सजा, न्याय और इंसानियत के बीच नौ साल की लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट ने एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें मौत की सजा पाने वाले कैदियों को फांसी देने के मौजूदा तरीके को चुनौती दी गई थी। सवाल मृत्युदंड खत्म करने का नहीं बल्कि यह था कि जब राज्य किसी इंसान का जीवन खत्म करने का फैसला करता है तो क्या उसे ऐसा करने का तरीका भी मानवीय, कम पीड़ादायक और गरिमापूर्ण होना चाहिए? अदालत ने बड़ी पीठ को मामला भेजने से इनकार किया है लेकिन विशेषज्ञों के जरिए मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की सम्भावना खुली रखी है। नौ साल चली इस कानूनी लड़ाई ने एक बार फिर वह सवाल हमारे सामने खड़ा कर दिया है जिसका कोई आसान जवाब नहीं है कि न्याय क्या केवल अपराध की गम्भीरता से तय होता है या उस सजा के तरीके से भी, जिसे राज्य अपने हाथों से लागू करता है?
अट्ठारह अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जिस फैसले को अपलोड किया गया, उसका नाम है ‘ऋषि मल्होत्रा बनाम भारत संघ, रिट पिटीशन (क्रिमिनल) नम्बर 145/2017’। मामला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के सामने था। यह याचिका 2017 में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने मृत्युदंड को लेकर दायर की थी। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल की और खुद अदालत में पेश होकर बहस करने की अनुमति मांगी थी। 6 अक्टूबर 2017 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली पीठ जिसमें न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ शामिल थे, ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से बहस करने की अनुमति दी थी।
यहां सबसे पहले उस भ्रम को दूर करना जरूरी है जो इस मामले के नाम की वजह से पैदा हो सकता है। ऋषि मल्होत्रा खुद कोई मृत्युदंड प्राप्त व्यक्ति नहीं हैं और न ही इस मामले में किसी अपराध के आरोपी हैं। वे वकील हैं और उन्होंने उस कानूनी प्रावधान को चुनौती दी थी जिसके तहत मौत की सजा पाए व्यक्ति को फांसी देकर मौत तक पहुंचाने का प्रावधान है। याचिका का केंद्र मृत्युदंड की वैधता नहीं बल्कि मृत्युदंड लागू करने के तरीके की संवैधानिकता और मानवीयता थी। 2017 के शुरुआती आदेश में अदालत ने स्पष्ट कर दिया था कि मल्होत्रा मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता को चुनौती नहीं दे रहे हैं। उनका तर्क था कि किसी व्यक्ति का जीवन कानून द्वारा समाप्त किया जाना तय हो जाने के बाद भी उसकी मृत्यु गरिमापूर्ण और कम से कम पीड़ादायक होनी चाहिए। यही इस मुकदमे की असली ताकत थी। सवाल यह नहीं था कि हत्या के दोषी व्यक्ति को सजा मिलनी चाहिए या नहीं। सवाल इससे ज्यादा असुविधाजनक था कि क्या राज्य को किसी व्यक्ति को मारने का अधिकार मिलने के साथ उसे पीड़ा देने का अधिकार भी मिल जाता है?
