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रावत का गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का चुनौतीपूर्ण दांव

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने सदन में गैरसैंण को प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा क्या की कि प्रदेश में राजनीतिक हलचल बढ़ने लगी है। जहां भाजपा इसे पहाड़ी प्रदेश की अवधारणा को मूर्त रूप देने की ऐतिहासिक पहल बता रही है, तो विपक्षी दल इसे एक छलावा बता रहे हैं। बुद्धिजीवी और आर्थिक जानकार एक छोटे से प्रदेश की दो-दो राजधानी को प्रदेश अनउपयुक्त बताकर अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा संकट मान रहे हैं। प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस सरकार पर गैरसैंण के नाम पर राजनीति करने और जनता को धोखा देने का आरोप लगाकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है। हालांकि, एक बड़ा वर्ग ऐसे लोगों का भी है जो ग्रीष्मकालीन राजधानी की पहल को राज्य की स्थाई राजधानी बनने के मार्ग की शुरुआत बताकर सरकार के इस कदम का समर्थन भी कर रहे हैं।

सरकार की नीयत पर सवाल इसलिए भी खड़े हो रहे हैं कि भराड़ी सैंण में बजट सत्र के अखिरी दिन से पहले ही सत्ताधारी भाजपा के 57 विधायकों में से महज 17 विधायक ही सदन में मौजूदर थे। शेष 40 विधायक देहरादून के लिए निकल गए। बताया जा रहा है कि भराड़ी सैंण में जबरदस्त बर्फबारी के चलते अत्याधिक ठंड को माननीय सहन नहीं कर पाए और एक के बाद एक 40 विधायक देहरादून के लिए निकल गए। हैरत की बात यह है कि स्वयं मुख्यमंत्री जिन्होंने कि अचानक सदन में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने की घोषणा करके सबको चैंका दिया, वे भी सत्र समाप्त होने से पहले ही गैरसैंण से निकल गए। उनके साथ उनके मंत्री भी चले गए। विधानसभा स्पीकर के अलावा केवल एक मात्र मंत्री मदन कौशिक ही सदन में मौजूद थे, जबकि कांग्रेस के सभी 11 विधायक सदन में मौजूद रहकर सरकार को आईना दिखाने का काम करते रहे। हालांकि अब 25 मार्च से लेकर 28 मार्च के बीच एक बार फिर से गैरसैंण के भराड़ी सैंण में बजट सत्र का दूसरा टर्म पूरा किया जाएगा।

बर्फबारी और ठंड के चलते सरकार और मंत्रियों के भराड़ी सैंण से पलायन करने पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। साथ ही राजनीतिक हलकांे में यह खासी चर्चा का विषय बना हुआ है। कई राजनीतिक जानकार मुख्यमंत्री के द्वारा अचानक की गई घोषणा को भाजपा के भीतर की राजनीति में चल रही उठापटक को मान रहे हैं। माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने संगठन और सरकार के मंत्रियों से भी इस गंभीर विषय पर चर्चा तक नहीं की और ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने की घोषणा कर दी। इससे भाजपा के कई नेता जो कि मैदानी क्षेत्र की राजनीति करते हैं वे खासे असहज हो चले हैं। वे अपनी नाराजगी को पार्टी अनुशासन के चलते सार्वजनिक करने के बजाए गैरसैंण से ही पलायन कर गए।

यह बात कुछ हद तक सही भी लग रही है। जो भाजपा के 17 विधायक 14 मार्च को भराड़ी सैंण में मौजूद थे उनमें रुद्रपुर के राजकुमार ठुकराल को छोड़कर बाकी सभी विधायक पर्वतीय मूल के ही हैं। स्पीकर प्रेमचंद अग्रवाल गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने की हमेशा से वकालत करते रहे हैं और मदन कौशिक का संसदीय कार्यमंत्री होने के चलते सदन में रहना जरूरी था। हालांकि, जो 40 विधायक सत्र समाप्ति से पहले ही चले गए उनमें पर्वतीय क्षेत्र के विधायकों की संख्या भी काफी है। कांग्रेस द्वारा सरकार पर गैरसेैंण को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। बजट सत्र में राज्यपाल के अभिभाषण में भी गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने का कोई उल्लेख न होने के बावजूद मुख्यमंत्री ने सदन में जो घोषणा की उसे कांग्रेस ने नियम के विरुद्ध बताया है।

ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए सरकार द्वारा बजट में कोई प्रावधान तक न करने से सरकार की नीयत पर सवाल खड़े हो रहे हंै, जबकि गैरसैंण में मिनी सचिवालय के निर्माण के लिए ही कम से कम 150 करोड़ के खर्च का अनुमान है। लेकिन सरकार ने इसके लिए कोई रोड़मैप बजट सत्र में नहीं दिया। सरकार की नीयत पर कांग्रेस के सवाल उठाने का एक कारण यह भी है कि सरकार ने बजट सत्र में विधानसभा के खर्च के लिए महज 80 करोड़ का बजट रखा है, लेकिन यह बजट गैरसेंैण में खर्च होगा या देहरादून, इसका कोई उल्लेख नहीं किया गया है। अब सरकार की घोषणा के बाद गैरसैंण में सभी गतिविधियों का संचालन किया जाएगा। इसके लिए बजट की जरूरत है, पंरतु ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है।

सरकार की अचानक की गई घोषणा और इसके लिए कोई रोडमैप न रखने से यह आशंका जताई जा रही है कि कहीं गैरसैंण पनिशमेंट या पोस्टिंग का पर्याय न बन जाए। यह आशंका इस बात से भी देखी जा रही है कि जिस तरह से विधासनसभा सत्र के दौरान बारिश ओैर बर्फबारी के चलते सरकार के मंत्री और विधायक सत्र के समाप्त होने से पूर्व ही पलायन कर गए तो कर्मचारी और अधिकारी गैरसैंण में रहंेगे या फिर वे भी केवल रस्म अदायगी के तौर पर अपना काम करेंगे? यह सवाल वास्तव में सभी को परेशान कर रहा है। अब गैरसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने के राजनीतिक फायदों के गुणा भाग को समझें तो यह जरूर है कि भाजपा ने इस मामले में कांग्रेस को पछाड़ दिया है। स्वयं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के लिए गैरसैंण एक बड़े अवसर के तौर पर देखा जा रहा है।

माना जा रहा है कि जिस तरह से लगातार मुख्यमंत्री के खिलाफ भाजपा में विरोध के स्वर उठ रहे थे, अब शायद मुख्यमंत्री के लिए आने वाला समय बड़ी राहत देने वाला होगा। 18 मार्च को सरकार के तीन वर्ष पूरे होने वाले हैं। इसके लिए सरकार प्रदेश के हर विधानसभा क्षेत्र में भव्य कार्यक्रमों का आयोजन करने जा रही है। मुख्यमंत्री ने सभी 13 जनपदों के लिए अपने सलाहकारों और विशेषाधिकारियों को समन्वयक बनाकर उनको जिम्मेदारियां बांट दी हैं। माना जा रहा है कि इस बड़े कार्यक्रम से मुख्यमंत्री अपनी सरकार और अपने तीन वर्ष के कार्यकाल की ब्राण्डिंग करके सरकार की कार्यशैली पर उठ रहे सभी सवालों की धार को कुंद करने का प्रयास करेंगे।

दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को आने वाले समय में मुख्यमंत्री के इस बड़े चुनावी हथियार की काट के लिए नये तरके ढंूढ़ने होंगे। फिलहाल कांग्रेस ने गैरसैंण को राज्य की स्थाई राजधानी बनाए जाने की बात कहकर भाजपा और सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब भाजपा संगठन और सरकार को कांग्रेस के इस चुनावी तीर का सामना करने के लिए कोई बड़ा निर्णय लेना ही होगा। जानकार इसे मुख्यमंत्री के लिए एक अवसर मान रहे हैं, लेकिन यह भी माना जा रहा है कि अभी विधानसभा चुनाव में दो वर्ष का समय शेष है और इन दो वर्षों में अगर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के तौर पर कोई स्पष्ट रोड मैप सामने नहीं रख पाए तो निश्चित ही यह सरकार और मुख्यमंत्री के लिए एक कड़वा अनुभव साबित हो सकता है।

