इसरो भी निजीकरण की राह पर

आज जब ‘स्वदेशी’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और राष्ट्रीय क्षमता को मजबूत करने की बात जोर-शोर से की जा रही है, उसी दौर में देश की सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थाओं में से एक ‘इसरो’ के कर्मचारियों को यह सवाल परेशान कर रहा है कि क्या राॅकेट और उपग्रह बनाने जैसी उसकी मूल क्षमताएं धीरे-धीरे निजी कम्पनियों और दूसरे संस्थानों को सौंप दी जाएंगी। सरकार और इसरो इसे निजीकरण नहीं बल्कि स्पेस इकोसिस्टम के विस्तार का नाम दे रहे हैं लेकिन सवाल यह है कि जिस सार्वजनिक संस्थान ने दशकों में देश की अंतरिक्ष क्षमता खड़ी की, उसकी अपनी उत्पादन और तकनीकी क्षमता कितनी बची रहेगी?

भारत में आर्थिक विकास का माॅडल जब आकार ले रहा था, तब प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में देश ने पूरी तरह सरकारी या पूरी तरह निजी अर्थव्यवस्था का रास्ता नहीं चुना था। 1956 की औद्योगिक नीति में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनों के लिए जगह थी लेकिन बुनियादी, रणनीतिक और बड़े निवेश वाले क्षेत्रों में राज्य की प्रमुख भूमिका तय की गई थी। उस नीति का उद्देश्य केवल सरकारी कम्पनियां खड़ी करना नहीं था बल्कि आर्थिक शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण को रोकना और रणनीतिक क्षेत्रों पर सार्वजनिक नियंत्रण बनाए रखना भी था। नेहरू ने उस समय साफ कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र को अर्थव्यवस्था के राजनीतिक बिंदुओं (strategic points) पर नियंत्रण रखना चाहिए जबकि निजी क्षेत्र को दूसरे क्षेत्रों में काम करने का अवसर दिया जाना चाहिए।

