अस्पताल में बदली तस्वीर, स्कूलों में बदहाली, सड़क, पानी और रोजगार अब भी बड़े सवाल

अस्पताल में बदली तस्वीर, स्कूलों में बदहाली, सड़क, पानी और रोजगार अब भी बड़े सवाल

कांग्रेस के खुशाल सिंह अधिकारी वर्तमान में लोहाघाट के विधायक हैं और 2022 से इस विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। लोहाघाट विधानसभा के राजनीतिक इतिहास को देखें तो वर्ष 2002 और 2007 में कांग्रेस, 2012 और 2017 में भाजपा तथा 2022 में फिर कांग्रेस ने जीत दर्ज की। यानी उत्तराखण्ड बनने के बाद इस क्षेत्र की राजनीति मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच ही घूमती रही है। अब मौजूदा विधानसभा कार्यकाल में राजनीतिक सवाल यह है कि 2022 में सत्ता परिवर्तन के बाद लोहाघाट की जमीनी तस्वीर कितनी बदली है? विधानसभा क्षेत्र के गांवों, कस्बों और बाजारों में सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यटन जैसे मुद्दों को लेकर पेश है ‘दि संडे पोस्ट’ की ग्राउंड रिपोर्ट

लोहाघाट विधानसभा की जमीनी यात्रा में विकास की तस्वीर एकरंगी नहीं दिखाई देती। कहीं स्वास्थ्य सेवाओं में ऐसा बदलाव नजर आता है जहां कभी मरीजों को छोटी-बड़ी बीमारी के लिए भी हल्द्वानी या दूसरे बड़े शहरों का रुख करना पड़ता था, वहीं दूसरी ओर गांवों में सूखे नल, जर्जर मकान, खराब सड़कें और जंगली जानवरों से उजड़ती खेती अब भी लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। कहीं सरकारी स्कूल में स्मार्ट टीवी और शिक्षक उपलब्ध हैं लेकिन उसी भवन की छत बारिश में टपकती है तो कहीं स्कूल में बच्चे इतने कम रह गए हैं कि पांच विद्यार्थियों पर चार शिक्षक तैनात हैं। पर्यटन की सम्भावनाएं भी बड़ी हैं लेकिन स्थानीय लोगों का सवाल है कि इन सम्भावनाओं को रोजगार में बदलने के लिए बुनियादी सुविधाएं कब विकसित होंगी।

