क्या देश का मिजाज बदलने लगा है?

जनवरी में ‘इंडिया टूडे’ सी-वोटर के ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे में एनडीए को 352 सीटों के साथ स्पष्ट बढ़त मिल रही थी जबकि अगस्त में सामने आए ‘पोल ट्रैकरे’ के नए सर्वे में इंडिया गठबंधन को 280 और एनडीए को 240 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इससे भी बड़ा राजनीतिक संकेत प्रधानमंत्री पद की पसंद को लेकर है, जहां सर्वे में राहुल गांधी को 58 प्रतिशत और नरेंद्र मोदी को 42 प्रतिशत समर्थन सामने आया है। ये आंकड़े चुनाव का परिणाम नहीं हैं लेकिन जनवरी से अगस्त के बीच बदलती राजनीतिक धारणा, युवाओं का असंतोष, रोजगार-परीक्षा जैसे सवालों और विपक्ष की बढ़ती स्वीकार्यता के बीच देश के बदलते मिजाज की एक तस्वीर जरूर पेश करते हैं

क्या देश की जनता का मिजाज बदलने लगा है? लोकसभा चुनाव अभी दूर हैं लेकिन भारतीय राजनीति में यह सवाल अब अचानक ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। अगस्त में सामने आए एक नए सर्वे ने राजनीतिक गलियारों में इसलिए हलचल पैदा की है क्योंकि कुछ महीने पहले तक जिस राजनीतिक तस्वीर में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाला एनडीए स्पष्ट बढ़त में दिखाई दे रहा था, उसी तस्वीर में अब विपक्षी इंडिया गठबंधन को बहुमत के पार और एनडीए को बहुमत से नीचे बताया जा रहा है। पोल ट्रैकर के ‘मूड ऑफ द इंडिया 2026’ सर्वे के मुताबिक अगर आज लोकसभा चुनाव होते हैं तो इंडिया गठबंधन को 280 सीटें, एनडीए को 240 सीटें और अन्य दलों को 23 सीटें मिल सकती हैं। वोट शेयर में भी इंडिया अलायंस को 44 प्रतिशत, एनडीए को 40 प्रतिशत और अन्य को 16 प्रतिशत बताया गया है। सर्वे के अनुसार यह तस्वीर 3 जुलाई से 7 अगस्त के बीच के राजनीतिक मूड को दर्शाती है।

आज आम चुनाव हुए तो राहुल हैं पीएम पद की पहली पसंद
इस सर्वे की सबसे बड़ी राजनीतिक खबर हालांकि 280 और 240 सीटों के बीच का अंतर नहीं है। असली खबर प्रधानमंत्री पद की पसंद को लेकर सामने आया आंकड़ा है। पोल ट्रैकर के मुताबिक अगर आज प्रधानमंत्री चुनने के लिए जनता से पूछा जाए तो राहुल गांधी को 58 प्रतिशत और नरेंद्र मोदी को 42 प्रतिशत लोगों की पसंद बताया गया है। यानी इस सर्वे में राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद की पसंद के सवाल पर मोदी से 16 प्रतिशत अंक आगे हैं। इससे भी आगे बढ़कर युवा नेतृत्व के सवाल पर ट्रैकर पोल के एक अन्य आंकड़े में राहुल गांधी को 69 प्रतिशत और नरेंद्र मोदी को 23 प्रतिशत पसंद किया गया है जबकि बाकी विकल्पों को बहुत कम समर्थन मिला है।
इन आंकड़ों को अंतिम चुनावी नतीजा मानना जल्दबाजी होगी। भारत जैसे विशाल और विविध देश में किसी भी राष्ट्रीय चुनाव का परिणाम केवल प्रधानमंत्री की लोकप्रियता या किसी एक सर्वेक्षण से तय नहीं होता लेकिन इस सर्वे का राजनीतिक महत्व इसलिए है क्योंकि यह उस समय सामने आया है जब पिछले कुछ महीनों में युवाओं, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, आर्थिक दबाव और सरकार की जवाबदेही को लेकर राजनीतिक बहस का स्वर बदलता दिखाई दे रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जनवरी में सामने आई तस्वीर और अगस्त में सामने आई तस्वीर के बीच बड़ा अंतर है। सवाल इसलिए यह नहीं है कि अभी किसकी सरकार बनने जा रही है बल्कि यह है कि क्या मतदाता के मन में सरकार और विपक्ष को लेकर धारणा बदलनी शुरू हो गई है?