2017 में इस सवाल पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि संविधान एक जीवंत और करुणामय दस्तावेज है और समय के साथ विज्ञान तथा सामाजिक सोच में बदलाव होने पर किसी पुराने प्रावधान की संवैधानिक समीक्षा सम्भव है। अदालत ने यह भी कहा था कि विधायिका ऐसे किसी दूसरे तरीके पर विचार कर सकती है जिससे मृत्युदंड पाए व्यक्ति की मृत्यु कम पीड़ा के साथ हो लेकिन इस सवाल का उत्तर आने में लगभग नौ वर्ष लग गए। 22 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। सुनवाई के दौरान अटाॅर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी नेशनल लाॅ यूनिवर्सिटी की एक महत्वपूर्ण पहल ‘प्रोजेक्ट 39ए’ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा और स्वयं अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने दलीलें रखीं। अदालत ने विभिन्न वैकल्पिक तरीकों, वैज्ञानिक अध्ययनों और दुनिया के दूसरे देशों के अनुभवों पर सामग्री मांगी थी।
अब फैसला आ चुका है। याचिका सफल नहीं हुई लेकिन इस फैसले को केवल ‘याचिका खारिज’ कहकर छोड़ देना उस पूरे विवाद को बहुत छोटा कर देना होगा क्योंकि अदालत ने जिस सवाल को अंतिम रूप से खत्म नहीं किया, वह यह है कि भविष्य में सरकार चाहे तो कानून, फाॅरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और अपराधशास्त्र के विशेषज्ञों की मदद से मृत्युदंड लागू करने की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर सकती है। एक दरवाजा बंद हुआ है लेकिन बहस का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं हुआ और शायद यही इस मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण
विरासत है क्योंकि फांसी का सवाल आज का नहीं है। यह उस समय से हमारे साथ है जब मनुष्य ने अपराध और दंड के बीच कोई सम्बंध बनाने की शुरुआत की थी।
विरासत है क्योंकि फांसी का सवाल आज का नहीं है। यह उस समय से हमारे साथ है जब मनुष्य ने अपराध और दंड के बीच कोई सम्बंध बनाने की शुरुआत की थी।
अपराध और दंड का इतिहास
दुनिया की सबसे पुरानी ज्ञात कानून-संहिताओं में ‘उर-नम्मू’ की संहिता का नाम आता है जो लगभग ईसा पूर्व 21वीं सदी की है। इसके बाद ‘हम्मूराबी’ की संहिता आई, जिसमें 282 कानून थे और जिसकी प्रसिद्धि ‘आंख के बदले आंख’ वाले सिद्धांत से जुड़ी है लेकिन दंड का इतिहास केवल प्रतिशोध का इतिहास नहीं है। उसमें धीरे-धीरे यह सवाल भी आया कि अपराधी को दंड देते समय समाज स्वयं कितना क्रूर हो सकता है।
भारत के इतिहास में भी यह प्रश्न बहुत पुराना है। सम्राट अशोक के चौथे स्तम्भ-लेख में मौत की सजा पाए कैदियों को तीन दिन की मोहलत देने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। उन तीन दिनों में परिजन पुनर्विचार की कोशिश कर सकते थे और दोषी व्यक्ति दान या उपवास जैसे धार्मिक कर्म कर सकता था। अशोक ने मृत्युदंड समाप्त नहीं किया था लेकिन उन्होंने मृत्यु और सजा के बीच तीन दिन का मानवीय अंतर जरूर रखा था। आज हम जिस भाषा में दया याचिका, पुनर्विचार और अंतिम अवसर की बात करते हैं, उसकी जड़ें कितनी पुरानी हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है। दुनिया हालांकि धीरे-धीरे बदलती गई। एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार 1977 में जब उसने मृत्युदंड के खिलाफ अपना वैश्विक अभियान शुरू किया था, तब तक 16 देश सभी अपराधों के लिए मृत्युदंड समाप्त कर चुके थे। अब कानून या व्यवहार में मृत्युदंड खत्म करने वाले देशों की संख्या 113 है।