पहाड़ में ही इलाज की बढ़ती सुविधा लेकिन कुछ विशेषज्ञ सेवाओं की कमी अब भी लोहाघाट और आस-पास के बड़े पर्वतीय क्षेत्र के लिए उप-जिला अस्पताल पिछले कुछ समय में स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार पहले जहां गम्भीर और जटिल मामलों में बड़ी संख्या में मरीजों को बाहर रेफर करना पड़ता था, अब विशेषज्ञ चिकित्सकों और जांच सुविधाओं की उपलब्धता के कारण 90 प्रतिशत से अधिक ऐसे रेफरल मामलों में कमी आई है। चिकित्सा अधीक्षक एवं नेत्र रोग विशेषज्ञ डाॅ. विराज राठी के अनुसार अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता ने स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर बदली है। रेडियोलॉजी विभाग में रेडियोलॉजिस्ट डाॅ. सोनाली मल्होत्रा की नियमित उपलब्धता से जटिल अल्ट्रासाउंड, गर्भावस्था से सम्बंधित जांच और कैंसर की शुरुआती जांच जैसी सुविधाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो रही हैं। वरिष्ठ फिजिशियन डाॅ. राकेश जोशी के आने के बाद गम्भीर आंतरिक रोगों वाले मरीजों को भी काफी हद तक स्थानीय उपचार मिल पा रहा है। पर्वतीय क्षेत्र में सांस की बीमारियां भी बड़ी समस्या हैं। फेफड़ों से जुड़ी गम्भीर बीमारियों के मरीज यहां बड़ी संख्या में आते हैं। डाॅ. रविंदर बोरा की देखरेख में रोजाना करीब 10 से 12 ऑक्सीजन सपोर्ट वाले मरीजों का उपचार किया जा रहा है। फेफड़ों में पानी भरने यानी Pleural Effusion जैसे जटिल मामलों का उपचार भी अस्पताल में सम्भव हुआ है।
मातृत्व सेवाओं में भी अस्पताल ने विस्तार किया है। प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग में डाॅ. मोनिका गिरी सेवाएं दे रही हैं। लोहाघाट के साथ बाराकोट, पाटी, पनार, पंचेश्वर और नैनीताल के ओखलकांडा जैसे दूरस्थ क्षेत्रों से गर्भवती महिलाएं यहां पहुंच रही हैं। जटिल प्रसव और सी-सेक्शन की सुविधा उपलब्ध होने से महिलाओं को बड़े शहरों की ओर जाने की जरूरत कम हुई है। पहली जांच से प्रसव तक पैथोलॉजी जांच और तीन अल्ट्रासाउंड निशुल्क उपलब्ध होने की जानकारी अस्पताल प्रशासन ने दी है। प्रसव के बाद चार से सात दिन तक निशुल्क देखभाल भी की जाती है। नवजात शिशुओं के लिए एनआईसीयू संचालित है जहां बाल रोग विशेषज्ञ डाॅ. ज्ञान प्रकाश शर्मा की निगरानी में बच्चों की देखभाल की जाती है। 24 घंटे एनेस्थेटिस्ट की उपलब्धता आपातकालीन ऑपरेशन के लिए महत्वपूर्ण सुविधा है। हड्डी रोग विशेषज्ञ डाॅ. राजीव कुमार की उपलब्धता के बाद हर महीने करीब 30 से 50 जटिल ऑर्थोपेडिक सर्जरी की जा रही है। अस्पताल की क्षमता बढ़ाकर 45 बेड की गई है। अपनी पैथोलाॅजी लैब के साथ चंदन डायग्नोस्टिक की सेवाएं भी उपलब्ध हैं। रेबीज, टिटनस और सर्पदंश के उपचार के लिए इंजेक्शन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। ऑक्सीजन और नेबुलाइजेशन की व्यवस्था के साथ 24 घंटे 108 एम्बुलेंस और गर्भवती महिलाओं के लिए ‘खुशियों की सवारी’ भी उपलब्ध है। जन्म के तीसरे या चौथे दिन निर्धारित दिनों में नवजात का जन्म प्रमाण पत्र जारी करने की व्यवस्था भी काम कर रही है। इन सुविधाओं का असर अस्पताल आने वाले मरीजों की संख्या में भी दिखाई देता है। साप्ताहिक दिनों में सोमवार को ओपीडी करीब 450 तक पहुंच जाती है जबकि सामान्य दिनों में लगभग 350 नए मरीज और 150 से 200 फालो-अप मरीज आते हैं।
सुई गांव के गौरव चैबे ने अपने पिता के इलाज का उदाहरण देते हुए बताया कि गम्भीर स्थिति में फिजिशियन डाॅ. बोरा के उपचार से उनके पिता को तीन दिनों में काफी सुधार हुआ। उन्होंने डॉक्टरों के तबादले रोकने के फैसले की सराहना की और अस्पताल की सफाई व्यवस्था को भी बेहतर बताया।
22 पद स्वीकृत, 14 डॉक्टर तैनात
अस्पताल में डाॅक्टरों के कुल 22 पद स्वीकृत हैं, जिनमें वर्तमान में 14 डाॅक्टर तैनात बताए गए हैं। न्यूरोसर्जन और कार्डियक सर्जन उपलब्ध नहीं हैं। सीटी स्कैन/एमआरआई के बाद सर्जरी की जरूरत वाले मरीजों को उच्च केंद्रों पर भेजना पड़ता है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार ऐसे करीब पांच से सात मरीजों को रेफर करना पड़ रहा है। सामान्य सर्जरी के पद स्वीकृत होने के बावजूद चिकित्सकों की तैनाती नहीं होने से इस क्षेत्र में भी कमी बनी हुई है। आॅपरेशन थिएटर शुरू करने की प्रक्रिया चल रही है और जिलाधिकारी के सहयोग से इसे जल्द शुरू किए जाने की उम्मीद अस्पताल प्रशासन ने जताई है। दूसरी बड़ी समस्या वित्तीय है। राज्य सरकार से मिलने वाला मुख्य फंड अभी शुरू नहीं हो पाने के कारण फिलहाल स्थानीय/आतंरिक फंड से व्यवस्था चलाने की बात कही गई है।
चिकित्सा अधीक्षक डाॅ. विराज राठी का कहना है कि 2020 से पहले पहाड़ों में डाॅक्टरों को रोकना बड़ी चुनौती थी लेकिन अब स्थिति बदली है और विशेषज्ञ चिकित्सक लोहाघाट में सेवाएं देने के लिए तैयार हैं। अस्पताल प्रशासन के अनुसार जनता से मिले सहयोग और विश्वास के कारण लक्ष्य हर मरीज को बिना भेदभाव बेहतर उपचार देना है। अस्पताल को स्थानीय जनप्रतिनिधियों से भी सहयोग मिला है। वर्तमान विधायक की ओर से पेयजल संकट दूर करने के लिए वाॅटर प्यूरीफायर उपलब्ध कराया गया है। पूर्व विधायक पूरन सिंह फत्र्याल की ओर से 40 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, आईसीयू गार्डन और पानी की टंकी उपलब्ध कराने की जानकारी सामने आई लेकिन अस्पताल से बाहर निकलते ही स्वास्थ्य की दूसरी तस्वीर दिखाई देती है। सुई, तड़ी, फोरथी, डूंगरी फत्र्याल और पाटी ब्लाॅक के दूरस्थ इलाकों के लोगों ने बताया कि अस्पताल में सामान्य उपचार मिलने से राहत है लेकिन गम्भीर बीमारी में बड़े केंद्र तक पहुंचना अभी भी जरूरी हो जाता है। पाटी ब्लाॅक के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क न होने के कारण मरीजों को डोली के सहारे मुख्य सड़क तक लाने की मजबूरी की बात भी सामने आई। यानी अस्पताल की क्षमता बढ़ने के बावजूद मरीज के अस्पताल तक पहुंचने का सवाल अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ है।
सूखे नल, जंगली जानवर और खेती का संकट
लोहाघाट के फोरथी गांव में ग्रामीणों से बातचीत करने पर स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के बीच एक अलग तस्वीर सामने आती है। जगदीश चंद्र सिंह पुनेठा के अनुसार गांव की सबसे बड़ी समस्याओं में पेयजल और जंगली जानवर शामिल हैं। जल जीवन मिशन के तहत घर-घर नल लगाए गए हैं लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि पांच वर्षों से इन नलों में नियमित पानी नहीं आया। मई-जून में स्थिति और गम्भीर हो जाती है। सिंचाई की व्यवस्था नहीं होने से खेती बारिश पर निर्भर है और जंगली जानवरों के कारण खेती करना भी कठिन होता जा रहा है। ग्रामीणों ने सौर लाइटों की कमी और पर्यटन की सम्भावनाओं के बावजूद बुनियादी सुविधाओं के अभाव की बात कही। उनके अनुसार क्षेत्र पंचायत से मांग के बावजूद प्रमुख स्थानों पर अपेक्षित सोलर लाइटें नहीं लग सकीं।
आठवीं-दसवीं तक पहुंची शिक्षा लेकिन विज्ञान के बाद रास्ता बंद