जनवरी में एनडीए के पक्ष में थी हवा
जनवरी 2026 में इंडिया टूडे सी-वोटर के ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे ने बिल्कुल अलग राजनीतिक तस्वीर पेश की थी। उस सर्वे के मुताबिक यदि उस समय लोकसभा चुनाव होते तो एनडीए को 352 सीटें मिल सकती थीं जबकि इंडिया गठबंधन को 182 सीटों पर रोक दिया गया था। यानी सत्ता पक्ष को विपक्ष से 170 सीटों की बढ़त दिखाई गई थी। यह वह समय था जब नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद एनडीए कई राज्यों में मिली चुनावी सफलताओं से उत्साहित था और विपक्षी गठबंधन के भीतर नेतृत्व, रणनीति तथा आपसी तालमेल को लेकर सवाल उठ रहे थे। जनवरी की यह तस्वीर बताती थी कि सरकार के खिलाफ तत्काल कोई बड़ी राष्ट्रीय एंटी इन्कमबेंसी लहर दिखाई नहीं दे रही थी और नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी भी सत्ता पक्ष की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई थी लेकिन अगस्त के सर्वे में वही राजनीतिक समीकरण पूरी तरह अलग दिखाई देता है। अब इंडिया गठबंधन को 280 सीटों के साथ बहुमत के आंकड़े से आठ सीट ऊपर बताया जा रहा है जबकि एनडीए को 240 सीटों पर रखा गया है। यदि इस आंकड़े को केवल एक सर्वे के अनुमान के रूप में देखें तो यह किसी चुनावी परिणाम का प्रमाण नहीं है लेकिन अगर इसे जनवरी से अगस्त तक बदलते राजनीतिक माहौल की पृष्ठभूमि में देखें तो यह जरूर पूछने का आधार देता है कि आखिर इतने कम समय में सत्ता के पक्ष में दिखाई दे रहा आत्मविश्वास किस तरह कमजोर हुआ और विपक्ष की स्वीकार्यता किस तरह बढ़ती दिखाई दी?
यहां यह भी समझना जरूरी है कि दोनों सर्वे अलग-अलग संस्थाओं के हैं और इसलिए उनके आंकड़ों को सीधे-सीधे एक ही सीरीज के आंकड़ों की तरह तुलना करना उचित नहीं होगा। फिर भी राजनीति में हर सर्वे एक समय विशेष का मूड कैप्चर करने का प्रयास करता है। जनवरी में 352 सीटों की तस्वीर और अगस्त में 240 सीटों की तस्वीर को एक साथ रखकर देखने पर यह जरूर दिखाई देता है कि राजनीतिक धारणा स्थिर नहीं है। मतदाता के सामने नए मुद्दे आ रहे हैं, सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन बदल सकता है और विपक्ष को लेकर बनी पुरानी धारणाएं भी धीरे-धीरे बदल सकती हैं।
सबसे बड़ा संकेत मोदी बनाम राहुल की बदलती तस्वीर
पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति को समझने का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता रहा है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की सफलता के पीछे पार्टी का संगठन, हिंदुत्व की राजनीति, विपक्ष की कमजोरी और क्षेत्रीय समीकरण अपनी जगह थे लेकिन चुनावी मुकाबले का केंद्रीय चेहरा नरेंद्र मोदी ही रहे। भाजपा का अभियान अक्सर सरकार की उपलब्धियों से आगे बढ़कर मोदी की व्यक्तिगत विश्वसनीयता, निर्णायक नेतृत्व और मजबूत प्रधानमंत्री की छवि पर केंद्रित रहा। यही वजह है कि किसी भी चुनावी सर्वे में प्रधानमंत्री पद की पसंद का सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
ऐसे में पोल ट्रैकर के सर्वे में राहुल गांधी का 58 प्रतिशत और नरेंद्र मोदी का 42 प्रतिशत पर होना निश्चित रूप से बड़ा राजनीतिक संकेत है। यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पूरे देश में राहुल गांधी मोदी से लोकप्रिय हो गए हैं क्योंकि दूसरे सर्वेक्षणों में अलग तस्वीर मिल सकती है और इस सर्वे की स्वतंत्र पुष्टि भी आवश्यक है लेकिन अगर किसी राष्ट्रीय सर्वे में पहली बार विपक्ष के प्रमुख चेहरे को प्रधानमंत्री पद की पसंद के सवाल पर मौजूदा प्रधानमंत्री से 16 प्रतिशत अंक आगे दिखाया जाता है तो यह विपक्ष के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से बड़ा बदलाव है। खासकर तब जब पिछले कई वर्षों में राहुल गांधी को भाजपा और उसके समर्थक वर्ग की ओर से लगातार कमजोर राजनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है।
