खूबसूरती के पीछे छुुपी बदहाली की कहानी

पहाड़ों की रानी मसूरी अपनी खूबसूरती के लिए देश-विदेश में विख्यात है लेकिन स्थानीय निवासियों के सामने समस्याओं का अम्बार है। खूबसूरती के पीछे की बदहाली की यह कहानी उस विधानसभा क्षेत्र की है जहां के जनप्रतिनिधि न केवल सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं बल्कि करीब डेढ़ दशक से विकास के वायदे पर चुनाव जीतते रहे हैं। विकास तो हुआ लेकिन बाहरी बिल्डरों का और काॅलोनाइजरों का, जिन्होंने हरियाली की जगह कंक्रीट के जंगल उगा दिए हैं। उनके लिए सड़कें भी हैं और बिजली-पानी भी लेकिन स्थानीय जनता के हिस्से में है लोक-लुभावन वायदे और घोषणाएं

पहाड़ों की रानी के नाम से विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी मसूरी 1957 में विधानसभा सीट बनी थी। तब से लेकर 2022 तक इस सीट का कई दिग्गज नेताओं ने प्रतिनिधित्व किया। गुलाब सिंह चैहान, शांति प्रपन्न शर्मा, रणजीत सिंह वर्मा, ब्रह्मादत्त, किशोरी लाल सकलानी, राजेेंद्र शाह अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय विधायक रहे। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद मसूरी विधानसभा के पहले विधायक जोत सिंह गुनसोला लगातार दो बार विधायक निर्वाचित हुए। 2012 में भाजपा के गणेश जोशी विधायक बने। तब से जोशी लगातार इस सीट से विधायक हैं, साथ ही भाजपा सरकार में कई अहम विभागों के कैबिनेट मंत्री भी हैं।

1 लाख 33 हजार मतदाताओं वाली मसूरी विधानसभा का करीब 80 फीसदी भू-भाग देहरादून क्षेत्र में है जिसमें आधे से भी ज्यादा क्षेत्र मैदानी तथा आधा भू-भाग पहाड़ी क्षेत्र में आता है। देहरादून नगर निगम का एक बड़ा हिस्सा तथा मसूरी नगर पालिका का सम्पूर्ण हिस्सा मसूरी विधानसभा क्षेत्र में आते हैं। ‘दि संडे पोस्ट’ ने मसूरी विधानसभा क्षेत्र का भ्रमण किया और विगत 14 वर्षों में हुए विकास कार्यों पर क्षेत्र की जनता के विचार जानने का प्रयास किया। यहां बड़े स्तर पर रोपवे योजनाएं लागू की गई हैं जिनमें  कैमल बैक रोड से जाॅर्ज एवरेस्ट, कैमल बैक रोड से लाल टिब्बा, भनोट स्टेट से कैम्पटीफाॅल और किगंक्रेट से माल रोड तथा हाईलंैण स्टेट से कम्पनी गार्डन के लिए रोपवे उत्तराखण्ड मेट्रो काॅरपोरेशन द्वारा स्वीकृत की गई हैं। पुरूकुल मसूरी जो कि मसूरी के लिए सबसे लम्बी रोपवे योजना है, पर काम चल रहा है। इसके अलावा सैन्य धाम का निर्माण भी पूरा हो चुका है जिसका उद्घाटन होना शेष है। कई नई सड़कों का निर्माण भी मसूरी विधानसभा क्षेत्र में हो चुका है और कई निर्माणाधीन हंै। इनमें पुरूकुल-भितरली-किमाड़ी रोड, शेरकी-बौंठा, मालदेवता-सोरना तथा मसूरी-डोम गांव सड़क मार्ग निर्माणाधीन है। मसूरी नगर में बृहद पार्किंग का निर्माण भी विगत 14 वर्षों में ही हुआ है।