तड़ी गांव स्थित राजकीय इंटर काॅलेज डोबाभागू में करीब 80 विद्यार्थी पढ़ते हैं और आस-पास के दूरस्थ गांवों से बच्चे यहां पहुंचते हैं। विद्यालय में कक्षा 10 तक विज्ञान की पढ़ाई होती है लेकिन 11वीं और 12वीं में विज्ञान वर्ग की व्यवस्था नहीं है। सबसे बड़ी वजह विज्ञान शिक्षक की उपलब्धता का अभाव बताया गया। परिणाम यह है कि जो विद्यार्थी आगे विज्ञान पढ़ना चाहते हैं, उन्हें लोहाघाट जाना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह आसान नहीं है। कई विद्यार्थियों को अपनी रुचि के बावजूद विज्ञान छोड़कर कला वर्ग चुनना पड़ता है। यह केवल विषय चुनने का सवाल नहीं है। पहाड़ के एक दूरस्थ विद्यालय में 10वीं तक विज्ञान पढ़ने के बाद उसी स्कूल में 11वीं-12वीं की पढ़ाई उपलब्ध न होना विद्यार्थियों के भविष्य के विकल्प सीमित करता है। विद्यालय भवन की स्थिति भी चिंता पैदा करती है। पहाड़ी के नीचे लगातार कटाव और भूस्खलन के कारण भवन की नींव प्रभावित हुई है। कुछ हिस्सों में दरारें और असुरक्षा की स्थिति दिखाई देती है। सुरक्षित कक्षाओं की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। पानी की समस्या भी यहां शिक्षा के साथ सीधे जुड़ी हुई है। परिसर में नल लगे हैं लेकिन पानी नहीं आता।
पांच बच्चे, चार शिक्षक और खाली होते गांव
विकासखंड लोहाघाट के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय कलचैड़ा में करीब पांच बच्चे और चार शिक्षक हैं। आंकड़ा अपने आप में पहाड़ के सरकारी स्कूलों के सामने खड़ी दूसरी चुनौती को दिखाता है। यहां समस्या शिक्षक की कमी नहीं बल्कि छात्र संख्या के लगातार गिरने की है। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन और परिवारों के गांव छोड़ने का असर स्कूलों पर साफ दिखाई देता है। कभी जिन विद्यालयों में बच्चों की संख्या अधिक हुआ करती थी, वहां अब गिने-चुने विद्यार्थी रह गए हैं। लोहाघाट की शिक्षा व्यवस्था में यही विरोधाभास दिखाई देता है, कहीं बच्चे हैं लेकिन शिक्षक और विषय नहीं, कहीं शिक्षक हैं लेकिन बच्चे नहीं। इस स्थिति का सीधा सम्बंध गांवों में रोजगार, सड़क, पानी और पलायन से भी है।
पर्यटन है, सुविधाओं का विस्तार बाकी
लोहाघाट क्षेत्र का बाणासुर किला धार्मिक-पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा स्थल है। इसे राजा बाणासुर के गढ़ से जोड़ा जाता है और भगवान श्रीकृष्ण से सम्बंधित मान्यता भी है। प्राकृतिक ऊंचाई और आस-पास का दृश्य इसे पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है। किले तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां, इंटरलाॅकिंग टाइल्स, बेंच और रेलिंग जैसे कार्य हुए हैं लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां अभी शौचालय, पेयजल, कैफे, छोटी दुकानें, बैठने की बेहतर व्यवस्था और सूचना बोर्ड जैसी सुविधाओं की जरूरत है। यदि प्राकृतिक वातावरण को नुकसान पहुंचाए बिना इन सुविधाओं का विकास किया जाए तो बाणासुर किला स्थानीय पर्यटन और रोजगार का बेहतर केंद्र बन सकता है।
लोहाघाट से करीब दो किलोमीटर दूर देवदार के जंगलों और पहाड़ों के बीच स्थित कोलीढेक झील अब क्षेत्र की प्रमुख पर्यटन पहचान बन रही है। इसे स्थानीय स्तर पर ‘मिनी कश्मीर’ भी कहा जाता है। सिंचाई विभाग की इस परियोजना का स्वीकृत वर्ष 2017-18 और लागत 3076.12 लाख रुपए बताई गई है। मूल उद्देश्य लोहाघाट और आस-पास के क्षेत्रों के लिए पेयजल और सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना था लेकिन समय के साथ झील पर्यटन का केंद्र भी बन गई। झील नव संचालन समिति के सदस्य विनोद सिंह ढेक के अनुसार अप्रैल, मई और जून में यहां सबसे अधिक पर्यटक पहुंचते हैं। उनका कहना है कि झील की खूबसूरती के बावजूद पर्यटकों के लिए शेल्टर, बेहतर बैठने की जगह, सफाई और अन्य बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है।
तहसील है, रोजगार नहीं, काॅलेज और स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग
स्थानीय गोविंद सिंह के अनुसार खेतीखान में स्कूल, निजी विद्यालय, आईटीआई और कोचिंग जैसी शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। बच्चों को शिक्षा के लिए बहुत दूर नहीं जाना पड़ता और सरकारी स्कूलों में पढ़ाई को उन्होंने अच्छा बताया। सड़क और पानी की समस्याएं समय-समय पर आती हैं लेकिन उनकी सबसे बड़ी चिंता स्वास्थ्य व्यवस्था है। स्थानीय अस्पताल में पर्याप्त उपचार न मिलने पर लोगों को लोहाघाट जाना पड़ता है। गोविंद सिंह ने वर्तमान विधायक के कार्यकाल में किसी बड़े विकास कार्य के दिखाई न देने की बात कही और अधिकतर प्रमुख कार्यों को पूर्व विधायक के कार्यकाल से जोड़ा। वहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के स्तर पर चम्पावत जिले और राज्य के अन्य हिस्सों में हुए विकास कार्यों का उन्होंने सकारात्मक उल्लेख किया।
पानी, नेटवर्क, अस्पताल और जंगली जानवरों से खेती पर संकट
खेतीखान के पास डूंगरी फत्र्याल में तस्वीर अधिक कठिन है। ग्रामीणों के अनुसार मोबाइल नेटवर्क की समस्या लगातार रहती है। गर्मियों में पेयजल संकट बढ़ जाता है और पर्याप्त अस्पताल सुविधा भी आस-पास उपलब्ध नहीं है। अधिकांश परिवार खेती पर निर्भर हैं लेकिन बंदर और दूसरे जंगली जानवर फसलों को लगातार नुकसान पहुंचाते हैं। फसल बर्बाद होने के कारण किसान खेती छोड़ने की स्थिति में पहुंच रहे हैं। यह समस्या सुई, तड़ी और काकड़ जैसे क्षेत्रों में भी अलग-अलग रूप में सामने आई।
हर घर नल लेकिन पानी की गारंटी नहीं
नसखोला के ग्रामीणों के अनुसार ‘हर घर नल- हर घर जल’ योजना के तहत कनेक्शन तो पहुंच गए लेकिन नियमित पानी नहीं आता। कई सड़कें अब भी कच्ची हैं। पूर्व विधायक के कार्यकाल में मंदिर सौंदर्यीकरण और सोलर लाइट लगाए जाने की बात ग्रामीणों ने कही। स्वास्थ्य के मामले में फिलहाल लोहाघाट अस्पताल की सेवाओं को संतोषजनक बताया गया, हालांकि डॉक्टरों के सम्भावित स्थानांतरण की खबर से पहले चिंता पैदा हुई थी। वर्तमान विधायक को लेकर यहां भी असंतोष सामने आया। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के बाद विधायक गांव में समस्याएं सुनने नहीं आए।
लोहाघाट बाजार : रोजगार, मालिकाना हक और पानी का सवाल
लोहाघाट बाजार निवासी नवीन शाह को सबसे बड़ी चिंता जमीन और मालिकाना हक को लेकर है। उनका कहना है कि लोगों को जमीन होने के बावजूद मालिकाना हक का प्रश्न बना हुआ है और प्राधिकरण सम्बंधी व्यवस्था के कारण भविष्य में मकानों को लेकर लोगों में असुरक्षा है।
सूखे नल, जर्जर मकान और विकास का इंतजार
तड़ी गांव की ममता देवी के लिए आवास की समस्या सबसे गम्भीर है। मकान इतना जर्जर हो चुका है कि सुरक्षा के कारण वह पिछले छह-सात महीनों से गांव के बारात घर में रहने को मजबूर हैं। बारात घर कोई स्थायी समाधान नहीं है। बारिश में वहां भी पानी टपकता है और सीलन रहती है।
रोजगार का स्थायी साधन नहीं है और परिवार मजदूरी पर निर्भर है। ग्रामीणों के अनुसार गांव के करीब 80 प्रतिशत परिवारों के पास पक्के मकान नहीं हैं। पहले ‘इंदिरा आवास’ योजना के तहत मिली सहायता से मकान बने थे लेकिन अब कई परिवार नए और सुरक्षित आवास की प्रतीक्षा कर रहे हैं। शौचालयों की स्थिति भी खराब है। पुराने शौचालय जर्जर हो चुके हैं और नए निर्माण के लिए सहायता नहीं मिलने की शिकायत ग्रामीणों ने की।
पानी की समस्या फिर सामने
तड़ी में भी ‘हर घर नल, हर घर जल’ योजना के तहत पाइप और कनेक्शन तो दिखाई देते हैं लेकिन पर्याप्त पानी नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि पुराने जलस्रोत और टंकियों से पाइप जोड़कर कनेक्शन दिए गए लेकिन स्थायी स्रोत की व्यवस्था नहीं हुई। पानी के लिए एक-दो किलोमीटर नीचे जाना पड़ता है। जंगली जानवरों का खतरा भी बना हुआ है। ग्राम पंचायत बलाई के प्रधान एवं यूथ कांग्रेस जिला उपाध्यक्ष जीवन सिंह बिष्ट ने बलाई और नई बलाई की सड़कों की स्थिति पर सवाल उठाया। उनके अनुसार सड़कें पिछले 10-12 वर्षों से खराब हैं। बरसात में कीचड़ और जलभराव के कारण आवागमन मुश्किल हो जाता है। पेयजल में घर-घर जल योजना के तहत रोजाना करीब एक-दो घंटे पानी मिलने की बात उन्होंने कही लेकिन पानी की गुणवत्ता और स्वच्छता पर चिंता जताई।

