बेकसूर की पुकार
पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को बम से उड़ा देने की धमकी किसी और ने दी। लेकिन पुलिस-प्रशासन ने एक बेकसूर युवा का जीवन बर्बाद कर डाला। मनोज नामक साधारण परिवार के इस युवा के सिर झूठा आरोप मढ़कर पुलिस ने उसे शारीरिक एवं मानसिक रूप से बेहद प्रताड़ित किया। उसे जेल में डाल दिया गया। इस पर मनोज ने हिम्मत नहीं हारी और अदालत में लड़ाई लड़ी। अदालत से वह निर्दोष साबित हुआ। अब वह शासन-प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहा है कि जिस तरह उसका जीवन बर्बाद कर दिया गया उसके एवज में उसे न्याय चाहिए। पुलिस-प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक वह न्याय के लिए फरियाद कर चुका है। अब वह आमरण-अनशन पर है, मगर कहीं से भी उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही है

इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कह सकते हैं कि मनोज कुमार नामक एक नवयुवक को देहरादून पुलिस ने फर्जी तरीके से फंसाकर उसे महीनों कारागार में बंद कर दिया। अनावश्यक तरीके से उसका शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न किया गया। अब न्यायालय ने उसे दोषमुक्त किया है। वह दोषी पुलिस कर्मियों को दंड देने और शारीरिक एवं मानसिक रूप से हुए नुकसान का मुआवजा मांग रहा है। उत्तराखण्ड के हर मुख्यमंत्री से वह न्याय की गुहार लगा चुका है। लेकिन ‘आम जन’ एवं ‘अंतिम व्यक्ति का विकास’ जैसे शब्दों की बौछार करने वाले सत्ता के मठाधीशों के पास इस गरीब नवयुवक की जायज मांगों को सुनने के लिए समय तक नहीं है। पूर्व में जब उसने अपनी मांग को लेकर पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी कार्यालय के समक्ष भूख हड़ताल शुरू की तो आश्वासन की द्घुट्टी पिलाकर उसका अनशन ताुड़वा दिया गया। लंबे समय तक जब आश्वासनों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई तो मनोज एक बार फिर अनशन स्थल पर पहुंचकर आमरण-अनशन पर बैठ जाता है। इस बार प्रशासन उसे जबदरस्ती अनशन स्थल से उठाकर अस्पताल में भर्ती कर देता है। पिछले सात सालों से वह न्याय मांग रहा है, लेकिन उसकी आवाज नक्कार खाने में तूती साबित हो रही है। इस पूरे प्रकरण की कहानी कुछ इस तरह से है कि मनोज कुमार पुत्र किशन राम जनपद पिथौरागढ़ के एक अभावग्रस्त गांव सीलिंग जो तहसील बंगापानी के अंतर्गत आता है, के एक गरीब परिवार का व्यक्ति है। वह पढ़ लिख कर अपने परिवार का सहारा बनना चाहता है। अपने परिवार को आर्थिक अभावों से मुक्ति दिलाने और अपने कैरियर को संवारने के लिहाज से वह अपने गांव से सैंकड़ों मील दूर राज्य की राजधनी देहरादून पहुंचता है। काफी भागदौड़ के बाद वह देहरादून के पृथ्वीराज कस्तूरिया नामक व्यक्ति के यहां प्राइवेट सुरक्षा गार्ड की नौकरी करने लगता है और साथ ही डीएबी डिग्री कॉलेज से बीए प्रथम वर्ष की पढ़ाई भी जारी रखता है। कॉलेज की पढ़ाई के सिलसिले में वह ३ अगस्त २०१० को स्कूल की पढ़ाई का शपथ पत्र बनवाने के लिए कोर्ट परिसर में जाता है। लेकिन इसी दिन ३ बजकर २० मिनट पर देहरादून के पुलिस कंट्रोल रूम में ९४५८१२४७१० मोबाइल नम्बर से उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को १५ अगस्त के दिन बम से उड़ा देने की धमकी मिलती है। धमकी मिलते ही पुलिस सक्रिय होती है। इस सब द्घटनाक्रम से अनभिज्ञ मनोज जब शाम ३ .