मसूरी विधानसभा में अनेक विसंगतियां भी देखने को मिलीं। अनियोजित विकास के आलावा अवैध निर्माण और अवैध आवासीय तथा कमर्शियल प्लाटिंग के मामले तो हैं ही साथ में रातों रात नदी-नाले और ग्राम पंचायतों की भूमि तथा वन भूमि पर अवैध बस्तियों के निर्माण भी मसूरी विधानसभा क्षेत्र में जमकर हो रहे हैं। कॉलोनाइजरों और भूमि के कारोबारियों द्वारा तमाम ऐसे स्थानों पर प्लॉट काटकर जमीनें बेची गई हैं जहां मानव बस्तियां नहीं होनी चाहिए थी। हैरत की बात यह है कि इन अवैध बस्तियों और काॅलोनियों में सड़क, पेयजल और अन्य सुविधाएं भी दी जाती रही हैं। सहस्रधारा में पिछले कुछ वर्षों में बारसात में भारी भूस्खलन ऐसे ही आवासीय क्षेत्रों में हो रहा है। इन क्षेत्रों में सरकारी खर्च पर पुश्ते आदि का निर्माण करके राहत देने का काम तो किया जा रहा है परंतु ऐसे क्षेत्रों में आवासीय क्षेत्र को नियोजित और नियंत्रित करने का कभी प्रयास तक नहीं किया गया।
नदियों पर अवैध कब्जों की भरमार
मसूरी विधानसभा क्षेत्र के बिंदाल नदी क्षेत्र में जमकर अवैध कब्जे करके बस्तियां बसा दी गई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन कब्जों को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है। हालात इतने विकट हैं कि इस नदी के घाटी में होटल और रिसॉर्ट का निर्माण किया जा चुका है। पिछले वर्ष भारी बरसात के चलते बिंदल नदी घाटी में बाढ़ आई थी जिसका एक बड़ा कारण नदी का रास्ता बदल कर निर्माण करना पाया गया। तत्कालीन जिलाधिकारी सविन बंसल ने इस क्षेत्र में बाढ़ राहत का दौरा किया और  ऐसे मामलों पर कार्यवाही के आदेश भी जारी हुए थे लेकिन राजनीतिक संरक्षण के चलते आदेशों को ठंडे बस्ते मे डाल दिया गया।
इसी तरह से देहरादून के किमाड़ी रोड स्थित गल्जवाड़ी गांव में नेपाली मूल के लोगों द्वारा साल के जंगलों के बीच अवैध बस्ती बना दी गई है। बाहर से काले प्लाटिक के तिरपाल लगाकर झुग्गी-झोपड़ी का स्वरूप दिखाया गया है जबकि भीतर से पक्के ईंट के निर्माण किए गए हैं। इन अवैध बस्ती के लिए पीने का पानी और बिजली के खम्भे तक लगाए जा चुके हैं। स्थानीय निवासी दबी जुबान से इसके पीछे स्थानीय विधायक गणेश जोशी और ग्रामसभा के जनप्रतिनिधियों का संरक्षण बताते हैं।
उत्तराखण्ड स्वाभिमान मोर्चा के अध्यक्ष बाॅबी पंवार का कहना है कि प्रदेश में धामी सरकार कड़े भू-कानून का हवाला दे रही है जबकि मुख्यमंत्री के आवास से महज तीन किमी दूर गल्जवाड़ी गांव में ही नेपाल के लोगों को राजनीतिक संरक्षण देकर वोट बैंक की खातिर अवैध तरीके से बसाया गया है। उत्तराखण्ड के निवासियों को अपनी ही जमीन में आवास बनाने के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है लेकिन भू-कानून की बात करने वाली सरकार नेपालियों के लिए वन विभाग की भूमि पर अवैध कब्जा करवा रही है।
सरकार इन अवैध कब्जों को मलिन बस्ती का नाम देकर इनको सभी जरूरी सुविधाएं दे रही है। बिजली पानी और सड़कों के साथ- साथ सीवर लाईन तक इन बस्तियों मे पहुंचाई जा रही है लेकिन वैध काॅलोनियां या आवासीय क्षेत्र में आज भी सीवर लाईन की सुविधा नहीं है। बारीघाट के निवासी चंद्र प्रकाश थापा कहते हैं कि बारीघाट, कंडोली क्षेत्र में जहां सरकार को हाउस टैक्स मिलता है उन क्षेत्रों में सीवर लाईन की सुविधा नहीं है। वर्षों से हमलोग सीवर लाईन की मांग कर रहे हैं लेकिन चुनाव में ही इसका वादा किया जाता है, चुनाव बीतने के बाद इस पर कोई काम नहीं होता।
