फ्रांस में भी भड़की जेन जी की बगावत

फ्रांस में हाईस्कूल छात्रों का आंदोलन अब देशव्यापी विरोध में बदल चुका है। शिक्षकों की कमी, भीड़भरी कक्षाओं, जर्जर स्कूल भवनों, लम्बे स्कूल समय और शिक्षा व्यवस्था में असमानता के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन अब पुलिस और छात्रों के बीच टकराव तक पहुंच गया है। पिछले सप्ताह पांच हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें लगभग 85 प्रतिशत नाबालिग बताए गए हैं। सैकड़ों छात्र और शिक्षा कर्मचारी घायल हुए हैं। 5 अक्टूबर को 400 से 500 स्कूलों में पढ़ाई पूरी या आंशिक रूप से प्रभावित रहने की स्थिति बनी। आंदोलन अब केवल शिक्षा व्यवस्था का सवाल नहीं रह गया है बल्कि फ्रांस की सामाजिक असमानता, युवाओं के भविष्य और सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े कर रहा है

फ्रांस में मौजूदा छात्र आंदोलन की शुरुआत 17 सितम्बर को पेरिस के उपनगर क्रेतेई के सेंट-एक्जुपेरी हाई स्कूल से हुई। वहां शिक्षक और छात्र कर्मचारियों तथा संसाधनों की कमी को लेकर विरोध में उतरे थे। शुरुआत में मामला एक स्कूल की समस्याओं तक सीमित दिखाई दे रहा था लेकिन धीरे-धीरे छात्रों के बीच यह भावना फैलने लगी कि समस्या केवल उनके स्कूल की नहीं बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की है।

इसके बाद दूसरे स्कूलों में भी छात्रों ने प्रवेश द्वारों पर प्रदर्शन शुरू किए, कक्षाओं का बहिष्कार किया और स्कूलों को बंद कराने की कोशिश की। सितम्बर के अंतिम सप्ताह तक आंदोलन पेरिस क्षेत्र से निकलकर देश के दूसरे हिस्सों में पहुंच गया। 1 अक्टूबर को एक हजार से अधिक हाईस्कूल किसी न किसी रूप में हड़ताल, प्रदर्शन या अवरोध से प्रभावित हुए थे। इनमें 222 स्कूलों में प्रवेश पूरी तरह बाधित होने की सूचना थी।
आंदोलन के फैलने के साथ ही कई जगह स्थिति हिंसक हो गई। कूड़ेदानों और दूसरी वस्तुओं में आग लगाई गई, पुलिस पर चीजें फेंकी गईं और कुछ स्कूलों तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा।
जेन-जेड का गुस्सा क्यों?
फ्रांस के छात्रों की शिकायतों का केंद्र शिक्षा व्यवस्था में संसाधनों की कमी है। छात्रों का कहना है कि कई स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। शिक्षक अनुपस्थित होते हैं तो उनकी जगह दूसरे शिक्षक समय पर नहीं मिलते। इसका सीधा असर पढ़ाई पर पड़ता है। इसके अलावा कक्षाओं में छात्रों की संख्या अधिक होने, स्कूल भवनों की खराब हालत, गर्मियों में अत्यधिक गर्म कक्षाओं और लम्बे स्कूल समय को लेकर भी नाराजगी है। कई हाईस्कूलों में पढ़ाई सुबह आठ बजे शुरू होकर शाम तक चलती है। छात्रों का कहना है कि इतनी लम्बी पढ़ाई और लगातार बढ़ते शैक्षणिक दबाव का उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है।
गरीब और कामकाजी वर्ग वाले इलाकों के छात्रों की शिकायत और ज्यादा गम्भीर है। उनका कहना है कि फ्रांस में समान शिक्षा का अधिकार तो सबको है लेकिन वास्तविक सुविधाओं और अवसरों में इलाकाई और सामाजिक अंतर मौजूद है। यानी आंदोलन का सवाल केवल यह नहीं है कि स्कूल में कितने शिक्षक हैं। सवाल यह भी है कि क्या हर फ्रांसीसी बच्चे को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा मिल रही है?
