सरकार की रडार पर आईएफएस

पहली बार मुख्यमंत्री बनते ही पुष्कर सिंह ट्टामी ने अपनी छोटी लेकिन तेज-तर्रार पारी में नौकरशाही पर लगाम कसने की कोशिश की थी। जिसके संकेत उन्होंने पहले दिन ही अपने प्रमुख सचिव को बदलकर दे दिए थे। पार्टी ने उन्हें एक बार फिर सत्ता की कमान सौंपी है। इन पांच सालों में उनके सामने बेलगाम नौकरशाही पर अंकुश लगाने के साथ ही भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति को लागू करना बड़ी चुनौती है। जिस पर वे फिलहाल सफल होते नजर आ रहे हैं। प्रदेश में पहली बार दो आईएफएस अट्टिकारियों पर कार्रवाई की गई है। फिलहाल एक और आईएफएस सरकार की रडार पर है

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आजकल एक्शन में हैं। वे नौकरशाही पर नकेल डालने के मद्देनजर सुर्खिंयों में हैं। सीएम ने भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ के तहत कड़ी कार्रवाई के संकेत दिए हैं। धामी ने सरकारी तंत्र को साफ संकेत कर दिया है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ के मुद्दे पर उनकी सरकार कोई नरमी नहीं बरतेगी। इसके मद्देनजर ही मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचार और घोटालों के मामले में चल रही जांच की फाइलें भी तलब कर ली हैं। भ्रष्टाचार से संबंधित जितने भी मामलों में कार्रवाई होनी है, उनमें तेजी से अमल किया जा रहा है। आने वाले दिनों में विजिलेंस के मामलों में भी तेजी दिखाई देने के संकेत हैं। पिछले दिनों भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के तीन अधिकारियों पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कार्रवाई के बाद पूरी नौकरशाही में खलबली मची हुई है।

 

प्रमुख सचिव एसएस संधू को एनजीटी द्वारा सुबुद्धि पर कार्यवाही के लिए पत्र 

याद रहे कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (केटीआर) में अवैध कटान और निर्माण सहित कई अनियमितताओं के मामले में धामी सरकार ने बड़ी कार्रवाई करते हुए दो आईएफएस अधिकारियों को निलंबित कर दिया था, जबकि एक आईएफएस अधिकारी को देहरादून मुख्यालय से अटैच कर दिया गया था। राज्य सरकार ने आईएफएस जेएस सुहाग और किशन चंद को निलंबित किया था और कॉर्बेट निदेशक राहुल को वन मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया था। इस कार्रवाई के बाद वन विभाग ही नहीं अन्य विभागों में हड़कंप मचा हुआ है। राज्य के वन विभाग में पहली बार इस तरह की कार्रवाई की गई है। राज्य सरकार की इस कार्रवाई के बाद राज्य की नौकरशाही में दहशत है और हर कोई राज्य सरकार के फैसले की सराहना कर रहा है। ताजा मामला एक और आईएफएस अफसर सुबुद्धि पर कार्रवाई करने का संकेत दे रहा है।

सुबुद्धि उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) के सदस्य सचिव हैं। इसके साथ ही वह राज्य पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवहन निदेशालय के डायरेक्टर भी हैं। उत्तराखंड में भारी भरकम बजट और कमाई वाला पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड होने के बावजूद किस तरह तमाम औद्योगिक इकाइयां, फैक्ट्रियां मानकों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से चलाई जा रही हैं इसका उदाहरण हरिद्वार की एक इंडस्ट्री है। इस इंडस्ट्री पर सुबुद्धि की इतनी मेरबानी रही उन्होंने नियम कानूनों को ही
दरकिनार कर दिया। एनजीटी के आदेशों के बाद फिलहाल सुबुद्धि सरकार की रडार पर हैं।

मामला 2020 का है। इस साल हरिद्वार की औद्योगिक इकाई द्वारा पर्यावरण नियमों के उल्लंघन का मामला एनजीटी के पास पहुंचा था। जिनमें एक मामला सुरेंद्रा मोटर्स का था। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने तब इस इकाई को बंद करने और जुर्माना लगाने की बात कही थी। इसके बाद इस मामले का निपटारा कर दिया गया। शिकायत का निपटारा होने के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मामले की फाइल बंद कर दी। लेकिन इसके बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस मामले को रहस्यमय तरीके से बंद कर दिया। मामले में ऐसा कोई एक्शन लिया ही नहीं गया और यह इंडस्ट्री बदस्तूर चलती रही। शिकायतकर्ता को जब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से न्याय नहीं मिला तो वह अप्रैल 2022 में एनजीटी की शरण में चला गया। जहां उसने एनजीटी को बताया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आरोपी इंडस्ट्रीज को हकीकत में नहीं बल्कि केवल कागजों में बंद करा है। जबकि औद्योगिक इकाई सुरेंद्र मोटर्स अभी भी बदस्तूर चल रही है।

