‘शुद्धिकरण’ से मिलेगी संजीवनी?

पिछले महीने हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रामलीला मैदान में हुई रैली के बाद रामलीला मैदान में श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास के लोगों ने ‘शुद्धिकरण’ किया। तब से प्रदेश की राजनीति ‘शुद्धिकरण’ के मामले के आस- पास घूम रही है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब राज्य विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही सियासी मुद्दों की तलाश भी तेज हो गई है। इस मामले को लेकर कांग्रेस का लगातार विरोध-प्रदर्शन कर भाजपा सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। बीते सात सितम्बर को कांग्रेस ने ‘शुद्धिकरण’ और राहुल गांधी के खिलाफ हुए मुकदमे के विरोध में मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया। कांग्रेस के शक्ति प्रदर्शन को पार्टी की चुनावी तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। ऐसे में सवाल हैं कि क्या करीब एक दशक से मूक्र्षित पड़ी कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव में ‘शुद्धिकरण’ के मुद्दे को भुना पाएगी? क्या पार्टी इस मुद्दे के सहारे चुनावी जीत की संजीवनी हासिल कर पाएगी?

राजनीतिक जानकारों की मानें तो कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसी एक मुद्दे को उठाना नहीं बल्कि उसे जनता के रोजमर्रा के सवालों से जोड़ना है। ‘शुद्धिकरण’ का मामला भावनात्मक और धार्मिक संवेदनशीलता से जुड़ा होने के कारण राजनीतिक रूप से असरदार हो सकता है लेकिन केवल इसी मुद्दे के सहारे चुनावी माहौल बदलना आसान नहीं होगा। दूसरी ओर भाजपा के लिए भी यह मुद्दा असहज स्थिति पैदा कर सकता है। यदि कांग्रेस लगातार इसे धार्मिक भावनाओं के अपमान और राजनीतिक असहिष्णुता के मुद्दे के रूप में जनता के बीच ले जाती है तो भाजपा को अपना पक्ष मजबूती से रखना होगा। ऐसे में आने वाले दिनों में बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप और तेज होने की आशंका है। कांग्रेस यदि ‘शुद्धिकरण’ को बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों के साथ जोड़ने में सफल रहती है तो यह अभियान व्यापक राजनीतिक असर पैदा कर सकता है लेकिन यदि पूरा आंदोलन केवल कांग्रेस बनाम भाजपा की बयानबाजी तक सीमित रहा तो इसका चुनावी लाभ सीमित रह सकता है। फिलहाल सवाल यही है कि क्या ‘शुद्धिकरण’ कांग्रेस के लिए सिर्फ एक तात्कालिक राजनीतिक मुद्दा है या 2027 में उसे चुनावी संजीवनी देने वाला मुद्दा बन सकता है। आने वाले समय में कांग्रेस की रणनीति और जनता की प्रतिक्रिया ही इसका जवाब तय करेगी।

विवाद या विभाजन की शुरुआत?

उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां जैसे-जैसे तेज हो रही हैं प्रदेश की क्षेत्रीय राजनीति में भी हलचल बढ़ती जा रही है। कभी उत्तराखण्ड आंदोलन की राजनीतिक आवाज माने जाने वाले उत्तराखण्ड क्रांति दल (यूकेडी) के सामने अब संगठनात्मक एकजुटता की चुनौती दिखाई देने लगी है। कुछ दिन पहले पार्टी ने अपने दमदार युवा नेता आशुतोष नेगी को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में छह साल के लिए निष्कासित कर दिया लेकिन निष्कासन के बाद मामला शांत होने के बजाय और गरमा गया है। आशुतोष नेगी की ओर से सोशल मीडिया पर 36 विधानसभा क्षेत्रों के सम्भावित उम्मीदवारों की सूची जारी किए जाने ने इस मामले को और हवा दे दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या चुनाव से पहले यूकेडी एक बार फिर गुटों में बंटने की राह पर है? यदि किसी नेता को पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है तो वह किस हैसियत से उम्मीदवारों की सूची जारी कर रहा है? क्या उनके पीछे संगठन का कोई समानांतर ढांचा खड़ा हो रहा है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल दो नेताओं के बीच का विवाद है या यूकेडी के भीतर बड़े राजनीतिक विभाजन की शुरुआत? क्या आने वाले दिनों में दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों के साथ अलग राजनीतिक मंच तैयार करेंगे? क्या राष्ट्रीय दलों के खिलाफ क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति करने वाला यूकेडी खुद अंदरूनी खींचतान का शिकार हो जाएगा?

