हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती
भाजपा का एक बड़ी ताकत बनने के पीछे यही तोड़-फोड़ और अन्य दलों में सेंधमारी की रणनीति का होना है। यदि वे ऐसा सोचती हैं तो यह उनकी भारी भूल है। भाजपा एक मजबूत कैडर आधारित दल है। उसकी असल ताकत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है जो पिछले सात दशकों से हिन्दुत्व के एजेंडे पर काम करते-करते आज अपनी जड़े पूरे देश में फैला चुका है। भाजपा संघ की राजनीतिक शाखा है। संघ का समर्पित प्रचारक भाजपा के लिए भी काम करता आया है। यदि अटल जी की लोकप्रियता, आडवाणी जी की संगठन क्षमता और मुरली मनोहर जोशी का बौद्धिक कौशल भाजपा की मजबूत इमारत है तो संघ का अपने एजेंडे के प्रति शत- प्रतिशत समर्पण इसकी नींव है। यदि वह नींव में संघ न होता तो भाजपा कभी भी इतनी विशाल, इतना मजबूत संगठन नहीं बन पाती। ममता बनर्जी इस तथ्य से भलीभांति वाकिफ हैं। वे लेकिन पश्चिम बंगाल में लगातार मिली सफलता के मद में इसे भूलने की भूल कर रही हैं। ममता की पार्टी का आधार केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित है। उन्होंने तीन दशकों तक वहां राज कर रही कम्युनिस्ट पार्टी से लोहा लिया और लगभग असंभव को संभव कर दिखाया। आज कम्युनिस्ट पार्टियों को बंगाल में अपना अस्तित्व बनाए रखने का संकट आन खड़ा हुआ है तो इसका क्रेडिट पूरी तरह से ममता की एग्रेसिव पॉलिटिक्स को जाता है। उन्होंने अपने दम पर तृणमूल को बंगाल में खड़ा किया। एक योद्धा की तरह लेफ्ट पार्टियों के सामने डट कर लड़ी। 1998 में वे कांग्रेस से अलग हुईं थी। 26 बरस तक वे कांग्रेस का हिस्सा रहीं। 1970 में कांग्रेस में शामिल हुई ममता 1975 में पहली बार तब सुर्खियों में आईं थी जब उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन कर रहे समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण की कार के बोनट में खड़े होकर नृत्य कर डाला था। इसके बाद उन्होंने कभी पलट कर नहीं देखा। 1984 में वे सांसद बन गईं। पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार में राज्य मंत्री बनी। 1997 में उन्होंने कांग्रेस से अलग हो अपनी पार्टी के गठन का एलान कर डाला। केंद्र की राजनीति में दक्षिण पंथी ताकतों के उदयकाल में ममता बगैर किसी हिचकिचाहट उनकी बगलगीर हो गईं। उन्हें 1999 में अटल सरकार में रेल मंत्री बनाया गया। वर्ष 2000 में बगैर किसी विशेष कारण उन्होंने एनडीए सरकार और गठबंधन से रिश्ता तोड़ डाला। इसके बाद वे मौकापरस्त राजनीति की नई गाथा लिखने में जुट गई। 2001 में कांग्रेस के साथ नजर आईं तो 2003 में फिर से एनडीए का हिस्सा बन केंद्र में मंत्री बन बैठीं। 2004 के आम चुनाव में वे एनडीए का हिस्सा थीं। उनकी पार्टी की पश्चिम बंगाल में करारी हार हुई। वे अपने दल की एक मात्र सांसद बनी। 2005 में तृणमूल कांग्रेस कोलकाता नगर निगम के चुनाव में भी पराजित हो गई। 2006 के राज्य विधानसभा चुनाव में तृणमूल को करारी हार का सामना करना पड़ा। फिर आया सिंगूर और नंदीग्राम का मुद्दा जिसने ममता के राजनीतिक भविष्य को चमका दिया। 2009 आते-आते वे फिर से यूपीए में शामिल हो गईं। उन्हें मनमोहन मंत्रिमंडल में रेल मंत्री बनाया गया। 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता ने असंभव को संभव कर पश्चिम बंगाल से कम्युनिस्ट शासन का सफाया कर डाला। तब से वे लगातार वहां की सत्ता में काबिज हैं। ममता का अपनी सुविधानुसार कभी यूपीए तो कभी एनडीए का दामन थामना उनकी कथित धर्मनिरपेक्षता पर तो बड़ा प्रश्न चिन्ह है ही, भविष्य के राजनीतिक परिदृश्य में उनका क्या स्टैंड होगा, यह कह पाना कठिन है। रही कांग्रेस में तोड़फोड़ कर तृणमूल कांग्रेस को भाजपा के सामने एक मजबूत विकल्प बनाने की बात तो यह ममता की भारी भूल है। वे बड़े मुगालते में हैं कि कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं को तृणमूल में लाने से उनकी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती मिल जाएगी। ऐसा इसलिए संभव नहीं है क्योंकि न तो संघ समान कोई मजबूत संगठन पीछे खड़ा है, न ही वे कांग्रेसी विचार धारा के वोटर को चंद असंतुष्टों के सहारे साध सकती हैं। उनकी निज महत्त्वाकांक्षा कांग्रेस को जरूर कमजोर कर रही है, इसका भारी प्रतिकूल प्रभाव 2024 के आम चुनाव में पड़ेगा। विपक्ष एक बार फिर भाजपा और संघ की सामूहिक संगठन क्षमता के हाथों धराशाई हो जाएगा। अभी 2024 बहुत दूर है। राजनीति में उलटफेर होते देर नहीं लगती। बहुत संभव है कि 2022 और 2023 में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन दमदार रहे। ऐसे में ममता विपक्षी दलों का चेहरा बनना तो दूर, स्वयं पश्चिम बंगाल में अपना आधार खो सकती हैं। लेकिन यह सब भविष्य के गर्भ में छिपा है। न तो अभी इसे ममता समझ पाएगी, न ही उनकी हालिया चमक से प्रभावित हो रहे नेता और अन्य क्षेत्रीय दल। अंग्रेजी में एक कहावत है। ‘All that glitters is not gold’ मतलब हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती। मैं शर्तिया कह सकता हूं ममता चमक भले ही रही हों लेकिन वे सोना कतई नहीं हैं। बाकी भविष्य तय करेगा।
