देश में राजनीतिक दल के नाम पर पंजीकृत हजारों संस्थाओं में कुछ ऐसी भी हैं जो चुनावी मैदान में नजर नहीं आती हैं लेकिन उनके खातों में सैकड़ों करोड़ रुपए का चंदा पहुंच जाता है। गत् दिनों ‘बीबीसी’ ने एक सनसनीखेज समाचार प्रकाशित किया है जिसमें ऐसा सच सामने आया है जिसने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और पूरे सिस्टम पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पड़ताल के अनुसार किसी अंजान पार्टी को 620 करोड़ रुपए मिले तो किसी को 330 करोड़ लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में इन दलों ने मिलकर सिर्फ 15 उम्मीदवार उतारे। बंद कार्यालयों, चंदे और खर्च के अस्पष्ट हिसाब तथा आयकर विभाग की संदिग्ध राजनीतिक चंदे पर कार्रवाई के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन पार्टियों के पीछे पैसा किसका है और इतनी बड़ी रकम की निगरानी करने वाली व्यवस्था इतने वर्षों तक क्या करती रही?
भारत में राजनीतिक दल बनाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। चुनाव आयोग के पास पंजीकृत राजनीतिक दलों की संख्या 2800 से ज्यादा है लेकिन इनमें केवल 73 दलों को राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त है। बाकी दल पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल हैं। इनमें से अधिकांश छोटे संगठन हैं और उनका चुनावी प्रभाव सीमित है। बीबीसी की 4 सितम्बर 2026 को प्रकाशित पड़ताल ने ऐसे छह दलों की वित्तीय तस्वीर सामने रखी है, जिनकी चुनावी गतिविधि लगभग शून्य होने के बावजूद 2023-24 में उनके पास सैकड़ों करोड़ रुपए का चंदा पहुंचा। बीबीसी की करीब दो महीने चली पड़ताल में गुजरात, दिल्ली और पटना तक जाकर इन पार्टियों के कार्यालयों, पदाधिकारियों और वित्तीय गतिविधियों की पड़ताल की गई। इस पड़ताल से सबसे बड़ा सवाल
राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता को लेकर सामने आया है।
बीबीसी के अनुसार इन छह पार्टियों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल केवल 15 उम्मीदवार उतारे थे। दूसरी तरफ 2023-24 में इनकी कुल आय भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर बाकी पांच राष्ट्रीय दलों की कुल आय से भी अधिक थी। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनावी राजनीति में किसी दल की सक्रियता और उसकी वित्तीय ताकत के बीच इतना बड़ा फर्क सामान्य राजनीतिक गतिविधि के लिहाज से असामान्य है।
उम्मीदवार एक, चंदा छह सौ करोड़
इन छह दलों में सबसे ज्यादा चंदा आम जनमत पार्टी को मिला। चुनाव आयोग को दिए गए रिकाॅर्ड के मुताबिक 2020 में पटना में बनी इस पार्टी को शुरुआती दो वर्षों में 20 हजार रुपए से ज्यादा का कोई चंदा नहीं मिला था लेकिन 2022-23 में अचानक पार्टी को करीब 216 करोड़ रुपए का चंदा मिला और 2023-24 में यह रकम बढ़कर करीब 620 करोड़ रुपए हो गई। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने सिर्फ एक उम्मीदवार उतारा।
यहां सवाल सिर्फ चंदे की रकम का नहीं है। किसी राजनीतिक दल के लिए बड़ी रकम जुटाना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है और चुनाव लड़ना भी उसकी एकमात्र राजनीतिक गतिविधि नहीं हो सकती लेकिन जब किसी पार्टी को दो साल में लगभग कोई बड़ा चंदा नहीं मिलता और उसके बाद अचानक सैकड़ों करोड़ रुपए मिलने लगते हैं जबकि उसकी चुनावी सक्रियता एक उम्मीदवार तक सीमित रहती है तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि पैसा कहां से आया, किसने दिया और उसका इस्तेमाल किस तरह किया गया।