यही नहीं बल्कि औद्योगिक इकाई पर जो बंदी का आदेश था वह भी वापस हो गया। इसके बाद एनजीटी ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को तलब कर लिया। जब सवाल जवाब हुए तो उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) के सदस्य सचिव सुबुद्धि ने एनजीटी में कहा कि इंडस्ट्री को बंद कराकर उसका पानी का कनेक्शन काट दिया गया था। जिसे बाद में जुर्माना वसूलने के बाद खोल दिया गया। लेकिन सच यह है कि उक्त औद्योगिक इकाई पर सुबुद्धि इतने मेहरबान हुए कि उससे जुर्माना भी नहीं वसूला गया।

यहां तक कि इस मामले में एनजीटी को यह लिखना पड़ा कि पीसीबी के सदस्य सचिव के भरोसे के पद पर बैठा व्यक्ति आदेशों का पालन न कर उल्टे ट्रिब्यूनल को गुमराह कर रहा है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। इतना ही नहीं एनजीटी के द्वारा 18 मई को उत्तराखंड के मुख्य सचिव से सुबुद्धि के खिलाफ एक्शन लेने को कहा गयाहै। एनजीटी ने सख्त लहजे में कहा कि ट्रिब्यूनल अपने स्तर से कार्रवाई करने में सक्षम है, लेकिन अच्छा यही होगा कि मुख्य सचिव खुद कार्रवाई करें। साथ ही एनजीटी ने आदेश दिए हैं कि राज्य सरकार इस पर जल्द ही कार्रवाई करे। एनजीटी ने इस आदेश में बोर्ड के सदस्य सचिव एसपी सुबुद्वि पर गंभीर आरोप लगाते हुए लिखा है कि उन्होंने एनजीटी को गुमराह किया और गलत तथ्य पेश किए। गौरतलब है कि एसपी सुबुद्धि 1994 बैच के आईएफएस हैं। उन पर सत्ता के करीब होने के आरोप लगते रहे है।

वह सत्ता के करीब होने का लगातार फायदा उठाते रहे हैं। जिसके चलते वह पिछले पांच सालों से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में जमे हुए हैं। सत्ता में उनके रसूख होने के चलते इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीते साल त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार में जब तत्कालीन कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने विभागीय स्थानांतरण किए और उनको प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से हटाया भी गया तो चंद ही दिनों में सुबुद्धि की फिर उसी पद पर वापसी भी हो गई। उत्तराखण्ड में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कमाई का विभाग माना जाता है। इससे भी आका जा सकता है कि दो साल पहले कोरोना काल में उत्तराखंड में यह विभाग सबसे ज्यादा राहत कोष देने वालों विभाग बना था। तब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मुख्यमंत्री राहत कोष में 25 करोड़ रुपया का डोनेशन दिया था। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को 25 करोड़ का चेक देने वालो में तत्कालीन मंत्री हरक सिंह रावत के साथ ही सुबुद्धि भी शामिल थे।

यहां यह भी ध्यान रखना जरुरी है कि अपनी शांत और स्वच्छ आबोहवा के लिए मशहूर राज्य उत्तराखंड में भी प्रदूषण का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। विशेषकर राजधानी देहरादून और उसके आसपास हरिद्वार और ऋषिकेश की हवा में विभिन्न कारणों से प्रदूषण साल दर साल तेजी से बढ़ रहा है। इस क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण की स्थिति ऐसी है कि एयर क्वालिटी इंडेक्स के हिसाब से हवा का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। जिसके बाद एनजीटी ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सख्त दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं। 25 सितंबर 2019 को एनजीटी ने जो आदेश दिए है उनके अनुसार औद्योगिक इकाइयों की तीन श्रेणियां बनाई गई है।

एनजीटी ने बीते वर्ष 10 जुलाई को आदेश दिए कि क्रिटिकल स्थिति वाले औद्योगिक क्षेत्रों में रेड व ऑरेंज श्रेणी के उद्योगों की अनुमति न दी जाए। साथ ही ऐसे उद्योगों का विस्तार भी न किया जाए। एनजीटी ने इन क्षेत्रों में प्रदूषण थामने को कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए हैं। याद रहे कि रेड श्रेणी ऐसे उद्योग है जो बड़े पैमाने पर वायु एवं जल प्रदूषण फैलाते हैं। जबकि ऑरेंज श्रेणी में वे उद्योग धंधे आते हैं जो रेड से कुछ प्रदूषण कम फैलाते हैं और इसे कंट्रोल किया जा सकता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक सर्वे के अनुसार देश के 122 प्रदूषित शहरों में उत्तराखंड राज्य के 3 शहरों के नाम शामिल हैं। जिसमें हरिद्वार- ऋषिकेश, देहरादून और काशीपुर शामिल हैं। प्रदेश के ये वे शहर हैं जहां पीएम 2 .5 और पीएम 10 खतरनाक स्तर को पार कर चुका है।

सुबुद्धि मामले में एनजीटी से आया पत्र विचाराधीन है, इस पर गंभीरता से कार्रवाई की जा रही है। इस मामले की हम जांच करा रहे हैं। जल्द ही इसके परिणाम सामने आ जायेंगे।
एसएस संट्टा, मुख्य सचिव

यह कोर्ट का मामला है कुछ नहीं कहूंगा
एसएसपी सुबुद्धि, सदस्य सचिव उत्तराखण्ड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड