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक साथ मंच पर नजर आए। दोनों भाइयों ने आगामी मुम्बई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव मिलकर लड़ने की घोषणा की है। ‘अगर बंटेंगे तो बिखरेंगे’ का नारा इस गठबंधन के पीछे के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करता है। बीते 24 दिसम्बर को औपचारिक गठबंधन की घोषणा के साथ यह साफ हो गया है कि ठाकरे बंधु अब सिर्फ साथ दिख ही नहीं रहे बल्कि साथ चुनावी मैदान में उतरने को तैयार हैं। एक ओर उद्धव ठाकरे खुद को बीजेपी के खिलाफ मुख्य विपक्षी चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहते हैं तो वहीं दूसरी तरफ राज ठाकरे अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने का अवसर तलाश रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इस गठबंधन के कई मायने निकाले जा रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या ठाकरे बंधुओं का यह मेल महाराष्ट्र की राजनीति में नया गुल खिला पाएगा?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि शिवसेना (यूबीटी) और मनसे के बीच तालमेल मजबूत होता है तो मराठी वोटों का बड़ा हिस्सा एकजुट हो सकता है। इसका सीधा असर मुम्बई और अन्य महानगरों में बीजेपी और महायुति पर पड़ सकता है। मराठी अस्मिता, भाषा और स्थानीय मुद्दों पर ठाकरे भाइयों की संयुक्त राजनीति बीजेपी के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है। यदि मुस्लिम वोट और दलित वोटों का एक हिस्सा भी विपक्ष के साथ जाता है तो समीकरण और जटिल हो सकते हैं। वोट गणित के लिहाज से देखें तो मुम्बई की राजनीति में जातीय और भाषाई समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। शहर की लगभग 26 प्रतिशत आबादी मराठी भाषी है जिसे ठाकरे परिवार का पारम्परिक समर्थक माना जाता है। इसके अलावा करीब 11-11 फीसदी मुस्लिम और दलित वोटर हैं जिनका बड़ा हिस्सा बीजेपी का कोर वोट बैंक नहीं माना जाता। 227 बीएमसी वार्डों में से 67 वार्ड ऐसे हैं जहां मनसे को मिले वोट जीत के अंतर से ज्यादा थे। इनमें 39 वार्डों में महाविकास आघाड़ी आगे रही जबकि 28 में महायुति को बढ़त मिली। कुल मिलाकर 123 वार्ड ऐसे रहे जहां मनसे का प्रभाव साफ दिखाई दिया। इससे स्पष्ट है कि कम वोट शेयर के बावजूद पार्टी का असर पूरे मुम्बई के सियासी भूगोल में फैला हुआ है।

राज ठाकरे का राजनीतिक सफर सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 2009 के विधानसभा चुनाव में मनसे ने 13 सीटें जीतकर 5.71 फीसदी वोट शेयर हासिल किया है। 2012 के बीएमसी चुनावों में 27 सीटों के साथ पार्टी अपने शिखर पर थी। हालांकि इसके बाद गिरावट शुरू हुई। 2014 में पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी, 2017 के बीएमसी चुनावों में यह संख्या घटकर 7 रह गई। 2024 के विधानसभा चुनाव में मनसे का खाता तक नहीं खुला और अमित ठाकरे को भी हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद राज ठाकरे की करिश्माई छवि और आक्रामक मुद्दों ने मनसे को राजनीतिक विमर्श में प्रासंगिक बनाए रखा। विरोधी दल अक्सर इसे ‘वोट-कटवा’ मानते रहे हैं। लेकिन जहां तक सवाल है कि ठाकरे भाइयों का गठबंधन क्या गुल खिलाएगा का तो इसका जवाब आने वाले बीएमसी चुनाव परिणामों में मिलेगा।

गौरतलब है कि राज ठाकरे ने वर्ष 2005 में शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का गठन किया था। इसके बाद से दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक ही नहीं बल्कि निजी दूरी भी बनी रही। लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। बीते कुछ महीनों में दोनों भाइयों की बढ़ती नजदीकियों ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दिया है। ठाकरे भाइयों के बीच नजदीकियों की शुरुआत 5 जुलाई 2025 को मराठी भाषा को लेकर हुई जहां दोनों एक मंच पर दिखे। इसके बाद 27 जुलाई को राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे के जन्मदिन पर ‘मातोश्री’ पहुंचे। अगस्त में गणेशोत्सव के दौरान करीब 20 साल बाद उद्धव ठाकरे अपने परिवार के साथ राज ठाकरे के ‘शिवतीर्थ’ निवास गए।

सितम्बर और अक्टूबर में स्नेह-भोज, दीपोत्सव, पारिवारिक कार्यक्रमों और यहां तक कि चुनाव आयोग से जुड़ी बैठकों में भी दोनों की साझा मौजूदगी दिखी। 1 नवम्बर को मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ ‘सत्य का मोर्चा’ निकालने का निर्णय हो या 10 नवम्बर को अभिनेता सुबोध भावे के जन्मदिन पर साथ दिखना, 10 दिसम्बर को अमित ठाकरे के बहनोई की शादी में पूरे ठाकरे परिवार की मौजूदगी के बाद अब दोनों दलों का साथ आना यह दिखाता है कि यह मेल-मिलाप केवल निजी नहीं बल्कि राजनीतिक भी है।