झाड़ियों में दफन महाराज का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’

विश्व ख्याति प्राप्त जिम काॅर्बेट नेशनल पार्क के निकट 5 करोड़ से अधिक की लागत से तैयार कन्वेंशन सेंटर चार साल आठ महीनों से बंद है। 800 लोगों की क्षमता, एसी हाॅल, आधुनिक स्टेज, साउंड सिस्टम, प्रोजेक्टर तथा लाखों के उपकरण धूल- सीलन की भेंट चढ़ चुके हैं और पूरा परिसर झाड़ियों में तब्दील है। जिस प्रोजेक्ट को पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने अपना ड्रीम प्रोजेक्ट करार दिया था, अब उसी को पीपीपी मोड पर निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की है। सवाल यह कि करोड़ों खर्च करने के बाद वर्षों तक इसे चलाने और सम्भालने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी?

कुमाऊं-गढ़वाल के प्रवेश द्वार और पर्यटन नगरी के रूप में पहचान रखने वाले रामनगर में सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला साफ दिखाई देता है। उत्तराखण्ड पर्यटन विकास परिषद की केंद्र वित्त पोषित योजना के तहत पांच करोड़ रुपए से अधिक की लागत से तैयार किया गया भव्य कन्वेंशन सेंटर आज लावारिस हालत में पड़ा है। चारों तरफ पांच से छह फीट ऊंची झाड़ियां उग चुकी हैं, मुख्य गेट पर जंक लगा, ताला लटका है और करोड़ों रुपए की लागत से तैयार भवन तथा उसमें लगाए गए महंगे उपकरण लम्बे समय से बंद पड़े हैं। इस कन्वेंशन सेंटर का लोकार्पण 13 जनवरी 2021 को प्रदेश के पर्यटन, धर्मस्व एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज ने किया था और उस समय इसे उन्होंने अपना ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ बताते हुए रामनगर के विकास में मील का पत्थर करार दिया था।

लोकार्पण के समय दिखाए गए थे बड़े सपने
13 जनवरी 2021 को लोकार्पण के दौरान इस परियोजना को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे। कहा गया था कि कन्वेंशन सेंटर रामनगर का कायाकल्प करेगा। यहां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े आयोजन होंगे, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और गरीब तथा मध्यम वर्ग के लोगों को शादी-समारोह और अन्य आयोजनों के लिए सस्ते दाम पर आधुनिक सुविधा उपलब्ध होगी। उस समय लोगों को उम्मीद थी कि वर्षों से बड़े आयोजन स्थल की कमी से जूझ रहे रामनगर को एक ऐसी सुविधा मिल गई है, जिसका लाभ आम जनता से लेकर पर्यटन कारोबार तक को मिलेगा लेकिन 13 जनवरी 2021 से लेकर सितम्बर 2026 तक करीब चार साल आठ महीने का लम्बा समय बीत चुका है और यह ड्रीम प्रोजेक्ट नियमित रूप से आम जनता के उपयोग में नहीं आ सका। जिस परिसर में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजन होने थे, वहां अब सन्नाटा है। मुख्य गेट पर ताला है और चारों ओर उगी झाड़ियां इस परियोजना की मौजूदा स्थिति की कहानी खुद कह रही हैं।

रामनगर में बड़े आयोजन स्थल की थी जरूरत
रामनगर को यूं ही उत्तराखण्ड की पर्यटन नगरी नहीं कहा जाता। यहां विश्व प्रसिद्ध जिम काॅर्बेट नेशनल पार्क है जहां हर साल बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं। वन्यजीव और पर्यटन से जुड़े शोध, सेमिनार, योग महोत्सव, फिल्म फेस्टिवल, सांस्कृतिक कार्यक्रम, साहित्यिक आयोजन और फिल्म शूटिंग से जुड़े कार्यक्रम यहां होते रहते हैं। इसके बावजूद रामनगर की एक बड़ी समस्या यह थी कि यहां 500 से 1000 लोगों की क्षमता वाला कोई बड़ा और आधुनिक हाॅल नहीं था।