बीबीसी ने पटना में पार्टी की संस्थापक अध्यक्ष अनामिका पासवान से बातचीत की। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने 2022 में ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। उनके पति ने उनका इस्तीफा पत्र और ऐसा दस्तावेज दिखाया जिसमें पार्टी का आधार पटना से अहमदाबाद ले जाने और गौरव मिश्रा को अध्यक्ष बनाए जाने की बात कही गई थी लेकिन अहमदाबाद में पार्टी का पंजीकृत कार्यालय बंद मिला। पार्टी के कोषाध्यक्ष धर्मेंद्र वैष्णव ने बीबीसी से कहा कि उन्होंने कामकाज बंद कर दिया था जबकि रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी के बैंक खाते में अभी भी चंदा भेजा जा सकता था। पार्टी के वित्तीय मामलों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने जानकारी होने से इनकार किया और सभी सवाल गौरव मिश्रा से पूछने को कहा। गौरव मिश्रा ने बीबीसी के फोन और संदेशों का जवाब नहीं दिया।
आम जनमत पार्टी का मामला राजनीतिक दृष्टि से इसलिए भी चर्चा में आता है क्योंकि उसकी संस्थापक अध्यक्ष अनामिका पासवान बाद में भाजपा की बिहार प्रदेश उपाध्यक्ष बनीं। उन्होंने बीबीसी को स्पष्ट किया कि उन्होंने आम जनमत पार्टी से 2022 में ही इस्तीफा दे दिया था। केवल इस तथ्य से किसी तरह की वित्तीय अनियमितता या राजनीतिक सम्बंध साबित नहीं होता लेकिन पार्टी की संस्थापक के बाद में एक बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक दल में महत्वपूर्ण पद पर पहुंचने के कारण इस पूरे घटनाक्रम की समयरेखा और पार्टी की वित्तीय गतिविधियां राजनीतिक जांच का विषय जरूर बनती हैं।
चुनाव आयोग के रिकाॅर्ड में इन छह पार्टियों में से किसी के भाजपा में विलय की पुष्टि नहीं मिलती। इसलिए आम जनमत पार्टी का भाजपा में विलय हो गया, ऐसा कहना सही नहीं होगा। मामला फिलहाल इतना है कि पार्टी की पूर्व संस्थापक बाद में भाजपा की प्रदेश पदाधिकारी बनीं। दोनों घटनाओं के बीच कोई वित्तीय या संगठनात्मक सम्बंध था या नहीं, इसका सार्वजनिक प्रमाण अभी तक सामने नहीं आया है।
330 करोड़ का चंदा और बंद कार्यालय
सत्यवादी रक्षक पार्टी का मामला भी कम चैंकाने वाला नहीं है। बीबीसी के अनुसार 2023-24 में इस पार्टी को करीब 330 करोड़ रुपए का चंदा मिला लेकिन गुजरात के आनंद शहर में पार्टी का पंजीकृत कार्यालय एक फ्लैट में मिला, जिसके दरवाजे पर ताला लगा था। वहां न कोई बोर्ड था और न ऐसा कोई संकेत जिससे यह आसानी से पता चल सके कि यह वास्तव में राजनीतिक दल का कार्यालय है। पार्टी अध्यक्ष स्वाति बेन उसी परिसर के दूसरे फ्लैट में रहती हैं।
इतनी बड़ी रकम प्राप्त करने वाली इस पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक उम्मीदवार उतारा। पार्टी की आॅडिट रिपोर्ट के अनुसार उसने चुनाव प्रचार पर 8.48 करोड़ रुपए खर्च किए जबकि 316 करोड़ रुपए जनकल्याण के नाम पर खर्च किए जाने का दावा किया गया। बीबीसी ने जब इस खर्च का विवरण मांगा तो पार्टी अध्यक्ष स्वातीबेन ने कहा कि पैसा चैरिटी के काम में खर्च किया गया लेकिन उसका कोई रिकाॅर्ड नहीं रखा गया है।
सवाल यह है कि अगर किसी राजनीतिक दल को 330 करोड़ रुपए का चंदा मिलता है और वह उसमें से 316 करोड़ रुपए जनकल्याण के नाम पर खर्च करता है तो उस खर्च का विस्तृत और सत्यापन योग्य रिकाॅर्ड क्यों नहीं होना चाहिए। राजनीतिक दलों को सामाजिक कार्य करने से कोई रोक नहीं है लेकिन सैकड़ों करोड़ रुपए के खर्च को केवल मौखिक दावे के आधार पर छोड़ देना वित्तीय पारदर्शिता के लिहाज से गम्भीर सवाल खड़ा करता है।
138 करोड़ वाली गरीब कल्याण पार्टी का कार्यालय भी बंद
