हल्द्वानी में खड़गे की गर्जना से उत्तराखण्ड की सियासत गरमा गई है और कांग्रेस ने 2027 की चुनावी जंग का शंखनाद कर भाजपा को सीधी चुनौती दे दी है। विशाल जनसैलाब ने कांग्रेस के भीतर नई ऊर्जा और एकजुटता का संदेश दिया है तो खड़गे के रोजगार, पेपर लीक, भ्रष्टाचार और युवाओं के असंतोष जैसे मुद्दों पर तीखे हमले ने धामी सरकार की चुनावी मुश्किलें बढ़ाने के संकेत दिए हैं। अब कांग्रेस के सामने इस रैली से मिली ऊर्जा को बूथ तक पहुंचाने और भीड़ को वोट में बदलने की असली चुनौती है
‘अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।’
दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों के जरिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उत्तराखण्ड के आगामी विधानसभा चुनावों के लिए एजेंडा तय कर दिया है। कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की ‘विजय शंखनाद रैली’ के जरिए कांग्रेस पार्टी ने राज्य में अपनी चुनावी तैयारियों की एक बेहद मजबूत और सफल शुरुआत की है। 8 अगस्त 2026 को हल्द्वानी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में आयोजित इस विशाल रैली में समर्थकों और कार्यकर्ताओं का भारी जनसैलाब उमड़ा, जिससे यह आयोजन आगामी 2027 के राज्य विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस का एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन बन गया है। करीब 53 साल बाद कुमाऊं मंडल के इस प्रमुख केंद्र पर किसी कांग्रेस अध्यक्ष की इस तरह की रैली देखी गई है, जिससे मैदान से लेकर आस-पास की सड़कों तक केवल कांग्रेस समर्थकों और झंडों की मौजूदगी दिखाई दे रही थी।
राजनीतिक बनवास झेल रही कांग्रेस के लिए भविष्य में ये रैली कितना संजीवनी का काम करेगी, ये आने वाला वक्त और चुनाव परिणाम बताएंगे लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की हल्द्वानी में हुई रैली ने कांग्रेस पार्टी को वो नई ऊर्जा दी है जिसकी उसे सख्त जरूरत थी। इंदिरा हृदयेश की कर्मभूमि रही हल्द्वानी के जरिए कांग्रेस ने अपने कैडर और जनता को यह संदेश देने की कोशिश की कि आगामी चुनावी लड़ाई के लिए वह पूरी तरह तैयार है और 2022 के विधानसभा चुनाव की तरह किसी भी प्रकार की चूक नहीं करना चाहती।
2017 के बाद सत्ता से बाहर रही कांग्रेस के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वह अपनी खोई जमीन को वापस पाकर उत्तराखण्ड की सत्ता पर काबिज हो। मल्लिकार्जुन खड़गे का हल्द्वानी दौरा उसके लिए राजनीतिक लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा हल्द्वानी से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जहां उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार और केंद्र सरकार पर जमकर हमला बोला वही कांग्रेस के नेताओं को एकता और जीत का मंत्र भी दे गए। अपने 45 मिनट के भाषण में मल्लिकार्जुन खड़गे ने उन सभी पहलुओं को छुआ जो जनता से जुड़े मुद्दे थे लेकिन उनके निशाने पर थे भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिन पर उन्होंने पर चुन-चुनकर प्रहार किया। उनके इस दौरे ने जहां कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच समन्वय देखने को मिला, वहीं कार्यकर्ताओं में भी एक नई ऊर्जा के संचार के संकेत भी मिले।
