‘वह बित्ते भर की छोकरी’
डॉ . बी .आर. अंबेडकर और नेहरू के खिलाफ ‘हिंदू कोड बिल’ को लेकर सड़कों पर उतरने वाले करपात्री जी महाराज एक बार फिर से नए मुद्दे को लेकर आंदोलनरत थे। इस बार उनका आंदोलन गौमांस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने को लेकर था। 6 नवंबर 1966 को करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में लगभग एक लाख साधु-संत दिल्ली की सड़कों पर उतर आए। हाथों में ‘त्रिशूल’ लिए इन साधुओं की एक बड़ी सभा को करपात्री महाराज और जनसंघ नेता संसद सदस्य स्वामी कमेश्वरानंद ने सम्बोधित करते हुए संसद को घेरने का आह्नान कर डाला। जनसंघ नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी इस सभा में मौजूद थे। उन्होंने करपात्री महाराज से अपील कर आग्रह किया कि संसद को घेरने का विचार त्याग दें लेकिन उनकी अपील बेअसर रही। साधुओं की अनियंत्रित भीड़ संसद बाहर एकत्रित होने लगी। पुलिस ने पहले तो लाठी चार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास किया। हालात लेकिन काबू से बाहर हो गए। भीड़ ने कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज के घर को आग के हवाले कर दिया और लगभग 400 वाहनां को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस को गोली चलानी पड़ी थी जिसमें 6 लोगों की मृत्यु हो गई। इंदिरा गांधी ने इस घटना का राजनीतिक लाभ लेते हुए ‘सिंडिकेट’ के वरिष्ठ सदस्य और तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसी दौरान पंजाब के सिखों को बड़ी राहत देते हुए हिन्दी भाषी इलाकों को अलग कर एक नए राज्य हरियाणा का गठन 1 नवम्बर, 1966 को केन्द्र सरकार ने किया। पंजाब का सिख समुदाय लम्बे अर्से से अलग प्रांत बनाए जाने की मांग कर रहा था। अविभाजित पंजाब में आजादी के समय 65 प्रतिशत जनसंख्या सिखों की थी जो बिहार और केरल से आने वाले श्रमिकों के चलते निरंतर घटने लगी थी। कांग्रेस सिंडिकेट और प्रधानमंत्री के मध्य इस दौरान तनाव चरम पर पहुंच चुका था। इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने वाले के. कामराज अब मोरारजी देसाई के संग मिलकर आम चुनाव बाद इंदिरा को दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनने देने की रणनीति बनाने में जुट गए। पार्टी प्रत्याशियों के चयन में इंदिरा की नहीं सुनी गई। इंदिरा लेकिन हार मानने वालों में नहीं थीं। उन्होंने देश भर का धुआंधार दौरा कर कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने की मुहिम छेड़ दी। उड़ीसा के भुवनेश्वर में एक चुनावी सभा को सम्बोधित करते समय भीड़ ने उन पर पत्थर फेंके जिस चलते उनकी नाक की हड्डी टूट गई। वे लेकिन घबराई नहीं। नाक से बहते खून से बेपरवाह इंदिरा ने पत्थरबाजों से कहा -‘यह मेरा नहीं बल्कि देश का अपमान है क्योंकि मैं बतौर प्रधानमंत्री देश का प्रतिनिधित्व कर रही हूं।’ फरवरी, 1967 में हुए चौथे आम चुनावों का नतीजा कांग्रेस के लिए सुखद नहीं रहा। लोकसभा में उसकी सदस्य संख्या 369 से घटकर मात्र 285 रह गई। हालांकि वे स्वयं उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से अपना पहला चुनाव भारी मतों से जीतने में सफल रहीं। सात राज्यों-केरल, मद्रास, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में विधानसभा के नतीजे कांग्रेस के खिलाफ रहे। ब्रिटेन के अखबार ‘द टाइम्स’ ने चुनाव नतीजों की बाबत प्रकाशित समाचार का तब शीर्षक दिया था-‘टूटी नाक के बाद अब चेहरे पर थप्पड़’। (After the broken nose, a slap in the face.) सिंडिकेट के लिए तो इन चुनावों के नतीजे विशेष रूप से खराब रहे। कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज को मद्रास सीट पर एक अनजाने युवक ने डीएमके के टिकट पर चुनाव लड़ पराजित कर दिया। सिंडिकेट के कई अन्य बड़े नेता, बॉम्बे में एस.