शानदार रहा भारत का प्रदर्शन

शानदार रहा भारत का प्रदर्शन

भारत पिछले एशियन गेम्स की तुलना में पीछे जरूर दिखाई देता है लेकिन आइची-नागोया के प्रदर्शन को सिर्फ 106 बनाम 85 के आंकड़े में समेटना उचित नहीं होगा। 85 पदकों के साथ भारत ने चैथा स्थान हासिल किया। तीरंदाजी, हाॅकी, कुश्ती, मुक्केबाजी, क्रिकेट और कबड्डी ने शानदार प्रदर्शन किया। नए सितारों ने उम्मीद जगाई लेकिन स्वर्ण बढ़ाने की चुनौती कायम है। अब अगली बड़ी परीक्षा 2028 ओलम्पिक में होगी

जापान के आइची-नागोया में 19 सितम्बर से 4 अक्टूबर तक चले 20वें एशियन गेम्स में भारत ने 85 पदकों के साथ अभियान समाप्त किया। इनमें 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य पदक शामिल हैं। पदक तालिका में भारत चौथे स्थान पर रहा। चीन 169 स्वर्ण समेत 341 पदकों के साथ पहले, जापान 83 स्वर्ण समेत 269 पदकों के साथ दूसरे और दक्षिण कोरिया 39 स्वर्ण समेत 150 पदकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। भारत ने 2023 एशियन गेम्स हांगझोऊ में हासिल चैथा स्थान तो बरकरार रखा लेकिन वहां के 106 पदकों के रिकॉर्ड को दोहरा नहीं सका। यानी कुल पदकों में 21 की कमी आई। पदक तालिका में चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ भारत का अंतर अभी भी बहुत बड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की चुनौती केवल अधिक पदक जीतने की नहीं बल्कि अधिक स्वर्ण जीतने की है। 85 पदकों में 37 कांस्य हैं। अगर इनमें से कुछ कांस्य रजत और रजत स्वर्ण में बदलते तो भारत की स्थिति कहीं बेहतर होती। इसके अलावा कुछ ऐसे खेल भी रहे जिनसे भारत को पिछले खेलों की तुलना में अधिक उम्मीद थी लेकिन वहां अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। शूटिंग और एथलेटिक्स में कुल पदक संख्या अच्छी रही मगर स्वर्ण पदकों की संख्या सीमित रही। यही वह प्रश्न है जिसे भारतीय खेल व्यवस्था को गम्भीरता से देखना होगा।

शुरुआत धीमी, अंत धमाकेदार
भारतीय अभियान की शुरुआत ऐसी नहीं थी जिससे 85 पदकों का अनुमान लगाया जा सके। कई प्रमुख खेलों में अपेक्षित सफलता नहीं मिली और कुछ प्रतियोगिताओं में भारत को शुरुआती दौर में ही निराशा हाथ लगी लेकिन जैसे-जैसे प्रतियोगिता आगे बढ़ी, तीरंदाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती, हाॅकी, क्रिकेट और टीम खेलों ने पदक तालिका को तेजी से ऊपर पहुंचाया। अंतिम दौर में भारत ने लगातार कई स्वर्ण पदक जीते। क्रिकेट, हॉकी, कबड्डी और तीरंदाजी में मिली सफलताओं ने अभियान को शानदार समापन दिया। पुरुष हॉकी टीम ने मलेशिया को 5-1 से हराकर स्वर्ण बरकरार रखा। महिला हॉकी टीम ने चीन को 1-0 से हराकर 44 साल का इंतजार समाप्त किया। यह महिला हॉकी के लिए ऐतिहासिक क्षण था। दोनों हॉकी टीमों ने लाॅस एंजेलिस 2028 ओलम्पिक के लिए भी जगह पक्की कर ली है तो वहीं क्रिकेट में भी भारत ने दोनों वर्गों में स्वर्ण जीता। महिला टीम ने श्रीलंका को हराकर खिताब बरकरार रखा जबकि पुरुष टीम ने पाकिस्तान को 19 रन से हराकर लगातार दूसरी बार एशियाई खेलों का स्वर्ण अपने नाम किया। कबड्डी में भी भारत ने पुरुष और महिला दोनों वर्गों में स्वर्ण जीतकर अपना दबदबा कायम रखा।