‘गरीब कल्याण पार्टी’ को 2023-24 में करीब 138 करोड़ रुपए का चंदा मिला और उसने लोकसभा चुनाव में तीन उम्मीदवार मैदान में उतारे। बीबीसी के अनुसार उसका कार्यालय भी बंद मिला। पार्टी अध्यक्ष नीरज कुमार क्षत्रिय के घर पहुंचने पर उनकी मां आशा बेन ने बताया कि वे घर पर नहीं हैं और उन्हें पार्टी के कामकाज के बारे में जानकारी नहीं है। उन्होंने यह जरूर बताया कि आयकर विभाग ने उनके घर पर छापा मारा था, हालांकि उन्हें इस कार्रवाई के कारण की जानकारी नहीं थी।
बीबीसी की पड़ताल में एक और असामान्य बात सामने आई कि इन छह दलों में से चार के पंजीकृत कार्यालय अहमदाबाद के एक ही इलाके में थे। बाकी दो भी गुजरात में थे। एक ही क्षेत्र में इतनी बड़ी वित्तीय क्षमता वाले कई छोटे राजनीतिक दलों की मौजूदगी अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं है लेकिन यह जरूर सवाल पैदा करती है कि क्या इन पार्टियों के बीच कोई संगठनात्मक, वित्तीय या पेशेवर सम्बंध था।
219 करोड़ पाने वाली पार्टी के अध्यक्ष बोले- पैसे पर मेरा अधिकार नहीं
स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी को 2023-24 में करीब 219 करोड़ रुपए चंदे के रूप में मिले। पार्टी अध्यक्ष सुरेंद्र तिवारी ने बीबीसी को बताया कि उन्हें उस पैसे के इस्तेमाल का पूरा अधिकार नहीं था। उनके अनुसार पार्टी का चार्टर्ड अकाउंटेंट चुनाव प्रचार के लिए उन्हें कुछ रकम देता था और फिर उन लोगों को प्रचार से सम्बंधित वीडियो दिखाए जाते थे जो राजनीतिक चंदे के जरिए आयकर में छूट हासिल करना चाहते थे।
तिवारी के मुताबिक जुलाई 2026 में पार्टी को आयकर विभाग से नोटिस भी मिला। उन्होंने पार्टी के चार्टर्ड अकाउंटेंट मयूर सिंह पर उन्हें अंधेरे में रखने और पार्टी की बागडोर अपने हाथ में रखने का आरोप लगाया। मयूर सिंह ने किसी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया और कहा कि वह केवल वही लेखा-परीक्षण रिपोर्ट जमा करते हैं जिन्हें राजनीतिक दलों के लिए चुनाव आयोग को सौंपना अनिवार्य है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां पार्टी के अध्यक्ष स्वयं यह कह रहे हैं कि पार्टी को मिले करोड़ों रुपए पर उनका पूरा नियंत्रण नहीं था। अगर किसी राजनीतिक दल का निर्वाचित या घोषित अध्यक्ष अपनी ही पार्टी के वित्तीय संचालन से अनजान है और वित्तीय गतिविधियों में चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका इतनी प्रभावशाली है तो राजनीतिक दल की वास्तविक निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी और भारतीय नेशनल जनता दल भी जांच के घेरे में
बीबीसी ने न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी और भारतीय नेशनल जनता दल की भी पड़ताल की। न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी को 2023-24 में करीब 200 करोड़ रुपए से ज्यादा का चंदा मिला जबकि भारतीय नेशनल जनता दल को भी करीब 190 करोड़ रुपए से ज्यादा का चंदा मिला। इन दलों की गतिविधियों और उनके वित्तीय रिकाॅर्ड को लेकर भी वही सवाल सामने आए जो बाकी पार्टियों के मामले में उठे, राजनीतिक गतिविधि और वित्तीय लेन-देन में बड़ा अंतर तथा पर्दे के पीछे काम करने वाले लोगों की भूमिका को लेकर अस्पष्टता। इस पूरी पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि छह पार्टियों की आर्थिक गतिविधि और चुनावी गतिविधि में कोई स्पष्ट समानता नहीं दिखाई देती। 2024 में इन छह पार्टियों ने मिलकर केवल 15 उम्मीदवार उतारे जबकि उनकी वित्तीय ताकत सैकड़ों करोड़ रुपए की थी।
आखिर इतना पैसा आता कहां से है?
