एक पद, दो उपाध्यक्ष चुनावी नियमों की उड़ी धज्जियां

सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के एसएसजे परिसर, अल्मोड़ा में छात्रसंघ उपाध्यक्ष पद पर पुनर्मतगणना के बाद बराबरी हुई और नियमावली के तहत लाॅटरी से परिणाम घोषित किया गया। इसके बाद नियमों के विपरीत दोनों प्रत्याशियों को उपाध्यक्ष बनाए जाने के फैसले ने चुनावी नियमों और लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुपालन पर सवाल खड़े कर दिए हैं
सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के एसएसजे परिसर में छात्रसंघ उपाध्यक्ष पद को लेकर सामने आया विवाद अब केवल चुनाव परिणाम तक सीमित नहीं रह गया है। पुनर्मतगणना में बराबरी के बाद लाॅटरी के जरिए परिणाम घोषित किए जाने और इसके बाद दोनों प्रत्याशियों को उपाध्यक्ष बनाए जाने के प्रशासनिक निर्णय ने चुनावी नियमावली के साथ-साथ छात्रसंघ चुनावों के लिए लागू लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुपालन को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

छात्रसंघ उपाध्यक्ष पद के लिए तीन उम्मीदवार भास्कर जोशी, सुमित जोशी और सुमित जोशी चुनाव मैदान में थे। 29 सितम्बर को हुई पहली मतगणना में भास्कर जोशी और सुमित जोशी के बीच एक वोट का अंतर सामने आया और भास्कर जोशी को विजयी घोषित किया गया। इसके बाद सुमित जोशी की ओर से पुनर्मतगणना की मांग की गई।

छात्रसंघ चुनाव नियमावली की धारा 12 के उपनियम 13 में तीन या उससे कम मतों के अंतर की स्थिति में निर्धारित समय और शुल्क के साथ पुनर्मतगणना का प्रावधान है। नियमावली में यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुनर्मतगणना का परिणाम अंतिम एवं सर्वमान्य होगा और इसके बाद दोबारा मतगणना नहीं की जाएगी।

पुनर्मतगणना में दोनों प्रमुख प्रत्याशियों के मत बराबर पाए गए। इसके बाद नियमावली की धारा 12 के उपनियम 12 के तहत बराबर मत मिलने की स्थिति में लाॅटरी से परिणाम घोषित किया गया। नियम के अनुसार बराबर मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशियों के नाम लिखकर लॉटरी निकाली जाती है और जिस प्रत्याशी का नाम निकलता है, उसे निर्वाचित घोषित किया जाता है। इसी प्रक्रिया में सुमित जोशी का नाम निकलने के बाद उन्हें विजयी घोषित किया गया।

यानी बराबरी की स्थिति से निपटने के लिए चुनाव नियमावली में पहले से ही स्पष्ट प्रक्रिया मौजूद थी और उसी प्रक्रिया के तहत परिणाम भी घोषित कर दिया गया। विवाद यहीं समाप्त हो सकता था लेकिन इसके बाद दोनों पक्षों के बीच समाधान निकालने के प्रयास में प्रशासन की ओर से दोनों प्रत्याशियों को उपाध्यक्ष बनाए जाने का रास्ता अपनाया गया। प्रशासन का यह कदम विवाद शांत करने और दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है लेकिन इसी फैसले ने अब एक नया सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस पद के लिए चुनाव हुआ, उस पर दो व्यक्तियों को एक साथ पद देने का नियमगत आधार क्या है।

यहां लिंगदोह समिति की सिफारिशों का संदर्भ भी महत्वपूर्ण हो जाता है। छात्रसंघ चुनावों में बढ़ते धनबल, बाहरी राजनीतिक प्रभाव, आपराधिकरण और चुनावी अनियमितताओं को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिसम्बर 2005 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। समिति को छात्रसंघ चुनावों में आपराधिकरण, चुनावी खर्च और वित्तीय पारदर्शिता, प्रत्याशियों की पात्रता तथा चुनाव से जुड़े विवादों और शिकायतों के निपटारे जैसे मुद्दों पर दिशा-निर्देश तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी।

समिति की सिफारिशों का मूल उद्देश्य छात्रसंघ चुनावों में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बनाए रखते हुए चुनाव प्रक्रिया को स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना तथा विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक वातावरण को राजनीतिक और बाहरी दबाव से बचाना था। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में समिति की सिफारिशों पर विचार करते हुए उनके अनुरूप छात्रसंघ चुनाव कराने के निर्देश दिए थे।

ऐसे में एसएसजे परिसर के मामले में सवाल केवल यह नहीं है कि लाॅटरी से किस प्रत्याशी को जीत मिली। सवाल यह भी है कि जब बराबरी की स्थिति के लिए नियमावली में पहले से स्पष्ट व्यवस्था थी और उसी के तहत एक प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित कर दिया गया तो उसके बाद उसी पद पर दो व्यक्तियों को उपाध्यक्ष बनाने का निर्णय किस नियम के तहत लिया गया।

छात्रसंघ चुनाव नियमावली की धारा 13 में छात्रसंघ पदाधिकारियों और कार्यकारिणी सदस्यों के अधिकार एवं कर्तव्यों का उल्लेख है। इसमें दोनों उपाध्यक्षों का उल्लेख मिलता है लेकिन नियमावली में उपाध्यक्ष पद की व्यवस्था एक छात्र उपाध्यक्ष और एक छात्रा उपाध्यक्ष के रूप में है। एसएसजे परिसर में छात्रा उपाध्यक्ष का पद पहले ही निर्वाचित हो चुका है। ऐसे में मौजूदा विवाद केवल छात्र उपाध्यक्ष के पद को लेकर था। सवाल यह है कि जब छात्र उपाध्यक्ष का एक ही पद था तो उस पद पर दो प्रत्याशियों को एक साथ उपाध्यक्ष बनाए जाने का स्पष्ट प्रावधान नियमावली में कहां है।

बागेश्वर के बेड़ी पाण्डे काॅलेज का उदाहरण भी इस मामले को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। वहां कोषाध्यक्ष पद पर अनामिका सिरस्वाल और रोलिका साह को 427-427 मत मिले थे और मुकाबला बराबरी पर रहा था। यह उदाहरण बताता है कि चुनाव में बराबरी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है लेकिन ऐसी स्थिति में निर्धारित नियमों के आधार पर ही परिणाम तक पहुंचना होता है। एसएसजे परिसर और सम्बंधित काॅलेज एक ही विश्वविद्यालयीय व्यवस्था से जुड़े होने के कारण ऐसे मामलों में नियमों की एकरूपता का सवाल भी सामने आता है।

मौजूदा मामले में किसी एक प्रत्याशी की जीत या हार के पक्ष में जाना उद्देश्य नहीं है। पुनर्मतगणना के बाद बराबरी की स्थिति में लाॅटरी के जरिए परिणाम घोषित करने का प्रावधान नियमावली में मौजूद है और उसी के आधार पर एक प्रत्याशी को विजयी घोषित भी किया गया। मूल सवाल इसके बाद लिए गए प्रशासनिक निर्णय को लेकर है। यदि चुनाव में छात्र उपाध्यक्ष का केवल एक पद था और उस पद पर लाॅटरी के माध्यम से एक प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित कर दिया गया था तो उसी पद पर दूसरे प्रत्याशी को भी उपाध्यक्ष बनाने का अधिकार प्रशासन को किस नियम से प्राप्त हुआ, इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए।

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि छात्रसंघ चुनाव
लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इनमें पदों की संख्या तथा निर्वाचन की प्रक्रिया पहले से निर्धारित होती है। यदि किसी विवाद को समाप्त करने के लिए चुनाव के बाद किसी पद पर दो व्यक्तियों को बैठाया जा सकता है तो ऐसी व्यवस्था का स्पष्ट नियम होना भी आवश्यक है। अन्यथा भविष्य में किसी भी पद पर बराबरी या विवाद की स्थिति आने पर अलग-अलग निर्णयों के लिए रास्ता खुल सकता है।

मामले में प्रशासन से यह स्पष्ट किए जाने की अपेक्षा है कि पुनर्मतगणना किस नियम के तहत हुई, बराबरी के बाद लाॅटरी से परिणाम किस प्रावधान के तहत घोषित किया गया और उसके बाद उसी छात्र उपाध्यक्ष पद पर दोनों प्रत्याशियों को उपाध्यक्ष बनाने का निर्णय किस नियम या अधिकार के तहत लिया गया। यदि इस निर्णय का कोई स्पष्ट नियमगत आधार है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे यह विवाद व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से बाहर निकलकर चुनाव नियमावली, लिंगदोह समिति की सिफारिशों और प्रशासनिक निर्णय की वास्तविक समीक्षा की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
(खुशबू बिष्ट स्वतंत्र पत्रकार हैं एवं लोकलेंस न्यूज पोर्टल से जुड़ी हैं।)

बात अपनी-अपनी

देखिए छात्रसंघ में उपाध्यक्ष के एक पद पर संयुक्त रूप से दो छात्रों को उपाध्यक्ष घोषित कर देना कानूनी रूप से बिल्कुल गलत है। इस निर्णय को अगर कोर्ट में चुनौती दी गई तो ये निर्णय अवैध ठहराया जा सकता है। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का ये उल्लंघन है। नियमानुसार दो प्रत्याशियों के बीच 3 मतों का अंतर हो या दोनों के मत बराबर हों तो फिर से मतगणना का प्रावधान है। अगर मतगणना के बाद दोनों प्रत्याशियों के मत बराबर हों तो टाॅस से निर्णय होता है। टाॅस में जो विजेता घोषित होगा वही जीता माना जायेगा। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का अनुपालन होना कहीं नजर आता नहीं। छात्रसंघ चुनाव कराने वाली संस्थाएं दबाव में काम करती हैं। इनके अधिकारियों की रीढ़ अब है कहां जो दबाव झेल सके। जब तक सख्त निर्णय लेने की हिम्मत नहीं ला पाएंगे तब तक छात्रसंघों के चुनाव में यूं ही अराजकता रहेगी।
डाॅ. जगदीश प्रसाद, पूर्व निदेशक, उच्च शिक्षा, उत्तराखण्ड

देखिए यह तो लिंगदोह समिति की सिफारिशों का खुला उल्लंघन है। एक पद के लिए दो लोग कैसे चयनित हो सकते हैं। तो फिर इसमें चुनाव की भूमिका ही कहां रह जाती है। बराबर वोट मिलने के बाद लाॅटरी में जिस व्यक्ति के पक्ष में परिणाम आया था नियमानुसार उसे ही छात्र संघ का उपाध्यक्ष घोषित कर दिया गया था लेकिन भारतीय जनता पार्टी से जुड़े एक संगठन के दबाव के चलते परिसर प्रशासन ने जो यह निर्णय लिया वो बिल्कुल नियम विरुद्ध है और कानूनी रूप से भी गलत है।
लोकेश सुप्याल, पूर्व अध्यक्ष छात्रसंघ, स्व. शोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा

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