तीरंदाजी बनी सबसे बड़ी स्वर्णिम ताकत
भारत का सबसे चमकदार खेल तीरंदाजी रही। भारतीय तीरंदाजों ने कुल 9 पदक जीते जिनमें 5 स्वर्ण, 2 रजत और 2 कांस्य शामिल हैं। इस बार किसी एक खेल में भारत के लिए 5 स्वर्ण सबसे बड़ी उपलब्धि रही। इस अभियान की सबसे बड़ी स्टार 17 वर्षीय कुमकुम मोहड़ रहीं। उन्होंने व्यक्तिगत और मिश्रित टीम रिकर्व स्पर्धा में स्वर्ण जीते। व्यक्तिगत रिकर्व में उनका स्वर्ण विशेष महत्व रखता है क्योंकि वह एशियाई खेलों में व्यक्तिगत रिकर्व स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय बनीं। यह उपलब्धि सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं है। यह संकेत भी है कि भारतीय तीरंदाजी अब केवल कुछ स्थापित नामों पर निर्भर नहीं है। नई पीढ़ी के खिलाड़ी दबाव में प्रदर्शन करने की क्षमता विकसित कर रहे हैं। 2028 ओलम्पिक को देखते हुए यह भारत के लिए बेहद सकारात्मक संकेत है।
एथलेटिक्स : पदक ज्यादा, स्वर्ण कम
एथलेटिक्स ने भारत को सबसे ज्यादा 24 पदक दिलाए जिनमें 9 रजत,14 कांस्य और महज 1 स्वर्ण हासिल किया। पदकों की संख्या के लिहाज से यह भारत का सबसे सफल खेल रहा लेकिन स्वर्ण की कमी चिंता का विषय है। महिला 4ग400 मीटर रिले टीम ने ट्रैक एंड फील्ड में भारत का एकमात्र स्वर्ण जीता। एथलेटिक्स में इतनी बड़ी संख्या में पदक मिलना बताता है कि भारतीय खिलाड़ियों का आधार मजबूत हुआ है लेकिन एशिया के शीर्ष देशों से प्रतिस्पर्धा में केवल पोडियम तक पहुंचना पर्याप्त नहीं है। अब ओलम्पिक स्तर पर स्वर्ण पदक की दौड़ में शामिल होने के लिए रजत और कांस्य को स्वर्ण में बदलना अगली बड़ी चुनौती होगी। जैवलिन थ्रो और लम्बी कूद जैसे मुकाबलों में भारत ने पदक जरूर हासिल किए लेकिन जिस तरह पहले नीरज चोपड़ा जैसे खिलाड़ी ने भारतीय एथलेटिक्स को स्वर्ण की उम्मीद दी है, उसी तरह अगली पीढ़ी से भी बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर निर्णायक प्रदर्शन की अपेक्षा रहेगी।
निशानेबाजी : पदक  आए, मगर चुनौतियां कम नहीं
निशानेबाजी भारत के सबसे मजबूत पदक स्रोतों में रही। कुल 15 पदकों में तीन स्वर्ण, आठ रजत और चार कांस्य शामिल हैं। ट्रैप निशानेबाज नीरू धांडा भारत की बड़ी स्टार बनकर उभरीं। उन्होंने व्यक्तिगत और मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण जीते और समापन समारोह में भारत की ध्वजवाहक बनीं। महिला ट्रैप के व्यक्तिगत वर्ग में उनका स्वर्ण ऐतिहासिक रहा लेकिन निशानेबाजी का प्रदर्शन यह भी बताता है कि भारत को रजत पदकों को स्वर्ण में बदलने की क्षमता पर और काम करना होगा। कई स्पर्धाओं में भारतीय निशानेबाज फाइनल तक पहुंचे, मगर शीर्ष स्थान से चूक गए। एशियाई स्तर पर चीन, दक्षिण कोरिया और अन्य देशों की कड़ी चुनौती को देखते हुए तकनीकी तैयारी के साथ मानसिक मजबूती भी निर्णायक होगी।
मुक्केबाजी में नया आत्मविश्वास