स्थानीय निवासी और जनता दल सेक्युलर के प्रदेश अध्यक्ष हरजिंदर सिंह कहते हैं कि ‘‘आज पूरी मसूरी विधानसभा अनियोजित विकास और वोट बैंक के राजनीतिक संरक्षण के चलते बदहाल हो चुकी है। सड़कों को चैड़ा करके उनमें पार्किंग बना दी जाती है। मलिन बस्तियों में हर प्रकार की सुविधा दी जा रही है लेकिन जो क्षेत्र सरकार को राजस्व टैक्स के रूप में देते हैं उन क्षेत्रों में न तो सड़कों की मरम्मत हो पा रही है और न ही जरूरी सुविधाएं दी जा रही हैं। पेयजल की लाईनें डाली गई हैं लेकिन उसका सबसे ज्यादा लाभ होटल-रिसाॅर्ट आदि को मिल रहा है। कोई ऐसी जगह नहीं है जिनका प्रयोग व्यवसायिक हितों में न हो रहा हो। आवासीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बिल्डिंगें खड़ी हो चुकी हैं जिसका बुरा असर आवासीय क्षेत्रों के निवासियों पर पड़ रहा है।’’
सड़क निर्माण में जमकर धांधलियां
मसूरी विधानसभा क्षेत्र में कई नई सड़कों का निर्माण हुआ है और कई सड़कें निर्माणाधीन हैं लेकिन ज्यादातर सड़कों को लेकर स्थानीय जनता में नाराजगी है। सड़कों के निर्माण में मनमानी, गुणवत्ता में भारी कमी के आरोप लगते रहे हैं। पुरूकुल भितरली-किमाड़ी रोड हो या शेरकी- बौंठा रोड का मामला या मालदेवता-सोरना रोड तथा मसूरी-डोम सड़क का निर्माण हो, करीब-करीब हर रोड में गुणवत्ता की कमी और ठेकेदारों की मनमर्जी से सड़क काटने का आरोप लग रहा है। भाजपा के कई नेता भी सड़क को लेकर सोशल मीडिया में वीडियो जमकर वायरल कर रहे हैं।
खण्डूड़ी सरकार में दायित्वधारी रह चुके राज्य आंदोलनकारी रविंद्र जुगराण द्वारा मसूरी विधानसभा में कई सड़कों के निर्माण और वनों कां क्षति पहुंचाने के कई वीडियो सोशल मीडिया में पोस्ट किए गए हैं जो बहुत वायरल हो रहे हैं। रविंद्र जुगराण ने अपने इन वीडियो में सरकारी तंत्र को जिम्मेदार बताया है। उनके द्वारा जारी वीडियो में वास्तव में मसूरी विधानसभा की सड़कों की बदहाली की भयावह तस्वीर नजर आ रही है।
पुरूकुल-भितरली-किमाड़ी दस किलोमीटर सड़क इस बात की गवाही देती है कि जुगराण के आरोप बेबुनियाद नहीं हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनाई जा रही इस सड़क के बारे में स्थानीय निवासियों का आरोप है कि सड़क को किमाड़ी गांव को कनेक्ट तक नहीं किया गया है जिससे उनको इस सड़क का कोई फायदा नहीं होने वाला। साथ ही सड़क निर्माण में मानकों का पालन नहीं किया गया। ठेकेदार द्वारा मनमाने तरीके से मिट्टी के पहाड़ को सीधे काट कर सड़क का निर्माण किया जा रहा है जिससे सड़क के टूटने की अधिक सम्भावना है। क्षेत्रवासियों द्वारा सड़क निर्माण की गुणवत्ता की जांच की मांग की गई है लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। विभागीय अधिकारी बात सुनते ही फोन काट देते हैं।
