गंगा पुत्र का बलिदान

‘स्वामी निगमानंद केस दुबारा खुलने के बाद आरोपियों का बचना संभव नहीं होगा। क्योंकि कोर्ट ने आरोपित नर्स से पूछताछ करने और निगमानंद की विसरा रिपोर्ट को उसके माता-पिता के डीएनए से मिलान करने का आदेश दिया है। ऐसे में सीबीआई के लिए आरोपियों को बचाना आसान नहीं होगा। सीबीआई स्वामी निगमानंद की हत्या के केस को लटकाना चाहती है। क्योंकि केस फिर-ओपन होने के दो माह बाद भी जांच अधिकारी ने जांच शुरू नहीं की है। कोर्ट ने सीबीआई के स्टे के आदेश को भी खारिज कर दिया है। पूर्व में सीबीआई ने एफआर लगा दी थी। इस पर सीबीआई कोर्ट ने असंतोष जताते हुए जांच शुरू करने के आदेश दिए। जांच शुरू होने को लेकर दो माह बीत गए हैं, लेकिन अभी तक जांच अधिकारी ने उनसे संपर्क नहीं किया है। इस बार आयोग के लिए मामले में एफआर लगाना मुश्किल होगा।’

यह कहना है मातृ सदन के अध्यक्ष स्वामी शिवानंद का। शिवानंद गत 13 जून को हरिद्वार स्थित मातृ सदन आश्रम में स्वामी निगमानंद की 11वीं पुण्यतिथि पर बोल रहे थे। स्वामी निगमानंद हरिद्वार के मातृ सदन के संत थे। स्वामी निगमानंद की 11 साल पहले 13 जून 2011 के दिन रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई थी। उनकी मौत पर काफी हल्ला मचा था। मातृ सदन ने तत्कालीन निशंक सरकार पर आरोप लगाए थे कि उन्होंने खनन माफियाओं के इशारे पर निगमानंद की जहर देकर हत्या करा दी थी। इसके बाद मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया गया था।

स्वामी निगमानंद की मौत के बाद से उनकी पुण्यतिथि पर मातृ सदन में प्रत्येक वर्ष गोष्ठी का आयोजन किया जाता रहा है। इस वर्ष भी निगमानंद की पुण्यतिथि के अवसर पर दो दिवसीय गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें निगमानंद के बलिदान को याद करते हुए सरकार को अवैध खनन के प्रति चेताया गया। इस अवसर पर देश के अनेक राज्यों से आए पर्यावरणविदों और प्रकृति प्रेमियों ने स्वामी निगमानंद को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की और गंगा के प्रति उनके समर्पण को याद किया। सभी लोगों ने एक स्वर में गंगा और प्रकृति के विकास के नाम पर हो रहे दोहन की कठोर शब्दों में निंदा की। वक्ताओं ने जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम के बारे में भी बताया। जलपुरुष डॉक्टर राजेंद्र सिंह ने कहा कि मातृ सदन एक विश्व तीर्थ है। जो साधक पूर्ण त्याग में प्रतिष्ठित रहेगा, वही मातृ सदन में श्री गुरुदेव के साथ रह सकेगा। उन्होनें निगमानंद के साथ अपने संस्मरण को सबके सामने रखते हुए कहा कि वे सर्वप्रथम मातृ सदन स्वामी के अनशन के 55वें दिन आये थे, और यहां की तपस्या को देखते हुए मातृ सदन के साथ उनका जुड़ाव हो गया। अतुल्य गंगा से भारतीय नौसेना के रिटायर्ड कमांडर अमोघ चौधरी ने बताया कि गंगा में बहते हुए नालों का गंदा पानी गंगाजल को प्रदूषित कर रहा हैं। उन्होंने बनारस से गंगा सागर की अपनी 5000 किलोमीटर की पदयात्रा के अनुभव साझा किए और कहा कि प्रत्येक भारतवासी के मन में गंगा के लिए पूजनीय भाव है। डॉक्टर मानसी बाल भार्गव ने सत्याग्रह का इतिहास बताते हुए बताया कि किस प्रकार सोलहवीं शताब्दी में हरे वृक्षों की रक्षा करने के लिए अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोइयों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। इस सत्याग्रह में महिलाओं ने अग्रिम भूमिका निभाई थी।

साध्वी पद्मावती ने कहा कि मातृ सदन तब तक बलिदान और सत्याग्रह करता रहेगा जब तक कि मां गंगा स्वस्थ नहीं होती। हम सब मां गंगा की संतान हैं और हमें उनके लिए कार्य करना ही होगा। इसलिए सभी भारत वासियों से प्रार्थना करते हैं कि मां गंगा के लिए उठें और अपने-अपने तरीके से आवाज और कदम उठाएं। मातृ सदन के स्वामी शिवानंद ने कहा कि गंगा पुत्र के बलिदान दिवस पर उत्तराखंड सरकार द्वारा कोर्ट में एनएमसीजी के खनन पर रोक का आदेश हटाने के वाद दायर किया जाना शर्मनाक है। मातृ सदन सरकार के इस रवैया की घोर निंदा करता है। सरकार ने वाद दायर करने के लिए गंगा पुत्र निगमानंद के बलिदान दिवस 13 जून को ही क्यों चुना। इससे साफ जाहिर होता है कि उत्तराखंड सरकार ने गंगा पुत्र के बलिदान को भुला दिया है। वहीं, खनन माफियाओं को लाभ पहुंचाने के लिए कोर्ट में वाद दायर किया है। लेकिन मातृ सदन अवैध खनन के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखेगा।

याद रहे कि मातृ सदन की स्थापना पर्यावरण की रक्षा के उद्देश्य से 1997 में की गई थी। तब से ही मातृ सदन ने गंगा और हिमालय की रक्षा के लिए कई आंदोलन किए है। हरिद्वार के कुंभ क्षेत्र में हो रहे खनन कार्यों को रोकने के लिए मातृ सदन पिछले कई साल से सक्रिय रहा है। 1998 में भी स्वामी निगमानंद ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर लगभग 70 दिन की भूख हड़ताल की थी। उनकी मांग थी कि गंगा को बचाने के लिए इसमें हो रहे खनन पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए। 19 फरवरी 2011 को स्वामी निगमानंद ने हरिद्वार के कुंभ क्षेत्र में हो रहे खनन को पूरी तरह से रोकने की मांग को लेकर फिर से भूख हड़ताल शुरू की थी।

निगमानंद को भूख हड़ताल करते हुए 68 दिन पूरे हुए तो उनका स्वास्थ्य ज्यादा बिगड़ने लगा था। इसके चलते 27 अप्रैल 2011 को प्रशासन ने उन्हें हरिद्वार के जिला अस्पताल में भर्ती करवा दिया। 30 अप्रैल की दोपहर एक नर्स ने आकर स्वामी निगमानंद को एक इंजेक्शन लगाया था। इसके बाद से ही उनकी तबियत ज्यादा ख़राब हुई। मातृ सदन के अनुसार वह नर्स न तो पहले कभी अस्पताल में दिखी थी और न ही उस दिन के बाद ही कभी देखी गई। साथ ही इंजेक्शन लगाने के बाद उस नर्स ने इंजेक्शन को पास रखे कूड़ेदान में भी नहीं डाला बल्कि अपने साथ ही वापस ले गई थी। तब जिला अस्पताल में स्वामी निगमानंद के साथ मौजूद रहे कौशलेन्द्र कुमार झा ने संदेह जताया कि उस नर्स ने इंजेक्शन में जहर मिलाकर स्वामी निगमानंद को दिया था जिससे उनकी मौत हुई।