लोहाघाट में एक अलग राय :
मुख्यमंत्री के कामों से संतोष, विधायक से शिकायत स्थानीय शिवराज सिंह बिष्ट की राय कई दूसरे ग्रामीणों से अलग थी। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में क्षेत्र और चम्पावत जिले में हुए कार्यों को सराहनीय बताया। रामलीला मंच, महिला स्पोर्ट्स काॅलेज और कोली ढेक झील के सौंदर्यीकरण का उन्होंने उल्लेख किया। यहां भी मुख्यमंत्री के कार्यों और लोहाघाट विधायक के कामों के बीच अंतर स्पष्ट है। शिवराज सिंह बिष्ट ने विधायक के कार्यकाल में किसी उल्लेखनीय विकास कार्य के न होने की बात कही और सड़कों की खराब स्थिति का उल्लेख किया।
इसी क्षेत्र के सुभाष राम की समस्या विकास योजनाओं की दूसरी तस्वीर सामने लाती है। आपदा के दौरान उनके मकान की नींव क्षतिग्रस्त हो गई और मकान खतरे की स्थिति में पहुंच गया। जिलाधिकारी, आपदा प्रबंधन और अन्य के अधिकारियों से सम्पर्क के बावजूद समाधान नहीं होने की शिकायत उन्होंने की। निरीक्षण और कार्रवाई का आश्वासन मिलने के बावजूद मौके पर कार्रवाई नहीं हुई। आर्थिक रूप से कमजोर सुभाष राम ड्राइविंग करके परिवार चलाते हैं। उनके लिए मकान की सुरक्षा कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि तत्काल जीवन का सवाल है।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष चिराग फर्त्याल ने चम्पावत को आदर्श जिला बनाए जाने के दावों के बीच रोजगार, पेयजल, सड़क और उच्च शिक्षा के सवाल उठाए। उनका कहना है कि रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं होने के कारण युवाओं को छोटी नौकरियों के लिए भी दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है। पेयजल की समस्या वर्षों से बनी हुई है और सरयू पेयजल योजना के बावजूद लोगों को इसके पूर्ण लाभ का इंतजार है। लोहाघाट-चम्पावत राष्ट्रीय राजमार्ग की स्थिति पर भी सवाल उठाया और जगह-जगह गड्ढों की बात कही। उच्च शिक्षा के लिए भी कमी गिनाई। 12वीं तक पढ़ाई की सुविधा के बावजूद लाॅ काॅलेज और मेडिकल काॅलेज जैसी संस्थाओं के अभाव में विद्यार्थियों को बाहर जाना पड़ता है। फत्र्याल के अनुसार यदि जिले को आदर्श जिला कहा जाता है तो रोजगार, सड़क, पेयजल और उच्च शिक्षा के स्तर पर भी उसकी तस्वीर उसी अनुरूप दिखनी चाहिए।
‘आदर्श’ स्कूल की जर्जर छत
लोहाघाट उप-जिला अस्पताल के ऊपर और रामलीला मैदान के निकट स्थित राजकीय आदर्श प्राथमिक विद्यालय लोहाघाट की स्थिति इस सवाल को और तीखा करती है कि सरकारी स्कूलों की प्राथमिकता क्या है। वर्ष 1953 से संचालित इस विद्यालय में करीब 60 से 75 बच्चे पढ़ते हैं। बच्चों के लिए स्मार्ट टीवी और शिक्षक जैसी सुविधाएं मौजूद हैं लेकिन स्कूल भवन जर्जर है। दीवारों में दरारें हैं, छत से प्लास्टर उखड़ रहा है और बरसात में पानी टपकता है। स्कूल प्रशासन को कई जगह तिरपाल का सहारा लेना पड़ता है। पांच कक्षाओं के लिए पांच कमरों की जरूरत है जबकि दो नए कमरे कक्षा एक और दो के लिए बनाए गए हैं। बाकी बच्चों को पुरानी इमारत में बैठना पड़ता है। बारिश के दौरान पानी से बचने के लिए बच्चों को अपनी जगह बदलनी पड़ती है।
विडम्बना यह है कि जिस भवन में स्मार्ट टीवी लगाया गया है, उसी छत से पानी टपकता है। टीवी को बचाने के लिए उसके ऊपर लकड़ी की पट्टियां और अन्य सामग्री लगानी पड़ती है। कार्यालय में रखे रिकाॅर्ड और जरूरी सामान को भी बारिश में ढककर रखना पड़ता है। विद्यालय में इंटरलाॅकिंग पेवर के लिए मुख्यमंत्री की 2021-22 की घोषणा के तहत 6.58 लाख रुपए स्वीकृत हुए थे और 5 अप्रैल 2023 को इसका उद्घाटन हुआ लेकिन ग्रामीणों का सवाल है कि जब भवन की छत और बच्चों की सुरक्षा बड़ी समस्या थी, तब प्राथमिकता पहले जर्जर भवन की मरम्मत को क्यों नहीं दी गई। यह विद्यालय क्षेत्रीय विधायक खुशाल सिंह अधिकारी के घर से कुछ ही दूरी पर है। ग्रामीणों के अनुसार विधायक से विद्यालय की स्थिति देखने का आग्रह किया गया लेकिन निरीक्षण नहीं हुआ। विधायक की ओर से पहले विद्यालय की स्थिति अच्छी होने की बात कही गई थी जबकि मौके पर जर्जर भवन और बारिश में टपकती छत की स्थिति सामने आती है। RES की ओर से भवन का एस्टीमेट शासन को भेजे जाने की जानकारी है लेकिन स्थायी निर्माण शुरू नहीं हुआ है। यहां सवाल राजनीतिक आरोप से ज्यादा बच्चों की सुरक्षा का है। जब तक नया भवन नहीं बनता, बच्चों को किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर पढ़ाई जारी रखना तत्काल जरूरी दिखाई देता है।