नाम न बताने की शर्त पर स्थानीय निवासी बताते हैं कि इस क्षेत्र में जमकर अवैध प्लाॅटिंग हो रही है। होटल-रिसाॅर्ट और होम स्टेे के नाम पर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहे हैं। उनको ही फायदा पहुंचाने के लिए इस रोड को बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ गांवों के लिए वर्षों से पुरानी रोड बनी हुई है जिसकी हालत बेहद खस्ता हो चुकी है लेकिन उस रोड की मरम्मत करने की बजाए नई रोड बनाई जा रही है। स्थानीय निवासी सोबन कोली का कहना है कि किमाड़ी गांव के लिए करीब 50 साल से पुरानी सड़क बनी हुई है लेकिन उसकी मरम्मत नहीं हो पा रही है। नई सड़क बनाई जा रही है मगर उसे किमाड़ी गांव से नहीं जोड़ा गया है क्योंकि नई सड़क बिल्डरों और होटल रिसाॅर्ट के लिए खरीदी गई जमीन को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई जा रही है। किमाड़ी के ही विजय कुमार कहते हैं कि यहां बाहरी लोगों और अधिकारियों द्वारा जमीनें खरीदी गई हैं, उनकी जमीनांे की कीमत बढ़ाने के लिए ही नई सड़क बनाई जा रही है।
ऐसा ही मसूरी से डोम गांव तक बनाई गई सड़क के भी हाल हैं। रूरल रोड एंड डेंजर डिपार्टमेंट द्वारा डोम गांव तक ग्रामीण सड़क का निर्माण किया गया है। इसके लिए 1 करोड़ 56 लाख 12 हजार प्रोजेक्ट ऋण तथा 97 लाख 64 हजार नाबार्ड से ऋण लिया गया है। 12 मई 2021 को सड़क का निर्माण पूरा होना था। सरकारी फाइलों में यह सड़क बनकर तैयार भी हो चुकी है और इसका भुगतान भी हो चुका है लेकिन स्थलीय निरीक्षण में देखें तो इस सड़क को देखकर कहीं से नहीं लगता कि यह सड़क बन चुकी है। जगह-जगह बोल्डर और मलवा आ चुका है जिससे मार्ग बंद हो गया है, छोटी-छोटी पुलिया भी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं।
स्थानीय निवासी सुंदरलाल ममगाई कहते हैं कि सरकार के अनुसार सड़क बना दी गई है लेकिन आज इस सड़क पर कोई चल नहीं सकता है। करीब-करीब पूरी सड़क टूट चुकी है। पुलिया तक खत्म हो चुकी है और यह सड़क विभागीय फाइलांे में बनकर यातायात के लिए तैयार बताई जा चुकी है। इस सड़क को देखने कोई नहीं आता। हमें पता चला है कि इस सड़क का भुगतान भी हो चुका है। इसके निर्माण में बड़ा खेल हुआ है, अगर विभागीय अधिकारी इसकी सुध लेते हैं तो उनकी मिलीभगत की भी पोल खुल जाएगी।
इसी तरह मालदेवता-बौंठा-सोरना ग्राम पंचायत के लिए 2017 में सड़क का निर्माण कार्य शुरू हुआ लेकिन 9 वर्ष बाद भी आज यह सड़क कछुआ गति से निर्माणाधीन ही है। इसके अलावा इस मार्ग पर पहाड़ का कटान नियमों के अनुरूप न होकर मनमर्जी से किए जाने के आरोप लग रहे हैं। ग्रामीण आरोप तो लगा रहे हैं लेकिन खुलकर बोलने से हर कोई बच रहा है। कई ग्रामीणों का कहना है कि बहुत से मीडिया वाले यहां आते हैं अगर किसी ने उनको कुछ कहा तो ग्रामीणों को परेशान किया जाने लगता है। ठेकेदार और विभाग के अधिकारी आपस में मिले हुए हैं। यदि कोई ग्रामीण सड़क के निर्माण में अनियमितता की शिकायत करता है तो ठेकेदार को इसका पता विभाग के अधिकारी ही बता देते हैं।
सोरना गांव के निवास ललित उनियाल का आरोप है कि ‘‘नौ सालों से यह सड़क ठेकेदारों और विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से निर्माण पूरा नहीं हो पाया है। सड़क निर्माण में पेड़ों को मनमाफिक तरीके से काटा गया और पहाड़ को भी मनमर्जी से जहां-तहां से काटकर सड़क बनाई गई है। इससे प्राकृतिक जल स्रोत भी खत्म हो गए हैं।’’