इसी समय एक दूसरा विरोधाभास भी सामने है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की मई 2026 में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2025 में दुनिया में कम से कम 2,707 लोगों को फांसी दी गई। यह 17 देशों में हुई और 2024 की 1,518 फांसियों से 78 प्रतिशत ज्यादा थी। एमनेस्टी के रिकाॅर्ड में यह 1981 के बाद सबसे ज्यादा संख्या है, हालांकि चीन में होने वाली फांसियों के वास्तविक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि वहां यह जानकारी राजकीय गोपनीयता में रखी जाती है लेकिन इस आंकड़े का दूसरा पहलू ज्यादा महत्वपूर्ण है। 2,707 में से कम से कम 2,159 फांसियां ईरान और 356 सऊदी अरब में हुईं। यानी दर्ज वैश्विक संख्या का लगभग पूरा हिस्सा कुछ ही देशों में केंद्रित है। अमेरिका में 47 फांसियां दर्ज हुईं। दुनिया में एक तरफ मृत्युदंड का इस्तेमाल करने वाले देशों का समूह छोटा होता जा रहा है, दूसरी ओर जिन देशों में यह सजा अब भी लागू है, उनमें कुछ सरकारें इसे पहले से अधिक इस्तेमाल कर रही हैं। यही विरोधाभास इस बहस को और कठिन बनाता है।
भारत की कहानी भी इतनी सीधी नहीं है। मृत्युदंड समाप्त करने की मांग आजादी से पहले ही शुरू हो गई थी। विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट के अनुसार 1931 में गया प्रसाद सिंह ने भारतीय दंड संहिता के तहत मृत्युदंड खत्म करने का विधेयक पेश करने की कोशिश की थी। वह प्रस्ताव सफल नहीं हुआ। उसी वर्ष भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को ब्रिटिश सरकार ने फांसी दी। आजादी के बाद संविधान सभा में भी इस पर गम्भीर बहस हुई। 1947-49 के बीच हुई बहसों में मृत्युदंड के मनमाने इस्तेमाल, गरीबों पर उसके असमान प्रभाव और न्यायिक गलती की सम्भावना जैसे सवाल उठे। डाॅ. भीमराव अम्बेडकर की स्थिति भी इस बहस को दिलचस्प बनाती है। वे मृत्युदंड को बनाए रखने के पक्ष में कोई निर्णायक संवैधानिक अनिवार्यता नहीं चाहते थे और संसद को इस विषय पर अंतिम निर्णय लेने की गुंजाइश दी गई। विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट ने संविधान सभा की बहसों को विस्तार से दर्ज किया है। भारत ने अंततः मृत्युदंड को समाप्त नहीं किया लेकिन उसे सामान्य सजा भी नहीं रहने दिया। 1860 की भारतीय दंड संहिता से लेकर आज के भारतीय न्याय संहिता के दौर तक कानून में मृत्युदंड मौजूद है लेकिन 1973 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354(3) ने एक महत्वपूर्ण बदलाव किया। अब मौत की सजा देने वाले न्यायाधीश को ‘विशेष कारण’ दर्ज करने होते हैं। यानी उम्रकैद सामान्य नियम और मृत्युदंड अपवाद की दिशा में कानून आगे बढ़ा।
फिर आया 1980 का ऐतिहासिक ‘बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य’ फैसला। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने मृत्युदंड को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित करने से इनकार किया लेकिन यह सिद्धांत स्थापित किया कि हत्या के मामलों में उम्रकैद सामान्य सजा है और मृत्युदंड केवल ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामलों में दिया जाना चाहिए, जब जीवन भर की कैद का विकल्प पर्याप्त न हो लेकिन यह फैसला सर्वसम्मति नहीं था। जस्टिस पी.एन. भगवती ने असहमति जताते हुए मृत्युदंड को अनुच्छेद 14 और 21 की कसौटी पर असंवैधानिक माना। उनकी चिंता सिर्फ सजा की क्रूरता नहीं थी। उन्हें यह भी आशंका थी कि जब कोई पूरी तरह वस्तुनिष्ठ पैमाना नहीं होगा तो समान अपराधों में अलग-अलग सजा हो सकती है।
चार दशक से ज्यादा समय बाद भी यही सवाल भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने है। 1983 में ‘मिठू बनाम पंजाब राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 303 को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इस धारा के तहत उम्रकैद काट रहे व्यक्ति द्वारा हत्या करने पर मौत की सजा अनिवार्य थी। अदालत ने कहा कि जब न्यायाधीश के पास सजा के मामले में विवेक की कोई गुंजाइश ही नहीं है तो ऐसी व्यवस्था अनुच्छेद 14 और 21 की कसौटी पर टिक नहीं सकती।
