टाटा की साख पर उठे सवाल
एसआईआर को लेकर उठ रहे सवाल अब केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं हैं। फाॅर्म-6 में बदलाव को लेकर राहुल गांधी ने पूछा है कि टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज को यह बदलाव करने का आदेश किसने दिया? कम्पनी में इसे मंजूरी किसने दी। दूसरी तरफ कर्नाटक में 4 हजार से ज्यादा फाॅर्म-7 के जरिए नाम हटाने की मांग, उत्तराखण्ड में पांच लोगों द्वारा करीब 6500 नामों के खिलाफ आपत्तियां और गोवा में बाॅम्बे हाईकोर्ट की साॅफ्टवेयर आधारित प्रक्रिया पर गम्भीर टिप्पणियों ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर बहस और गहरी कर दी है। इस पूरे विवाद में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज का नाम आना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि टाटा का नाम लम्बे समय से कारोबारी भरोसे का पर्याय माना जाता रहा है
देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। शुरुआत में बहस इस बात पर थी कि एसआईआर के दौरान कितने मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हो सकते हैं, किन लोगों को अपनी नागरिकता या निवास से सम्बंधित दस्तावेज देने पड़ेंगे और किन मतदाताओं को दोबारा सूची में शामिल होने के लिए आवेदन करना होगा लेकिन अब विवाद का दायरा इससे कहीं बड़ा हो गया है। अब सवाल केवल मतदाता सूची का नहीं है, सवाल यह भी है कि इस पूरी प्रक्रिया को संचालित करने वाली व्यवस्था काम कैसे कर रही है, उसके पीछे कौन से निर्देश हैं और उसमें इस्तेमाल होने वाली तकनीक किस तरह फैसलों को प्रभावित कर रही है।
इसी बीच ऑनलाइन फाॅर्म-6 में हुए एक बदलाव ने पूरे विवाद को नया आयाम दे दिया है। फाॅर्म-6 वह आवेदन है जिसके जरिए मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का दावा किया जाता है। एसआईआर के दौरान इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि जिन लोगों के नाम किसी प्रक्रिया के दौरान सूची से बाहर रह जाते हैं, उनके दोबारा नाम शामिल कराने की प्रक्रिया भी इसी से जुड़ती है। यहीं राहुल गांधी ने एक ऐसा सवाल उठाया है जिसका जवाब अब चुनाव आयोग के साथ-साथ टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज से भी मांगा जा रहा है। राहुल गांधी का सवाल है कि ऑनलाइन फाॅर्म-6 में बदलाव करने का आदेश चुनाव आयोग में आखिर किसने दिया? इस बदलाव को चुनाव आयोग में किस अधिकारी ने मंजूरी दी? टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में इसे किस अधिकारी ने स्वीकृति दी? क्या कम्पनी पर ऐसा बदलाव करने के लिए किसी तरह का दबाव था? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक सॉफ्टवेयर में तकनीकी बदलाव का मामला नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसके जरिए करोड़ों मतदाताओं से जुड़े चुनावी रिकाॅर्ड तैयार और संचालित किए जाते हैं। चुनाव आयोग ने बाद में कुछ राज्यों में फाॅर्म-6 से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा को हटाने का फैसला किया। इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल और बड़ा कर दिया कि आखिर वह अतिरिक्त व्यवस्था आई कैसे थी और उसके पीछे निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या थी। यदि किसी बदलाव का आदेश किसी निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत हुआ था तो उस आदेश का रिकॉर्ड क्या है और उसे किस स्तर पर मंजूरी दी गई थी, यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
आमतौर पर चुनावी विवाद में चुनाव आयोग, राजनीतिक दल और सरकार चर्चा के केंद्र में होते हैं लेकिन इस बार एक बड़ी निजी तकनीकी कम्पनी का नाम भी सामने आ रहा है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज का नाम सामने आना अपने आप में कम्पनी को किसी गलती या अनियमितता का दोषी साबित नहीं करता। किसी तकनीकी कम्पनी को चुनावी व्यवस्था के लिए साॅफ्टवेयर या तकनीकी सेवाएं उपलब्ध कराने और उस व्यवस्था में किसी बदलाव का राजनीतिक या प्रशासनिक निर्णय लेने के बीच फर्क है लेकिन यही वजह है कि राहुल गांधी के सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं। अगर बदलाव का आदेश चुनाव आयोग के किसी अधिकारी ने दिया था तो वह अधिकारी कौन था? अगर आदेश किसी निर्धारित प्रक्रिया के तहत दिया गया था तो उसका रिकॉर्ड क्या है? अगर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने केवल चुनाव आयोग के निर्देश पर तकनीकी बदलाव किया था तो कम्पनी को उस निर्देश की प्रकृति क्या बताई गई थी? अगर कम्पनी ने अपनी तरफ से कोई बदलाव किया था तो उसकी अनुमति किसने दी?