पहली बार लगा कि कांग्रेस ने अपनी कमियों के चलते ही अपनी राजनीतिक जमीन खोई है और अगर वह इसे दुरुस्त कर ले तो भाजपा के सामने एक गम्भीर चुनौती पेश कर सकती है। मल्लिकार्जुन खड़गे के भाषण में जहां भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के लिए प्रहार था तो युवा, किसान, सैनिक, महिला और गरीब परिवारों का भी जिक्र था।
उत्तराखण्ड के हल्द्वानी स्थित ऐतिहासिक रामलीला मैदान में आयोजित कांग्रेस की ‘विजय शंखनाद रैली’ राज्य की भावी सियासत के लिए एक बड़ा टर्निंग पाॅइंट साबित हो सकती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की मौजूदगी में हुई इस रैली को साल 2027 में होने वाले उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी का पहला और सबसे आक्रामक चुनावी शंखनाद माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद सुस्त पड़े सांगठनिक ढांचे में इस रैली ने न केवल नई जान फूंकी है बल्कि सत्ताधारी भाजपा के लिए एक मजबूत चुनौती भी खड़ी कर दी है। उत्तराखण्ड की राजनीति पारम्परिक रूप से गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों के इर्द-गिर्द घूमती है। हल्द्वानी को कुमाऊं का प्रवेश द्वार कहा जाता है और इस क्षेत्र की 29 विधानसभा सीटों पर जो भी दल बढ़त बनाता है, देहरादून की सत्ता की राह उसके लिए उतनी ही आसान हो जाती है। चुनाव में लगभग 6 महीने का समय शेष रहते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का यहां आना कांग्रेस की सोची- समझी रणनीति का हिस्सा है।
रामलीला मैदान में उमड़ी भारी भीड़ और सड़कों तक फैले कार्यकर्ताओं के हुजूम ने यह साबित कर दिया कि मुख्य विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस का जमीन पर कैडर अभी भी बेहद मजबूत है। एकजुटता का संदेश और आंतरिक समीकरण उत्तराखण्ड कांग्रेस के भीतर गुटबाजी हमेशा से एक बड़ी कमजोरी रही है। हालांकि इस रैली के मंच पर एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा, वरिष्ठ नेता हरक सिंह रावत सहित तमाम दिग्गज एक साथ एक मंच पर खड़े दिखाई दिए। केंद्रीय नेतृत्व के सामने इस तरह एकजुटता का प्रदर्शन कर कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं को यह कड़ा संदेश दिया है कि साल 2027 की लड़ाई आपसी मतभेदों को भुलाकर सिर्फ और सिर्फ ‘जीत’ के संकल्प के साथ लड़ी जाएगी। मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने सम्बोधन में वैचारिक राष्ट्रवाद से लेकर स्थानीय जन-सरोकारों तक, हर उस मुद्दे को छुआ जो उत्तराखण्ड की जनता को सीधे प्रभावित करता है।
खड़गे ने भाजपा और आरएसएस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि देश की आजादी की लड़ाई में इनका कोई योगदान नहीं था। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा कि असली देशभक्त कांग्रेस है, जिसके नेताओं ने देश की एकता के लिए कुर्बानियां दी हैं। खड़गे ने इस रैली में सबसे ज्यादा फोकस युवाओं पर रखा। उत्तराखण्ड में हाल के वर्षों में हुए पेपर लीक और सरकारी भर्तियों में कथित धांधली को खड़गे ने मुख्य मुद्दा बनाते हुए कहा कि उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार में नौकरी के लिए पैसे और सिफारिश चाहिए, बिना रिश्वत के इस सरकार में नौकरी पाना असम्भव है। उन्होंने राज्य को ‘पेपर लीक की राजधानी’ करार दिया, वहीं खड़गे ने आरोप लगाया कि योग्य युवाओं के भविष्य को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया गया है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार पर तंज कसते हुए खड़गे ने कहा कि सरकार सड़कों के गड्ढे भरने और बुनियादी सुविधाएं देने में पूरी तरह नाकाम रही है लेकिन विज्ञापनों और होर्डिंग्स पर जनता की गाढ़ी कमाई पानी की तरह बहाई जा रही है। ऐतिहासिक संदर्भ का चतुराई से उपयोग करते हुए खड़गे ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (1942) के दिन की ऐतिहासिक तारीख का बखूबी इस्तेमाल करते हुए आरएसएस पर हमला बोला।