दर्शन लाल कोठारी कहते हैं कि ‘‘सड़क बनने से सभी को फायदा होता है, हमें भी होगा लेकिन निर्माण कार्यों में मनमर्जी और गड़बड़ी पर कार्यवाही करना सरकार और स्थानीय विधायक का काम है। जब सड़क का शिलान्यास होता है तो विधायक इसका खूब प्रचार करते हैं लेकिन कम से कम अपने क्षेत्र की सड़कों के निर्माण में क्या खामियां बरती जा रही हैं यह तो विधायक को समझना चाहिए।’’
हजारों की आबादी के लिए बरसात बनी नासूर
मसूरी विधानसभा क्षेत्र के देहरादून शहर से सटे हुए क्षेत्र गल्जवाड़ी, भीतरली, घट्टीखोला, इंद्रानगर, रिकोली, बिष्ट गांव, सहित आठ दस गांवों के करीब 12 हजार ग्रामीणों का जीवन बरसात में एक तरह से रूक जाता है। इन गांवों के निवासियों के आवागमन के लिए लम्बीधार किमाड़ी मोटर मार्ग बनाया जरूर गया है लेकिन भूस्खलन इस मार्ग की नियति बन चुकी है। हर बरसात में यह मार्ग क्षतिग्रस्त हो जाता है जिससे कई दिनों तक मार्ग बंद हो जाता है। पिछले वर्ष भी बरसात में इस मार्ग में कई स्थानों पर भूस्खल हुआ जिसके कारण करीब एक माह तक यह मोटर मार्ग बंद रहा इसके चलते क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों का जनजीवन बुरी तरह प्रभावित रहा। छात्रों का स्कूल जाना भी दूभर हो गया था। यह हाल तब है जब राजधानी देहरादून से महज आठ दस किलोमीटर दूर ये गांव बसे हुए हैं। जब यह मार्ग बंद हो जाता है तो ग्रामीणों को सैन्य क्षेत्र से होकर जाने वाले मार्ग से गुजरना पड़ता है लेकिन सेना से अनुमति लेने के बाद ही आवागमन हो पाता है। रिखौली निवासी कुंदन सिंह का कहना है कि हर बरसात में हमें समस्या होती है यह सरकार और जनप्रतिनिधि भी जानते हैं लेकिन इसका स्थाई समाधान तक नहीं निकाला जा रहा है।
शिफन कोर्ट बना नेताओं और प्रशासन के बीच फुटबॉल
मसूरी स्थित शिफन कोर्ट के 85 गरीब परिवारों का पुनर्वास का मामला चार सालों से नेताओं और प्रशासन के बीच फुटबाॅल बना हुआ है जिसके चलते स्थानीय निवासी बुरी तरह से पिस रहे हैं। शिफन कोर्ट से विस्थापित निवासियों ने अपने जीवन-यापन के लिए मसूरी में रेहड़ी-पटरी और फड़ का कारोबार खड़ा किया तो नगर पालिका ने उनको भी वहां से हटा दिया। एक तरह से शिफन कोर्ट के निवासियों को दोहरी मार सरकार और प्रशासन के द्वारा पड़ी है।
गौरतलब है कि आजादी से पूर्व शिफन कोर्ट परिसर में स्थानीय कुली और रिक्शा चालकों की बस्ती आबाद की गई थी। ब्रिटिश प्रशासन के नियमों के अनुसार कुली, मजदूर और हाथ रिक्शा चालकों के लिए नगर से बाहर ही रहने का नियम था। इसके चलते तमाम मजदूर आदि वर्गों को मसूरी शहर से बाहर शिफन कोर्ट परिसर के एक भाग में रहने के लिए दिया गया जिसमें भवन आदि बनाए गए। ये भवन ज्यादातर स्थानीय मजदूरों द्वारा ही बनाए गए। स्वतंत्रता के बाद शिफन कोर्ट को बंद कर दिया गया लेकिन इन मजदूरों की बस्तियों को हटाया नहीं गया।
स्थानीय निवासी और शिफन कोर्ट आंदोलन से जुड़े संजय टम्टा बताते हैं कि ‘‘देश की आजादी के बाद शिफन कोर्ट को तो हटा दिया गया लेकिन मजदूरों के 84 परिवारों को इस जमीन में ही रहने का हक दिया गया और आश्वासन दिया गया कि उनको इस भूमि का मालिकाना हक दिया जाएगा। वर्षों तक आश्वासन ही दिया जाता रहा लेकिन जब मसूरी में नए रोपवे के निर्माण के लिए भूमि की आवश्यकता पड़ी तो प्रशासन और नगर पालिका द्वारा शिफन कोर्ट की बस्ती की भूमि का ही चयन कर दिया।’’
