गठबंधन से बदलेगा सियासी गणित?

गोवा में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी और गोवा फाॅरवर्ड पार्टी के ‘गोवा फर्स्ट’ गठबंधन ने सियासी समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। दोनों दलों ने भाजपा और कांग्रेस से अलग राजनीतिक विकल्प पेश करने का ऐलान किया है। गठबंधन ने समान विचारधारा वाले दूसरे दलों के लिए भी दरवाजा खुला रखा है। इसके बाद से मीडिया, सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या कांग्रेस अलग-थलग पड़ेगी? क्या कोई और क्षेत्रीय दल इस मोर्चे में आएगा? क्या भाजपा विरोधी वोटों का नया ध्रुवीकरण सम्भव है? सबसे बड़ा सवाल क्या इस गठबंधन से गोवा का  सियासी गणित बदलेगा? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यह गठबंधन कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है। गोवा फाॅरवर्ड पार्टी के विजय सरदेसाई पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर बातचीत कर रहे थे लेकिन दलबदल के सवालों और अन्य मतभेदों के कारण बात आगे नहीं बढ़ सकी। अब आप के साथ हाथ मिलाने से कांग्रेस के सामने विपक्षी एकता की चुनौती खड़ी हो गई है तो ‘गोवा फस्र्ट’ की असली परीक्षा सीटों के बंटवारे और जमीनी संगठन को लेकर होगी। आप का राज्य में अपना आधार है जबकि ‘जीएफपी’ की क्षेत्रीय पहचान और विजय सरदेसाई की राजनीतिक पकड़ गठबंधन को स्थानीय मुद्दों से जोड़ सकती है लेकिन क्या दोनों दल अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों से बाहर भी वोट खींच पाएंगे यह बड़ा सवाल है। दूसरी ओर भाजपा के सामने भी इस गठबंधन को हल्के में लेने का जोखिम नहीं होगा। 2022 में भाजपा ने 40 में से 20 सीटें जीती थीं जबकि कांग्रेस को 11 सीटें मिली थीं। बाद में कांग्रेस के आठ विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे। ऐसे में आप और जीएफपी गठबंधन का दावा है कि वह भाजपा और कांग्रेस दोनों के विकल्प के रूप में उभरना चाहता है। ‘गोवा फर्स्ट’ अगर गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस वोटों को एकजुट कर पाया तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है लेकिन यदि कांग्रेस भी अपना संगठन मजबूत कर लेती है तो यह गठबंधन भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे का कारण भी बन सकता है।

क्या है कांग्रेस-भाजपा की रणनीति?

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं आम आदमी पार्टी को घेरने के लिए भाजपा और कांग्रेस ने अपराध, भ्रष्टाचार और नशे को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम शुरू किया है। साथ ही अकाली दल का अगला कदम भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भाजपा अकेले मैदान में उतरेगी या अकाली दल के साथ फिर कोई नया समीकरण बनेगा? आप के खिलाफ कांग्रेस और भाजपा की रणनीति क्या होगी? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा-कांग्रेस की रणनीति भी साफ होती दिखाई दे रही है। कांग्रेस की चुनौती भाजपा से ज्यादा आप विरोधी वोटों को अपने पक्ष में एकजुट करने की है तो भाजपा की 18 सितम्बर से चार यात्राएं राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों तक पहुंचने वाली हैं। भाजपा की कोशिश इस बार केवल शहरी इलाकों तक सीमित रहने की नहीं बल्कि गांवों और युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की है। ऐसे में इसे भाजपा के चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है वहीं कांग्रेस ने भी आप के खिलाफ मोर्चा मजबूत करने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी ने पंजाब में अंदरूनी मतभेदों को साधने के लिए सचिन पायलट को जिम्मेदारी दी है और संकेत दिया है कि वह चुनाव मुख्यमंत्री के घोषित चेहरे के बजाय सामूहिक नेतृत्व में लड़ेगी। फिलहाल भाजपा में अकेले चुनाव लड़ने की आवाज मजबूत बताई जा रही है जबकि अकाली दल भी अपना संगठन और चुनावी एजेंडा तैयार कर रहा है। बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस और भाजपा आप को चुनौती देकर मुकाबला त्रिकोणीय बनाएंगी या चुनाव से पहले कोई नया गठजोड़ पूरा गणित बदल देगा?

किसका कटेगा पत्ता, किसे मिलेगा मौका?

उत्तराखण्ड की राजनीति में इन दिनों एक ओर जहां पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पार्टी के दोनों पदों से इस्तीफा देने के बाद सियासी हलचल तेज है वहीं आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियां अब संगठन से निकलकर सम्भावित उम्मीदवारों की दौड़ तक पहुंचती दिखाई दे रही हैं। भाजपा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में चुनावी तैयारी तेज कर दी है। हाल में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की मौजूदगी में हुई संगठनात्मक बैठकों में विधायकों के प्रदर्शन और चुनावी तैयारियों की समीक्षा ने टिकट के दावेदारों के बीच हलचल बढ़ा दी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा इस बार केवल मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन को ही टिकट का आधार नहीं बनाएगी बल्कि जीत की सम्भावना क्षेत्र में सक्रियता, संगठन से तालमेल और जनता के बीच छवि जैसे पैमानों पर भी उम्मीदवारों को परखा जा सकता है। पार्टी में युवा और नए चेहरों को मौका देने की चर्चा पहले से है। ऐसे में कुछ मौजूदा विधायकों के टिकट पर भी सवाल उठने लगे हैं। इस मामले में कांग्रेस भी पीछे नहीं है। पार्टी ने विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को सक्रिय करने के साथ भाजपा सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने की रणनीति अपनाई है। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने नेताओं और कार्यकर्ताओं को सरकार के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाने का संदेश दिया है। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रस्तावित गतिविधियों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि कांग्रेस में चुनौती गुटीय संतुलन और मजबूत दावेदारों के चयन की होगी जबकि भाजपा में सवाल मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन और नए चेहरों के बीच संतुलन का है। आने वाले महीनों में टिकट की लड़ाई चुनाव से पहले ही कई सीटों पर असली सियासी मुकाबला तय कर देगी कि किसका पत्ता कटेगा और किसे मौका मिलेगा, जिस पर अभी से सभी की निगाहें टिक गई हैं और भाजपा- कांग्रेस के विधायकों की धड़कने धुक-धुक करने लगी हैं।

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