उन्होंने महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के नारे की याद दिलाते हुए उत्तराखण्ड की जनता और देवभूमि के युवाओं से आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब इस ‘गड्ढा युक्त और भ्रष्टाचार युक्त’ सरकार को राज्य से विदा करने का संकल्प लिया जाए। इस रैली की सफलता ने निश्चित रूप से कांग्रेस के पक्ष में एक सकारात्मक माहौल बनाया है लेकिन पार्टी के सामने असली चुनौती अभी बाकी है। रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ हमेशा चुनावी जीत की गारंटी नहीं होती। कांग्रेस को इस उत्साह को बूथ स्तर पर सांगठनिक मजबूती में बदलना होगा।
2022 की तरह इस बार मुख्यमंत्री के चेहरे की लड़ाई सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आ रही है। चुनाव के नजदीक आते ही मुख्यमंत्री पद के चेहरे और टिकट वितरण को लेकर आंतरिक खींचतान फिर से उभर सकती है, जिससे पार्टी बचना चाहेगी। हल्द्वानी की ‘विजय शंखनाद रैली’ के जरिए कांग्रेस ने 2027 के महासमर की जमीन तैयार कर दी है। मल्लिकार्जुन खड़गे के तीखे तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस इस बार बैकफुट पर नहीं बल्कि फ्रंटफुट पर रहकर बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और स्थानीय मुद्दों पर चुनाव लड़ेगी। इस जनसैलाब ने उत्तराखण्ड की सियासत में हलचल तेज कर दी है और आने वाले दिनों में इसके जवाब में भाजपा की ओर से भी बड़े राजनीतिक पलटवार देखने को मिल सकते हैं।
2017 के बाद प्रभारियों के जिम्मे छोड़ी गई उत्तराखण्ड कांग्रेस के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे का दौरा बहुत से सकारात्मक बदलाव लाता दिख रहा है। ये पहला अवसर है जब कांग्रेस के किसी बड़े नेता ने बड़ी जनसभा के साथ प्रदेश नेताओं के साथ दो दिन बिताए। निष्क्रियता के आरोप झेल रहीं प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा की सक्रियता ने फिलहाल पार्टी के अंदर गुटबाजी को बढ़ावा नहीं दिया है जिसके चलते कांग्रेस एकजुट नजर आ रही है। हल्द्वानी में जनसभा के बाद रुद्रपुर में मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी के वर्तमान और पूर्व विधायकों, पूर्व सांसदों सहित नेताओं के साथ बैठक की और नवगठित प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में भी भाग लिया। हल्द्वानी की जनसभा में कांग्रेस के अंदर युवा नेताओं के प्रति बदलती सोच भी दिखाई दी। शायद ‘जेन जी’ आंदोलन से कांग्रेस की सोच में भी बदलाव आया है। लम्बे समय बाद नजर आया कि कांग्रेस की जनसभा मंच की पहली पंक्ति में युवा नेताओ को जगह दी गई थी। हल्द्वानी विधायक सुमित हृदयेश, कांग्रेस के नवनियुक्त राष्ट्रीय सचिव संजीव आर्य, खटीमा से विधायक भुवन कापड़ी जैसे युवा नेता बड़े नेताओं के साथ पहली कतार में थे। ये तस्वीर कांग्रेस के अंदर बदलते पीढ़ीगत बदलाव की दिशा बताने के लिए काफी थी। हल्द्वानी