मोदी नहीं, मतदाताओं के गले लगे राहुल

दुश्मनी लाख सही खत्म कर कीजिए रिश्ता,
दिल मिले न मिले, हाथ मिलाते रहिये।
निदा फाजली के इस शेर को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने थोड़ा आगे बढ़कर चरितार्थ किया। संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अपने बारूदी भाषण से उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधे आक्रमण किया। खासकर फ्रांस के साथ हुए रफेल डील में प्रधानमंत्री को सीधे घेरा। लेकिन इस आक्रमक भाषण का अंत जिन पर हमला किया गया उन्हीं को गल लगाकर किया।
संसद के भीतर राहुल का मोदी को गले लगाना महज एक उदारता या भारतीय संस्कृति या कांग्रेसी परंपरा का नजीर नहीं था। लोग अब मजा लेने के लिए टीवी स्टूडियो के भीतर  और बाहर इस मिलने की अपने-अपने ढंग से व्यख्या करते रहे। उन मजेवादी व्याख्याओं की कोई अहमितयत नहीं है। अहम चीज यह है कि राहुल गांधी ने अपने इस भाषण को एक चुनावी पैकेज की तरह इस्तेमाल किया। राफेल सौदा के जरिए प्रधानमंत्री पर हमला बोलना और भाषण के अंत में मोदी से पास जाकर उनका गले लगाना दोनों ही उस पैकेज का पार्ट था।
उन्होंने राफेल सौदा के मार्फत भाजपा सरकार को रक्षात्मक मुद्रा अपनाने के लिए मजबूर कर दिया। साथ ही प्रधानमंत्री से गले लगना नहीं था, वह चुनावी मतदाताओं के गले लगना था। उनका यह संसद के भीतर हाईबोल्टेज ड्रामा मोदी का दिल जीतने या उनसे काऊटर अटैक के दौरान माइल्ड होने की उम्मीद में नहीं था। अलबत्ता वह देश की मतदाताओं का दिल जीतने सरीखा था। यह पैगाम-ए-मोहब्बत से ज्यादा पैगाम-ए-चुनाव है।
राहुल ने राफेल के मार्फत संसद में मोदी के साथ-साथ से भाजपा को सकते में डाल दिया है।
राफेल का जो काऊटर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने किया उस पर सवाल उठ रहे है।  भाजपा अब रक्षात्मक हो गयी। कहा जा रहा है, राफेल सौदा कांग्रेस सरकार ने किया था, लिहाजा गोपनीयता का सौदा भी उसी का हिस्सा था जिसका जिक्र रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट में किया और सबूत के तौर पर 2008 में एके एंेटनी का दस्तखत किया एक कागज लहरा दिया। जो सौदा मनमोहन सरकार ने किया था, उसमें बचने वाली कंपनी दसा (क्नेेंसज) एचएएल में एचएएल में एसे बल किये जाने वाले विमानों की गांरटी लेने से इंकार कर रही थी। मनमोहन सरकार को सह स्वीकार नहीं था कि दो अलग-अलग सौदे किए जाए। इसलिए यह सौदा फंस गयी। मोदी सरकार ने पिछले टेंडर प्रक्रिया को कुडे़दान में डालते हुए 36 राफेल आधो से शेल्फ खरीद लिए। यह सौदा 2016 में हुआ था। इसी सौदा की कीमत बताने से रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने इंकार किया था। जब पूछा गया कि इंकार क्यों दिया तो गोपनीयता वाला कागज 2008 दिखा दिया। अब देखना है मोदी गले मिलने का काट क्या निकालते है। निगाहे मोदी पर टिकी है।

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