बांग्लादेश में  थम नहीं रहा मोदी को लेकर उपजा बबाल , अभी तक 13 मौत 

इसी हफ्ते 26 मार्च को बांग्लादेश जहां एक ओर अपनी आजादी के 50 साल पूरे होने का जश्न  मना रहा था, वहीं इस दौरान भारतीय प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी भी इस जश्न में आमंत्रित थे। लेकिन बांग्लादेश देश के कुछ  कट्टरपंथी  पीएम मोदी के विरोध में हिंसक प्रदर्शन पर उतर आए। इससे विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प में अब तक 13 लोगों की जान जा चुकी है। दर्जनों लोग घायल हो गए हैं। इस उत्सव में भारत के  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  के अलावा नेपाल ,श्रीलंका ,भूटान और मालदीव के राष्ट्राध्यक्ष  और शासन प्रमुख भी  शामिल हुए।

दरअसल बांग्लादेश अपनी आजादी के पचास साल पूरे होने का जश्न मना रहा था जो  बांग्लादेश के कट्टरपंथी इसलामी गुट हिफ़ाजत-ए- इसलाम को रास नहीं आया। इस मौके पर कट्टरपंथी इसलामी गुट हिफ़ाजत-ए- इसलाम बांग्लादेश  के कार्यकताओं ने  चटगाँव और ढाका में विरोध प्रदर्शन किया और सुरक्षा बलों पर हमला कर दिया। बांग्लादेश के सुरक्षा बलों ने उन्हें रोकने की कोशिश में गोलियाँ चलाईं, जिसमें  अब तक 13  लोगों की मौत हुई है।

इस विरोध प्रदर्शन में वामपंथी सगंठनों के लोग भी शामिल थे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नरेंद्र मोदी मुसलिम विरोधी हैं और ऐसे व्यक्ति का बांग्लादेश की स्वतंत्रता के 50 साल पूरे होने के मौके पर वहाँ आना  ग़लत है। ढाका के अलावा चिटगाँव में भी हिंसा हुई है। चिटगाँव मेडिकल कॉलेज में तैनात एसिस्टेंट सब इंस्पेक्टर मुहम्मद अलाउद्दीन ने हिंसा की पुष्टि करते हुए कहा कि गोलियों की चोट के साथ आठ लोगों को इस अस्पताल में लाया गया, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई।

बांग्लादेश पुलिस के एक अफ़सर रफीकुल इसलाम ने  कहा कि पुलिस वालों ने पहले आँसू गैस के गोले छोड़ कर भीड़ को तितर – बितर करना चाहा। भीड़ ने पुलिस वालों पर हमला कर दिया तो गोलियाँ चलाई गईं।  बांग्लादेशी अखबर ‘ढाका ट्रिब्यून’ को हिफ़ाजत-ए- इसलाम बांग्लादेश के संगठन सचिव अज़ीज़ुल हक़ ने कहा कि पुलिस ने ढाका के बैतुल मुर्करम मसजिद में उनके कार्यकर्ताओं और नेताओं पर गोलियाँ चलाईं।

क्या है हिफाजत -ए -इस्लाम ?

हिफ़ाजत-ए- इसलाम कई छोटे-छोटे कट्टरपंथी इसलामी गुटों का शीर्ष संगठन है। इसका मानना है कि बांग्लादेश में इसलामी शरिया से शासन किया जाना चाहिए। बांग्लादेश का चरित्र अभी भी मोटे तौर पर धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन इसलामी संगठनों का प्रभाव धीरे-धीर बढ़ रहा है। हिफ़ाजत-ए- इसलाम इस स्थिति का फ़ायदा उठाना चाहता है।

हिफ़ाजत-ए- इसलाम राजनीतिक रूप से जमात-ए-इसलामी के साथ रहा है। बांग्लादेश के मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनल पार्टी के साथ जमात-ए-इसलामी रहा है। हिफ़ाजत-ए- इसलाम की 13 सूत्री माँगों में प्रमुख यह है कि बांग्लादेश में ईशनिंदा क़ानून यानी ब्लास्फ़ेमी लॉ लागू किया जाए और इसके तहत पैगंबर की निंदा करने वालों को मौत की सज़ा सुनाने का प्रावधान हो। ईशनिंदा क़ानून बहुत ही विवादास्पद क़ानून है, जो पाकिस्तान में लागू है। पाकिस्तान में इसके दुरुपयोग की ख़बरें आती रही हैं, वहां उसका विरोध भी हुआ है, पर ज़्यादातर पाकिस्तानी इसके पक्ष में हैं। हिफ़ाज़त-ए-इसलाम पर आरोप है कि वह सऊदी अरब से पैसे लेता है और उसी मॉडल के इसलाम को बांग्लादेश भी लागू करना चाहता है। इसे भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी संगठन माना जाता है।