एक सौम्य राजनेता का निधन

हरबंश कपूर : 7 जनवरी 1946-13 दिसंबर 2021

भाजपा के वरिष्ठ नेता और लगातार आठ बार विधायक रहे हरबंश कपूर का हृदयाघात से निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही प्रदेश की राजनीति में शुचिता और ईमानदारी का एक बड़ा दौर भी गुजर गया। हरबंश कपूर सार्वजनिक जीवन में सादगी और विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे। वे भाजपा में अनुशासन के एक प्रतीक बन चुके थे। पार्टी भीतर खेमेबाजी की राजनीति से हमेशा उन्होंने दूरी बनाकर रखी। कपूर का राजनीतिक जीवन खासा दिलचस्प रहा है। छात्र जीवन से ही राजनीति की मुख्यधारा से जुड़े कपूर ने देहरादून के डीएवी कॉलेज से बतौर एबीवीपी प्रत्याशी महासचिव का चुनाव जीतकर राजनीति में पहला कदम रखा। छात्र राजनीति के बाद भाजपा की मुख्यधारा की राजनीति से जुड़कर पार्टी संगठन में वे कोषाध्यक्ष बने। वर्ष 1985 में पहली बार कांग्रेस के दिग्गज नेता हीरा सिंह बिष्ट के खिलाफ भाजपा के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ा लेकिन इस चुनाव में उनकी हार हुई। यह हार कपूर के राजनीतिक जीवन की पहली और आखिरी हार ही रही। इसके बाद कपूर कभी भी कोई चुनाव नहीं हारे।

वर्ष 1989 में फिर से कांग्रेस के हीरा सिंह बिष्ट को चुनाव में हरा कर उन्होंने अपनी पहली हार का बदला तो लिया ही, साथ ही देहरादून सीट कांग्रेस के लिए एक स्वप्न के समान बना दी। एक तरह से कपूर ने कांग्रेस के कई नेताओं की राजनीति पर हार का ग्रहण इस कदर लगाया कि वे अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखने के लिए देहरादून से पलायन कर गए। कपूर ने 1991 में कांग्रेस के विनोद चंदोला, 1993 एवं 1996 में कांग्रेस के ही दिनेश अग्रवाल को लगातार दो बार चुनाव में पटखनी दी। राज्य बनने के बाद भी देहरादून, देहराखास सीट पर कपूर का दबदबा बना रहा। 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कपूर ने कांग्रेस के संजय शर्मा को, 2007 में कांग्रेस के ही लालचंद शर्मा और 2012 में कांग्रेस के दिग्गज पंजाबी नेता देवेन्द्र सेठी को चुनाव में मात देकर अपना परचम लहराया। 2017 में कांग्रेस के सूर्यकांत धस्माना को हरबंश कपूर ने करारी हार देकर आठवीं बार इस सीट से अपनी चुनावी जीत हासिल की।

कपूर का अपने क्षेत्र की जनता में खासी पकड़ थी। उनकी सफलता का एक बड़ा राज अपने कार्यकर्ताओं संग प्रगाढ़ संबंध होना भी था। जानकार बताते हैं कि कपूर अपने सभी कार्यकर्ताओं को उनके नाम से जानते थे। अगर कोई कार्यकर्ता या पदाधिकारी उनसे नाराज भी होता था तो वे उसके घर स्वयं पहुंच कर उसे मना लेते थे। यही खूबी कपूर को कार्यकर्ताओं और उनकी जनता के बीच एक बड़ी कड़ी के तौर पर काम करती थी। अब कैंट सीट पर भाजपा के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। जिस तरह से माना जा रहा था कि भाजपा 75 वर्ष से अधिक आयु के नेताओं को चुनाव में टिकट नहीं देगी लेकिन कपूर इसके लिए एक अपवाद थे।

सूत्रों की मानें तो भाजपा कैंट सीट पर किसी प्रकार का जोखिम नहीं लेने से बच रही थी और कपूर को ही 2022 के चुनाव में मैदान में उतरने का मन बना चुकी थी। भाजपा आलाकमान भी इस पर अपनी मुहर लगा चुका था। हालांकि कपूर स्वयं स्वास्थ्य कारणों के चलते चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे। इसके संकेत वे कई बार दे चुके थे। अब माना जा रहा है कि 2022 के चुनाव में पार्टी कपूर के परिवार से ही किसी को मैदान मेें उतारने की रणनीति बना रही है। हो सकता है कि कैंट सीट से हरबंश कपूर की धर्मपत्नी सविता कपूर या उनके पुत्र अमित कपूर को चुनाव में टिकट देकर सहानुभूति मत हासिल करने का काम करे।

विगत पांच वर्षों में देखा जाए तो भाजपा के पांच सीटिंग विधायकों की असामयिक निधन हुए हैं। सबसे पहले थराली के विधायक मगनलाल शाह की मृत्यु के बाद उनकी धर्मपत्नी मुन्नी देवी को भाजपा ने उपचुनाव में खड़ा किया और जीत हासिल की। इसके बाद प्रकाश पंत के निधन के बाद उनकी पत्नी श्रीमती चंद्रा पंत को पिथौरागढ़ से चुनाव में उतारा और चुनाव जीता। इसी तरह से सुरेंद्र सिंह जीना के निधन के बाद उनके भाई महेश जीना को उम्मीदवार बनाकर फिर से सल्ट सीट अपने कब्जे में की। गंगोत्री सीट पर भाजपा के गोपाल सिंह रावत के असामयिक निधन के बाद भाजपा इसी रणनीति पर काम कर रही है।