विधायक सुमित हृदयेश के भाषण के बाद मल्लिकार्जुन का उन्हें अपने बगल में बिठाकर उनकी पीठ थपथपाना सुमित हृदयेश के बढ़ते कद का संकेत तो था ही साथ ही युवा नेताओं को आगे बढ़ाने की कांग्रेस की रणनीति को जाहिर करता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा उनके हल्द्वानी दौरे को ‘चुनावी पर्यटन’ कहने पर आपत्ति उठाते हुए खड़गे ने कहा कि मुख्यमंत्री राजनीतिक मर्यादा भूल गए हैं। उन्होंने राजनीतिक मर्यादा पर सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस की परम्परा विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं को सम्मान देने की रही है, राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन वरिष्ठ
नेताओं का सम्मान जरूरी है। वह यहां पर पर्यटन के लिए नहीं अपनी जनता, छात्रों, युवाओं के लिए, पार्टी को जिंदा करने और भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए आया हूं।
हल्द्वानी में खड़गे रैली कांग्रेस के लिए 2027 की लड़ाई ‘पहला बड़ा टेस्ट’ था, उसकी सफलता को भीड़ ने साबित तो कर दिया लेकिन क्या भारी भीड़ चुनावी जीत का पैमाना है? कांग्रेस ने यह साबित करने की कोशिश की है कि उसके पास कार्यकर्ता हैं, भीड़ जुटाने की क्षमता है और भाजपा के खिलाफ राजनीतिक माहौल बनाने की क्षमता भी है लेकिन अब असली परीक्षा शुरू होगी। क्या कांग्रेस का कार्यकर्ता अगले विधानसभा चुनावों तक उसी ऊर्जा से गांव-गांव, वार्ड-वार्ड और बूथ-बूथ खड़ा रहेगा? इसके हां या ना जवाब पर ही 2027 के चुनावी
महासमर नतीजा तय होगा। अगर कांग्रेस अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की हल्द्वानी रैली से निकली ऊर्जा को चुनाव तक बरकरार रख पाई तो वह भाजपा को चुनौती दे सकती है लेकिन अगर वह इसे बरकरार नहीं रख पाई तो यह रैली भी उन रैलियों की तरह रह जाएगी जहां भीड़ भी थी, नारे भी थे लेकिन वह वोटों में तब्दील नहीं हो पाए।
खड़गे ने हल्द्वानी से भाजपा को चुनौती दे दी है। अब देखना यह है कि उत्तराखण्ड के कांग्रेसी नेता उस चुनौती को कैसे संगठन में बदलते हैं, हरीश रावत उसे व्यापक जनाधार देते हैं और कांग्रेस के बाकी नेता अपनी महत्वाकांक्षाओं को पीछे रखकर 2027 की लड़ाई को एकजुट होकर लड़ते हैं या नहीं। खड़गे की रैली का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश केवल कांग्रेस के लिए नहीं बल्कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए भी है। भाजपा को अब कांग्रेस को हल्के में लेने की रणनीति से बचना होगा।
धामी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि कांग्रेस जिन मुद्दों, बेरोजगारी, पेपर लीक, कानून- व्यवस्था, महंगाई और युवाओं के असंतोष को उठा रही है, उनका राजनीतिक जवाब केवल उपलब्धियों की सूची देकर नहीं दिया जा सकता। भाजपा को यह साबित करना होगा कि सरकार के काम का असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
रैली से पहले पुलिस से भिड़ी कांग्रेस
मल्लिकार्जुन खड़गे की हल्द्वानी रैली से पहले और उसके दौरान पुलिस की भूमिका ने एक अलग ही राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पुलिस के साथ अभद्रता की या पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए। असली सवाल यह है कि लोकतांत्रिक राजनीतिक कार्यक्रम में पुलिस की सीमा कहां खत्म होती है और राजनीतिक प्रशासन की आशंका कहां से शुरू होती है?