३५ में अपने कमरे में लौटता है तो पुलिस उसे अपने इंतजार में खड़ी मिलती है। उसके पहुंचते ही पुलिस उसका नाम, मोबाइल नं ़ ९४५८१२४७१० के बारे में जानकारी लेती है। उस समय मनोज के साथ मौजूद उसके साथी लक्ष्मण, नवीन, शंकर सिंह के साथ ही पुलिस मनोज को उठा ले जाती है। वहां जब पुलिस तलाशी लेती है तो शंकर सिंह नाम के व्यक्ति की जेब से मोट्रोला मॉडल का मोबाइल बरामद होता है। पूछताछ के दौरान वह अपने को इंटरमीडिएट के टॉपर के साथ ही गोपेश्वर महाविद्यालय का गोल्ड मेडलिस्ट और इसी विद्यालय में छात्र संद्घ चुनाव लड़ने तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं पत्रकार संस्था से जुड़ने की बात कहते हुए अपना जुर्म स्वीकारता है। वह कहता है, ‘मैंने ही मुख्यमंत्री को धमकी दी।’ इसके बाद भी पुलिस मनोज को बंधक बना लेती है। मनोज के मुताबिक पुलिस उसके साथ गाली गलौच करती है। उसके कपड़े उतारती है और मारपीट करती है। मनोज के जुर्म न स्वीकारने पर उसे आश्वासन दिया जाता है कि उसे कल सुबह १० बजे तक छोड़ दिया जाएगा। लेकिन उसे छोड़ने के बजाय चार माह के लिए जेल में भेज दिया जाता है। पुलिस की मार के कारण उसके फेफड़े में पानी भर जाता है। वह बीमार पड़ जाता है। उसका इलाज सिद्वाला जेल में चलता है। इसी बीच मनोज की जमानत होती है। मगर बीच में ही जमानत रद्द कर दी जाती है। उसे दोबारा जेल में डाल दिया जाता है। इस बीच मनोज और उसके द्घरवालों को लगातार धोखे में रखा जाता है। जमानत मिलने पर मनोज पांखू स्थित कोटगाड़ी मंदिर में पहुंचता है। वहां कोटगाड़ी मंदिर कमेटी से ५० रुपए की पर्ची काटकर भी न्याय की गुहार लगाता है। इस आशा के साथ कि जब लोकतांत्रिक सिस्टम में उसकी नहीं सुनी जा रही है तो शायद न्याय की देवी न्याय कर दें। जबकि पुलिस की जांच में यह बात निकल कर आई थी कि जिस मोबाइल नंबर से तत्कालीन मुख्यमंत्री को उड़ाने की धमकी आई वह आईडी के आधार पर धर्मेंद्र पुत्र शमशेर निवासी मिठ्ी बेरी, प्रेमनगर जो कि आईएमएम का कर्मचारी था, के नाम पर था। धर्मेंद्र पुत्र शमशेर का कहना था कि उसकी आईडी गलत तरीके से इस्तेमाल की गई। पुलिस का कहना था कि कॉल डिटेल पर वह मनोज कुमार पुत्र किशन राम के नाम निकली। जबकि मनोज का कहना था कि यह आईडी उसकी नहीं थी। न्यायालय से बरी होने के बाद भी मनोज अपनी लड़ाई जारी रखता है। इस पूरे द्घटनाक्रम की सच्चाई को जानने के लिए वह उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल’निशंक’ को १६ मई २०११ को एक प्रार्थना पत्र पेश करता है। तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक की ओर से इसका कोई जबाव नहीं आता है। फिर वह सच्चाई जांचने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी को एक पत्र भेजता है। यहां थोड़ा हरकत होती है। पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस विभाग को पत्र भेजा जाता है, लेकिन जवाब में मुख्यमंत्री के पास पुलिस विभाग द्वारा जो जानकारी भेजी जाती है वह झूठी होती है। लेकिन मनोज यहां भी हार नहीं मानता वह तत्कालीन पुलिस महानिदेशक बीएस सिंधू को सच्चाई जानने के लिए एक प्रार्थना पत्र भेजता है। तत्कालनी पुलिस निदेशक के यहां से भी कोई उत्तर नहीं मिलता। निराश मनोज एक बार फिर न्यायालय की शरण में जाता है। न्यायालय देहरादून पुलिस को २८ नवंबर २०१६ तक साक्ष्य उपलब्ध कराने का आदेश देता है। पुलिस साक्ष्य नहीं जुटा पाती है। इस प्रकार २०१७ के पहले महीने की ११ वीं तारीख मनोज के लिए राहत लेकर आती है। इसी दिन न्यायालय ने उसे बरी कर दिया। पुलिस द्वारा लगाए गए और कोर्ट में पेश किए गए सभी आरोप झूठे साबित हो गए। यह द्घटनाक्रम कई सालों तक चलता है, इसमें कई पड़ाव आते हैं। जब मनोज रोता है, बिखरता है, टूटता है, लेकिन गलत न करने और अन्याय सहन न करने एवं अपने को सही साबित करने के लिए वह बार-बार उठ खड़ा होता है। तमाम आर्थिक परेशानियों को झेलने के बाद भी वह अपने को सच्चा सिद्ध करता है। लेकिन कसक यहां रह जाती है कि जिस पुलिस ने उसे झूठा फंसाया उसके खिलाफ कोई कार्यवाही आज की तारीख में भी नहीं हो रही है। जबकि विगत ७ सालों से लड़ाई लड़ते-लड़ते मनोज का शरीर बीमारियों का द्घर बन जाता है। अदालतों के चक्कर काटते-काटते वह १५ लाख रुपया भी गंवा बैठता है। यह पैसा उसने अपने को दोषमुक्त करने के लिए उधार लिया था। इस दौरान मनोज की मां का देहांत भी हो जाता है। बूढ़ा पिता सदमे में है। अकेला मनोज अब उन झूठे पुलिसकर्मियों को सजा दिलाने एवं मुआवजे की लड़ाई के लिए प्रशासन की चौखट पर भटक रहा है। मनोज कहता है, ‘वह किसी सरकार या प्रशासन के खिलाफ नहीं है उसकी लड़ाई तो उन झूठे पुलिसकर्मियों के खिलाफ है जिन्होंने उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी। वह न्याय चाहता है, मुआवजा चाहता है ताकि वह अपने बूढ़े बाप का सहारा बन सके और उसका जीवन भी पटरी पर आ सके।’ वह आगे कहता है कि न्याय इसलिए भी चाहिए ताकि कल किसी दूसरे गरीब और असहाय व्यक्ति को उस पीड़ा का सामना न करना पड़े जो उसने खुद भोगी है। अब जब मुआवजे को लेकर वह पत्र व्यवहार कर रहा है तो उसके साथ अभियुक्त की तरह व्यवहार हो रहा है। २४ अगस्त २०१७ को निजी सचिव, पेयजल मंत्री की तरफ से जिलाधिकारी पिथौरागढ़ को भेजे गए पत्र में भी उसके मुख्यमंत्री को धमकी देने और सजा काटने का हवाला देते हुए उसे मुआवजा एवं नौकरी देने को सिरे से खारिज कर दिया गया। वह अब भी अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहा है। सच्चाई जानने के लिए मनोज ने सूचना के अधिकार अधिनियम का भी सहारा लिया। जिसमें बीएसएनएल सिम कार्ड नं ़ ९४५८१२४७१० को माह जनवरी २०१० से ३१ जुलाई २०१० तक किस व्यक्ति के नाम जारी किया गया था। उसका नाम, पता एवं पूरा विवरण के साथ ही इसी नम्बर में जनवरी २०१० से ३१ जुलाई २०१० तक के समय काल की पूरी डिटेल मांगने के साथ ही वर्तमान समय इसे कौन व्यक्ति उपयोग में ला रहा है आदि जानकारियां मांगी जाती रही। सूचना के तहत कुछ सही तो कुछ गलत जानकारी मनोज को प्राप्त होती रहीं। खैर, किसी तरह से मनोज अपने को दोषमुक्त साबित करने में सफल तो रहा लेकिन इसकी बड़ी कीमत अपना स्वास्थ्य खोकर मनोज को चुकानी पड़ रही है। उसके कान में गंभीर चोट है। जिसका प्राथमिक उपचार दून हॉस्पिटल में किया गया था, डॉक्टर कहते हैं कि इसका ऑपरेशन होगा। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के चलते मनोज ऑपरेशन करने में सक्षम नहीं है। पुलिस महानिदेशालय के साथ ही महामहिम राज्यपाल को न्याय के लिए वह जिलाधिकारी के माध्यम से पत्र प्रेषित कर चुके हैं। विशेष कार्याधिकारी मुख्यमंत्री सचिवालय, अपर सचिव गृह विभाग को भी मनोज अपनी आप बीती लिख चुका है लेकिन उसकी बात को कोई गंभीरता से नहीं ले रहा है। फिलहाल न्याय को लेकर मनोज की लड़ाई जारी है, देखना यह होगा कि इस संवेदनहीन तंत्र में उसे न्याय मिलता है या नहीं?