मुक्केबाजी में भारत ने छह पदक जीते जिनमें तीन स्वर्ण और तीन कांस्य शामिल हैं। लवलीना बोरगोहेन, परवीन हुड्डा और अंकुश ने स्वर्ण पदक जीते। विशेष रूप से अंकुश का प्रदर्शन महत्वपूर्ण रहा। वह एशियाई खेलों में पुरुष मुक्केबाजी का स्वर्ण जीतने वाले चुनिंदा भारतीय मुक्केबाजों में शामिल हो गए वहीं महिला मुक्केबाजी ने भी भारत को मजबूती दी। लवलीना ने अपने अनुभव को पदक में बदला जबकि परवीन हुड्डा ने भी स्वर्ण हासिल किया। यह प्रदर्शन उस दौर में महत्वपूर्ण है जब भारतीय मुक्केबाजी को लगातार नई पीढ़ी के खिलाड़ियों की जरूरत महसूस हो रही है।
कुश्ती ने दिखाई वापसी की राह
कुश्ती में भारत ने छह पदक जीते। दो स्वर्ण, दो रजत और दो कांस्य। यह 1962 के जकार्ता एशियन गेम्स के बाद भारत का सर्वश्रेष्ठ एशियाई खेल प्रदर्शन है। अमन सहरावत और सुजीत ने फ्रीस्टाइल में स्वर्ण पदक जीते। कुल छह में से चार पदक फ्रीस्टाइल पहलवानों ने हासिल किए। कुश्ती के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय कुश्ती लगातार विवादों, प्रशासनिक अस्थिरता और चयन से जुड़े सवालों से घिरी रही है। ऐसे माहौल के बावजूद मैट पर खिलाड़ियों का प्रदर्शन उम्मीद जगाता है। हालांकि इस सफलता को निरंतरता में बदलना जरूरी होगा।
हॉकी और कबड्डी ने बचाया गौरव
भारत के पारम्परिक मजबूत खेलों ने इस बार भी निराश नहीं किया। कबड्डी में पुरुष और महिला दोनों टीमों ने स्वर्ण जीता। महिला टीम ने ईरान को 37-34 और पुरुष टीम ने ईरान को 40-34 से हराकर खिताब अपने नाम किया। इस तरह भारत ने कबड्डी में स्वर्णिम दबदबा कायम रखा तो हॉकी में भी भारत ने इतिहास रचा। पुरुष टीम ने लगातार दूसरी बार खिताब जीता जबकि महिला टीम ने 1982 के बाद पहली बार एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक हासिल किया। पहली बार ऐसा हुआ कि भारत की पुरुष और महिला दोनों हॉकी टीमों ने एक ही एशियाई खेल में स्वर्ण जीता। यह सफलता इसलिए अहम है क्योंकि हॉकी में एशियाई स्तर पर भारत का मुकाबला लगातार मजबूत हो रहा है। महिला टीम की स्वर्णिम वापसी विशेष रूप से यह बताती है कि भारतीय महिला खेल अब केवल कुछ चुनिंदा स्पर्धाओं तक सीमित नहीं रह गया है।
महिलाओं ने बढ़ाया देश का आत्मविश्वास
आइची-नागोया में भारतीय महिला खिलाड़ियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। तीरंदाजी, मुक्केबाजी, हाॅकी, क्रिकेट और अन्य खेलों में महिलाओं ने स्वर्ण पदक दिलाए। कुमकुम मोहड़, नीरू धांडा, लवलीना बोरगोहेन, परवीन हुड्डा और महिला हाॅकी टीम जैसे नाम अभियान की पहचान बने। यह बदलाव केवल पदकों तक सीमित नहीं है। भारतीय खेलों में महिलाओं की भागीदारी पिछले दशक में तेजी से बढ़ी है। अब वे केवल पदक की सम्भावित दावेदार नहीं बल्कि कई खेलों में भारत की सबसे भरोसेमंद स्वर्ण उम्मीद बन रही हैं। यह परिवर्तन 2028 ओलम्पिक की तैयारी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
नए खेलों में दस्तक
भारत की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने कुछ ऐसे खेलों में भी पदक जीते जिनमें उसकी उपस्थिति पहले बहुत मजबूत नहीं थी। साॅफ्ट टेनिस और मिश्रित मार्शल आर्ट्स में भारत ने पहली बार पदक हासिल किए। यह विस्तार बताता है कि भारतीय खेल व्यवस्था धीरे-धीरे पारम्परिक खेलों के बाहर भी अपनी जगह बना रही है। गोल्फ में प्रणवी उर्स ने महिला व्यक्तिगत स्वर्ण जीतकर इतिहास रचा। वह एशियाई खेलों में व्यक्तिगत गोल्फ स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं और महिला टीम के रजत पदक का भी हिस्सा रहीं। स्क्वैश में भारत ने पांच पदक जीते। स्वर्ण भले नहीं आया लेकिन यह अभियान संयुक्त रूप से भारत का सर्वश्रेष्ठ पदक प्रदर्शन रहा। अभय सिंह और अनाहत सिंह जैसे युवा खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत स्पर्धाओं में रजत जीते और टीम स्पर्धाओं में भी योगदान दिया।