बस्ती वालों के तमाम विरोध के बावजूद 19 अगस्त 2020 में जब कोरोना की पहली लहर अपने चरम पर थी तब जिला प्रशासन द्वारा बुलडोजर चलाकर समूची बस्ती को ध्वस्त करा दिया गया। तब से लेकर आज तक शिफन कोर्ट के निवासी दर-दर भटक रहे हैं। इस मामले में मसूरी नगर पालिका प्रशासन की भूमिका पर गम्भीर सवाल खड़े हो रहे हैं। बस्ती ढहाने से पूर्व नगर पालिका द्वारा कहा गया कि 84 परिवारों को मसूरी में ही अन्यत्र भूमि पर आवास दिए जाएंगे और ‘हंस फाउंडेशन’ द्वारा शिफन कोर्ट बस्ती के निवासियों के लिए आवास बनाकर देने की घोषणा भी की गई। जमीन सरकार द्वारा दिए जाने की बात की शर्त रखी परंतु वर्तमान पालिका प्रशासन अपनी ही बात से मुकरता दिखाई दे रहा है।
पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष अनुज गुप्ता के  अनुसार उनके कार्यकाल में मसूरी में ही शिफन कोर्ट के निवासियों के लिए आवासीय भूमि चिन्हित कर दी गई थी और भवनों का निर्माण ‘हंस फांउडेशन’ द्वारा किया जाना था। मुख्यमंत्री धामी जी ने भूमि पूजन भी किया था। तब से लेकर इस मामले में राजनीति ही हो रही है और भवन नहीं बनाए जा रहे हैं। वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष मीरा सकलानी कहती हैं कि कुछ परिवारों को आईडीएक्स और कुछ परिवारों को किंग्रेट में नगर पालिका के ही भवनों में शिफ्ट किया गया है लेकिन ज्यादातर परिवारों को अभी भी आवास नहीं मिल पाया है।
दिलचस्प बात यह है कि मसूरी नगर पालिका के कर्मचारियों को इसके चलते आवासीय सुविधा नहीं मिल पा रही है। जिन आवासों में पालिका कर्मचारियों को आवास दिए जाने थे उनमें शिफन कोर्ट के लोगों को अस्थाई तौर पर शिफ्ट कर दिया गया है। नाम न छापने की शर्त पर पालिका के कर्मचारी बताते हैं कि नगर पालिका शिफन कोर्ट के निवासियों को भूमि दे सकती है लेकिन राजनीतिक फायदे के कारण सरकारी आवासों में उनको बसाया जा रहा है जबकि हमारे लिए अभी तक पालिका ने आवासीय व्यवस्था  नहीं की है।
शिफन कोर्ट का मामला चुनावी राजनीति में जमकर भुनाया जाता रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान विधायक और कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने शिफन कोर्ट बस्ती के नाम से भूमि और आवास का शिलान्यास तक कर डाला, तब से पांच वर्ष हो चुके हैं लेकिन शिफन कोर्ट के निवासियों का मामला हल नहीं हो पाया है।
मसूरी का इको सिस्टम हो रहा तबाह
मसूरी के प्रर्यावरण और इसकी जैव विविधिता को बर्बाद करने का सबसे ज्वंलत प्रमाण जाॅर्ज एवरेस्ट और हाथीपांव पार्क स्टेट का सामने आ चुका है। इसमें 142 एकड़ (762 बीघा) सरकारी भूमि को उत्तराखण्ड पर्यटन विभाग द्वारा राजस ऐयरो स्पोर्ट एंड एडवंचर प्राइवेट लिमिटेड को साहसिक पर्यटन गतिविधियों को बढ़ाने के लिए 1 करोड़ रुपए सालाना किराए पर 15 वर्ष के लिए लीज पर दे दी। इस मामले में गम्भीर बात यह है कि जिस पार्क स्टेट की भूमि कम्पनी को पर्यटन गतिविधियों के नाम पर लुटाया गया है वह भूमि नोटिफाईड भूमि है तथा