शादी-समारोह, सरकारी कार्यक्रम और बड़े आयोजनों के लिए लोगों को या तो हल्द्वानी अथवा देहरादून जाना पड़ता था या फिर रामनगर के निजी होटल और रिजाॅर्ट का सहारा लेना पड़ता था। स्थानीय लोगों के अनुसार निजी स्थानों पर बड़े आयोजनों के लिए डेढ़ से दो लाख रुपए तक का किराया चुकाना पड़ता था। इसी कमी को दूर करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार की वित्त पोषित योजना के तहत उत्तराखण्ड पर्यटन विकास परिषद को इस
कन्वेंशन सेंटर के लिए धन उपलब्ध कराया गया।

2012-13 में शुरू हुआ निर्माण, 2021 में मिला जनता को
सांवल्दे क्षेत्र में सिंचाई विभाग की बड़ी जमीन पर इस कन्वेंशन सेंटर का निर्माण कराया गया। इसका निर्माण कार्य वर्ष 2012-13 में शुरू हुआ था और कई वर्षों तक धीरे-धीरे चलता रहा। आखिरकार वर्ष 2021 में भवन बनकर तैयार हुआ और 13 जनवरी 2021 को पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने फीता काटकर इसे जनता को समर्पित किया।

इस कन्वेंशन सेंटर में करीब 800 लोगों की क्षमता वाला एयरकंडीशन मुख्य हाॅल, बड़ा और आधुनिक स्टेज, दो वीआईपी ग्रीन रूम, वीआईपी लाउंज, साउंड प्रूफ सिस्टम, आधुनिक प्रोजेक्टर और अत्याधुनिक लाइटिंग सिस्टम जैसी सुविधाएं तैयार की गई थीं। इसके अलावा 100 से अधिक वाहनों के लिए बड़ी पार्किंग, कैंटीन और आधुनिक बाथरूम जैसी सुविधाएं भी बनाई गई थीं। उस समय इसे पूरे कुमाऊं मंडल का सबसे आधुनिक और सबसे बड़ा कन्वेंशन सेंटर बताया गया था।

लोकार्पण के दिन पूरे शहर में इस परियोजना को लेकर उत्साह था। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे। पर्यटन मंत्री ने इसे अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बताते हुए कहा था कि यह रामनगर के विकास में मील का पत्थर साबित होगा। बड़े आयोजनों और पर्यटन गतिविधियों के लिए इसकी उपयोगिता को लेकर भी दावे किए गए थे। मीडिया में इस कार्यक्रम की खबरें और तस्वीरें प्रमुखता से प्रकाशित हुई थीं लेकिन लोकार्पण के बाद जिस परियोजना को लगातार सक्रिय रहना चाहिए था, वह धीरे-धीरे बंद होती चली गई।

चार साल में नहीं बन सकी संचालन की व्यवस्था
सवाल यह है कि जिस परियोजना को पर्यटन मंत्री स्वयं अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बता रहे थे, उसे नियमित रूप से संचालित करने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? पर्यटन विभाग ने इसकी बुकिंग प्रक्रिया को आम लोगों के लिए कितना सरल बनाया? क्या इसके संचालन के लिए पर्याप्त कर्मचारी तैनात किए गए? क्या इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया? सबसे महत्वपूर्ण, करोड़ों रुपए की इस सरकारी सम्पत्ति के रखरखाव और सुरक्षा की जिम्मेदारी किस अधिकारी या संस्था की थी? लम्बे समय तक भवन बंद रहने के कारण इसकी हालत लगातार खराब होती गई। परिसर में पांच से छह फीट ऊंची घनी झाड़ियां और घास उग आईं। मुख्य गेट तक पहुंचने का रास्ता भी झाड़ियों से प्रभावित हो गया। बाहर से देखने पर यह भवन किसी लम्बे समय से वीरान पड़ी इमारत जैसा दिखाई देने लगा है।

महंगे उपकरण और फर्नीचर भी बदहाली की चपेट में
मुख्य हाॅल में रखी महंगी कुर्सियों पर धूल की मोटी परत जम गई है और कई कुर्सियों के हत्थे गायब बताए गए हैं। स्टेज की लकड़ी सीलन के कारण खराब होने की बात कही जा रही है। दीवारों पर दरारें और सीलन के निशान दिखाई देने तथा पेंट उखड़ने की शिकायतें भी सामने आई हैं। कई स्थानों पर छत से पानी टपकने की बात भी स्थानीय लोगों ने कही है।