के. पाटिल, बंगाल में अतुल्य घोष और उड़ीसा में बीजू पटनायक भी चुनाव हारे। इन बड़े नेताओं की हार का अप्रत्यक्ष लाभ इंदिरा को मिला। कांग्रेस अध्यक्ष कामराज ने अब पार्टी में एकता बनाए रखने को अपना लक्ष्य बना इंदिरा और मोरारजी के मध्य सुलह कराने की मुहिम शुरू कर दी। मोरारजी देसाई कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद का चयन चुनाव के जरिए कराना चाहते थे। उन्होंने स्वयं की उम्मीदवारी भी घोषित कर दी लेकिन कामराज और अन्य नेताओं की मध्यस्थता बाद आखिरकार इंदिरा को ही दोबारा संसदीय दल का नेता चुन लिया गया। मोरारजी देसाई को उपप्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पद नई सरकार में दिया गया था। मोरारजी देसाई संग इंदिरा के संबंध हमेशा अविश्वास और तनावपूर्ण रहे। मोरारजी देसाई ने नेहरू से उत्तराधिकारी की तलाश के दौरान इंदिरा के लिए कहा था ‘वह बित्ते भर की लड़की।’ अब उसी बित्ते भर की लड़की के अधीन काम करना देसाई को बेहद अपमानजनक लगने लगा था। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र से देसाई ने शिकायती भरे लहजे में कहा था। ‘छोकरी सुनती नहीं है।’ एक तरफ इंदिरा गांधी की ‘सिंडिकेट’ संग टकराव लगातार बढ़ने लगा था तो दूसरी तरफ उनका अमेरिका संग तेजी से मोहभंग उन्हें साम्यवादी नीतियों की तरफ ले जाने लगा था। मई, 1967 में उन्होंने अपनी सरकार के 10 सूत्री कार्यक्रम को सार्वजनिक करते हुए निजी क्षेत्र के बैंकां पर सरकारी नियंत्रण मजबूत करने, बीमा क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण करने, आवश्यकता से अधिक अचल सम्पत्ति पर रोक लगाने खाद्य निर्यात पर सरकारी नियन्त्रण बढ़ाने और राजे-रजवाड़ों को दिए जाने वाली विशेष आर्थिक सहायता ‘प्रिवी पर्स’ को समाप्त किए जाने की बात कह डाली। इस घोषणा ने स्पष्ट संकेत देने का काम किया कि अब इंदिरा अपने पिता के पदचिन्हों पर चल पड़ी हैं। खाद्य संकट अभी टला नहीं था और अमेरिकी सरकार इस संकट का राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से समय पर यथोचित सहायता जान-बूझकर नहीं भेज रहा था। इंदिरा गांधी ने इसका जवाब कृषि क्षेत्र में भारी सुधार कर भारत को आत्मनिर्भर बनाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया। हालांकि भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की कवायद नेहरूकाल में ही शुरू हो चुकी थी और शास्त्री के प्रधानमंत्रित्वकाल में भी इस पर खासा काम जारी रहा था, इंदिरा गांधी ने अपने अमेरिकी अनुभव से सबक लेकर इस मिशन को युद्ध स्तर पर शुरू कर डाला। उनकी सरकार में कृषि मंत्री सी ़ सुब्रमण्यम ने भारतीय किसानों को उन्नत कृषि तकनीक, संकर बीज (हाइब्रिड बीज) और सुलभ सिंचाई व्यवस्था उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नतीजा कुछ ही वर्षों में सफल ‘हरित क्रांति’ के रूप में सामने आया और भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर राष्ट्र बन गया। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में इस ‘हरित क्रांति’ को गिना जाता है।