राहुल गांधी की राजनीति में 2022-23 के बाद जो बदलाव दिखाई दिया, वह भी इस आंकड़े को समझने में महत्वपूर्ण है। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और बाद में ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ ने राहुल गांधी की सार्वजनिक छवि को एक अलग रूप दिया। उन्होंने रोजगार, बेरोजगारी, सामाजिक न्याय, संविधान, आर्थिक असमानता और किसानों के सवालों को लगातार उठाया। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन 2019 के मुकाबले बेहतर हुआ और राहुल गांधी विपक्षी राजनीति के केंद्रीय चेहरे के रूप में पहले से ज्यादा स्वीकार्य दिखाई दिए। चुनाव परिणामों ने भी यह दिखाया कि विपक्ष को पूरी तरह समाप्त मान लेना राजनीतिक भूल होगी।
युवाओं के बीच राहुल की बड़ी बढ़त का मतलब
इस सर्वे का शायद सबसे चैंकाने वाला आंकड़ा युवा नेतृत्व को लेकर है। पोल ट्रैकर के मुताबिक युवाओं से पूछा गया कि वे अपने भविष्य के लिए किसे नेता मानते हैं तो राहुल गांधी को 69 प्रतिशत और नरेंद्र मोदी को 23 प्रतिशत पसंद किया गया।  यह आंकड़ा प्रधानमंत्री पद की पसंद वाले 58 बनाम 42 के आंकड़े से अलग सवाल पर आधारित है, इसलिए दोनों को एक नहीं माना जाना चाहिए लेकिन दोनों आंकड़ों को साथ रखें तो एक दिलचस्प राजनीतिक संकेत जरूर निकलता है कि युवा मतदाता के एक हिस्से के बीच विपक्षी नेतृत्व को लेकर स्वीकार्यता बढ़ती हुई दिखाई जा रही है।
भारत की राजनीति में युवाओं का महत्व इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि देश की बड़ी आबादी युवा है और आने वाले चुनावों में पहली बार मतदान करने वाले तथा नौकरी की तलाश कर रहे युवा मतदाताओं की संख्या निर्णायक हो सकती है। इस वर्ग के लिए राजनीति केवल राष्ट्रवाद या नेतृत्व की लोकप्रियता का सवाल नहीं है। उसके सामने शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षा, नौकरी, सरकारी भर्ती, निजी क्षेत्र में अवसर, कौशल और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा जैसे सवाल हैं। जब इन सवालों पर असंतोष बढ़ता है तो उसका असर धीरे-धीरे राजनीतिक पसंद पर पड़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि पिछले कुछ समय में प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक का मुद्दा सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन गया है। परीक्षा की तैयारी में वर्षों लगाने वाले युवाओं के लिए एक पेपर लीक केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है। इसका अर्थ समय, पैसा और भविष्य का नुकसान है। ऐसे मुद्दों पर सरकार से जवाबदेही की मांग बढ़ना स्वाभाविक है। यदि यह असंतोष लगातार बना रहता है तो वह किसी चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बन सकता है। जुलाई में सी-वोटर के एक स्नैप पोल में पेपर लीक से निपटने के सरकार के तरीके को लेकर एनडीए समर्थकों के बीच भी असंतोष सामने आया था। ‘दि प्रिंट’ पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक करीब एनडीए के मतदाता इस मामले में सरकार के प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं थे।
रोजगार का सवाल अब राजनीतिक सवाल है
भारत में बेरोजगारी और रोजगार की कमी वर्षों से बहस का विषय रही है लेकिन पिछले कुछ समय में इस मुद्दे का चरित्र बदलता दिखाई दिया है। पहले बेरोजगारी को आर्थिक समस्या के रूप में देखा जाता था, अब यह राजनीतिक जवाबदेही का प्रश्न बन रही है। लाखों युवा सरकारी नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। कई बार भर्ती प्रक्रिया लम्बी होती है, परीक्षा रद्द होती है, पेपर लीक होता है या परिणाम को लेकर विवाद पैदा होता है। दूसरी ओर निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसरों और वेतन को लेकर भी युवाओं की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पातीं।
