राहुल बनाम विपक्षी सहयोगी

लोकसभा चुनाव 2029 में अभी काफी वक्त बाकी है लेकिन विपक्षी खेमे में प्रधानमंत्री पद के चेहरे को लेकर सियासी बहस ने अभी से जोर पकड़ लिया है। कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी को विपक्षी गठबंधन का प्रमुख चेहरा बनाने की आवाजें तेज हो रही हैं। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने हाल ही में साफ कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी इंडिया अलायंस का नेतृत्व करेंगे। दूसरी ओर गठबंधन के प्रमुख घटक सीपीआई (एम) के महासचिव एमए बेबी ने राहुल गांधी को अभी से प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित करने की चर्चा को ‘जल्दबाजी’ बताया है। उनका कहना है कि गठबंधन ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर कोई फैसला नहीं किया है। यानी 2029 के चेहरे को लेकर अभी से लकीरें खींचने लगी हैं।

मीडिया और सोशल मीडिया में सवाल उठ रहे हैं कि क्या इंडिया ब्लाॅक में नेतृत्व का विवाद बढ़ेगा? क्या कांग्रेस राहुल गांधी के नाम को लेकर धीरे-धीरे सहयोगी दलों पर दबाव बढ़ा रही है? या फिर 2029 की रणनीति में अभी किसी एक चेहरे पर सहमति बनाने के बजाय चुनावी परिस्थितियों का इंतजार किया जाएगा? क्या कांग्रेस राहुल गांधी को सिर्फ अपना नेता बताएगी या उन्हें पूरे विपक्ष का स्वाभाविक चेहरा बनाने की कोशिश करेगी? क्या सीपीआई (एम), समाजवादी पार्टी और दूसरे क्षेत्रीय दल इस पर सहमति जताएंगे? या फिर चुनाव के बाद ही प्रधानमंत्री पद के चेहरे पर फैसला करने की रणनीति अपनाई जाएगी?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के लिए राहुल गांधी को आगे करना स्वाभाविक है। वह लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के सबसे बड़े चेहरे भी हैं। कांग्रेस को लगता है कि 2024 के मुकाबले उसकी लोकसभा स्थिति मजबूत हुई है और राहुल गांधी की विपक्ष के प्रमुख नेता के रूप में भूमिका भी स्थापित हुई है। ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच 2029 के लिए राहुल को सम्भावित प्रधानमंत्री चेहरे के तौर पर पेश करने की मांग बढ़ना असामान्य नहीं है लेकिन विपक्षी गठबंधन की राजनीति कांग्रेस की अपनी राजनीति से अलग है। यहां सवाल केवल कांग्रेस की पसंद का नहीं बल्कि सहयोगी दलों की स्वीकार्यता का भी है। एमए बेबी का बयान इसी अंतर की ओर इशारा करता है। यदि अभी से राहुल गांधी के नाम को गठबंधन का फैसला बताने की कोशिश हुई तो क्षेत्रीय दल असहज हो सकते हैं।

तमिलनाडु की राजनीति ने इस बहस को और पेचीदा कर दिया है। मुख्यमंत्री और टीवीके नेता सी. जोसेफ विजय को लेकर उनके समर्थकों के बीच भविष्य में राष्ट्रीय भूमिका की चर्चा शुरू हो चुकी है। टीवीके की सहयोगी राजनीति में कांग्रेस और अन्य दल भी शामिल हैं लेकिन राहुल गांधी के नाम को लेकर कांग्रेस और विजय समर्थकों के बीच मतभेद के संकेत सामने आए हैं। टीवीके की 9 सितम्बर को हुई बैठक को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। यह विवाद अभी प्रधानमंत्री पद की औपचारिक दावेदारी से ज्यादा किसके नेतृत्व में विपक्ष आगे बढ़ेगा का सवाल है। यदि कांग्रेस 2029 की तैयारी में राहुल गांधी को लगातार राष्ट्रीय चेहरे के रूप में आगे करती है और क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में अलग नेतृत्व की मांग करते हैं तो सीट बंटवारे के समय भी इसका असर दिखाई दे सकता है।

दूसरी सम्भावना यह है कि विपक्षी दल फिलहाल नेतृत्व का सवाल टालकर राज्यों के विधानसभा चुनावों पर ध्यान दें। 2027 के उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और अन्य राज्यों के चुनाव विपक्षी दलों के बीच आपसी ताकत का वास्तविक आकलन भी कर सकते हैं। यदि कांग्रेस इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करती है तो राहुल गांधी की स्वीकार्यता का दावा मजबूत होगा लेकिन यदि क्षेत्रीय दल कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो गठबंधन में नेतृत्व का सवाल और जटिल हो सकता है। प्रधानमंत्री पद के चेहरे से पहले विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग राज्यों में सीटों का तालमेल है। उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस, महाराष्ट्र में विपक्षी घटक दलों और तमिलनाडु में सहयोगियों के बीच सीटों का संतुलन आसान नहीं होगा। यदि सीट बंटवारे पर विवाद बढ़ा तो नेतृत्व का मुद्दा भी उसके साथ जुड़ सकता है।

बहरहाल तस्वीर साफ नहीं है लेकिन संकेत जरूर मिलने लगे हैं कि 2029 की विपक्षी राजनीति में राहुल गांधी बनाम सहयोगी दलों का सवाल धीरे-धीरे बड़ा होता जा रहा है। कांग्रेस के लिए राहुल सबसे स्वाभाविक विकल्प हैं जबकि सहयोगी दलों के लिए गठबंधन की सामूहिक स्वीकार्यता ज्यादा महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में अब सवाल उठने लगा है कि क्या राहुल गांधी 2029 में सिर्फ कांग्रेस का चेहरा होंगे या पूरे विपक्ष का? यदि सहयोगी दलों ने अभी हामी नहीं भरी तो क्या आने वाले महीनों में इंडिया अलायंस के भीतर नेतृत्व की नई खींचतान देखने को मिल सकती है? ऐसे में आने वाले दिनों में कांग्रेस और सहयोगी दलों के बयानों पर नजर रहेगी।

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