कांग्रेस के लिए भी यह दो वर्ष का समय राजनीतिक तौर पर बेहद चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। हालांकि कांग्रेस के लिए यह एक सुलभ अवसर भी लेकर आया है। सरकार के दो वर्ष के कार्यकाल में गैरसैंण में निर्माण और सुविधाओं तथा राजधानी के अनुरूप निर्माण में सरकार खरा नहीं उतरती तो कांग्रेस के लिए 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मात देने के लिए बड़ा अवसर सामने आ सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गैरसेैंण को लेकर भले ही सभी राजनीतिक दलों के ने ढुलमुल रवैया ही अपनाया है, लेकिन कांग्रेस सरकार के समय में ही गैरसेंैण प्रदेश की राजनीति की मुख्यधारा में शामिल हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के द्वारा गैरसैंण में पहली बार कैबिनेट की बैठक करके विधानसभा के नाम पर पहल की गई थी। इसके बाद ही गैरसैंण में विधानसभा भवन के निर्माण का रास्ता बना था।

कांग्रेस की हरीश रावत सरकार के समय में गैरसेैंण में विधानसभा भवन का निर्माण पूरा हुआ और पहली बार भराड़ी संैण में विधानसभा सत्र का आयोजन किया गया जिससे गैरसैंण पूरी तरह से राजनीति की मुख्यधारा में एक बड़ा कदम माना गया। तब से लेकर लगातार एक सत्र गैरसैंण में होता ही रहा है। भले ही असुविधाओं के बीच हुआ हो, लेकिन हर वर्ष एक सत्र गैरसैंण में होता रहा। मौजूदा भाजपा सरकार ने पिछले वर्ष में एक भी सत्र गैरसैंण में नहीं किया जिससे सरकार पर सवाल खड़े हुए थे। अब कांग्रेस ने गैरसैंण को राज्य की स्थाई राजधानी बनाए जाने की मांग आरंभ करके पूरी तरह से जनभावनाओं की राजनीति करके सरकार के लिए बड़ी चुनौती पैदा कर दी है।

अब सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर जूझना पड़ सकता है। जिसमें सबसे बड़ा मोर्चा राज्य की बिगड़ती अर्थवयवस्था के बीच दो-दो राजधानियों के संचालन के लिए करोड़ों के खर्च को पूरा करना और कर्मचारियों, विधायकों-मंत्रियों और नौकरशाहों को गैरसैंण से जोड़ने में ईमानदारी से काम करने जैसे सवालों से सरकार को जूझना पड़ेगा। जिस तरह से दो राजधानियों का माॅडल पूर्व में फेल साबित हुआ है उससे भी यह अंदेशा जताया जा रहा है कि हिमाचल की ही तरह से उत्तराखण्ड का यह माॅडल फेल न हो जाए। जानकार इसे कर्ज में डूबे प्रदेश के लिए बेहद परेशानी पैदा करने वाला माॅडल मान रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राज्य के इतिहास में त्रिवेंद्र रावत पहले ऐसे मुख्यमंत्री होंगे जिनके मुख्यमंत्री बनने के तीन महीने बाद ही उनके नेतृत्व पर कई सवाल खड़े होने लगे थे। यहां तक कि हर दो माह के बाद अचानक उनको मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की चर्चाएं होने लगी।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद तो अचानक मुख्यमंत्री बदले जाने की चर्चाएं इस कदर होने लगी कि यह चर्चाएं राष्ट्रीय मीडिया में भी सुर्खियां बनने लगी। भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री की कार्यशैली को लेकर खासी नाराजगी की खबरें सामने आती रही। त्रिवेंद्र रावत द्वारा गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने की घोषणा भी ठीक उसी तरह से की गई है जिस तरह से पूर्व के मुख्यमंत्रियों ने अपने विरोध और अपनी सरकार के कामकाज पर उठ रहे सवालों से बचने के लिए गैरसैंण को राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या गैरसैंण मुख्यमंत्री के लिए बड़ा सहारा बनेगा या फिर उनके लिए भी चुनावी राजनीति में गैर ही रहेगा।