मोदी कैबिनेट में सम्भावित फेरबदल और विस्तार को लेकर राजनीतिक हलकों में लगातार कयास लगाए जा रहे हैं। किसे मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी, किसका विभाग बदलेगा और किस मंत्री की छुट्टी हो सकती है, इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। इसी बीच केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के एक बयान ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। गडकरी नागपुर जिले के काटोल में आयोजित ‘एकलव्य एकल विद्यालय शिक्षक-पर्यवेक्षक प्रशिक्षण क्लास’ कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस दौरान उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में 30 साल से अधिक के सफर का जिक्र करते हुए नई पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि जिस गति से उन्होंने काम किया है, सम्भव है कि आने वाले समय में वे उसी गति से काम न कर पाएं। इसलिए नई पीढ़ी को आगे आकर जिम्मेदारी सम्भालनी चाहिए। हालांकि गडकरी ने न तो मंत्रिमंडल छोड़ने की बात कही है और न ही राजनीति से संन्यास का कोई संकेत दिया है लेकिन इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगा कि क्या यह उनके सक्रिय राजनीतिक जीवन में बदलाव का संकेत है? गडकरी के कार्यालय की ओर से भी इस पूरे मामले पर सफाई दी गई है। उनके कार्यालय ने कहा कि बयान राजनीति या मंत्रिमंडल से जुड़ा नहीं था। गडकरी जिस लक्ष्मणराव मानकर ट्रस्ट से जुड़े हैं, उसके कामकाज और भविष्य के नेतृत्व के संदर्भ में उन्होंने नई पीढ़ी को जिम्मेदारी देने की बात कही थी। दिलचस्प यह है कि गडकरी इससे पहले भी नई पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपने की बात कह चुके हैं। इसी साल जनवरी में नागपुर के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि धीरे-धीरे पीढ़ी में बदलाव होना चाहिए और जब व्यवस्था सुचारू रूप से चलने लगे तो वरिष्ठ लोगों को पीछे हटकर दूसरी जिम्मेदारियां सम्भालनी चाहिए। ऐसे में गडकरी के ताजा बयान ने एक बार फिर सियासी अटकलों को जन्म जरूर दिया है। सवाल है कि गडकरी का बयान सिर्फ नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की सलाह है या आने वाले समय में कोई बड़ा सियासी बदलाव होने वाला है।
पंजाब में बदलेगा सियासी गणित?
पंजाब में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच नए सियासी समीकरणों को लेकर चर्चाएं जोर पकड़ने लगी हैं। खासतौर पर भाजपा और अकाली दल के बीच सम्भावित तालमेल को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि भाजपा की ओर से सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कही गई है लेकिन सम्भावित गठबंधन और सीट बंटवारे को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं जारी हैं। इसी बीच अलग-अलग दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं का भाजपा में शामिल होना भी चर्चा का विषय बना हुआ है। आप, कांग्रेस और अकाली दल से जुड़े कार्यकर्ताओं के भाजपा में जाने को पार्टी के संगठन और जनाधार के विस्तार की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पंजाब में मुकाबला सिर्फ सत्ता और विपक्ष के बीच रहेगा या चुनाव से पहले गठबंधन और दल-बदल की राजनीति कोई नया मोड़ लेगी? क्या आने वाले महीनों में राज्य का सियासी गणित पूरी तरह बदल सकता है? राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यदि दल-बदल का सिलसिला आगे भी जारी रहता है तो भाजपा आगामी चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। हालांकि उसके सामने पंजाब में मजबूत संगठन खड़ा करने और स्थानीय स्तर पर स्वीकार्य नेतृत्व तैयार करने की चुनौती भी है। दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर एकजुटता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। पार्टी के नेताओं के बीच मतभेद और गुटबाजी की चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। वहीं शिरोमणि अकाली दल के सामने अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की बड़ी चुनौती है। उसके लिए 2027 का चुनाव संगठन और जनाधार, दोनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा
राजनीतिक दलों की रणनीति और सम्भावित गठबंधनों की तस्वीर भी साफ होती जाएगी। फिलहाल पंजाब में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अगली सरकार किसकी बनेगी बल्कि यह भी है कि चुनाव से पहले कौन किसके साथ खड़ा होगा और कौन किसका सियासी खेल बिगाड़ेगा।
