नौकरी की जंग, सियासत में उमंग?
पुणे में महाराष्ट्र लोकसेवा आयोग (एमपीएससी) के परीक्षार्थियों का आंदोलन अब महज भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक का मुद्दा नहीं रह गया है। पिछले कुछ दिनों में जिस तेजी से इसमें राजनीतिक दलों के नेता शामिल हुए हैं उससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या एमपीएससी आंदोलन महाराष्ट्र की राजनीति में युवा और रोजगार के सवाल को नए सियासी मुद्दे के रूप में स्थापित कर सकता है?
गौरतलब है कि इस आंदोलन की मुख्य मांग एमपीएससी अध्यक्ष विवेक भीमनवार के इस्तीफे की है। इसके अलावा 70 हजार पदों पर भर्ती, परीक्षाओं में पारदर्शिता, ऑनलाइन परीक्षा और कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच जैसी मांगें भी उठ रही हैं। बीते 30 सितम्बर को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की थी। इसके बाद आंदोलन स्थगित हुआ लेकिन मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए छात्र फिर सड़कों पर उतर आए हैं। सरकार ने अब एमपीएससी के कामकाज की न्यायिक जांच के लिए राज्यपाल से सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता में समिति बनाने की सिफारिश की है वहीं एनसीपी (शरद गुट) के विधायक रोहित पवार आंदोलन के प्रमुख चेहरों में हैं। शरद पवार ने मुख्यमंत्री से छात्रों से बातचीत की अपील की है। कांग्रेस के नेताओं ने भी आंदोलन का समर्थन किया है। मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने आंदोलन स्थल पर पहुंचकर रोजगार और सरकारी नौकरियों के सवाल को उठाया तथा युवाओं से जाति-पंथ से ऊपर उठकर एकजुट रहने की अपील की। शिवसेना (यूटीबी) और कांग्रेस के नेता भी आंदोलन में पहुंचे हैं। यही राजनीतिक हस्तक्षेप सत्ता पक्ष के लिए चिंता का कारण भी बन रहा है।
भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया है कि छात्रों के आंदोलन को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। केंद्रीय मंत्री मुरलीधर मोहोल ने रोहित पवार पर छात्रों के आंदोलन का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। पुणे भाजपा ने रोहित पवार की प्रस्तावित बंद की चेतावनी का भी विरोध किया है। पुलिस ने आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारियों, कोचिंग संस्थानों और टेलीग्राम चैनलों को 70 से ज्यादा नोटिस जारी किए हैं और प्रदर्शन को बिना अनुमति का बताया है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि आंदोलन अभी पूरी तरह एकजुट भी नहीं है। पुणे में तीन अलग-अलग स्थानों पर चल रहे प्रदर्शनों की मांगें अलग हैं। एक गुट पुरानी वस्तुनिष्ठ यानी एमसीक्यू परीक्षा व्यवस्था चाहता है जबकि दूसरा 2025 में लागू वर्णनात्मक परीक्षा प्रणाली जारी रखने की मांग कर रहा है। तीसरे गुट के केंद्र में एमपीएससी अध्यक्ष का इस्तीफा और भर्ती प्रक्रिया में सुधार है। इसलिए केवल मौजूदा विवाद को शांत करना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि आयोग की कार्यप्रणाली में बुनियादी बदलाव जरूरी हैं।
एमपीएससी का मुद्दा महाराष्ट्र के उस बड़े युवा वर्ग को जोड़ सकता है जो सरकारी नौकरी को रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जोड़कर देखता है। खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों से आने वाले अभ्यर्थियों के लिए पुणे में वर्षों तक तैयारी करना आर्थिक बोझ बनता जा रहा है। ऐसे में पेपर लीक या परीक्षा में बदलाव का मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि उनके भविष्य से जुड़ा सवाल बन जाता है लेकिन क्या यह आंदोलन स्थायी राजनीतिक जमीन में बदल पाएगा, यह अभी तय नहीं है। आंदोलन के भीतर ही मांगों को लेकर मतभेद हैं और अलग- अलग दल अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे के साथ इसमें पहुंच रहे हैं। यदि छात्र नेतृत्व
राजनीतिक दलों से दूरी रखते हुए परीक्षा, भर्ती और पारदर्शिता जैसे साझा मुद्दों पर आंदोलन को केंद्रित रखता है तो इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है। दूसरी ओर यदि यह सीधे महायुति बनाम महाविकास आघाड़ी की लड़ाई में बदल गया तो इसकी छात्र-आंदोलन वाली पहचान कमजोर पड़ सकती है।
राजनीतिक दलों से दूरी रखते हुए परीक्षा, भर्ती और पारदर्शिता जैसे साझा मुद्दों पर आंदोलन को केंद्रित रखता है तो इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है। दूसरी ओर यदि यह सीधे महायुति बनाम महाविकास आघाड़ी की लड़ाई में बदल गया तो इसकी छात्र-आंदोलन वाली पहचान कमजोर पड़ सकती है।
बहरहाल राजनीतिक एमपीएससी आंदोलन महाराष्ट्र में बेरोजगारी और सरकारी भर्ती को नई राजनीतिक बहस के केंद्र में ला रहा है। आने वाले दिनों में रोहित पवार का प्रस्तावित पुणे बंद, राज ठाकरे की सक्रियता और सरकार की न्यायिक जांच सम्बंधी पहल यह तय करने में अहम होगी कि यह आंदोलन प्रशासनिक सुधार तक सीमित रहता है या महाराष्ट्र की राजनीति में युवाओं के नए राजनीतिक मुद्दे का आधार बनेगा।