बात अपनी-अपनी

वर्ष 2022 में जनता ने परिवर्तन के नाम पर विश्वास करके वर्तमान विधायक को चुना था लेकिन करीब साढ़े चार साल तक विधायक क्षेत्र से नदारद रहे। अब जनता के बीच जाकर अपनी परेशानियों को गिनाते रहे हैं जबकि वास्तव में विधायक जी की कोई परेशानी नहीं है। करीब साढ़े चार साल बाद अब वह जगह-जगह दिखाई देने लगे हैं। लोग अब जान चुके हैं और 2022 में जो गलती हुई थी, वह गलती 2027 में दोबारा नहीं करेंगे। मेरी नजर में विधायक द्वारा किसी भी क्षेत्र में ऐसा कोई काम नहीं हुआ, जिसकी बात की जा सके। सरयू लिफ्ट पेयजल योजना सरकार ने स्वीकृत की और बजट दिया लेकिन उसका श्रेय भी विधायक जी ले रहे हैं। मैं नहीं मानता कि इसमें उनका कोई श्रेय है। एक जनप्रतिनिधि को जनता के बीच जाकर सेवा करनी चाहिए जो उन्होंने कभी नहीं की। उनकी सोच है कि धनवान लोग हैं और धन के बल पर ही हमेशा विजय पाते रहेंगे लेकिन आने वाले समय में यह सम्भव नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधार की आवश्यकता है। अधिकतर बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे हैं जबकि सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या लगातार घट रही है। कई सरकारी स्कूल बंद होने की कगार पर हैं और बहुत से बंद भी हो चुके हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षक हैं लेकिन बच्चे कम हैं। आने वाले समय में शिक्षकों को दूसरे विद्यालयों में समायोजित करना पड़ सकता है। सरकार को सरकारी स्कूलों की स्थिति पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
महेश बोरा, जिला मंत्री, भाजपा

लोहाघाट विधानसभा की बात करें तो जो भी बड़े कार्य हुए हैं, वे मुख्यमंत्री जी और भाजपा सरकार के प्रयासों से हुए हैं। छमनियां में प्रदेश का पहला महिला स्पोर्ट्स काॅलेज करीब 256 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा है और इसका निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। यह क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है। लोहाघाट में वर्षों से पेयजल की सबसे बड़ी परेशानी रही है। सरयू लिफ्ट पेयजल योजना इस समस्या के समाधान की दिशा में बड़ा कदम है। लोहाघाट में रामलीला मंच की मांग भी वर्षों पुरानी थी, जिसका निर्माण हो चुका है। विधायक जी के कार्यकाल की बात करें तो मेरे हिसाब से उनका कार्यकाल निराशाजनक रहा है। करीब साढ़े चार साल तक वह क्षेत्र से नदारद रहे। मुख्यमंत्री जी द्वारा कराई जा रही योजनाओं का श्रेय भी विधायक जी अपने नाम करने का प्रयास कर रहे हैं।
सतीश चंद्र पाण्डे, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य, भाजपा

लोहाघाट विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक: खुशाल सिंह अधिकारी (अवधि : 4.5 वर्ष)
क्र. क्षेत्र                                        मुद्दा / जमीनी स्थिति                                अंक  (10 में)
  1. जनसम्पर्क एवं उपलब्धता विधायक के समर्थकों का दावा है कि सड़क, पानी और जनसुविधाओं से जुड़े मामलों में उनकी सक्रियता रही है लेकिन कई ग्रामीणों और स्थानीय कार्यकर्ता इससे सहमत नहीं।      5
  2. शिक्षा क्षेत्र के कई सरकारी विद्यालयों में शिक्षक और विषय विशेषज्ञों की कमी अब भी बड़ी समस्या है। दूरस्थ स्कूलों में घटती छात्र संख्या जैसी चुनौतियां हैं।                5
  3. स्वास्थ्य सेवाएं लोहाघाट उप जिला चिकित्सालय में डाॅक्टरों और सुविधाओं की स्थिति में सुधार हुआ है। एनआईसीयू, विशेषज्ञ डाॅक्टरों और जांच सुविधाओं का विस्तार सकारात्मक पक्ष है, लेकिन न्यूरोसर्जन, कार्डियक सर्जन और अन्य विशेषज्ञ सेवाओं की कमी तथा दूरस्थ गांवों से अस्पताल तक पहुंच अब भी चुनौती है।    7
  4. रोजगार एवं पलायन स्थानीय स्तर पर रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं हैं। युवाओं का पलायन जारी है और कई गांवों में आबादी घट रही है।     4
  5. सड़क एवं आधारभूत ढांचा विधायक निधि और अन्य योजनाओं से कई सम्पर्क मार्गों पर काम हुआ है तथा कुछ नई सड़कों के प्रयास हुए हैं। इसके बावजूद कई ग्रामीण मार्ग खराब हैं।     6
  6. पेयजल एवं सिंचाई पेयजल संकट लोहाघाट की सबसे बड़ी समस्याओं में शामिल है। जल जीवन मिशन के तहत घरों तक कनेक्शन पहुंचे, लेकिन कई गांवों में नियमित पानी नहीं पहुंचने की शिकायतें मिलीं। सिंचाई की कमी के कारण खेती प्रभावित है। पेयजल योजनाओं को आगे बढ़ाने की पहल के बावजूद जमीनी समाधान अभी अधूरा है।        5
  7. कृषि एवं जंगली जानवर जंगली जानवरों से खेती को नुकसान ग्रामीणों की बड़ी चिंता है। कई क्षेत्रों में खेत बंजर होने और खेती छोड़ने की स्थिति है।     4
  8. स्थानीय अर्थव्यवस्था एवं पर्यटन बाणासुर किला, कोलीढेक झील, मायावती आश्रम और अन्य पर्यटन स्थलों के कारण लोहाघाट में पर्यटन की बड़ी सम्भावनाएं हैं लेकिन पर्यटन को स्थानीय उत्पाद, बाजार और रोजगार से जोड़ने की मजबूत व्यवस्था अभी नहीं बन पाई है।                6
  9. विधायक निधि एवं विकास कार्य विधायक निधि से सड़क, खड़ंजा और अन्य छोटे विकास कार्य हुए हैं। कई योजनाओं के प्रस्ताव और स्वीकृतियां भी सामने आई हैं।           6
  10. पारदर्शिता एवं जवाबदेही विधायक की ओर से विकास कार्यों और शासन स्तर पर उठाए गए मुद्दों का दावा किया जाता है लेकिन सत्ता और विपक्ष के बीच विकास कार्यों का श्रेय लेने की राजनीति तस्वीर को धुंधला करती है।          5
कुल अंक :  5.3/10                            फाइनल ग्रेड : पास