साउंड सिस्टम, प्रोजेक्टर, एसी और आधुनिक लाइटिंग सिस्टम जैसे महंगे उपकरण भी लम्बे समय तक इस्तेमाल और रखरखाव के अभाव में खराब होने की स्थिति में बताए जा रहे हैं। बाथरूम के दरवाजे टूटे होने और नलों में पानी की व्यवस्था नहीं होने की शिकायत भी सामने आई है। पूरे परिसर में कूड़ा जमा होने और शाम होते ही अंधेरा छा जाने की बात स्थानीय लोग बताते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले करीब तीन वर्षों से यहां कोई नियमित चैकीदार तक तैनात नहीं किया गया। उनका कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होने के कारण आवारा जानवर और असामाजिक तत्व परिसर में पहुंचते रहते हैं तथा रात के समय नशेड़ियों का जमावड़ा भी देखने को मिलता है। इन शिकायतों की विभागीय स्तर पर जांच की जानी जरूरी है ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

कोविड काल में क्वारंटाइन सेंटर बना, फिर दोबारा बंद
कोविड-19 महामारी के दौरान जब क्वारंटाइन सेंटरों की जरूरत पड़ी तो जिला प्रशासन को इस बंद पड़े भवन की याद आई। इसे आनन-फानन में क्वारंटाइन सेंटर घोषित किया गया। यहां कुछ बेड डाले गए और
ऑक्सीजन व्यवस्था की बात कही गई लेकिन स्थानीय स्तर पर उस समय भी व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठे। कोविड काल समाप्त होते ही भवन दोबारा बंद हो गया और इसे नियमित रूप से जनता के इस्तेमाल में लाने की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं बन सकी।

रखरखाव के बजट का हिसाब भी जरूरी
सबसे बड़ा सवाल अब पर्यटन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। पर्यटन विभाग को सरकारी सम्पत्तियों के रखरखाव के लिए हर साल बजट मिलता है। ऐसे में सवाल है कि वर्ष 2021 से अब तक इस कन्वेंशन सेंटर के रखरखाव, सुरक्षा, सफाई और उपकरणों की देखरेख पर कितना पैसा खर्च किया गया? यदि रखरखाव के लिए धन खर्च किया गया तो भवन की मौजूदा हालत उस खर्च की कहानी क्यों नहीं कहती?

स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि रखरखाव केवल कागजों तक सीमित रहा और जमीन पर पर्याप्त काम नहीं हुआ। इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है लेकिन सरकार और पर्यटन विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि लोकार्पण के बाद से अब तक इस सम्पत्ति के रखरखाव के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ और वास्तव में कितना खर्च किया गया। समय रहते यदि भवन की नियमित सफाई, रंग-रोगन, बिजली व्यवस्था, उपकरणों की सर्विसिंग, जल निकासी और सुरक्षा पर ध्यान दिया जाता तो आज जिस बड़े खर्च की आशंका जताई जा रही है, उसकी जरूरत शायद नहीं पड़ती। करोड़ों रुपए की सरकारी सम्पत्ति को वर्षों तक बंद रखने से उसकी उपयोगिता के साथ-साथ सार्वजनिक धन की सुरक्षा पर भी सवाल उठते हैं।

अब निजी हाथों में सौंपने की तैयारी
लम्बे समय तक लावारिस पड़े रहने के बाद अब पर्यटन विभाग की नींद खुलती दिखाई दे रही है। विभाग की ओर से इसे निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की बात सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि इसे पीपीपी मोड पर किसी निजी कम्पनी को संचालन के लिए दिया जाएगा और इसके लिए टेंडर जारी किए जाने की तैयारी है।
स्थानीय लोगों का सवाल है कि जिस भवन को सरकार चार साल से अधिक समय में नियमित रूप से नहीं चला पाई, उसे कोई निजी कम्पनी मौजूदा खस्ता हालत में किस शर्त पर लेगी? इसे दोबारा उपयोग योग्य बनाने और आधुनिक सुविधाओं को बहाल करने में कितना खर्च आएगा? स्थानीय स्तर पर भवन की मरम्मत और नवीनीकरण के लिए दो से तीन करोड़ रुपए तक अतिरिक्त खर्च आने का अनुमान लगाया जा रहा है। यदि इतना अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। क्या सरकार पहले सरकारी धन से इसे दुरुस्त करेगी और फिर निजी कम्पनी को संचालन सौंपेगी, या निजी संचालक को ही मरम्मत की जिम्मेदारी दी जाएगी? पीपीपी की शर्तों में आम जनता के लिए किराया, संचालन की अवधि और सरकार को मिलने वाले राजस्व का प्रावधान क्या होगा, यह भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