गरीब इलाकों की आवाज
इस आंदोलन में पेरिस के बाहरी और अपेक्षाकृत कमजोर इलाकों के छात्रों की भागीदारी खास तौर पर दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि सामाजिक पृष्ठभूमि आज भी शिक्षा के अवसरों को प्रभावित करती है। फ्रांस का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व है। छात्रों के हाथों में दिखाई देने वाले पोस्टरों में भी इसी समानता के सवाल को उठाया गया है। उनका कहना है कि शिक्षा अधिकार है, विशेषाधिकार नहीं। यही बात इस आंदोलन को केवल स्कूल सुधार की मांग से आगे ले जाती है। अगर छात्रों को लगता है कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति या उनके रहने का इलाका उनके भविष्य की सम्भावनाओं को तय कर रहा है तो स्वाभाविक रूप से उनका असंतोष व्यापक सामाजिक सवाल में बदल जाता है।
सोशल मीडिया ने दी आंदोलन को गति
जेन-जेड की इस बगावत में सोशल मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। छात्रों ने पारम्परिक राजनीतिक संगठनों का इंतजार किए बिना इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए एक-दूसरे से सम्पर्क किया। एक स्कूल में शुरू हुआ प्रदर्शन दूसरे स्कूल तक पहुंचा और फिर अलग-अलग शहरों में छात्रों ने समान मांगों के साथ प्रदर्शन शुरू कर दिए। तस्वीरें और वीडियो तेजी से फैलते गए और इससे आंदोलन को राष्ट्रीय स्वरूप मिला। यही वजह है कि फ्रांस सरकार के लिए इस आंदोलन को केवल कुछ स्थानीय स्कूलों की समस्या के रूप में देखना सम्भव नहीं है।
आंदोलन में हिंसा ने बढ़ाई चिंता
शांतिपूर्ण विरोध के साथ-साथ कई जगह हिंसा की घटनाओं ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। कई शहरों में कूड़ेदानों में आग लगाई गई, पुलिस पर वस्तुएं फेंकी गईं और स्कूलों तथा सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। 1 और 2 अक्टूबर के आस-पास स्थिति ज्यादा गम्भीर हुई। पुलिस ने कई स्थानों पर आंसू गैस और दूसरे नियंत्रण उपायों का इस्तेमाल किया। कुछ इलाकों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच सीधा टकराव हुआ। सरकार का कहना है कि छात्रों की शिकायतें वैध हो सकती हैं लेकिन आगजनी और हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों और उनके समर्थकों ने कुछ पुलिस कार्रवाई को जरूरत से ज्यादा कठोर बताया है। इस विवाद ने आंदोलन के मूल मुद्दे को और जटिल बना दिया है।
पांच हजार से ज्यादा गिरफ्तारियां
फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुसार पिछले सप्ताह से अब तक पांच हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें करीब 85 प्रतिशत नाबालिग बताए गए हैं। यह आंकड़ा बताता है कि आंदोलन किस स्तर तक पहुंच चुका है। बड़ी संख्या में छात्र और शिक्षा कर्मचारी भी घायल हुए हैं। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार आंदोलन के दौरान 170 से अधिक छात्र और 78 शिक्षा कर्मचारी घायल हुए हैं। 24 स्कूलों में आगजनी या तोड़-फोड़ की गम्भीर घटनाएं होने की भी जानकारी सामने आई है। 5 अक्टूबर को 400 से 500 माध्यमिक विद्यालयों में सुरक्षा कारणों से पढ़ाई पूरी या आंशिक रूप से स्थगित रहने की स्थिति बनी।
पुलिस भी सवालों के घेरे में
आंदोलन के दौरान पुलिस की भूमिका विवाद का विषय बन गई है। सरकार का कहना है कि सुरक्षा बल सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और हिंसा रोकने के लिए कार्रवाई कर रहे हैं। गृहमंत्री लॉरेंट नूनेज ने पुलिस की कार्रवाई को अनुपातहीन बताए जाने को खारिज किया है। दूसरी तरफ छात्रों और उनके समर्थकों ने आरोप लगाया है कि कुछ स्थानों पर पुलिस ने जरूरत से अधिक बल का इस्तेमाल किया। कुछ छात्रों के घायल होने की घटनाओं ने इस बहस को और तेज कर दिया है। एक घटना में टकराव के बाद एक युवक की एक आंख की रोशनी जाने की सूचना सामने आई है। एक अन्य घटना में एक शिक्षक पर पेट्रोल डालने और हमला करने का मामला सामने आया। पुलिसकर्मियों पर हमले की घटनाएं भी दर्ज हुई हैं। इस तरह आंदोलन में हिंसा दोनों तरफ से चिंता का विषय बन गई है।