इसी आर्थिक सोच के व्यापक संदर्भ में आगे चलकर देश ने भारी उद्योग, इस्पात, ऊर्जा, परिवहन, बैंकिंग, बीमा से लेकर वैज्ञानिक अनुसंधान तक सार्वजनिक संस्थानों का एक बड़ा ढांचा खड़ा किया। अंतरिक्ष कार्यक्रम भी इसी राष्ट्रीय क्षमता निर्माण की सोच का हिस्सा था। आज जिस ‘इसरो’ (इंडियन स्पेस रिसर्च ओर्गनइजेशन ) को दुनिया की अग्रणी अंतरिक्ष एजेंसियों में गिना जाता है, उसके पीछे दशकों का सार्वजनिक निवेश, वैज्ञानिक संस्थानों का निर्माण और सरकारी संसाधनों से विकसित तकनीकी क्षमता है।
अब करीब सात दशक बाद आर्थिक नीति की दिशा काफी बदल चुकी है। मोदी सरकार ने 2020 से अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ाने की नीति अपनाई और 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति ने इस प्रक्रिया को संस्थागत आधार दिया। सरकार का तर्क है कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ाने के लिए केवल इसरो और सरकारी संसाधन पर्याप्त नहीं हैं। निजी कम्पनियों, स्टार्टअप और उद्योग को पूरे अंतरिक्ष के क्षेत्र (space value chain) में शामिल करना जरूरी है। इसरो भी अब यही कह रहा है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी उसकी भूमिका घटाने के लिए नहीं बल्कि उसे गहन रिसर्च, राजनीतिक परियोजनाओं और अगली पीढ़ी की तकनीकों पर ज्यादा ध्यान देने के लिए है लेकिन विवाद यहीं से शुरू होता है।
सितम्बर के पहले सप्ताह में इसरो के नौ कर्मचारी संगठनों ने इसरो चेयरमैन और अंतरिक्ष विभाग के सचिव वी. नारायणन को पत्र लिखकर अंतरिक्ष एजेंसी के भविष्य की भूमिका पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा। इन संगठनों का प्रतिनिधित्व करीब 5,000 कर्मचारियों से जुड़ा बताया गया है। कर्मचारियों की चिंता यह है कि क्या इसरो आगे भी PSLV, LVM3 और SSLV जैसे लॉन्च विहिकल्स के डिजाइन, उनकी रिसर्च, टेस्टिंग तथा लाॅन्च जैसी गतिविधियों में केंद्रीय भूमिका निभाएगा या धीरे-धीरे इन कार्यों से बाहर हो जाएगा।
यह चिंता उस वक्त और बढ़ी जब केंद्र सरकार की एजेंसी ‘इन-स्पेस’ (IN-SPACe) के चेयरमैन पवन गोयनका की 21 अगस्त की टिप्पणी सामने आई कि भविष्य में ‘इसरो’ लाॅन्च विहिकल्स का निर्माण नहीं करेगा और यह काम निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम कर सकते हैं। कर्मचारी संगठनों ने इसी टिप्पणी को आधार बनाकर पूछा है कि क्या यह केवल एक विचार है या सरकार की स्वीकृत नीति? उनका कहना है कि निजी भागीदारी का विरोध नहीं है लेकिन ऐसा मॉडल स्वीकार्य नहीं हो सकता जिसमें ‘इसरो’ केवल रिसर्च करने वाली संस्था बनकर रह जाए और देश के प्रमुख लॉन्च विहिकल्स तथा लाॅन्च इन्फ्रास्ट्रक्चर की वास्तविक क्षमता सार्वजनिक हाथों से बाहर चली जाए।
सरकार और इसरो का जवाब है कि उसके निजीकरण की बातें पूर्णतः भ्रामक और बेबुनियाद हैं। ‘इसरो’ की मानें तो वह स्पेस रिसर्च, तकनीक विकास, राष्ट्रीय और खासकर देश की सुरक्षा से जुड़े अभियानों, अंतरिक्ष विज्ञान आदि की प्रमुख संस्था बनी रहेगी। उसके मुताबिक पहले से विकसित तकनीक को निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा बड़े पैमाने पर बनाया जाना इसरो की भूमिका खत्म करना नहीं है बल्कि उसे अगली पीढ़ी की तकनीकों पर केंद्रित करना है। यानी तकनीकी तौर पर सरकार का मॉडल ‘इसरो’ का निजीकरण नहीं बल्कि ‘इसरो के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय अंतरिक्ष इकोसिस्टम’ तैयार करना है। फर्क महत्वपूर्ण है। सवाल यह नहीं है कि कल इसरो किसी निजी कम्पनी को बेच दिया जाएगा। ऐसा कोई सरकारी फैसला अभी सामने नहीं है। सवाल यह है कि सरकारी संस्थान की कौन-कौन सी क्षमताएं भविष्य में उसके पास रहेंगी और कौन सी क्षमताएं निजी कम्पनियों अथवा सार्वजनिक क्षेत्र को हस्तांतरित की जाएगी?
यहीं नेहरू के दौर की आर्थिक सोच से आज की नीति की तुलना दिलचस्प हो जाती है। 1956 की औद्योगिक नीति ने निजी क्षेत्र को पूरी तरह खारिज नहीं किया था बल्कि नेहरू ने खुद कहा था कि निजी क्षेत्र को उसके क्षेत्र में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए लेकिन रणनीतिक और बुनियादी क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख भूमिका होनी चाहिए और आर्थिक शक्ति कुछ हाथों में केंद्रित नहीं होनी चाहिए।
आज की नीति इसके उलट नहीं तो कम से कम अलग जरूर है। सरकार निजी पूंजी, निजी तकनीक और निजी निर्माण क्षमता को देश की राजनीतिक और उच्च तकनीकी क्षमता के विस्तार का माध्यम मान रही है। अंतरिक्ष क्षेत्र में इसका परिणाम यह है कि ‘इसरो’ द्वारा विकसित की जा चुकी तकनीकों को इंडस्ट्री तक पहुंचाया जा रहा है। पीएसएलवी के उत्पादन में एचएएल और एल एंड टी का संयुक्त उपक्रम आगे आया है और एसएसएलवी की तकनीक भी एचएएल को हस्तांतरित की जा चुकी है।
अब अंतरिक्ष में भी अडानी की छलांग?
देश में शायद ही कोई ऐसा बड़ा आर्थिक क्षेत्र बचा हो जहां अडानी समूह की मौजूदगी दिखाई न देती हो। बंदरगाहों से लेकर हवाई अड्डों तक, बिजली से लेकर नवीकरणीय ऊर्जा तक और रक्षा क्षेत्र से लेकर बुनियादी ढांचे तक अडानी समूह का विस्तार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से हुआ है। अब अंतरिक्ष का क्षेत्र भी उसकी महत्वाकांक्षाओं के दायरे में दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि इसरो की उत्पादन क्षमताओं को निजी क्षेत्र के लिए खोलने की मौजूदा नीति के बीच एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या आने वाले दिनों में अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी अडानी समूह एक प्रमुख खिलाड़ी बनने जा रहा है?
अडानी समूह की अंतरिक्ष क्षेत्र में मौजूदगी केवल भविष्य की अटकल नहीं है। समूह की रक्षा और एयरोस्पेस कम्पनी अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस पहले ही अंतरिक्ष से जुड़ी गतिविधियों में कदम रख चुकी है। समूह ने उपग्रह आधारित संचार और रक्षा क्षेत्र से जुड़ी क्षमताओं को विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया है। अडानी समूह ने अंतरिक्ष और रक्षा तकनीक से जुड़े क्षेत्र में निवेश तथा साझेदारियों के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश की है। यानी अंतरिक्ष क्षेत्र उसके लिए अब केवल दूर की सम्भावना नहीं बल्कि कारोबारी विस्तार का अगला महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है।