फिर 2014 में ‘शत्रुघ्न चैहान बनाम भारत संघ’ का फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दया याचिका पर अत्यधिक और अस्पष्ट देरी भी मौत की सजा पाए व्यक्ति के लिए असहनीय मानसिक पीड़ा बन सकती है। अदालत ने कई मामलों में मौत की सजा को उम्रकैद में बदला और इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक व्यवस्था में प्रतिशोध न्याय का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। इसका अर्थ समझना जरूरी है। भारत में अदालत ने मृत्युदंड को समाप्त नहीं किया लेकिन उसके चारों ओर संवैधानिक सुरक्षा की दीवार लगातार ऊंची की। फिर सवाल आया कि क्या वह दीवार पर्याप्त है? इसके जवाब में आंकड़े परेशान करते हैं।
नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली का ‘प्रोजेक्ट 39ए’ जो अब ‘Square Circle Clinic’ के नाम से काम करता है, ने पिछले दस वर्षों में भारत में मृत्युदंड से सम्बंधित मामलों का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार किया है। उसके 2025 के नवीनतम वार्षिक अध्ययन के अनुसार 2016 से 2025 के बीच ट्रायल अदालतों ने 1,279 लोगों को मौत की सजा दी। उच्च अदालतों में पिछले दशक में जिन 1,085 मौत की सजाओं पर निर्णय हुआ, उनमें केवल 106 यानी लगभग 9.77 प्रतिशत की पुष्टि हुई। 376 मामलों में आरोपी बरी हुए और 515 में मौत की सजा उम्रकैद या दूसरी सजा में बदल दी गई। सुप्रीम कोर्ट का आंकड़ा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। 2016 से 2025 के बीच सुप्रीम कोर्ट के सामने मौत की सजा से जुड़े 153 दोषियों के मामले आए। उनमें 38 लोग बरी हुए, 71 की सजा बदली गई और केवल 19 मामलों में मौत की सजा बरकरार रखी गई। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने जिन 19 मौत की सजा वाले मामलों पर फैसला किया, उनमें 10 लोगों को बरी किया गया, एक दशक में सबसे ज्यादा। अदालत ने पिछले तीन वर्षों में एक भी मौत की सजा की पुष्टि नहीं की है। इन आंकड़ों की दो व्याख्याएं हो सकती हैं। पहली यह कि न्याय व्यवस्था काम कर रही है। निचली अदालत की गलती ऊपर की अदालत पकड़ रही है। दूसरी यह कि अगर मृत्युदंड जैसी अपरिवर्तनीय सजा निचली अदालतों से इतनी बड़ी संख्या में आती है और उनमें से बहुत बड़ी संख्या ऊपर जाकर बदल जाती है तो यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि अंतिम रूप से बची हुई सजा पर हमारा भरोसा कितना पूर्ण हो सकता है। इन दोनों में से किसी एक को ही सच मान लेना आसान है। असली चुनौती यह स्वीकार करना है कि दोनों में कुछ सच्चाई है। 2023 के अंत में भारत में 561 लोग मौत की सजा के तहत थे, लगभग दो दशकों में सबसे बड़ा आंकड़ा। उसी साल ट्रायल अदालतों ने 120 मौत की सजाएं दी थीं लेकिन इनमें से कितने लोग आखिर फांसी तक पहुंचेंगे? इस सवाल का जवाब भारत की जेलों और अदालतों का इतिहास देता है।
भारत में आखिरी फांसी 20 मार्च 2020 को तिहाड़ जेल में निर्भया मामले के चार दोषियों, मुकेश सिंह, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और अक्षय ठाकुर की हुई थी। उसके बाद भारत में कोई और फांसी नहीं हुई। इसका अर्थ यह नहीं है कि मृत्युदंड खत्म हो गया है। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि अदालतों द्वारा दी गई मौत की सजा और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच बहुत बड़ी दूरी है। इस दूरी में साल गुजरते हैं। इसीलिए भारत में मृत्युदंड पर बहस केवल उस एक क्षण की नहीं है जब फंदा लगाया जाता है। असली सवाल उन वर्षों का भी है जो कोई व्यक्ति मौत की प्रतीक्षा में जेल में बिताता है।