अब सवाल चंदे के स्रोत का है। राजनीतिक दलों को चंदा देना कानूनन वैध है और निर्धारित शर्तों के तहत चंदा देने वाले व्यक्ति को आयकर में कटौती का लाभ भी मिल सकता है। यही व्यवस्था कथित तौर पर फर्जी राजनीतिक चंदे के नेटवर्क के लिए आकर्षक बनती है।
बीबीसी से बातचीत में अहमदाबाद के वरिष्ठ चार्टर्ड अकाउंटेंट महेश छाजेड़ ने दावा किया कि कुछ लोग राजनीतिक दलों को चंदा देने की रसीद लेकर आयकर में छूट का दावा करते हैं और इसके बदले राजनीतिक दल अपना कमीशन काटकर बाकी रकम नकद वापस कर देते हैं। इस तरह कागज पर राजनीतिक चंदा दिखाई देता है, दानदाता को आयकर में लाभ मिलता है और पार्टी को कमीशन।
यदि किसी मामले में यह व्यवस्था वास्तव में साबित होती है तो यह केवल राजनीतिक चंदे की अनियमितता नहीं होगी बल्कि कर चोरी और धन को वापस घुमाने का मामला भी बन सकता है। इसी वजह से इस पूरे नेटवर्क की जांच में केवल राजनीतिक दलों के खातों को देखना पर्याप्त नहीं होगा। उन लोगों की भी पहचान जरूरी है जिन्होंने चंदा दिया, उन लोगों की भी जांच जरूरी है जिन्होंने चंदे की रसीद तैयार की और उन बैंक खातों का भी परीक्षण होना चाहिए जिनसे रकम गई और वापस आई।
आयकर विभाग पहले से कर रहा है जांच
बीबीसी की पड़ताल में आयकर विभाग की कार्रवाई से जुड़ी जानकारी इस मामले को और गम्भीर बनाती है। दिसम्बर 2025 में आयकर विभाग ने अपनी कार्रवाई के बारे में बताते हुए कहा था कि जांच में कुछ पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल ऐसे पाए गए जो अपने पंजीकृत पते पर काम नहीं कर रहे थे, राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं थे और फिर भी उनके नाम पर चंदे की रसीदें जारी हो रही थीं। विभाग ने ऐसे मामलों में धन के हस्तांतरण, हवाला लेन-देन, सीमा पार धन भेजने और फर्जी चंदे की रसीद जारी करने जैसी गतिविधियों का उल्लेख किया था।
बीबीसी ने आयकर विभाग के एक अधिकारी के हवाले से एक आंतरिक दस्तावेज का भी उल्लेख किया है। इसके मुताबिक विभाग ने कम से कम 2022 से संदिग्ध गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की जांच की और कर में छूट हासिल करने के लिए किए गए करीब 5591 करोड़ रुपए के कथित फर्जी चंदे की पहचान की। इनमें से 2749 करोड़ रुपए की वसूली किए जाने का दावा इस दस्तावेज में किया गया है। इसके अलावा 665 करोड़ रुपए के विदेशी लेन-देन का भी उल्लेख किया गया है। बीबीसी ने इन आंकड़ों की पुष्टि के लिए बिहार, गुजरात और दिल्ली के आयकर कार्यालयों तथा केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को सवाल भेजे थे लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक उसे जवाब नहीं मिला था।
बीबीसी ने आयकर विभाग से यह भी पूछा था कि उसकी पड़ताल में शामिल छह पार्टियों में से कोई उस कार्रवाई का हिस्सा थी या नहीं। इस सवाल का भी रिपोर्ट प्रकाशित होने तक कोई जवाब नहीं मिला।
एडीआर के आंकड़े भी बढ़ाते हैं चिंता
राजनीतिक और चुनावी सुधार पर नजर रखने वाली संस्था एडीआर लम्बे समय से गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की आय और चंदे का अध्ययन करती रही है। उसके आंकड़ों में भी वित्तीय पारदर्शिता को लेकर गम्भीर कमियां सामने आती रही हैं। एडीआर के अध्ययन में बड़ी संख्या में ऐसी पार्टियां मिलीं जिन्होंने अपनी लेखा-परीक्षण रिपोर्ट या चंदे का विवरण समय पर सार्वजनिक नहीं किया।