सरकार के लिए चुनौती यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ने के बावजूद उस विकास का अनुभव हर वर्ग और हर परिवार को समान रूप से नहीं होता। जीडीपी की वृद्धि, एक्सप्रेसवे, रेलवे, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक निवेश जैसे आंकड़े महत्वपूर्ण हैं लेकिन वोट डालते समय परिवार यह भी देखता है कि उसके बेटे-बेटी के लिए नौकरी का अवसर कितना बढ़ा है। किसान यह देखता है कि उसकी लागत और आमदनी का संतुलन क्या है। छोटा व्यापारी यह देखता है कि उसका कारोबार कितना आसान हुआ है। मध्यमवर्ग यह देखता है कि महंगाई और करों के बाद उसकी वास्तविक बचत कितनी रह गई है। यही वो जगह है जहां सरकार की उपलब्धियों और जनता के अनुभव के बीच अंतर पैदा हो सकता है। यदि सरकार कहती है कि अर्थव्यवस्था मजबूत है लेकिन युवा नौकरी की तलाश में भटक रहा है तो उसके लिए सरकार की आर्थिक उपलब्धियां व्यक्तिगत अनुभव से कमजोर पड़ सकती हैं। राजनीति में धारणा ;चमतबमचजपवदद्ध अक्सर आंकड़ों से ज्यादा ताकतवर होता है और यही कारण है कि आने वाले समय में रोजगार और आय का सवाल सरकार के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
2024 ने भी यही संकेत दिया था

2024 का लोकसभा चुनाव इस पूरे बदलाव को समझने की सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि है। चुनाव से पहले राजनीतिक वातावरण में नरेंद्र मोदी की तीसरी पारी को लगभग तय माना जा रहा था। भाजपा ने ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा दिया था और विपक्षी इंडिया गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि वह अपने मतदाताओं को एकजुट कर पाए।  अधिकांश ओपिनियन पोल्स एनडीए को स्पष्ट बहुमत दे रहे थे और चुनाव के बाद आए एक्जिट पोल्स ने तो इस बढ़त को और बड़ा कर दिया।

समाचार एजेंसी ‘रियूटर्स’ के मुताबिक प्रमुख एक्जिट पोल्स में एनडीए को 353 से 401 सीटों तक मिलने का अनुमान लगाया गया था। यानी किसी बड़े एक्जिट पोल्स ने एनडीए की हार या बहुत मामूली बहुमत की तस्वीर नहीं दिखाई। इसके उलट अधिकांश अनुमानों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए को बहुत मजबूती बहुमत मिलने की बात कही गई लेकिन 4 जून को जब वास्तविक परिणाम सामने आए तो राजनीतिक तस्वीर ने सभी अनुमानों को चुनौती दे दी। भाजपा 240 सीटों पर रह गई और एनडीए कुल 293 सीटों तक पहुंचा। इंडिया गठबंधन ने 234 सीटें हासिल कीं। भाजपा सत्ता से बाहर नहीं हुई और नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने लेकिन ‘400 पार’ की राजनीतिक कल्पना वास्तविक परिणामों से बहुत दूर रह गई। इस परिणाम का महत्व सिर्फ सीटों की संख्या में नहीं था। 2019 में 303 सीटें जीतने वाली भाजपा 240 पर आ गई और उसे सरकार चलाने के लिए अपने सहयोगी दलों पर अधिक निर्भर होना पड़ा। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन अनुमान से कमजोर रहा। चुनाव के बाद विश्लेषणों में आर्थिक मुद्दों, ग्रामीण असंतोष और स्थानीय सामाजिक समीकरणों को भाजपा के अपेक्षित प्रदर्शन से कम रहने के महत्वपूर्ण कारणों में गिना गया।
जब सर्वे जमीन का मिजाज नहीं पकड़ पाए

2024 ने सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर भी बड़ा सवाल खड़ा किया। चुनाव के बाद कुछ प्रमुख पोल कराने वाली एजेंसी ने माना कि वे समाज के कुछ हिस्सों में हो रहे बदलाव को ठीक से पकड़ नहीं सके। ‘रियूटर्स’ की चुनाव बाद की रिपोर्ट के मुताबिक ‘एक्सिस माई इंडिया’ के प्रमुख प्रदीप गुप्ता और सी-वोटर के यशवंत देशमुख ने माना कि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बीच बदलते रुझान सर्वे में पर्याप्त रूप से नहीं पकड़े जा सके।