रैली से पहले कांग्रेस और पुलिस के बीच तनाव इतना बढ़ा कि कांग्रेस नेताओं को एसएसपी कार्यालय पहुंचकर धरना देना पड़ा। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि ऊपर से मिले कथित निर्देशों के चलते रैली में आने वाले समर्थकों की बसों को रोका जा रहा था और कार्यकर्ताओं को कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने में बाधा डाली जा रही थी ताकि रैली को फ्लाॅप साबित किया जा सके। चाहे कोई भी राजनीतिक दल या उसका कोई बी बड़ा नेता क्यों न हो यदि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के साथ अभद्रता करता है तो उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। राजनीतिक ताकत का अर्थ कानून से ऊपर होना नहीं है।
अगर किसी राजनीतिक रैली में जाने वाले लोगों को केवल राजनीतिक पहचान के आधार पर रोका गया, उनकी आवाजाही में अनावश्यक बाधा पैदा हुई या पुलिस कार्रवाई में समानता का सिद्धांत कमजोर पड़ा तो उसका जवाब भी प्रशासन को देना होगा। पुलिस किसी सरकार की नहीं, राज्य की संस्था है। खड़गे की रैली से पहले बसों को रोके जाने के कांग्रेस के आरोप ने विवाद को राजनीतिक रंग दे दिया। शायद प्रशासन को यहां पर पारदर्शिता दिखानी चाहिए थी।
यदि बसें यातायात व्यवस्था, पार्किंग, सुरक्षा प्रोटोकॉल या अनुमति की शर्तों के कारण रोकी गई थीं तो प्रशासन को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए था कि कितनी बसें रोकी गईं? किस स्थान पर रोकी गईं? कितनी देर तक रोकी गईं? रोकने का लिखित अथवा प्रशासनिक आदेश क्या था? या फिर सारी कवायद का उद्देश्य राजनीतिक था जिसमें नैनीताल पुलिस अपने हाथ जला बैठीं। सवाल व्यक्तिगत रूप से मंजू टीसीनाथ या प्रहलाद सिंह मीणा का नहीं है। सवाल है कि क्या अन्य राजनीतिक कार्यक्रमों में भी यही व्यवस्था लागू की थी? क्या 2021 में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा हो या फिर अभी हाल में ही हुई रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की हुईं रैली में भी इसी प्रकार वाहनों को चेकिंग के नाम पर रोका गया था? खड़गे की जिस प्रकार की सुरक्षा का हवाला नैनीताल पुलिस दे रही है उससे ज्यादा सुरक्षा कवर तो प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री को मिलता है। क्या नैनीताल पुलिस इतनी कमजोर है कि उसे अपने समर्थन के लिए भाजपा जैसे राजनीतिक दल के समर्थन की जरूरत पड़ गई।
भारतीय जनता पार्टी के चलते ही नैनीताल पुलिस को कई बार असहज स्थिति का सामना करना पड़ा है। फिर वो चाहे जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनावों में जिला पंचायत सदस्यों के कथित अपहरण का मामला हो या फिर बंशीधर भगत द्वारा भाजपा के एक मंडल पदाधिकारी को छुड़ाने के लिए धरने पर बैठ जाने का मामला हो जिसमें कहा गया कि बंशीधर भगत कप्तान पहलाद मीणा को घुटनों पर ले आए थे। नैनीताल जिला पंचायत सदस्यों के कथित अपहरण कांड में तो हाईकोर्ट ने सरकार को तत्कालीन कप्तान प्रहलाद मीणा के स्थानांतरण तक के निर्देश दे दिए थे। जिस प्रकार हल्द्वानी प्रकरण के बाद भारतीय जनता पार्टी और उत्तराखण्ड के 13 जिलों की पुलिस सोशल मीडिया में एक्टिव हुई उससे भी कई सवाल खड़े होते हैं। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ऊधमसिंह नगर से स्थानांतरण के बाद डीजीपी अनिल रतूड़ी, डीजी लाॅ एंड आॅर्डर पर प्रताड़ना का आरोप लगाकर स्थानांतरण के खिलाफ हाईकोर्ट जाने वाले बलजिंदर सिंह जो आईपीएस एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं को भी मर्यादा याद आ गई। भाजपा भूल गई कि जिस पुलिस के कथित सम्मान के लिए वो विरोध प्रदर्शन पर उतर आए थे, उसी पुलिस को उसके नेताओं ने कई बार असहज किया था। पुलिस ने तो एक प्रकार से कांग्रेस के खिलाफ पोस्टर वाॅर ही छेड़ दिया और वह भी राजनीति में शामिल हो गए। यहां तक कहा जाने लगा कि पुलिस भाजपा के आईटी सेल की भूमिका निभा रही है।