यह साबित नहीं कि मृत्युदंड का डर अपराध रोक पाता है
‘प्रोजेक्ट 39ए’ के 2021 के ‘मृत्युदंड योग्य’ मामलों में पांच राज्यों की जेलों में 88 मौत की सजा पाए कैदियों का अध्ययन किया गया। अध्ययन में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गम्भीर समस्याओं का उल्लेख हुआ। 87 लोगों के उपलब्ध आंकड़ों में 13.8 प्रतिशत ने आत्महत्या के विचारों की रिपोर्ट की। अध्ययन ने यह भी दिखाया कि मौत की सजा की प्रतीक्षा स्वयं मानसिक स्वास्थ्य पर गम्भीर प्रभाव डाल सकती है। यहां बहस अचानक अपराधी से हटकर व्यवस्था पर आ जाती है। क्या मौत की सजा केवल वह क्षण है जब फांसी दी जाती है? या वह कई साल पहले शुरू हो जाती है, जब किसी कैदी को पता होता है कि राज्य के पास एक दिन उसकी जान लेने का अंतिम आदेश मौजूद है? इसी सवाल का दूसरा पहलू है, गलती। जेल से छोड़ा गया निर्दोष व्यक्ति अपने परिवार के पास लौट सकता है। उसके जीवन के खोए हुए साल वापस नहीं आते लेकिन उसका जीवन वापस मिलता है। फांसी पर चढ़ा दिया गया निर्दोष व्यक्ति वापस नहीं आ सकता।
यही मृत्युदंड के खिलाफ सबसे कठिन और सबसे गम्भीर तर्क है। इसके जवाब में मृत्युदंड के समर्थकों का तर्क भी उतना ही गम्भीर है। वे पूछते हैं कि अगर किसी व्यक्ति ने जानबूझकर किसी निर्दोष की हत्या की, किसी बच्चे के साथ जघन्य अपराध किया, आतंकवादी हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की हत्या की तो क्या समाज को उसके अपराध के लिए सबसे कठोर सजा देने का अधिकार नहीं होना चाहिए? यह प्रश्न भावनात्मक है लेकिन केवल भावनात्मक नहीं है। यह दंड के उद्देश्य से जुड़ा है। क्या सजा का उद्देश्य प्रतिशोध है? क्या वह समाज को सुरक्षित रखने के लिए है? क्या वह अपराधी को रोकने के लिए है? क्या वह दूसरे लोगों के लिए चेतावनी है? या न्याय का उद्देश्य केवल इतना है कि अपराध के अनुपात में दंड दिया जाए? यहीं विज्ञान भी प्रवेश करता है लेकिन विज्ञान ने भी इस बहस का अंतिम उत्तर नहीं दिया है।
अमेरिका की ‘नेशनल रिसर्च काउंसिल’ ने 2012 में मृत्युदंड और अपराध रोकने के उसके प्रभाव पर उपलब्ध शोध की समीक्षा की। समिति के अध्यक्ष कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डेनियल नैगिन थे। निष्कर्ष यह था कि उपलब्ध शोध यह तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि मृत्युदंड हत्या की दर कम करता है, बढ़ाता है या कोई प्रभाव नहीं डालता। शोधों में दूसरी सजाओं, विशेषकर गैर-मृत्युदंड वाली सजाओं के प्रभाव को पर्याप्त रूप से अलग नहीं किया गया था। अर्थात विज्ञान यह साबित नहीं कर पाया कि फांसी अपराध रोकती है लेकिन यह भी विज्ञान ने साबित नहीं किया कि फांसी से अपराध पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। किसी बात के पक्ष में प्रमाण न मिलना और उसके गलत होने का प्रमाण मिलना एक ही बात नहीं है।
शायद यही वजह है कि मृत्युदंड का अंतिम फैसला विज्ञान नहीं कर सकता। वह अंततः कानून, नैतिकता और समाज की उस समझ पर निर्भर करता है कि राज्य को अपने नागरिक का जीवन समाप्त करने की कितनी शक्ति दी जानी चाहिए।
शायद यही वजह है कि मृत्युदंड का अंतिम फैसला विज्ञान नहीं कर सकता। वह अंततः कानून, नैतिकता और समाज की उस समझ पर निर्भर करता है कि राज्य को अपने नागरिक का जीवन समाप्त करने की कितनी शक्ति दी जानी चाहिए।