इसलिए आज सामने आए नए सर्वे को चुनावी परिणाम मान लेना गलत होगा लेकिन 2024 की गलतियों से दूसरी सीख भी निकलती है। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सर्वे गलत हो सकते हैं इसलिए उनमें दिखाई देने वाले बदलावों का कोई महत्व नहीं है। सर्वेक्षणों को एक तरह के चुनावी तापमान की तरह देखा जा सकता है। तापमान 102 डिग्री है या 103 डिग्री, इसमें गलती हो सकती है लेकिन यदि अलग-अलग समय पर तापमान लगातार बढ़ता या घटता दिखाई दे तो उस दिशा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगस्त का नया सर्वे इसी वजह से चर्चा में है। इसका महत्व इस बात में कम है कि इंडिया अलायंस को सचमुच 280 सीटें मिलेंगी या एनडीए को 240 और ज्यादा इस बात में है कि एक सर्वेक्षण उस समय विपक्ष को बहुमत के पार दिखा रहा है जब कुछ महीने पहले तक सत्ता पक्ष को 350 से ज्यादा सीटों के साथ मजबूत स्थिति में दिखाया जा रहा था।
मोदी की लोकप्रियता मजबूत लेकिन सरकार से असंतोष का सवाल
इस तस्वीर को समझते समय नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को कम करके आंकना भी गलती होगी। पोल ट्रैकर के अपने आंकड़ों में जहां प्रधानमंत्री पद की पसंद के सवाल पर मोदी राहुल गांधी से पीछे हैं, वहीं उसी सर्वे में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में प्रदर्शन को 43 प्रतिशत लोगों ने अच्छा और 47 प्रतिशत ने खराब बताया है। यानी यहां भी तस्वीर एकतरफा नहीं है।
यही विरोधाभास भारतीय राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। कोई मतदाता प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की व्यक्तिगत क्षमता को स्वीकार कर सकता है लेकिन सरकार के किसी खास फैसले या प्रदर्शन से असंतुष्ट हो सकता है। इसी तरह कोई मतदाता सरकार की किसी उपलब्धि से खुश हो सकता है लेकिन बेरोजगारी या महंगाई को लेकर परेशान हो सकता है। चुनावी राजनीति इन्हीं अलग-अलग भावनाओं का जोड़ होती है। नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत अभी भी उनका राष्ट्रीय चेहरा और मजबूत नेतृत्व की छवि है लेकिन सत्ता में लम्बा समय बिताने के बाद हर सरकार के सामने एक नई चुनौती आती है, जब मतदाता उपलब्धियों की सूची से आगे बढ़कर सवाल पूछने लगता है। 2014 में जनता ने बदलाव और मजबूत नेतृत्व के नाम पर वोट दिया, 2019 में राष्ट्रीय सुरक्षा और नेतृत्व की विश्वसनीयता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, 2024 में उसी नेतृत्व के बावजूद भाजपा को पहले से कम सीटें मिलीं। इसका अर्थ यह नहीं कि मोदी की लोकप्रियता खत्म हो गई बल्कि यह कि मोदी की लोकप्रियता अकेले हर सीट का परिणाम तय करने की गारंटी नहीं रही।
विपक्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि-विकल्प बनना
यदि आज के सर्वे में कोई सबसे बड़ा राजनीतिक परिवर्तन दिखाई देता है तो वह यह है कि विपक्ष केवल सरकार से नाराजगी का मंच नहीं बल्कि एक सम्भावित विकल्प के रूप में दिखाई देने लगा है। 2024 के चुनाव में इंडिया गठबंधन 234 सीटें जीतने में सफल रहा। कांग्रेस 99 सीटों तक पहुंची और राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता बने। इससे विपक्ष की संस्थागत भूमिका मजबूत हुई।
राहुल गांधी ने संसद में संविधान, सामाजिक न्याय, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और किसानों के मुद्दों को लगातार उठाया। उनकी शैली पर राजनीतिक विवाद अपनी जगह है लेकिन यह भी तथ्य है कि 2024 के बाद विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में उनकी दृश्यता और राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ी है। यदि पोल ट्रैकर के सर्वे में 58 प्रतिशत लोग उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए पसंद करते हैं तो यह उसी बदलाव की ओर संकेत कर सकता है। हालांकि विपक्ष के सामने अभी बहुत बड़ी चुनौती है। राहुल गांधी की लोकप्रियता यदि वास्तव में बढ़ रही है तो उसे सीटों में बदलने के लिए विपक्षी गठबंधन को मजबूत संगठन, राज्यवार सीट समझौते और एक साझा राजनीतिक कार्यक्रम की आवश्यकता होगी। 2024 में भाजपा को नुकसान पहुंचाने के बावजूद इंडिया गठबंधन सत्ता तक नहीं पहुंच सका। इसलिए केवल मोदी विरोध पर्याप्त नहीं होगा। विपक्ष को मतदाता के सामने यह भरोसा पैदा करना होगा कि वह सरकार चलाने के लिए तैयार और सक्षम विकल्प है।
क्या यह बदलाव सिर्फ मोदी विरोध है?