मसूरी वन्य जीव विहार के नाम होने से पूरी तरह संरक्षित की श्रेणी में है। इसे ईको सेंसिटिव जोन घोषित किया गया है। इसके चलते इस क्षेत्र के जितने भी भूमिधर या खातेदार हैं उनको भी अपनी भूमि पर किसी प्रकार का पक्का निर्माण करने की अनुमति नहीं है। सरकारी सिस्टम द्वारा भूमि की श्रेणी और इस पर लागू प्रतिबंध को नकारते हुए भूमि निजी कम्पनी को थाली में सजाकर दी है। भूमि पर किसी भी प्रकार की वाणिज्यक और व्यवयायिक गतिविधियां पूरी तरह प्रतिबंधित है। साथ ही ध्वनि रहित फ्लाईंग जोन होने के कारण क्षेत्र में हेलीकाॅप्टर का संचालन या उड़ान पर पूरी तरह से प्रतिबंध है लेकिन कम्पनी द्वारा बगैर अनुमति के हेलीपैड का निर्माण किया गया और मसूरी क्षेत्र में धड़ल्ले से पर्यटकों को हवाई सैर करवाई जाती रही है। यही नहीं हेलीपैड के समीप ही कई लकड़ियों की काॅटेजों का भी निर्माण किया गया है लेकिन काॅटेज निर्माण के मामले में मसूरी वन प्रभाग द्वारा किसी प्रकार की अनुमति या लाइसेंस नहीं दिया गया है।
इससे यह बात साफ हो जाती है कि जब संरक्षित भूमि पर ही नियम कायदों को तोड़-मरोड़ किया जा सकता है तो निजी भूमि पर भवनों और भव्य होटल रिसाॅर्ट आदि के लिए बनाए गए नियमों की परवाह किसे हो सकती है?
पर्यावरण और जैव विविधता के लिए काम करने वाले दीपक जोशी कहते हैं कि ‘‘मसूरी का स्वरूप पहले जैसा नहीं रहा है। अब मसूरी की जैव विविधता और पर्यावरण को बहुत बड़ी क्षति पहुंच रही है। सरकार मसूरी में पर्यटकों को आने के लिए प्रोत्साहित करती है लेकिन मसूरी की क्षमता इतनी नहीं है कि वह अधिक पर्यटकों को अपने सीने में धारण कर सके। नई-नई सड़कें बनाई जा रही हैं जिनमें नियमों को ताक पर रखा जा रहा है। मन मर्जी से निर्माण कार्य हो रहे हैं जिसके चलते प्राचीन जल स्रोत खत्म हो गए हैं और जल संकट पैदा हो रहा है। कभी जिन स्थानों पर लोग नहीं रहते थे अब उनमें बड़े-बड़े होटल बन चुके हैं।’’
स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल
मसूरी पर्यटक नगरी है और प्रतिदिन इस नगर में सैकड़ों पर्यटक घूमने आते हैं। हर सप्ताहांत में पर्यटकों की संख्या हजारों में पपहुंच जाती है। इसके अलावा आस-पास के क्षेत्र के निवासियों का आवागमन होता है। इसके चलते मसूरी अब जाम का शहर हो चुका है लेकिन इस नगर में आज तक कोई बेहतर स्वास्थ्य सुविधा नहीं बन पाई है। हजारों पर्यटकों और स्थानीय आबादी के लिए मसूरी के लंढौर में एक सिविल अस्पताल जो कि अब उपजिला अस्पताल बन चुका है लेकिन उसकी हालत एक रेफर सेंटर से आगे नहीं बढ़ पाई है। खास बात यह है कि यह अस्पताल ब्रिटिशकाल में बना था जिसे आज उपजिला अस्पताल बनाया गया है। बावजूद इसके इस अस्पताल के हालातों में कोई सुधार नहीं हो पाया है। ऑपरेशन की सुविधा, चिकित्सकों की कमी और स्टाफ की कमी लगातार बनी हुई है। एक तरह से यह अस्पताल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के तौर पर ही काम करता नजर आ रहा है जिसके चलते गम्भीर मरीजों को देहरादून रेफर होना पड़ता है।