इस कहानी में टाटा का नाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में टाटा सिर्फ एक कारोबारी समूह का नाम नहीं रहा है। टाटा का नाम दशकों से विश्वसनीयता के साथ जोड़ा जाता रहा है। देश में बड़े कारोबारी समूहों और सत्ता के रिश्तों को लेकर लगातार राजनीतिक बहस होती रही है। अडाणी और अम्बानी जैसे कारोबारी समूहों को लेकर विपक्ष और सरकार के बीच अलग-अलग तरह के आरोप और प्रत्यारोप सामने आते रहे हैं लेकिन टाटा की सार्वजनिक छवि लम्बे समय तक इन राजनीतिक कारोबारी विवादों से अपेक्षाकृत अलग रही है। यही वजह है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवाद में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज का नाम आना सामान्य कारोबारी खबर नहीं है। यह टाटा की उस सार्वजनिक साख से भी जुड़ जाता है जिसे उसने वर्षों में बनाया है।
लोगों के लिए सवाल यह नहीं होगा कि टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज चुनाव आयोग के लिए तकनीकी काम क्यों कर रही है। सवाल यह होगा कि जिस तकनीकी व्यवस्था में देश के मतदाताओं से जुड़ा डेटा और चुनावी प्रक्रिया संचालित होती है, उसमें कम्पनी की भूमिका और जिम्मेदारी कितनी है। इसलिए टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देना केवल राजनीतिक विवाद का हिस्सा नहीं होना चाहिए बल्कि
पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही का हिस्सा होना चाहिए। यदि कम्पनी के पास यह स्पष्ट करने के लिए दस्तावेज हैं कि उसने केवल अधिकृत निर्देशों के अनुसार काम किया तो उन तथ्यों के सामने आने से विवाद की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी।
पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही का हिस्सा होना चाहिए। यदि कम्पनी के पास यह स्पष्ट करने के लिए दस्तावेज हैं कि उसने केवल अधिकृत निर्देशों के अनुसार काम किया तो उन तथ्यों के सामने आने से विवाद की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी।
फाॅर्म-6 का विवाद अकेला मामला नहीं है। इसी एसआईआर के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से फाॅर्म-7 को लेकर भी ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। फाॅर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची से किसी नाम को हटाने की आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है। कर्नाटक में 4 हजार से ज्यादा ऐसे आवेदन सामने आए हैं जिनके जरिए मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई। कई मामलों में यह भी सामने आया कि बहुत बड़ी संख्या में आवेदन कुछ ही लोगों ने दाखिल किए। बाबलेश्वर में 1373 आवेदन सामने आए और इनमें 1363 आवेदन केवल 10 लोगों ने दाखिल किए। कई मामलों में जिन मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम मतदाताओं की बताई गई है।
यहां एक बात समझना जरूरी है कि फाॅर्म-7 दाखिल होना और मतदाता का नाम वास्तव में मतदाता सूची से हट जाना एक ही बात नहीं है। आवेदन पर जांच और निर्धारित प्रक्रिया के बाद ही नाम हटाया जा सकता है लेकिन सवाल फिर भी गम्भीर है कि आखिर कुछ लोगों ने इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने की मांग क्यों की और उन्हें इन मतदाताओं के बारे में इतनी जानकारी कहां से मिली। यदि कोई व्यक्ति सैकड़ों या हजारों मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आवेदन करता है तो यह जानना स्वाभाविक है कि उसने उन मतदाताओं के सम्बंध में जानकारी किस आधार पर जुटाई और क्या प्रत्येक मामले में वास्तविक सत्यापन हुआ। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भी बड़े पैमाने पर फाॅर्म-7 दाखिल किए जाने के मामले की जांच की मांग की है और इस पूरे विवाद ने अब राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बहस को तेज कर दिया है।