आम जनमत पार्टी का उदाहरण इस व्यवस्था की कमजोरी को और सामने लाता है। पार्टी बनने के शुरुआती वर्षों में उसे कोई बड़ा चंदा नहीं मिला लेकिन अचानक उसकी आय सैकड़ों करोड़ रुपए तक पहुंच गई। इतना बड़ा वित्तीय बदलाव सामान्य राजनीतिक गतिविधि की तुलना में असाधारण है और इसलिए दानदाताओं की पहचान तथा चंदे के वास्तविक स्रोत की स्वतंत्र जांच जरूरी हो जाती है।
एडीआर के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि कुछ दानदाता एक से ज्यादा ऐसी पार्टियों को चंदा दे रहे थे। इससे यह सवाल और गम्भीर होता है कि क्या ये अलग-अलग राजनीतिक दलों को समर्थन देने वाले सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता या कारोबारी थे अथवा किसी समान वित्तीय व्यवस्था के माध्यम से अलग-अलग दलों में रकम पहुंचाई जा रही थी।
चुनाव आयोग की भूमिका सबसे अहम अब इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर है। चुनाव आयोग केवल चुनाव कराने वाली संस्था नहीं है। राजनीतिक दलों के पंजीकरण, उनके वित्तीय विवरण और चुनावी नियमों के पालन से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी उसके पास हैं।
चुनाव आयोग ने पिछले साल 800 से ज्यादा गैर-मान्यता प्राप्त
राजनीतिक दलों को सूची से हटाया था। आयोग के अनुसार इन दलों ने पिछले छह वर्षों में किसी चुनाव में एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा था। कई दलों के पंजीकृत कार्यालय भी नहीं मिले। आयोग की यह कार्रवाई महत्वपूर्ण है लेकिन इससे एक नया सवाल पैदा होता है कि जब कोई दल वर्षों तक चुनाव नहीं लड़ता, उसका कार्यालय नहीं मिलता और फिर भी उसके पास करोड़ों रुपए के चंदे का रिकाॅर्ड होता है तो उसके वित्तीय लेन-देन की जांच किस स्तर पर होनी चाहिए। क्या किसी राजनीतिक दल को एक साल में असाधारण रूप से बड़ा चंदा मिलने पर स्वतः जांच की व्यवस्था है? क्या चुनाव आयोग और आयकर विभाग के बीच ऐसे मामलों में जानकारी तुरंत साझा होती है? क्या किसी पार्टी का कार्यालय बंद मिलने और उसके खाते में करोड़ों रुपए आने की स्थिति को एक गम्भीर वित्तीय जोखिम मानकर जांच की जाती है? अगर आयकर विभाग किसी दल के बारे में वित्तीय अनियमितता की जानकारी हासिल करता है तो चुनाव आयोग को इसकी जानकारी देने की कोई समयबद्ध व्यवस्था है?
इन सवालों का जवाब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग ने खुद हजारों ऐसे दलों के खिलाफ कार्रवाई की है जिनकी राजनीतिक सक्रियता संदिग्ध या नगण्य थी। ऐसे में करोड़ों रुपए का चंदा पाने वाले दलों की वित्तीय निगरानी और ज्यादा कठोर होनी चाहिए थी।
क्या केवल सूची से हटाना पर्याप्त है?
राजनीतिक दल को सूची से हटा देना एक प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है लेकिन इससे यह सवाल खत्म नहीं होता कि उसके सक्रिय रहने के दौरान उसके पास कितना पैसा आया और वह पैसा कहां गया। अगर किसी दल ने अपने अस्तित्व के दौरान करोड़ों रुपए का चंदा लिया है तो उसकी वित्तीय गतिविधियों की जांच केवल इसलिए खत्म नहीं हो सकती कि बाद में उसका पंजीकरण समाप्त कर दिया गया।
भाजपा से जुड़ाव का सवाल भी जांच के दायरे में क्यों आना चाहिए?