क्या कहते हैं विश्लेषक
खेल विश्लेषकों का कहना है कि पहली नजर में यह प्रदर्शन पिछले एशियन गेम्स की तुलना में पीछे जरूर दिखाई देता है लेकिन आइची- नागोया में भारतीय प्रदर्शन को सिर्फ 106 बनाम 85 के आंकड़े में समेटना उचित नहीं होगा। इस बार भारत ने कुछ ऐसे क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी मजबूत की जहां पहले वह पदक का दावेदार नहीं माना जाता था। कुछ पुराने मजबूत खेलों में उम्मीद के अनुरूप प्रदर्शन नहीं हुआ तो कुछ नए चेहरों ने भविष्य के लिए उम्मीद जगाई। सबसे खास बात यह रही कि शुरुआती दिनों की धीमी रफ्तार के बाद भारतीय दल ने अंतिम चरण में जबरदस्त वापसी की और कई स्वर्ण पदक एक साथ आए।
पदकों की संख्या के लिहाज से इस प्रदर्शन को निराशाजनक नहीं कहा जा सकता है। 85 पदकों के साथ ऐतिहासिक उपलब्धियां इस अभियान को सफल बनाती हैं। दूसरी तरफ हांगझोऊ के 106 पदकों से पीछे रहना और स्वर्ण पदकों की अपेक्षाकृत कम संख्या बताती है कि भारत को अभी लम्बी दूरी तय करनी है। इस एशियन गेम्स की असली उपलब्धि शायद पदक तालिका से ज्यादा उन चेहरों में है जो भविष्य का भारत बन सकते हैं। कुमकुम मोहड़ जैसी किशोर खिलाड़ी, नई पीढ़ी के मुक्केबाज, पहलवान, तीरंदाज और स्क्वैश खिलाड़ी संकेत दे रहे हैं कि भारतीय खेलों की अगली कहानी पुराने सितारों के सहारे नहीं लिखी जाएगी। भारत ने आइची-नागोया में चैथा स्थान बचाया है लेकिन असली लक्ष्य चैथे से तीसरे या दूसरे स्थान पर पहुंचना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य यह होना चाहिए कि भारत एशिया की खेल महाशक्तियों के बीच स्थायी रूप से खड़ा हो और ओलम्पिक में भी पदकों की संख्या के साथ स्वर्ण पदकों की दौड़ में शामिल हो।
कुल मिलाकर आइची-नागोया का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत के पास 2028 लाॅस एंजिलिस ओलम्पिक के लिए सम्भावनाओं की कमी नहीं है। तीरंदाजी में युवा प्रतिभा, कुश्ती में वापसी, मुक्केबाजी में नए नाम, शूटिंग में गहराई, एथलेटिक्स में बढ़ता आधार और हाॅकी में दोनों वर्गों की सफलता भविष्य के लिए उम्मीद पैदा करती हैं लेकिन एशियाई खेलों की सफलता को ओलम्पिक पदकों में बदलने के लिए तैयारी का स्तर अलग रखना होगा। एशिया में शीर्ष तीन-चार देशों से मुकाबला करने वाले खिलाड़ियों को विश्व स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना होगा। चोट प्रबंधन, खेल विज्ञान, मानसिक प्रशिक्षण, विदेशी प्रतियोगिताओं में भागीदारी और उच्च स्तरीय कोचिंग पर अधिक निवेश जरूरी है। एशियन गेम्स 2026 ने सम्भावनाएं दिखाई हैं कि अब 2028 तक उन्हें परिणाम में बदलना भारतीय खेल व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

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