उत्तराखण्ड में सामने आया मामला भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की पांच विधानसभा सीटों में पांच लोगों ने मिलकर करीब 6500 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आपत्तियां दाखिल कीं। रिपोर्ट के अनुसार इन पांच लोगों का सम्बंध भाजपा से बताया गया है और उनके द्वारा जिन मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम मतदाताओं की थी। सबसे ज्यादा संख्या वाले एक मामले में एक व्यक्ति ने अकेले हजारों नाम हटाने की आपत्तियां दाखिल कीं। यहां सवाल यह है कि क्या एक व्यक्ति के पास हजारों मतदाताओं के नामों की जानकारी हो सकती है, क्या उसने व्यक्तिगत रूप से इन मतदाताओं के बारे में सत्यापन किया था और इतनी बड़ी संख्या में आपत्तियां किस आधार पर दाखिल की गईं।
उत्तराखण्ड में सामने आया मामला भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की पांच विधानसभा सीटों में पांच लोगों ने मिलकर करीब 6500 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आपत्तियां दाखिल कीं। रिपोर्ट के अनुसार इन पांच लोगों का सम्बंध भाजपा से बताया गया है और उनके द्वारा जिन मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम मतदाताओं की थी। सबसे ज्यादा संख्या वाले एक मामले में एक व्यक्ति ने अकेले हजारों नाम हटाने की आपत्तियां दाखिल कीं। यहां सवाल यह है कि क्या एक व्यक्ति के पास हजारों मतदाताओं के नामों की जानकारी हो सकती है, क्या उसने व्यक्तिगत रूप से इन मतदाताओं के बारे में सत्यापन किया था और इतनी बड़ी संख्या में आपत्तियां किस आधार पर दाखिल की गईं।
टाटा समूह के बारे में लोगों की धारणा उसकी सबसे बड़ी पूंजी रही है। इसलिए टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज का नाम किसी चुनावी विवाद में आना अपने आप में एक बड़ा समाचार है। यह कहना अभी सही नहीं होगा कि टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने कोई अनियमितता की है। इसका फैसला जांच और तथ्यों के आधार पर ही हो सकता है लेकिन कम्पनी को यह बताने में भी संकोच नहीं होना चाहिए कि फाॅर्म-6 में बदलाव की प्रक्रिया में उसकी भूमिका क्या थी, किसने निर्देश दिया, किसने मंजूरी दी, किस आधार पर बदलाव किया गया और क्या कम्पनी के पास उस आदेश का रिकॉर्ड मौजूद है।
टाटा समूह के भीतर नेतृत्व और अध्यक्ष पद को लेकर जो चर्चाएं चल रही हैं, उनके बीच इस विवाद को लेकर कुछ लोग अलग-अलग आशंकाएं भी व्यक्त कर रहे हैं लेकिन अभी ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं है जिससे टाटा समूह के आंतरिक घटनाक्रम को फाॅर्म-6 या चुनाव आयोग के विवाद से सीधे जोड़ा जा सके। इसलिए इस हिस्से को सवाल और आशंका के स्तर पर ही देखना चाहिए, तथ्य के स्तर पर नहीं लेकिन इतना जरूर है कि टाटा का नाम इस विवाद में आना अपने आप में एक बड़ी खबर है क्योंकि जिस देश में टाटा नाम को वर्षों तक भरोसे और विश्वसनीयता की पहचान माना गया, वहां चुनावी प्रक्रिया जैसे संवेदनशील विषय में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज की भूमिका पर सवाल उठना मामूली बात नहीं है।
अब गेंद चुनाव आयोग और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज दोनों के पाले में है। अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ है तो जवाब सामने आना चाहिए। अगर कोई गलती हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और अगर किसी अधिकारी ने कोई ऐसा आदेश दिया जिसे लेकर खुद सवाल उठ रहे हैं तो उस आदेश की पूरी कहानी देश के सामने आनी चाहिए क्योंकि एसआईआर सिर्फ मतदाता सूची का पुनरीक्षण नहीं है, यह मतदाता के भरोसे का भी पुनरीक्षण है। इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चुनाव आयोग उन सवालों का जवाब देगा जो फाॅर्म-6 से लेकर फाॅर्म-7 तक और साॅफ्टवेयर से लेकर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज तक पहुंच चुके हैं? क्या टाटा अपने नाम से जुड़ी इस नई बहस पर यह साफ करेगा कि चुनावी प्रक्रिया में उसकी वास्तविक भूमिका आखिर थी क्या?