आम जनमत पार्टी की संस्थापक अनामिका पासवान का बाद में भाजपा की बिहार प्रदेश उपाध्यक्ष बनना इस कहानी में एक राजनीतिक सवाल जरूर जोड़ता है। यह फिर स्पष्ट करना जरूरी है कि उनके भाजपा में आने से अपने आप आम जनमत पार्टी के करोड़ों रुपए और भाजपा के बीच कोई सम्बंध साबित नहीं होता। इसी तरह उपलब्ध चुनाव आयोग के रिकाॅर्ड में इन छह पार्टियों में से किसी के भाजपा में विलय की पुष्टि नहीं है लेकिन चूंकि भाजपा बीते 12 बरसों से केंद्र की सत्ता में है और भ्रष्टाचार को जड़ से हटाने का संकल्प लेकर वह सत्ता के शीर्ष तक पहुंची है इसलिए अगर किसी ऐसी पार्टी की संस्थापक, जिसे बाद में सैकड़ों करोड़ रुपए का चंदा मिला, भाजपा प्रदेश पदाधिकारी बनती हैं तो उसके घटनाक्रम की पूरी समयरेखा सार्वजनिक होना जरूरी है। पार्टी से उनका इस्तीफा कब हुआ, उसके बाद पार्टी का संचालन किसके हाथ में रहा, पार्टी के बैंक खाते कौन चलाता था, बड़े चंदे की रकम किस समय आई और उस समय पार्टी के प्रमुख पदाधिकारियों के बीच क्या सम्बंध थे, इन सवालों के जवाब सार्वजनिक रिकाॅर्ड में तलाशे जाने चाहिए।
यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या इन पार्टियों से जुड़े किसी व्यक्ति का बाद में किसी बड़े राजनीतिक दल में प्रवेश हुआ और क्या उस व्यक्ति के पुराने राजनीतिक संगठन की वित्तीय गतिविधियों पर कोई सरकारी जांच हुई थी। यदि कोई सम्बंध नहीं है तो जांच के बाद यह बात भी साफ हो जाएगी लेकिन सवाल पूछे बिना जवाब सामने नहीं आएगा।
असली सवाल अब यह है कि पैसे का अंतिम लाभ किसे मिला?
इस पूरे मामले को सिर्फ ‘कागजी पार्टियों’ की कहानी मानना शायद सबसे बड़ी भूल होगी। असली सवाल यह है कि राजनीतिक दल के नाम पर प्राप्त सैकड़ों करोड़ रुपए की रकम का अंतिम लाभ किसे मिला। क्या पैसा वास्तव में राजनीतिक गतिविधियों में लगा? क्या सामाजिक कार्यों में खर्च हुआ? क्या दानदाता ने वास्तविक राजनीतिक समर्थन के लिए पैसा दिया? क्या किसी हिस्से को आयकर में लाभ लेने के लिए इस्तेमाल किया गया? क्या कोई रकम वापस दानदाता तक पहुंची? क्या चार्टर्ड अकाउंटेंट या बिचौलियों ने इसमें भूमिका निभाई? क्या अलग-अलग पार्टियों के पीछे एक ही वित्तीय नेटवर्क काम कर रहा था?
बीबीसी की पड़ताल ने एक ऐसा सवाल सामने रखा है जिसे अब सिर्फ छह पार्टियों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। देश में 2800 से ज्यादा पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल हैं। उनमें से कितने वास्तव में राजनीतिक गतिविधियां कर रहे हैं, कितने सिर्फ कागज पर हैं, कितनों को असामान्य रूप से बड़ा चंदा मिलता है और कितनों के वित्तीय लेन-देन की कभी गम्भीर जांच हुई, इन सवालों का जवाब अब सार्वजनिक होना चाहिए क्योंकि अगर कोई राजनीतिक दल चुनावी मैदान में लगभग दिखाई नहीं देता, उसका कार्यालय बंद मिलता है, उसके पदाधिकारी वित्तीय संचालन से खुद को अलग बताते हैं और फिर भी उसके खाते में सैकड़ों करोड़ रुपए पहुंचते हैं तो सवाल केवल उस पार्टी पर नहीं उठता। सवाल उस पूरी व्यवस्था पर उठता है जो उसे राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत रखती है, उसे चंदा लेने की सुविधा देती है और उसकी वित्तीय गतिविधियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी भी निभाती है और इसलिए इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल यही है कि कागज पर मौजूद इन पार्टियों के खातों में करोड़ों रुपए आखिर किसके हैं, उनका अंतिम ठिकाना क्या है और चुनाव आयोग तथा आयकर विभाग की निगरानी में इतना बड़ा अंतर कैसे पैदा हुआ?