बसपा बढ़ाएगी भाजपा-सपा की चिंता?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सियासी गतिविधियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच जहां आमने-सामने की राजनीतिक लड़ाई के संकेत दिखाई दे रहे हैं तो वहीं बहुजन समाज पार्टी की सक्रियता ने मुकाबले को एक नया कोण दे दिया है। बसपा एक बार फिर अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। पार्टी प्रमुख मायावती ने बीते 31 अगस्त को पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक बुलाई थी। बताया जा रहा है कि बैठक में विधानसभा चुनाव की तैयारियों, प्रत्याशी चयन और संगठन को मजबूत करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई है। बसपा पहले ही संकेत दे चुकी है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में किसी बड़े गठबंधन का हिस्सा बनने के बजाय अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या मायावती की यह रणनीति भाजपा और सपा दोनों के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बसपा अपने पारम्परिक सामाजिक आधार को दोबारा मजबूत करने में सफल रहती है तो कई सीटों पर मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है। खासकर उन विधानसभा क्षेत्रों में जहां भाजपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला माना जाता है, वहां बसपा की मजबूत मौजूदगी वोटों के गणित को बदल सकती है। कुछ सीटों पर बसपा का मामूली वोट प्रतिशत भी चुनावी नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में पहुंच सकता है। हालांकि बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पुराने जनाधार को वापस खड़ा करने की है। पार्टी को संगठन में नई ऊर्जा भरने के साथ-साथ युवा मतदाताओं और उन सामाजिक वर्गों के बीच भी अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी जो पिछले कुछ चुनावों में दूसरे दलों की ओर चले गए हैं। यदि बसपा दलित वोटों में सेंध लगाने में सफल रहती है तो सपा की रणनीति प्रभावित हो सकती है। भाजपा के लिए भी बसपा की सक्रियता महत्वपूर्ण है क्योंकि विपक्षी वोटों का बंटवारा कई सीटों पर उसके लिए राजनीतिक लाभ की स्थिति पैदा कर सकता है।
आरक्षण की आंच, भाजपा की फांस?
कुछ ही महीनों बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश सहित कई राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुए ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ ने भाजपा के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। खास बात यह है कि आंदोलन में बड़ी संख्या में ऐसे युवा और वर्ग नजर आ रहे हैं जिन्हें भाजपा का परम्परागत समर्थक माना जाता रहा है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह आंदोलन आने वाले चुनाव में भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है? क्या भाजपा इस आंदोलन को समय रहते संभाल पाएगी या 2027 की चुनावी बिसात पर यही मुद्दा उसके लिए नई परेशानी बन जाएगा? क्या आरक्षण का सवाल भाजपा के लिए ‘आगे कुआं, पीछे खाई’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है? राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आरक्षण खत्म करने अथवा उसमें बड़े बदलाव की मांग को लेकर चल रहे इस आंदोलन में आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने जैसी मांगें उठाई जा रही हैं। आंदोलनकारियों का तर्क है कि आरक्षण का आधार जाति के बजाय आर्थिक स्थिति और जरूरत को बनाया जाना चाहिए। हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों और भाजपा नेताओं के बीच बातचीत की कोशिश भी हुई है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी इस मुद्दे को नजरअंदाज करने के बजाय संवाद के जरिए सम्भालने की कोशिश कर रही है लेकिन भाजपा के सामने असली चुनौती यहीं से शुरू होती है। पार्टी यदि आरक्षण विरोधी मांगों के प्रति नरम रुख अपनाती है तो उसके दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में गलत संदेश जाने का खतरा हो सकता है। वहीं यदि पार्टी आंदोलन से पूरी तरह दूरी बनाती है तो उसके पारम्परिक सवर्ण समर्थक वर्ग के एक हिस्से में नाराजगी पैदा होने की आशंका है। अब सभी की नजरें भाजपा और केंद्र सरकार की अगली रणनीति पर है। उत्तर प्रदेश में भाजपा और सपा के बीच 2027 का मुकाबला मुख्य रूप से सामाजिक समीकरणों पर भी निर्भर रहने वाला है। सपा पहले ही आरक्षण और सामाजिक न्याय को अपने राजनीतिक एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रही है। ऐसे में भाजपा के लिए आरक्षण के सवाल पर संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। यदि आंदोलन का दायरा बढ़ता है तो कांग्रेस और सपा इसे भाजपा के खिलाफ चुनावी मुद्दा बना सकती है। दूसरी ओर भाजपा सम्भवतः आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बनाने वाली रणनीति पर जोर दे सकती है।