‘मैंने निष्ठापूर्वक काम किया है’
खुशाल सिंह अधिकारी लोहाघाट विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के वर्तमान विधायक हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के तत्कालीन विधायक पूरन सिंह फत्र्याल को 6,038 मतों के अंतर से हराकर विधानसभा में प्रवेश किया। इससे पहले 2017 के चुनाव में भी वह कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में लोहाघाट से चुनाव लड़ चुके हैं। खुशाल सिंह अधिकारी का वर्तमान कार्यकाल क्षेत्र की सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन और ग्रामीण विकास जैसी बुनियादी जरूरतों के बीच आगे बढ़ रहा है। ‘दि संडे पोस्ट’ की ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान क्षेत्र में विकास कार्यों और जनता की समस्याओं को लेकर विधायक से विस्तार से बातचीत की गई। इस बातचीत में उन्होंने अपने कार्यकाल की उपलब्धियों, सरकार के साथ समन्वय, लम्बित योजनाओं, क्षेत्र की चुनौतियों और भविष्य की प्राथमिकताओं पर अपनी बात रखी

आप अपने कार्यकाल के चार वर्ष से अधिक का समय पूरा कर चुके हैं। इस दौरान क्षेत्र में हुए विकास कार्यों और अपनी उपलब्धियों का आप किस तरह आत्म मूल्यांकन करते हैं?

मेरा मानना है कि विकास एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। सरकार की जो भी योजनाएं आती हैं, वे जन-विकास का माध्यम बनती हैं। एक विपक्षी विधायक होने के नाते, जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को निभाते हुए मुझसे क्षेत्र के लिए जितना सम्भव हो सका, मैंने निष्ठापूर्वक काम किया है। चाहे पेयजल की बात हो, सड़कों का जाल बिछाने का विषय हो या ग्रामीणों की दैनिक बुनियादी समस्याएं, मैंने हर क्षेत्र में धरातल पर काम करने का प्रयास किया है। सड़कों के संदर्भ में, मैंने विशेष रूप से उन दूरस्थ क्षेत्रों को प्राथमिकता दी। उदाहरण के लिए, जब हम किमतोली से आगे बढ़ते हैं तो ‘मौड़ा’ नाम का एक गांव है। स्वतंत्रता के बाद से ही वहां के ग्रामीण सड़क की मांग करते-करते हताश हो चुके थे। जब मैं स्वयं पैदल चलकर उस गांव में गया और वहां की सीधी चढ़ाई चढ़ी, तब मुझे ग्रामीणों की वास्तविक पीड़ा का अहसास हुआ। मुख्य मार्ग से गांव तक पहुंचने में आधा से पौन घंटा पैदल चलना पड़ता था। ग्रामीणों की इस गम्भीर समस्या को देखते हुए मैंने प्राथमिकता के आधार पर उस मार्ग का निर्माण स्वीकृत करवाया। ऐसी कई अन्य सड़कें हैं जो पहले उपेक्षित थीं, पर आज वहां कनेक्टिविटी पहुंच चुकी है। इसी प्रकार पेयजल संकट के समाधान की दिशा में हमने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। सरयू लिफ्ट पेयजल योजना हमारे क्षेत्र की दशकों पुरानी मांग रही है, जिसके लिए पूर्ववर्ती जननेताओं ने भी प्रयास किए थे। जनता ने जब मुझे विधायक चुना तो उनका पहला आदेश यही था कि क्षेत्र में पानी की स्थायी व्यवस्था की जाए। यह देवतुल्य जनता के समर्थन का ही परिणाम है कि आज लगभग 100 करोड़ रुपए की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए 1 करोड़ रुपए की बयाना राशि (Token Amount) जारी हो चुकी है, टेंडर की प्रक्रिया पूरी हो गई है और धरातल पर कार्य प्रारम्भ होने जा रहा है।

विधानसभा चुनाव 2022 के दौरान आपने लोहाघाट की जनता से कई महत्वपूर्ण वादे किए थे। वे प्रमुख वादे कौन-कौन से थे, और अब तक उनमें से कितने वादे जमीनी स्तर पर पूरे हो चुके हैं?
देखिए, चुनाव के दौरान हमने ‘सरयू लिफ्ट पेयजल योजना’ के अलावा कोई बहुत बड़ी या भ्रामक घोषणाएं नहीं की थीं। हमारा मुख्य ध्यान ग्रामीण और क्षेत्रीय स्तर की वास्तविक समस्याओं को हल करने पर था। जनता की जो भी मांगें सामने आईं, उन्हें पूरा करने का मैंने ईमानदारी से प्रयास किया। विपक्षी विधायक होने के नाते मेरे पास एक सीमित विधायक निधि ही उपलब्ध रहती है, फिर भी हमने संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग किया। उदाहरण के लिए, जब हम ‘गुमदेश’ क्षेत्र की बात करते हैं तो वहां पेयजल की भारी किल्लत थी। जहां कम बजट में काम सम्भव था, वहां हमने विधायक निधि से तुरंत काम कराया। रीगुर क्षेत्र के शिव मंदिर परिसर, मां अखिलतारिणी मंदिर परिसर और पाटी स्थित शिव मंदिर परिसर में पेयजल और अन्य जनसुविधाओं की व्यवस्था कराई। ऐसी दर्जनों छोटी-छोटी योजनाएं हमने समय पर पूरी कीं। जहां बड़ी योजनाओं के लिए भारी बजट की आवश्यकता थी, वहां जल जीवन मिशन की सरकारी नीति के तहत काम होना था। हमने अधिकारियों और विभाग से लगातार संघर्ष किया लेकिन उनका एक ही जवाब होता था, ‘बजट का अभाव है’।