अब विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट पर लौटिए। 2015 में जारी इस रिपोर्ट ने कहा था कि आतंकवाद और देश के खिलाफ युद्ध जैसे सीमित मामलों को छोड़कर मृत्युदंड समाप्त किया जाना चाहिए। आयोग ने चिंता जताई कि ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ का सिद्धांत व्यवहार में काफी हद तक न्यायाधीश-केंद्रित हो गया है और समान मामलों में अलग-अलग परिणाम सामने आ सकते हैं। रिपोर्ट ने यह भी कहा कि गरीब और वंचित लोगों पर मृत्युदंड का प्रभाव असमान हो सकता है और मानवीय गलती की सम्भावना को कभी पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता लेकिन यहां भी पूरी तस्वीर एकतरफा नहीं थी। रिपोर्ट पर आयोग के सभी सदस्यों ने हस्ताक्षर नहीं किए थे। तीन सदस्यों ने अलग-अलग असहमति दर्ज की। उनका तर्क था कि अपराध की गम्भीरता, समाज की सुरक्षा और मृत्युदंड के सम्भावित निवारक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यानी जिस आयोग की रिपोर्ट को अक्सर मृत्युदंड खत्म करने की सिफारिश के रूप में उद्धृत किया जाता है, उसी दस्तावेज में असहमति की आवाज भी मौजूद है। इसीलिए इस बहस में ईमानदार पत्रकारिता का पहला नियम शायद यही है कि केवल अपनी पसंद का आंकड़ा न चुना जाए। भारत में मृत्युदंड पर बहस करते हुए धनंजय चटर्जी का मामला भी बार-बार सामने आता है।14 अगस्त 2004 को कोलकाता की अलीपुर जेल में धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई। वह उनका 39वां जन्मदिन था। राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने उनकी दया याचिका खारिज कर दी थी। धनंजय ने आखिरी समय तक अपनी बेगुनाही का दावा किया था। बाद के वर्षों में कुछ शोधकर्ताओं ने मामले के साक्ष्यों और जांच की विसंगतियों पर सवाल उठाए लेकिन यह स्पष्ट रहना चाहिए कि अदालतों ने उनकी दोषसिद्धि को स्वीकार किया था और उन्हें कानून की नजर में दोषी मानकर ही फांसी दी गई। बाद के शोध या वैकल्पिक व्याख्याएं न्यायिक निर्णय को अपने आप पलट नहीं देतीं।
इस मामले से एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर निकलता है। अगर किसी दिन यह साबित हो जाए कि न्यायिक गलती हुई थी तो क्या उस गलती को सुधारा जा सकता है? मृत्युदंड का सबसे बड़ा संकट यहीं है। जेल की दीवारें खोली जा सकती हैं। सजा बदली जा सकती है। मुआवजा दिया जा सकता है लेकिन फांसी वापस नहीं ली जा सकती। शायद यही कारण है कि मृत्युदंड के समर्थक भी एक कठिन शर्त के सामने खड़े होते हैं कि क्या हमारी न्याय व्यवस्था इतनी त्रुटिहीन है कि राज्य को किसी व्यक्ति के जीवन पर अंतिम मुहर लगाने का अधिकार दिया जा सके? भारत का जवाब अब तक ‘हां लेकिन केवल रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में’ रहा है।
ऋषि मल्होत्रा की नौ साल लम्बी लड़ाई ने इस जवाब के भीतर एक और प्रश्न जोड़ दिया कि अगर राज्य को फांसी देने का अधिकार है तो क्या उसे फांसी देने के तरीके को भी समय-समय पर विज्ञान और मानवीय गरिमा की कसौटी पर जांचना नहीं चाहिए? दुनिया के 113 देश मृत्युदंड पूरी तरह समाप्त कर चुके हैं। 145 देश कानून या व्यवहार में उससे दूर जा चुके हैं। दूसरी तरफ 2025 में दुनिया में दर्ज 2,707 फांसियां बताती हैं कि यह सजा अभी खत्म होने से बहुत दूर है। भारत इन दोनों दुनियाओं के बीच खड़ा है। यह मृत्युदंड को कानूनी तौर पर बनाए रखता है लेकिन उसका इस्तेमाल अत्यंत सीमित करता है। यह ‘रेयरेस्ट आॅफ रेयर’ कहता है लेकिन निचली अदालतों द्वारा दी गई बड़ी संख्या में मौत की सजाएं ऊपर की अदालतों में बदल जाती हैं। यह न्यायिक गलती की सम्भावना को स्वीकार करता है लेकिन मृत्युदंड को पूरी तरह खत्म नहीं करता। यह दया याचिका की व्यवस्था रखता है लेकिन कई मामलों में फैसला आने में वर्षों लगते हैं। यह फांसी को कानूनन लागू करता है लेकिन 2020 के बाद अब तक किसी को फांसी नहीं दी गई। यही भारत की मृत्युदंड व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास है। कानून में सजा जिंदा है। अदालतों में सजा जिंदा है लेकिन व्यवहार में उसका इस्तेमाल बेहद दुर्लभ है तो क्या भारत को इसे खत्म कर देना चाहिए? या फिर ऐसे अपराध हैं जिनके लिए समाज को यह अंतिम दंड बनाए रखना चाहिए? इस सवाल का कोई आसान उत्तर नहीं है। उस पिता से पूछिए जिसकी बेटी हत्या के बाद कभी घर नहीं लौटी। उसके लिए अपराधी की जिंदगी बचाना न्याय का अपमान लग सकता है।