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि एक तरफ पार्टी नेतृत्व है जो संगठन और आधिकारिक निर्णयों को सर्वोपरि बता रहा है तो वहीं दूसरी ओर आशुतोष नेगी का सक्रिय राजनीतिक रुख अलग संकेत दे रहा है। यूकेडी प्रमुख सुरेंद्र कुकरेती ने आशुतोष नेगी के कदम पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि वह राष्ट्रीय दलों से पोषित होकर इस तरह की गतिविधियां कर रहे हैं। कुकरेती का सवाल है कि आखिर उन्हें उम्मीदवारों की सूची जारी करने का अधिकार किसने दिया? हालांकि आशुतोष नेगी की ओर से जारी 36 नामों की सूची को लेकर अंतिम राजनीतिक स्थिति अभी साफ नहीं है लेकिन चुनावी समय में इस तरह की गतिविधि यूकेडी के लिए चिंता का विषय जरूर बन सकती है। 2027 का चुनाव यूकेडी के लिए अपने अस्तित्व और राजनीतिक प्रभाव को फिर से स्थापित करने का बड़ा मौका है। ऐसे में यदि पार्टी के भीतर ही नेतृत्व, उम्मीदवार चयन और राजनीतिक रणनीति को लेकर दो अलग-अलग दावे सामने आते हैं तो इसका सीधा असर चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है। उम्मीदवारों की सूची को लेकर शुरू हुई यह जंग संकेत दे रही है कि आने वाले महीनों में यूकेडी के भीतर ‘असली यूकेडी कौन’ का सवाल राजनीतिक रूप से बड़ा मुद्दा बन सकता है।

योगी का ‘मिशन 115’ बदलेगा चुनावी गणित?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी बिसात अभी से तेजी से बिछने लगी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन 115 विधानसभा क्षेत्रों पर खास फोकस बढ़ाया है जहां 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को बढ़त मिली थी। इन सीटों को लेकर भाजपा की सक्रियता को राजनीतिक हलकों में ‘मिशन 115’ के तौर पर देखा जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इन सीटों में 2024 के लोकसभा चुनाव के हिसाब से सपा 54 और कांग्रेस 13 सीटों पर आगे रही थी जबकि भाजपा 47 और उसकी सहयोगी आरएलडी 1 सीट पर आगे थी। ऐसे में भाजपा के लिए यह इलाका महज चुनावी चुनौती नहीं बल्कि 2027 की सत्ता वापसी की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। ऐसे में सवाल है कि क्या ‘मिशन 115’ भाजपा के लिए केवल डैमेज कंट्रोल की कवायद है या सत्ता बरकरार रखने का मास्टर प्लान? क्या योगी इन सीटों पर नए चेहरों के साथ बड़ा प्रयोग करेंगे? सबसे बड़ा सवाल क्या भाजपा लोकसभा हार से सबक लेकर विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में सेंध लगा पाएगी? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा इन सीटों पर केवल सरकार के कामकाज का प्रचार करने तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि स्थानीय सामाजिक समीकरण, उम्मीदवार की लोकप्रियता और बूथ स्तर की मजबूती को भी नए सिरे से परख सकती है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन इलाकों में विपक्षी गठबंधन की बढ़त को पलटना है जहां 2024 में उसे नुकसान हुआ था। पार्टी यदि इन सीटों पर नए चेहरों को मौका देती है तो इसका उद्देश्य सत्ता विरोधी माहौल को कम करना और स्थानीय स्तर पर नई राजनीतिक ऊर्जा पैदा करना हो सकता है। दूसरी तरफ सपा भी ब्राह्माण समेत विभिन्न सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में दिखाई दे रही है। यदि विपक्ष जातीय और सामाजिक समीकरणों को प्रभावी ढंग से साधने में सफल रहा तो भाजपा के लिए 2027 की राह आसान नहीं होगी। आने वाले महीनों में उम्मीदवारों और संगठन में होने वाले सम्भावित बदलाव इन सवालों के जवाब की दिशा तय करेंगे।

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