वर्षों से लोहाघाट विधानसभा क्षेत्रवासियों की भूमि के मालिकाना हक के लिए काफी समय से मांग चल रही है, इस पर आपका क्या कहना है?
बिल्कुल, यह आपने बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल पूछा है। जो भूमि के मालिकाना हक की बात है, जब मैं शुरुआत में विधानसभा गया था तो उसी दिन मैंने सरयू लिफ्ट पेयजल योजना और भूमि के मालिकाना हक का मुद्दा सदन में उठाया था लेकिन सदन में मुद्दा उठाने के बाद सरकार द्वारा यह कह दिया गया कि यह मामला कोर्ट में है, न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए इस पर चर्चा नहीं की जा सकती। मैंने इस विषय पर सरकार से बार-बार आग्रह किया। इसका जीता-जागता उदाहरण यह है कि अभी करीब 8 महीने पहले जब माननीय मुख्यमंत्री जी यहां आए थे तो उस दिन सरयू लिफ्ट पेयजल योजना के लिए मैंने उन्हें धन्यवाद भी दिया और साथ ही उनसे यह अनुरोध भी किया था कि श्यदि आप इस भूमि के मामले का निर्णय कर देंगे तो यहां की जनता आपको कभी नहीं भूलेगी।’ लेकिन बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि अभी तक इसमें सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं की जा रही है।

वर्तमान में नगर पालिका के माध्यम से लोहाघाट के विकास के लिए ‘मास्टर प्लान 2041’ की प्रक्रिया चल रही है। इस मास्टर प्लान पर आपकी क्या राय है?
देखिए, मास्टर प्लान की बात को तो हम सिरे से नकारते हैं। यह केवल इनका एक चुनावी एजेंडा है, जिसका धरातल पर कोई औचित्य नहीं बनता। मैं तो लोहाघाट की भोली-भाली जनता को नमन करता हूं। होता यह है कि यहां जिलाधिकारी महोदय आते हैं और सत्ता पक्ष के 10-12 लोग बैठकर यह तय कर देते हैं कि ‘यहां प्राधिकरण लाया जाए, मास्टर प्लान लागू किया जाए और चैड़ा राय, कलीगांव, कोलीढेक या पाटन जैसे ग्रामीण इलाकों को इसमें शामिल कर लिया जाए।’ हमारा मानना है कि विकास अवश्य होना चाहिए और हमारी सोच सकारात्मक होनी चाहिए लेकिन लोहाघाट जैसे घने और अव्यवस्थित (Unplanned) बसे नगर में मास्टर प्लान तब तक सम्भव ही नहीं है, जब तक कि यहां की नजूल भूमि को फ्री-होल्ड करके जनता को मालिकाना हक न दे दिया जाए। जब तक जमीन पर लोगों को स्वामित्व अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक आप इस घनी आबादी में मास्टर प्लान कैसे लागू करेंगे? आपके पास ऐसा कौन-सा जादू है? आप किसका बना-बनाया मकान तोड़ देंगे? कहां सड़क चैड़ी करेंगे और कहां कूड़ेदान या पार्किंग की व्यवस्था करेंगे?

कई लोगों का कहना है कि लोहाघाट विधानसभा क्षेत्र में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी के नेतृत्व में कई विकास कार्य हुए हैं। आप इसे किस तरह देखते हैं?

देखिए, यह तो लोग बताएंगे और समय बताएगा। हम तो नहीं कह सकते। मैंने पहले भी कहा कि विकास कार्य तो एक सतत प्रक्रिया है, विकास कार्य होते भी हैं। हम तो कहेंगे कि सरयू लिफ्ट पेयजल योजना स्वीकृत की तो उसमें केवल 1 करोड़ रुपए ही दे पाए, यह तो एक टोकन मनी के रूप में है, जो कार्य अभी प्रगति में है ही नहीं। टेंडर भी करा दिया लेकिन हम कह रहे हैं कि अगर यह विकास की बात करते हैं तो उस पर पैसा बढ़ाएं, उसमें 40 करोड़ रुपए दें, तब हम कहेंगे कि विकास की बात कर रहे हैं। रीठा साहिब में डिग्री काॅलेज के लिए मैं अपनी बात रखते-रखते थक गया हूं। आपने देवीधुरा में डिग्री कॉलेज खोला, फिर पार्टी में खोला, लोगों को सुविधा मिल रही है। अच्छी बात है, हम आपकी सराहना करते हैं। अब जो रीठा साहिब है, यहां से 30 किलोमीटर जाने के बाद वहां के बच्चे कैसे आते होंगे? क्या व्यवस्था करते होंगे उनके लिए? आपकी इस ओर सोच ही नहीं है! आपके उस विभाग के माननीय मंत्री कहते रहते हैं कि ‘मैंने उत्तराखण्ड के प्रत्येक ब्लॉक में डिग्री कॉलेज का काम कर दिया है, डिग्री कॉलेज खोल दिया है।’ अब एक बाराकोट ब्लॉक है मेरा! मैंने सदन में भी उनसे पूछा और आज पुनः उनसे मैं निवेदन करना चाहूंगा कि माननीय मुख्यमंत्री जी, यह बाराकोट ब्लाॅक भी आपके उत्तराखण्ड का ही हिस्सा है। यहां तो डिग्री काॅलेज खुला ही नहीं, जो हमारी सबसे बड़ी मांग थी। अब जब वही काम नहीं हुआ तो हम इसको कैसा विकास कहेंगे?

