‘जेन जी’ को साधने की कवायद!

मुम्बई में 6 अगस्त को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का ‘जेन जी’ और ‘जेन-अल्फा’ के साथ संवाद महज युवाओं से बातचीत का कार्यक्रम था या इसके पीछे कोई बड़ा वैचारिक संदेश भी था? भागवत ने जिस तरह आरक्षण, जनसंख्या नीति, मुस्लिम समुदाय और पाकिस्तान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर एक साथ अपनी राय रखी, उससे राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संघ नई पीढ़ी के बीच अपनी छवि और संवाद का दायरा बदलने की कोशिश कर रहा है? आरक्षण पर भागवत का संदेश खासा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जब तक सामाजिक भेदभाव कायम है, आरक्षण जारी रहना चाहिए। डाॅ. भीमराव अम्बेडकर का उल्लेख करते हुए उन्होंने आरक्षण को राजनीति से दूर रखने की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि जिन लोगों की सामाजिक स्थिति आरक्षण के कारण सुधर चुकी है, वे उदारता दिखाते हुए इसका लाभ छोड़ने पर विचार कर सकते हैं। राजनीतिक नजरिए से देखें तो इसे सामाजिक न्याय के मुद्दे पर संघ की स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है, खासकर युवा मतदाताओं के बीच। जनसंख्या नीति पर तीन बच्चों की वकालत और घुसपैठियों के खिलाफ सख्त रुख संघ की पारम्परिक चिंताओं को सामने लाता है। हालांकि भागवत का यह कहना कि जनसंख्या नीति की समीक्षा होनी चाहिए और किसी कानून से पहले समाज को समझाना जरूरी है, संकेत देता है कि संघ इस मुद्दे को सीधे राजनीतिक टकराव के बजाय सामाजिक विमर्श के जरिए आगे बढ़ाना चाहता है। मुस्लिम समुदाय को लेकर भी भागवत की भाषा में दोहरी परत दिखाई दी। उन्होंने भेदभाव से बचने और समान अवसर की बात की लेकिन आरएसएस की हिंदू पहचान से जुड़ी वैचारिक सीमाओं को भी बरकरार रखा। यानी समावेशन की भाषा और वैचारिक आग्रह साथ-साथ चलते दिखे। पाकिस्तान पर ‘स्थायी दुश्मनी समाधान नहीं’ और बातचीत के दरवाजे खुले रखने की बात भी राजनीतिक रूप से अलग संकेत देती है। सरकार और सेना के साथ खड़े रहने की बात के साथ संवाद की सम्भावना स्वीकार करना बताता है कि संघ संघर्ष और संवाद, दोनों को साथ लेकर चलने की सोच पर जोर दे रहा है। इन चारों मुद्दों को एक साथ देखें तो सवाल उठता है कि क्या संघ ‘जेन जी’ और ‘जेन-अल्फा’ के लिए अपनी नई राजनीतिक-वैचारिक भाषा तैयार कर रहा है? सम्भव है कि ये बयान तत्काल चुनावी रणनीति न हों लेकिन इतना स्पष्ट है कि आने वाली राजनीति में नई पीढ़ी को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

राहुल का वार, शाह पर सवाल!