राजनीतिक विश्लेषण में अक्सर यह गलती होती है कि सरकार के खिलाफ किसी भी असंतोष को एंटी इन्कमबेंसी मान लिया जाता है लेकिन बदलता राजनीतिक मिजाज केवल सरकार विरोधी भावना का परिणाम नहीं होता। उसके पीछे विपक्ष के प्रति बढ़ता भरोसा भी होना चाहिए। अगर जनता सरकार से नाराज है लेकिन विपक्ष पर भरोसा नहीं करती तो सत्ता परिवर्तन नहीं होता।
यही वजह है कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद की पसंद के आंकड़े को सीटों के आंकड़े से अलग नहीं देखा जाना चाहिए। अगर एक ओर एनडीए के खिलाफ असंतोष बढ़ता है और दूसरी तरफ राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेता की स्वीकार्यता भी बढ़ती है, तभी सत्ता परिवर्तन की राजनीतिक सम्भावना मजबूत होती है। पोल ट्रैकर के आंकड़े इसी दिशा में संकेत दे रहे हैं, हालांकि उन्हें अन्य स्वतंत्र सर्वेक्षणों से पुष्ट किए जाने की जरूरत है। यहां युवा मतदाताओं का महत्व फिर सामने आता है। अगर युवा मतदाता रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार से सवाल कर रहा है और उसी समय विपक्षी नेतृत्व को ज्यादा स्वीकार कर रहा है तो यह केवल किसी एक सरकार के खिलाफ नाराजगी नहीं बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव हो सकता है।
महंगाई और रोजमर्रा का दबाव भी बन सकता है कारण
राजनीति में आर्थिक आंकड़े और घरेलू बजट दो अलग-अलग चीजें हैं। सरकार के लिए महंगाई दर नियंत्रित होना एक उपलब्धि हो सकती है लेकिन परिवार के लिए दूध, सब्जी, स्कूल फीस, मकान का किराया, स्वास्थ्य खर्च, परिवहन और रोजमर्रा की जरूरतों का बढ़ता खर्च ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मध्यमवर्ग और निम्न आय वर्ग की आर्थिक चिंताएं चुनावी राजनीति में अक्सर धीरे-धीरे जमा होती हैं और फिर अचानक किसी चुनाव में दिखाई देती हैं। 2024 में भी भाजपा को जिन इलाकों में नुकसान हुआ, वहां स्थानीय आर्थिक परिस्थितियां, किसानों की नाराजगी और सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण रहे। ‘रियूटर्स’ के चुनाव बाद विश्लेषण में भी भाजपा के कमजोर प्रदर्शन को उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में अपेक्षा से कम समर्थन तथा आर्थिक और सामाजिक मुद्दों से जोड़ा गया था। अगर 2026 में यही आर्थिक दबाव बढ़ता है और रोजगार तथा शिक्षा जैसे सवालों से जुड़ जाता है तो सरकार के लिए चुनौती ज्यादा गम्भीर हो सकती है। क्योंकि तब मतदाता के पास एक साथ कई शिकायतें होंगी और विपक्ष उन्हें एक राजनीतिक नैरेटिव में बदलने की कोशिश करेगा।
राजनीति में हवा कब बदलती है?
किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक हवा एक दिन में नहीं बदलती। पहले कुछ मुद्दे लोगों की बातचीत में आते हैं, फिर वे सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस में जगह बनाते हैं, उसके बाद विपक्ष उन्हें राजनीतिक मुद्दा बनाता है और अंत में यदि जनता उन्हें अपने जीवन से जुड़ा महसूस करती है तो वे चुनावी मुद्दे बन जाते हैं।
आज रोजगार और पेपर लीक की चर्चा इसी प्रक्रिया से गुजर रही है। युवाओं के लिए यह जीवन-मरण का सवाल है। किसान के लिए कृषि आय और लागत का सवाल वैसा ही है। मध्यवर्ग के लिए महंगाई और नौकरी की सुरक्षा का सवाल अलग महत्व रखता है। यदि अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग चिंताएं एक साझा असंतोष में बदलती हैं तो राजनीतिक माहौल तेजी से बदल सकता है।
2024 में ऐसा कुछ हद तक हुआ था। भाजपा का राष्ट्रीय नैरेटिव मजबूत था लेकिन कई राज्यों में स्थानीय मुद्दों और सामाजिक समीकरणों ने उसे चुनौती दी। 2026 का नया सर्वे यदि किसी बड़े बदलाव की आहट दे रहा है तो आने वाले महीनों में देखना होगा कि क्या ये मुद्दे एक स्थायी राजनीतिक नैरेटिव में बदलते हैं या फिर कुछ समय बाद राजनीतिक प्राथमिकताएं फिर बदल जाती हैं।
सबसे बड़ी चुनौती सर्वे नहीं, जमीन है
आखिरकार चुनाव सर्वेक्षणों में नहीं, जमीन पर लड़े जाते हैं। किसी भी पार्टी के लिए सर्वे में बढ़त हासिल करना और उस बढ़त को मतदान केंद्र तक ले जाना दो अलग बातें हैं। इंडिया गठबंधन के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती होगी। सीटों का बंटवारा, राज्यवार समीकरण, संगठन और स्थानीय नेतृत्व अभी भी उसके लिए कठिन सवाल हैं।
दूसरी तरफ एनडीए के पास मजबूत संगठन, सत्ता का अनुभव, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय चेहरा और सहयोगी दलों का व्यापक नेटवर्क है। यदि भाजपा और एनडीए को लगता है कि जनता के बीच असंतोष बढ़ रहा है तो उसके पास इसे सम्भालने का पर्याप्त समय भी है। सरकारें चुनाव से पहले नीतियों में बदलाव करती हैं, नई कल्याणकारी योजनाएं लाती हैं और नाराज समूहों को साधने की कोशिश करती हैं। इसलिए आज के सर्वे का अर्थ कल का परिणाम नहीं है लेकिन राजनीति में धारणा का महत्व कम नहीं होता। यदि पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच यह धारणा बनने लगे कि जनता का मूड बदल रहा है तो रणनीति बदलती है। विपक्ष के भीतर आत्मविश्वास बढ़ता है और सत्ता पक्ष अपने कमजोर क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देना शुरू करता है। इसलिए सर्वे का
वास्तविक असर उसके आंकड़ों से ज्यादा राजनीतिक दलों के व्यवहार पर पड़ता है।
2026 में सबसे बड़ा सवाल, क्या 2024 दोहराया जाएगा या कुछ नया होगा?