मुख्यमंत्री जी पैसे दे रहे हैं लेकिन मेरी समझ में तो यह नहीं आ रहा कि वह पैसा कहां दे रहे हैं आप! मंदिरों के लिए 10-20 लाख दे रहे हैं, जो यह खड़ंचोर के लिए इंटरलाॅकिंग टाइल्स दे रहे हैं, इसके बिना तो लोग चल भी सकते हैं, आप तो उन क्षेत्रों को देखिए जहां आपकी ‘घर-घर नल, घर-घर जल’ योजना के तहत पानी नहीं पहुंचा। जिन गांवों में आज पानी नहीं है, मैं तो कह रहा हूं, कहीं 10-20 लाख रुपए के मोटर के चक्कर में तो कहीं लाइट के कनेक्शन के चक्कर में वे योजनाएं रुकी पड़ी हैं, जिन पर करोड़ों रुपए खर्च हुए हैं। आप अपना ध्यान वहां केंद्रित कीजिए। मुख्यमंत्री जी की घोषणा में एक ‘मूलाकोट से पुनोली’ तक की सड़क है, आपकी घोषणा में वह शामिल है लेकिन घोषणा करने के बाद भी वह काम नहीं हो पा रहा है।

तड़ी गांव और राजकीय इंटर काॅलेज डोबाभागू क्षेत्र के लिए आपके कार्यकाल में कौन-कौन से विकास कार्य किए गए हैं? ग्रामीणों का कहना है कि इंटर कॉलेज डोबाभागू में 11वीं कक्षा से विज्ञान के शिक्षक नहीं हैं और स्कूल की इमारत ढलान पर खिसक रही है, वहां सुरक्षा दीवार की सख्त आवश्यकता है। साथ ही पेयजल की समस्या भी बनी हुई है। आपके द्वारा बताए गए विकास कार्यों के बावजूद ये समस्याएं अभी तक क्यों बनी हुई हैं?
तड़ी गांव तो हमारा पड़ोसी गांव ही है! वहां समस्याएं क्या हैं… लगभग सब ठीक है लेकिन जो मूलभूत और गम्भीर समस्याएं हैं, उनके सम्बंध में मैं अपनी बात स्पष्ट रूप से रखना चाहता हूं। डोबाभागू इंटर कॉलेज ऐसा विद्यालय है जहां पानी की भारी किल्लत थी। पूर्व में वहां पानी का नल तो बिछा था लेकिन पानी आता ही नहीं था और हमारी भोजन माताएं नीचे गधेरे (प्राकृतिक जल स्रोत) से पानी ढोकर लाने को मजबूर थीं। बड़ी कठिनाई से मैंने वहां पानी की व्यवस्था करवाई।

आप ‘आदर्श जिले’ की बात करते हैं जबकि तड़ी गांव हमारा अनुसूचित जाति (एससी) बहुल शिल्पकारों का गांव है। वहां कई लोग आज भी पक्के मकान से वंचित हैं। पुराने समय में जब इंदिरा आवास योजना के तहत मात्र 15,000 रुपए मिलते थे, जिन लोगों को उस समय वह लाभ मिला था, उन्हें आज नए आवास नहीं दिए जा रहे हैं। आज स्थिति यह है कि लोग अपने बच्चों को तिरपाल के नीचे रखकर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। जब सिर पर पक्की छत ही नहीं होगी तो वे अपने बच्चों को उचित शिक्षा कैसे दिलवा पाएंगे?

पिछली बार आपदा मद में इस जिले को लगभग 67 करोड़ रुपए के आस-पास का बजट प्राप्त हुआ था। मैं जिलाधिकारी (डीएम) साहब का धन्यवाद करूंगा कि उन्होंने स्वयं गांवों में जाकर निरीक्षण किया और जहां अतिआवश्यकता थी, वहां काम करने का प्रयास किया। पर इसके बावजूद, डोबाभागू का स्कूल जहां अत्यंत आवश्यकता है और खतरा बना हुआ है, क्या इस जिले में 67 करोड़ रुपए आने के बाद भी एक इंटर काॅलेज की सुरक्षा दीवार का निर्माण नहीं हो सकता था?

लोहाघाट का यह राजकीय आदर्श प्राथमिक विद्यालय वर्ष 1953 से संचालित है। आज भी यहां 60-75 बच्चे पढ़ते हैं लेकिन भवन अत्यंत जर्जर हो चुका है। छत से पानी टपकता है और दीवारों में दरारें हैं। आपके घर के समीप होने के बावजूद आज तक इसके पुनर्निर्माण की दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए?

देखिए, सबसे पहली बात यह है कि बाजार क्षेत्रों में निरीक्षण की आवश्यकता थोड़ी कम पड़ती है क्योंकि बाजार में तकरीबन व्यवस्थाएं ठीक होती हैं। वहां थोड़ा-बहुत डर भी लोगों को रहता है और हमारे नगर के सम्भ्रांत नागरिक भी रहते हैं, वे आते-जाते रहते हैं। अगर थोड़ी-बहुत शिकायत होती है तो वहीं पर हमारे आदरणीय खंड विकास अधिकारी साहब का कार्यालय भी है और वे स्वयं बैठते हैं। इसलिए मुझे लगता था कि उस स्कूल की दशा ठीक होगी।

जब तक इस जर्जर विद्यालय भवन के पुनर्निर्माण का बजट और स्वीकृति नहीं मिल जाती, तब तक मासूम बच्चों को इस खतरे के साए में पढ़ाना कितना उचित है? क्या सुरक्षा के दृष्टिकोण से बच्चों को तत्काल किसी वैकल्पिक सुरक्षित भवन में स्थानांतरित (शिफ्ट) नहीं किया जाना चाहिए? इस दिशा में आपकी ओर से क्या त्वरित प्रशासनिक और व्यावहारिक कदम उठाए जाएंगे?

यह मूल रूप से शासन-प्रशासन और सम्बंधित शिक्षा विभाग की नैतिक व प्रशासनिक जिम्मेदारी है। आज केवल लोहाघाट का यही स्कूल नहीं बल्कि क्षेत्र के ऐसे कई विद्यालय हैं जहां बुनियादी सुविधाओं (जैसे शौचालय आदि) की अत्यंत आवश्यकता है लेकिन वहां स्थिति दयनीय बनी हुई है। विद्यालय प्रशासन से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधि (ग्राम प्रधान आदि) अधिकारियों से गुहार लगाते-लगाते थक चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही। मुझे तो यह समझ में नहीं आता कि आखिर अधिकारियों की मंशा क्या है? ऐसा लगता है कि सरकार का अधिकारियों पर से नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो चुका है।

व्यवस्था का आलम यह है कि जहां बच्चों की संख्या कम है और शौचालय की आवश्यकता ही नहीं है, वहां एक की जगह आठ-आठ शौचालय बना दिए गए हैं और जहां सचमुच एक भी शौचालय नहीं है या भवन जर्जर पड़ा है, वहां बजट ही नहीं दिया जा रहा है।

ऐसी स्थिति में हमारे बच्चे सुरक्षित कैसे रहेंगे और उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिल पाएगी? तमाम शिकायतों के बाद भी सरकार और प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी बड़े हादसे या अनहोनी का इंतजार कर रहे हैं, ताकि उसके बाद ही चेता जा सके और यही उनकी नीति है।

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