अगस्त 2026 में इसरो के भारी प्रक्षेपण यान एलवीएम-3 की तकनीक को उद्योग तक पहुंचाने की सम्भावनाओं को लेकर जिन बड़े औद्योगिक समूहों के नाम सामने आए, उनमें अडानी समूह का नाम भी शामिल था। इसके साथ लार्सन एंड टुब्रो, जेएसडब्ल्यू और महिंद्रा जैसे बड़े कारोबारी समूहों के नाम भी चर्चा में आए हैं।
अडानी समूह के आलोचक इसी बिंदु को लेकर आशंका जताते हैं। उनका तर्क है कि देश के लगभग हर बड़े बुनियादी और रणनीतिक क्षेत्र में कुछ चुनिंदा बड़े कारोबारी समूहों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यदि अंतरिक्ष क्षेत्र में भी बड़े औद्योगिक घरानों को सरकारी संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों और उत्पादन क्षमताओं तक व्यापक पहुंच मिलती है तो बाजार में प्रतिस्पर्धा और तकनीकी क्षमताओं के अत्यधिक केंद्रीकरण का सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि दूसरी तरफ एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है। अंतरिक्ष क्षेत्र में केवल अडानी समूह ही प्रवेश नहीं कर रहा।

अग्निकुल काॅसमाॅस, स्काई रूट एयरोस्पेस, पिक्सल, ध्रुव स्पेस, बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस, दिगंतरा और कई दूसरी नई कम्पनियां भी अंतरिक्ष तकनीक के अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही हैं। सरकार का तर्क है कि इन कम्पनियों और बड़े उद्योगों की भागीदारी से भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी और देश वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में बड़ी भूमिका निभा सकेगा।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि अडानी को अंतरिक्ष क्षेत्र में आने दिया जाना चाहिए या नहीं। सवाल इससे बड़ा है कि क्या अंतरिक्ष जैसी रणनीतिक क्षमता के विस्तार का लाभ व्यापक भारतीय उद्योग और नई तकनीकी कम्पनियों को समान अवसर के साथ मिलेगा या फिर यह क्षेत्र भी धीरे-धीरे कुछ बड़े कारोबारी समूहों के प्रभुत्व वाला क्षेत्र बन जाएगा?

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