यदि सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रम में प्रशासन का रवैया एक तरह का और विपक्षी दल के कार्यक्रम में दूसरा दिखाई देता है तो पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसलिए पुलिस को सिर्फ निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए।
बात अपनी-अपनी
कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा में जिस प्रकार के जनसमर्थन की उम्मीद की थी वो पूरी नहीं हुई। पूरे कुमाऊं से भीड़ जुटाने के बावजूद भी रैली फीकी रही और कांग्रेस नेताओं ने अपनी इस नाकामी की खीझ उतारने के लिए एसएसपी कार्यालय में अभद्रता और अराजकता की। जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार और उसके शासनकाल के घोटालों को अच्छी तरह समझती है।
बंशीधर भगत, विधायक, कालाढूंगी
कांग्रेस की हल्द्वानी रैली में उमड़ी भारी भीड़ से भाजपा बौखला गई है। स्वयं कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जी ने रैली की सफलता पर प्रसन्नता जाहिर की थी। इस रैली से कांग्रेसजनों का उत्साह बढ़ा है और आमजन में कांग्रेस के प्रति विश्वास मजबूत हुआ है। नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मंजूनाथ अपने सर्विस के कर्तव्यों को भूलकर भाजपा के कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रहे हैं। भाजपा की शह पर उन्होंने रैली को फ्लाॅप दिखाने का प्रयास किया जिसमें वो सफल नहीं रहे। ये बड़े दुःख का विषय है कि कुछ लोगों द्वारा खड़गे जी की रैली के बाद रामलीला मैदान के शुद्धिकरण का कार्यक्रम किया, ये भाजपा की छोटी मानसिकता को दिखाता है।
सुमित हृदयेश, विधायक, हल्द्वानी
देखिए, विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इसलिए आजकल कांग्रेसी नेता चुनावी पर्यटन पर आ रहे हैं। इसमें हैरानी होने वाली जैसी कोई बात नहीं है। उन्हें पता था कि वो भीड़ नहीं जुटा पाएंगे इसलिए उन्होंने ऐसी जगह चुनी। उन्होंने तुष्टीकरण का एक स्पाॅट चुना था लेकिन इसमें कांग्रेस सफल नहीं हो पाई। कांग्रेस के बड़े नेताओं को सिर्फ चुनाव के समय उत्तराखण्ड की याद आती है। ये सिलसिला चुनावों तक चलता रहेगा। चुनाव के बाद कांग्रेस भी शांत होकर बैठ जाएगी।
महेंद्र भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड भाजपा
हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली बेहद सफल रही। रैली में उमड़ी भीड़ ने जता दिया कि जनता भाजपा सरकार से अजीज आ चुकी है और उसने परिवर्तन का मन बना लिया है। इसीलिए भाजपा प्रशासन के माध्यम से ओछी हरकतें कर रही है। उसे समझ आ गया है कि प्रदेश में उसकी जमीन खिसक चुकी है इसलिए वो प्रशासन के माध्यम से रैली की बसों को रोकना जैसी ओछी हरकतें कर रही है और प्रशासन उनके हाथ की कठपुतली बना हुआ है। हमारा उस दिन प्रदर्शन किसी व्यक्ति के विरोध में नहीं बल्कि उस संस्था के विरोध में था जो अपने दायित्वों का निष्पक्ष रूप से निर्वहन नहीं कर रही थी। पुलिस और प्रशासन का राजनीतिक इस्तेमाल
चिंताजनक है। अधिकारियों को आॅल इंडिया सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स 1968 के नियम 3 और 5 का कड़ाई से पालन करनाा चाहिए। अखिल भारतीय सेवाएं देश की एकता और प्रशासनिक निरंतरता का स्टील फ्रेम है। इसकी मुख्य ताकत राजनीतिक तटस्थता और निष्पक्षता है।
यशपाल आर्य, नेता प्रतिपक्ष