पांच करोड़ की सम्पत्ति, जवाबदेही किसकी?
स्थानीय लोगों को आशंका है कि कहीं पीपीपी के नाम पर करोड़ों रुपए की सरकारी सम्पत्ति किसी चहेते कारोबारी को औने-पौने दाम पर सौंपने का रास्ता न खुल जाए। ऐसे में सरकार के लिए जरूरी होगा कि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रखी जाए और सम्पत्ति का स्वतंत्र मूल्यांकन, टेंडर की शर्तें, चयन प्रक्रिया, संचालन अवधि, मरम्मत की जिम्मेदारी तथा सरकार को मिलने वाले राजस्व की जानकारी सार्वजनिक की जाए।
आखिर यह पांच करोड़ रुपए से अधिक की लागत से तैयार सम्पत्ति जनता के टैक्स के पैसे से बनी है। इसका उद्देश्य रामनगर में पर्यटन और बड़े आयोजनों को बढ़ावा देना था, न कि इसे वर्षों तक बंद रखकर जर्जर होने देना। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकार खुद इसका संचालन नहीं कर पा रही है तो निजी क्षेत्र को संचालन देने में भी जनता के हित और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

फिलहाल सांवल्दे में खड़ा यह कन्वेंशन सेंटर रामनगर में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का सबसे बड़ा अंतर दिखा रहा है। जिस परियोजना को कभी पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ बताया गया था, वही परियोजना आज झाड़ियों के बीच खड़ी है। पांच करोड़ रुपए से अधिक की लागत, वर्षों का निर्माण, 800 लोगों की क्षमता वाला आधुनिक हाॅल, महंगे उपकरण और लोकार्पण के समय किए गए बड़े-बड़े दावे, इन सबके बावजूद यदि चार साल आठ महीने बाद भी भवन के मुख्य गेट पर ताला लटका है तो सवाल सिर्फ एक इमारत की बदहाली का नहीं है। सवाल यह है कि जनता के करोड़ों रुपए से तैयार इस ड्रीम प्रोजेक्ट को वर्षों तक लावारिस छोड़ने की जवाबदेही आखिर तय किसकी होगी?

बात अपनी-अपनी

भाजपा की डबल इंजन की सरकार सिर्फ बातें करती है, काम जीरो है। रामनगर के सांवल्दे में कांग्रेस सरकार के समय 5 करोड़ की लागत से बना कन्वेंशन सेंटर आज भाजपा राज में बद से बदतर हालत में है। स्थानीय लोग बता रहे हैं कि वहां कोई चैकीदार नहीं है, असामाजिक तत्व और नशेड़ी रात में डेरा जमाते हैं और अंदर का सामान तक निकाल कर ले जा रहे हैं। ये सालों से लावारिस पड़ा है, करोड़ों का सामान सड़ रहा है किसी मंत्री की निजी जागीर नहीं। मैं सरकार से मांग करता हूं कि तुरंत सम्बंधित विभाग को निर्देश दें, इस कन्वेंशन सेंटर की मरम्मत कराकर इसे जनता को समर्पित करे, नहीं तो कांग्रेस सड़कों पर उतर कर आंदोलन करेगी।
पुष्कर दुर्गापाल, पूर्व दर्जा राज्यमंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता

रामनगर सांवल्दे स्थित कन्वेंशन सेंटर को लेकर शासन स्तर से प्रक्रिया चल रही है। इसे पीपीपी मोड पर संचालित करने के लिए टेंडर की कार्रवाई गतिमान है। टेंडर प्रक्रिया पूरी होते ही इसे जल्द ही स्थानीय जनता को समर्पित कर दिया जाएगा और बुकिंग प्रक्रिया भी सरल की जाएगी।
कृति आर्या, जिला पर्यटन अधिकारी

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