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच राजनीतिक टकराव आने वाले दिनों में और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं। छात्र आंदोलनों, कानून-व्यवस्था और सरकार की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर राहुल गांधी जिस तरह लगातार अमित शाह को निशाने पर ले रहे हैं, उससे राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हैं कि कांग्रेस अब इस टकराव को संसद से बाहर भी व्यापक राजनीतिक मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर सकती है। राहुल गांधी की ओर से अमित शाह से जवाबदेही की मांग को महज बयानबाजी न मानकर कांग्रेस की बड़ी राजनीतिक रणनीति के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी के लिए यह मौका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि छात्र आंदोलनों, भर्ती परीक्षाओं, रोजगार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे सीधे युवा वर्ग से जुड़े हैं। ऐसे में कांग्रेस इन सवालों को जोड़कर सरकार पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि आने वाले दिनों में संसद में गृह मंत्रालय से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष का हमला और आक्रामक हो सकता है। कांग्रेस यदि राहुल गांधी को इन मुद्दों पर विपक्षी हमले का प्रमुख चेहरा बनाती है तो अमित शाह के साथ उनकी सीधी राजनीतिक भिड़ंत और बढ़ने की सम्भावना है। इससे संसद के भीतर आरोप-प्रत्यारोप के साथ-साथ बाहर भी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो सकती है। हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि व्यक्तिगत राजनीतिक टकराव को व्यापक जनमुद्दों से कैसे जोड़ा जाए। यदि बहस केवल राहुल बनाम शाह तक सीमित रही तो इसका असर सीमित रह सकता है। अगर रोजगार, शिक्षा, कानून-व्यवस्था और युवाओं की समस्याओं को इस लड़ाई से जोड़ने में विपक्ष सफल रहा तो इसे बड़ा राजनीतिक अभियान बनाया जा सकता है। दूसरी ओर भाजपा भी राहुल गांधी के हमलों का आक्रामक जवाब देने से पीछे नहीं हटेगी। ऐसे में आने वाले दिनों में राहुल बनाम शाह की राजनीतिक लड़ाई संसद की बहस से निकलकर सियासी नैरेटिव की बड़ी लड़ाई बन सकती है।

छात्र आंदोलन बनेगा विपक्ष का नया हथियार?

देश की राजनीति में छात्र और युवा मुद्दे एक बार फिर बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं। नीट-यूजी 2026 और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवादों के बीच शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं और रोजगार को लेकर बढ़ती नाराजगी विपक्ष के लिए नया राजनीतिक मुद्दा बन सकती है। राहुल गांधी की ओर से छात्रों के मुद्दों को लगातार उठाए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हैं कि कांग्रेस समेत विपक्षी दल इसे संसद से सड़क तक बड़े अभियान का रूप देने की तैयारी कर सकते हैं। इस बीच ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) ने शिक्षा और रोजगार से जुड़े सवालों को लेकर महीने भर का ‘जेन जी राइजिंग’ अभियान घोषित किया है। इसे महज छात्र संगठन का कार्यक्रम न मानकर व्यापक छात्र-युवा असंतोष को राजनीतिक मंच देने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं की शिकायतें किसी बड़े छात्र आंदोलन का रूप ले पाएंगी या फिर अलग-अलग मुद्दों तक सीमित रहेंगी? राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यदि यह अभियान कैम्पस से बाहर निकलकर बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों को एक साझा मंच पर लाने में सफल रहा तो इसका राजनीतिक असर बढ़ सकता है। विपक्ष के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि युवा मतदाता चुनावी राजनीति में लगातार निर्णायक भूमिका निभा रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों छात्रों की नाराजगी यदि संगठित आंदोलन में बदलती है तो कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती आंदोलन को व्यापक छात्र समर्थन दिलाने की होगी। अलग-अलग छात्र संगठनों के बीच नेतृत्व और रणनीति को लेकर मतभेद उभरे तो इसका प्रभाव सीमित रह सकता है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष भी इस सम्भावित चुनौती को नजरअंदाज नहीं करना चाहेगा। परीक्षा व्यवस्था में सुधार, पारदर्शिता और भर्ती प्रक्रिया को लेकर सरकार के कदमों को सामने रखकर विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की कोशिश की जा सकती है। फिलहाल बड़ा सवाल यही है कि ‘जेन जी राइजिंग’ जैसे अभियान कैम्पस की नाराजगी को राजनीतिक आंदोलन में बदल पाएंगे या नहीं। यदि ऐसा हुआ तो आने वाले दिनों में युवा और छात्र राजनीति विपक्ष के लिए एक नया मोर्चा खोल सकती है।

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