2024 में जनता ने चुनावी सर्वेक्षणों और राजनीतिक अनुमानों को बड़ा झटका दिया था। एनडीए सत्ता में लौटा लेकिन उस बड़े बहुमत के साथ नहीं जिसकी भविष्यवाणी अधिकांश एक्जिट पोल्स कर रहे थे।
भाजपा 240 सीटों पर आ गई और विपक्ष 234 तक पहुंच गया। आज अगस्त 2026 का सर्वे एक बिल्कुल अलग सम्भावना सामने रख रहा है। यदि आज चुनाव होते हैं तो इंडिया को 280 और एनडीए को 240 सीटें मिलने का अनुमान है। प्रधानमंत्री पद की पसंद के सवाल पर राहुल गांधी को 58 और मोदी को 42 प्रतिशत बताया जा रहा है। युवा नेतृत्व के सवाल पर राहुल गांधी की बढ़त और बढ़ी है।
इतिहास यह भी बताता है कि चुनाव से पहले जनता का मन कई बार बदलता है। 2024 के चुनाव से पहले के अनुमान इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। इसलिए आज के आंकड़ों से कल की सरकार तय करना गलत होगा। इसके बजाय इन आंकड़ों को एक चेतावनी और संकेत की तरह देखना चाहिए। संकेत यह है कि नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता के बावजूद सरकार के प्रदर्शन को लेकर सवाल बढ़ रहे हैं। संकेत यह है कि युवाओं की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। संकेत यह है कि रोजगार, पेपर लीक, शिक्षा, आर्थिक दबाव और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ रहे हैं। संकेत यह भी है कि राहुल गांधी को लेकर मतदाताओं की धारणा में बदलाव हो सकता है।
जनवरी का आत्मविश्वास, अगस्त की बेचैनी
जनवरी में एनडीए के लिए 352 सीटों का अनुमान था। अगस्त में टैªकर पोल ने एनडीए को 240 और इंडिया को 280 सीटें दे दी हैं। इन आंकड़ों को सीधे चुनावी भविष्यवाणी मानना ठीक नहीं होगा लेकिन दोनों के बीच की राजनीतिक दूरी को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। एक समय था जब विपक्ष को यह साबित करने में संघर्ष करना पड़ रहा था कि वह नरेंद्र मोदी और भाजपा के सामने राष्ट्रीय विकल्प बन सकता है। अब एक सर्वे विपक्ष को बहुमत से ऊपर और उसके सबसे बड़े नेता को प्रधानमंत्री पद की पसंद में मौजूदा प्रधानमंत्री से आगे दिखा रहा है।
यह बदलाव अगर केवल सर्वे का आंकड़ा है तो आने वाले महीनों में दूसरे सर्वे इसे गलत साबित कर सकते हैं लेकिन अगर इसके पीछे वास्तविक जनभावना है तो अगले कुछ महीनों में उसका असर राजनीतिक घटनाओं, आंदोलनों, सरकार की नीतियों और विपक्ष की रणनीति में दिखाई देगा। यही इस समय भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी कहानी है। देश में अभी चुनाव नहीं हैं लेकिन चुनावी मिजाज बनने लगा है। इस मिजाज में जनवरी की तरह केवल सत्ता के पक्ष में आत्मविश्वास नहीं है; अब सवाल हैं, असंतोष है, विकल्प की तलाश है और विपक्ष को लेकर पहले से ज्यादा स्वीकार्यता के संकेत भी हैं। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अभी समाप्त नहीं हुई है और न ही भाजपा की चुनावी ताकत कमजोर मान लेने का कोई आधार है लेकिन अगर सत्ता के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है और उसी समय विपक्षी नेतृत्व की स्वीकार्यता भी बढ़ रही है तो यह किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए गम्भीर राजनीतिक संकेत है। दूसरी ओर राहुल गांधी के लिए भी यह आंकड़ा जीत का प्रमाण नहीं बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी है। लोकप्रियता को संगठन में, संगठन को वोट में और वोट को सीट में बदलना अभी बाकी है।
2024 ने यह साबित कर दिया कि भारतीय मतदाता को पढ़ना आसान नहीं है। बड़े-बड़े सर्वे और एक्जिट पोल्स उसके अंतिम फैसले को पूरी तरह नहीं पकड़ पाए। इसलिए 2026 में भी किसी एक सर्वे को भविष्यवाणी मान लेना भूल होगी लेकिन लोकतंत्र में हर सर्वे एक सवाल जरूर छोड़ता है। इस बार सवाल बहुत सीधा है कि क्या देश की जनता का मिजाज सचमुच बदलने लगा है? जवाब अभी मतपेटी के भीतर नहीं है लेकिन जनवरी से अगस्त के बीच बदलती राजनीतिक तस्वीर, युवाओं के सवाल, सरकार के प्रदर्शन को लेकर बढ़ती बेचैनी, राहुल गांधी की बढ़ती स्वीकार्यता और एनडीए के खिलाफ दिखाई दे रहे नए असंतोष को साथ रखकर देखें तो इतना जरूर कहा जा सकता है कि देश की राजनीतिक फिजा पहले जैसी स्थिर नहीं रही है। भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि जब जनता के मन में सवाल बढ़ने लगते हैं, तब चुनावी नतीजों से बहुत पहले राजनीतिक हवा बदलना शुरू हो जाती है।

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