उस व्यक्ति से भी पूछिए जो वर्षों बाद अदालत से बरी हुआ। उसके लिए यह सवाल अलग होगा कि अगर उसके सिर पर फांसी का फैसला कायम रहता तो? दोनों दर्द वास्तविक हैं। एक तरफ पीड़ित का अधिकार है, वहीं ओर अभियुक्त का जीवन और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता। एक तरफ समाज की सुरक्षा है। दूसरी ओर राज्य की शक्ति पर संवैधानिक नियंत्रण। इनके बीच खड़ा है न्यायाधीश, जिसे अंततः एक ऐसा फैसला करना पड़ता है जिसे गलत साबित होने पर वापस नहीं लिया जा सकता। शायद इसलिए मृत्युदंड पर बहस को केवल ‘अपराधी के पक्ष’ और ‘पीड़ित के पक्ष’ में बांटना बहुत आसान लेकिन बहुत अधूरा तरीका है। असल सवाल यह है कि एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक राज्य अपने सबसे जघन्य अपराधी के साथ भी कितना मानवीय रह सकता है और ऐसा करते हुए पीड़ित के न्याय के अधिकार को कैसे सुरक्षित रख सकता है।
ऋषि मल्होत्रा अपनी नौ साल की लड़ाई में अदालत से वह नहीं मनवा सके जो वे चाहते थे। फांसी का मौजूदा तरीका खत्म नहीं हुआ लेकिन उनकी याचिका ने एक ऐसा प्रश्न अदालत के सामने रख दिया जिसे आने वाली पीढ़ियां शायद फिर पूछेंगी। मृत्युदंड रहेगा या नहीं कि यह बहस संसद और समाज के सामने अभी बाकी है लेकिन जब तक यह सजा कानून में है, एक और सवाल हमेशा रहेगा कि जिस राज्य से हम न्याय की उम्मीद करते हैं क्या उसे किसी इंसान की आखिरी सांस तक भी गरिमा की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए?
नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली का ‘प्रोजेक्ट 39ए’ जो अब ‘Square Circle Clinic’ के नाम से काम करता है, ने पिछले दस वर्षों में भारत में मृत्युदंड से सम्बंधित मामलों का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार किया है। उसके 2025 के नवीनतम वार्षिक अध्ययन के अनुसार 2016 से 2025 के बीच ट्रायल अदालतों ने 1,279 लोगों को मौत की सजा दी। उच्च अदालतों में पिछले दशक में जिन 1,085 मौत की सजाओं पर निर्णय हुआ, उनमें केवल 106 यानी लगभग 9.77 प्रतिशत की पुष्टि हुई। 376 मामलों में आरोपी बरी हुए और 515 में मौत की सजा उम्रकैद या दूसरी सजा में बदल दी गई। सुप्रीम कोर्ट का आंकड़ा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। 2016 से 2025 के बीच सुप्रीम कोर्ट के सामने मौत की सजा से जुड़े 153 दोषियों के मामले आए। उनमें 38 लोग बरी हुए, 71 की सजा बदली गई और केवल 19 मामलों में मौत की सजा बरकरार रखी गई। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने जिन 19 मौत की सजा वाले मामलों पर फैसला किया, उनमें 10 लोगों को बरी किया गया, एक दशक में सबसे ज्यादा। अदालत ने पिछले तीन वर्षों में एक भी मौत की सजा की पुष्टि नहीं की है। भारत में आखिरी फांसी 20 मार्च 2020 को तिहाड़ जेल में निर्भया मामले के चार दोषियों, मुकेश सिंह, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और अक्षय ठाकुर की हुई थी। उसके बाद भारत में कोई और फांसी नहीं हुई। इसका अर्थ यह नहीं है कि मृत्युदंड खत्म हो गया है। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि अदालतों द्वारा दी गई मौत की सजा और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच बहुत बड़ी दूरी है। इस दूरी में साल गुजरते हैं। इसीलिए भारत में मृत्युदंड पर बहस केवल उस एक क्षण की नहीं है जब फंदा लगाया जाता है। असली सवाल उन वर्षों का भी है जो कोई व्यक्ति मौत की प्रतीक्षा में जेल में बिताता है