शिक्षक भी छात्रों के साथ
इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब शिक्षक संगठन भी छात्रों की मांगों के समर्थन में सामने आ गए हैं। फ्रांस के प्रमुख शिक्षक संगठनों ने छात्रों के साथ एकजुटता दिखाई है। उनका कहना है कि छात्रों की जिन समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया जा रहा है, वे वही समस्याएं हैं जिनको लेकर शिक्षक लम्बे समय से शिकायत करते रहे हैं, कर्मचारियों की कमी, संसाधनों का अभाव और काम करने की कठिन परिस्थितियां। इससे आंदोलन का सामाजिक आधार और व्यापक हो गया है।
राजनीति भी आंदोलन में दाखिल
छात्र आंदोलन अब फ्रांस की राजनीति का हिस्सा भी बन चुका है। वामपंथी नेता ज्यां-ल्यूक मेलांशों और उनकी पार्टी ने छात्रों की मांगों का समर्थन किया है तथा पुलिस कार्रवाई की आलोचना की है। सरकार और उसके समर्थकों का आरोप है कि राजनीतिक ताकतें छात्रों के आंदोलन को अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। दूसरी तरफ आंदोलन समर्थकों का कहना है कि छात्रों की समस्याएं वास्तविक हैं और किसी राजनीतिक दल का समर्थन मिलने से उनकी मूल मांगें खत्म नहीं हो जातीं। यहां यह फर्क महत्वपूर्ण है कि आंदोलन की शुरुआत शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं से हुई थी और बाद में राजनीतिक समर्थन तथा आरोप-प्रत्यारोप इसमें शामिल हुए।
मैक्रो सरकार के सामने चुनौती
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। उसे शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक समस्याओं का समाधान करना है और साथ ही हिंसा तथा सार्वजनिक सम्पत्ति के नुकसान को रोकना है। सरकार के प्रस्तावित 2027 बजट में शिक्षा के लिए 65.5 अरब यूरो का प्रावधान किया गया है। यह रक्षा के लिए प्रस्तावित राशि से भी अधिक है। इसके बावजूद छात्र शिक्षा व्यवस्था में संसाधनों की कमी का सवाल उठा रहे हैं। इससे एक बड़ा सवाल सामने आता है कि क्या समस्या केवल बजट की मात्रा की है या फिर उसके वितरण और इस्तेमाल की भी है। सरकार ने शिक्षकों की भर्ती तेज करने और छात्रों से संवाद बढ़ाने की बात कही है लेकिन छात्रों की मांग है कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं बल्कि ठोस बदलाव चाहिए।
सवाल सिर्फ स्कूलों का नहीं
फ्रांस में शुरू हुआ यह आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके केंद्र में केवल स्कूल की इमारत या शिक्षक की कमी नहीं है। इसके केंद्र में नई पीढ़ी का वह सवाल है कि उसे अपने भविष्य के लिए कितने अवसर मिलेंगे। जेन-जेड की यह पीढ़ी सोशल मीडिया के जरिए तेजी से संगठित हो सकती है और अपनी बात सीधे सत्ता तक पहुंचाने की कोशिश कर सकती है। फ्रांस में यह प्रक्रिया अब साफ दिखाई दे रही है लेकिन आंदोलन की विश्वसनीयता के लिए शांतिपूर्ण विरोध और हिंसा के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। शिक्षा सुधार की मांग और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाली घटनाओं को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। फिलहाल फ्रांस के स्कूलों से उठी आवाज सरकार के सामने एक सीधा सवाल रख रही है कि अगर शिक्षा भविष्य की नींव है तो उस नींव में इतनी दरारें क्यों हैं? यही सवाल इस आंदोलन को फ्रांस की मौजूदा
राजनीति और समाज के लिए महत्वपूर्ण बना रहा है।

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