वंदे मातरम् पर भिडंत

वंदे मातरम राष्ट्रगीत के सम्बंध में संसद द्वारा राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2026 पारित किया गया है, जिसे अगस्त 2026 में राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है लेकिन कांग्रेस की ओर से वंदे मातरम् की दो पंक्तियां गाने के फैसले के बाद यह मुद्दा केवल गीत की प्रस्तुति तक सीमित न रहकर राष्ट्रवाद, विचारधारा और राजनीतिक विरासत की बहस में बदलता दिखाई दे रहा है। भाजपा इस विवाद को कांग्रेस की राष्ट्रवादी सोच पर सवाल खड़े करने के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। आने वाले दिनों में पार्टी अपने कार्यक्रमों और जनसभाओं में वंदे मातरम् को प्रमुखता देकर कांग्रेस पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर सकती है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर भाजपा समर्थक अभियान तेज होने की सम्भावना है। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वह इस मुद्दे पर भाजपा के हमले का किस तरह जवाब देती है। पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि वंदे मातरम् के प्रति सम्मान में किसी तरह की कमी नहीं है लेकिन राजनीतिक मुद्दों को धार्मिक या भावनात्मक ध्रुवीकरण का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। कांग्रेस के लिए यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा लम्बे समय से राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक बढ़त बनाए रखने की कोशिश करती रही है। ऐसे में वंदे मातरम् का मुद्दा कांग्रेस को रक्षात्मक स्थिति में ला सकता है जबकि भाजपा इसे अपने वैचारिक एजेंडे को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। आने वाले दिनों में वंदे मातरम, राष्ट्रवाद और कांग्रेस की विचारधारा को लेकर दोनों दलों के बीच बयानबाजी और तेज होगी। भाजपा कांग्रेस से जुड़े पुराने बयानों और घटनाओं को सामने ला सकती है जबकि कांग्रेस भाजपा पर राष्ट्रवाद को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप लगा सकती है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक अगर विवाद लम्बा खिंचा तो इसका असर संसद से लेकर राज्यों के राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया तक दिखाई दे सकता है। ऐसे में वंदे मातरम् का मुद्दा आने वाले दिनों में भाजपा-कांग्रेस के बीच नई वैचारिक भिड़ंत का राजनीतिक केंद्र बन सकता है।
विरासत बनाम सामाजिक न्याय की जंग

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के साथ भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच
राजनीतिक मुकाबला लगातार तेज होता दिखाई दे रहा है। अखिलेश यादव की ओर से लोधी समाज को साधने की कोशिशों को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। बीते 16 अगस्त को अवंती बाई लोधी की जयंती पर सरकारी अवकाश और उनकी प्रतिमा लगाने के वादे को भाजपा के पारम्परिक सामाजिक आधार में सेंध लगाने की कोशिश माना जा रहा है। दूसरी ओर सपा के इस दांव का जवाब भाजपा भी देने की तैयारी में नजर आई। भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की विरासत को चुनावी विमर्श में प्रमुखता से सामने लाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। 20 अगस्त को प्रदेश के सभी जिलों में कल्याण सिंह की पुण्यतिथि के कार्यक्रमों के जरिए उनके राजनीतिक योगदान और राम मंदिर आंदोलन में उनकी भूमिका को याद किया गया। जिसे महज श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं बल्कि आगामी चुनाव के लिए भाजपा के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आने वाले दिनों में भाजपा और सपा के बीच विरासत बनाम सामाजिक न्याय की नई राजनीतिक लड़ाई क्या तेज हो सकती है। राजनीतिक पंडितों का कहना कि भाजपा कल्याण सिंह, राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दों के जरिए अपने पुराने समर्थक वर्ग को मजबूत करना चाहेगी जबकि सपा पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के सामाजिक समीकरण यानी पीडीए को और मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। यही नहीं भाजपा राम मंदिर आंदोलन में अपनी भूमिका को सामने रखेगी जबकि सपा रोजगार, महंगाई, विकास और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों से जवाब देने की कोशिश करेगी। आने वाले समय में यह जंग केवल बड़े नेताओं के बयानों तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि जिला और बूथ स्तर तक पहुंच सकती है।

‘चंदा चोरी’ के मुद्दे पर घर-घर जाएगी कांग्रेस?

कांग्रेस ने राम मंदिर से जुड़े कथित चंदा अनियमितताओं के मुद्दे को लेकर अपनी राजनीतिक रणनीति को संसद से आगे ले जाने के संकेत दिए हैं। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठकों में इस मुद्दे को गांव -गांव और बूथ स्तर तक ले जाने की रणनीति पर चर्चा की गई है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में पार्टी इसे बड़े जनसंपर्क अभियान का रूप दे सकती है। अगर ऐसा होता है तो संसद में उठाया गया यह मुद्दा चुनावी मैदान में पारदर्शिता बनाम राजनीतिक आस्था की बहस का नया केंद्र बन सकता है? राजनीतिक जानकारों के मुताबिक कांग्रेस यदि इस मुद्दे को लेकर घर-घर पहुंचने की रणनीति अपनाती है तो उसका मकसद केवल कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाना नहीं होगा बल्कि भाजपा और राम मंदिर से जुड़े राजनीतिक विमर्श को सीधे चुनौती देना भी हो सकता है। कांग्रेस के लिए यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि राम मंदिर लम्बे समय से भाजपा की राजनीति का प्रमुख मुद्दा रहा है। ऐसे में मंदिर निर्माण से जुड़े चंदे के सवाल को उठाकर कांग्रेस भाजपा के मजबूत राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश कर सकती है तो वहीं भाजपा कांग्रेस पर धार्मिक मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाकर पलटवार कर सकती है। ऐसे में कांग्रेस का यह अभियान कितना असरदार होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी आरोपों को कितने ठोस तथ्यों के साथ जनता के बीच रख पाती है।

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