स्थानीय निवासी और पत्रकार अजीत कुमार कहते हैं कि ‘‘सिविल अस्पताल आज के समय में नगर और इसके अस्पताल हजारों की आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाएं देने में नाकाम है। जब मसूरी में आबादी कम थी और पर्यटकों की सीमित संख्या मसूरी में पहुंचती थी तब के लिए यह बेहतर था लेकिन अब हजारों की संख्या में पर्यटक मसूरी आते हैं और आस-पास के क्षेत्रों में आबादी बहुत बढ़ गई है जिसके कारण मसूरी में एक बड़ा अस्पताल होना जरूरी है।’’
कांग्रेस के नगर अध्यक्ष अमित गुप्ता कहते हैं कि ‘‘सिविल अस्पताल मसूरी का एक मात्र सरकारी और सस्ते इलाज का अस्पताल था। विगत 15 सालों से जितना बेड़ा गर्क इस अस्पताल का हुआ है उतना शायद किसी अस्पताल का हुआ होगा। पर्यटक नगरी होने के बावजूद मसूरी में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं न होना बहुत ही दुखद है। विधायक गणेश जोशी जी तीन बार से लगातार मसूरी के विधायक हैं और सरकार में मंत्री भी हैं लेकिन उनका कभी भी फोकस मसूरी शहर के लिए नहीं रहा। अस्पताल में गम्भीर मरीजों और दुर्घटना होने पर सीटी स्कैन तक की सुविधा नहीं है। लाखों की मशीन अस्पताल में हैं लेकिन आज तक इसके ऑपरेटर की नियुक्ति नहीं हो पाई है। स्टाफ की कमी कई सालों से बनी हुई है। सबसे दुखद बात यह है कि यहां के डॉक्टरों को चारधाम यात्रा रूट पर भेज दिया जाता है। इसके कारण मरीज को देहरादून रेफर कर दिया जाता है जबकि मसूरी से देहरादून के लिए ट्रैफिक जाम के कारण कई-कई घंटे लग जाते हैं जिससे मरीज की जान को खतरा होता है। हालात यह है कि मामूली बीमारी में भी मरीज को अपना इलाज करवाने के लिए देहरादून जाना पड़ता है। मसूरी में स्वाथ्य सुविधाओं के लिए एक ईसाई समुदाय का अस्पातल है लेकिन उसमें भी कोई सुविधाएं नहीं होने से सथानीय निवासियों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।’’
यमुना पेयजल योजना भी सवालों में
मसूरी में पेयजल का भारी संकट रहा है। वर्षों पूर्व अंग्रेजों की बनाई हुई पेयजल व्यवस्था के भरोसे मसूरी चल रही थी। पूर्व में हरीश रावत सरकार के समय मूसरी यमुना मसेरी पेयजल योजना की डीपीआर बनी थी। करोड़ों की यह योजना अब पूरी हो चुकी है लेकिन इस पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। मूलतः यह योजना मसूरी नगर के लिए बनाई गई थी लेकिन अब इसको मसूरी के अलावा अन्य स्थानों को भी जोड़ दिया गया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि देहरादून-मसूरी मार्ग पर बड़े-बड़े होटल और रिसाॅर्ट को पेयजल देने के लिए गुपचुप तरीके से इस योजना से जोड़ दिया गया है। यही नहीं ब्रिटिशकाल में बने पेयजल टैंकों को इस योजना में जोड़ा गया है जबकि इसके लिए नए टैंक बनाए जाने थे।
मास्टर प्लान की आस में मसूरी वासी
मसूरी के लिए मास्टर प्लान बनाए जाने की घोषणा की गई थी लेकिन उसका आज तक अता-पता नहीं है। इसके चलते मसूरी और इसके आस-पास के क्षेत्रों में तेजी से अवैध निर्माणों की बाढ़-सी आ गई है। अमित गुप्ता कहते हैं कि ”आज मसूरी की हालत यह हो चुकी है कि जहां निर्माण नहीं होना चाहिए था वहां निर्माण हो रहे हैं जहां कमर्शियल क्षेत्र नहीं होना चाहिए था वहां कमर्शियल क्षेत्र बनाकर पूरे मसूरी को बर्बाद कर दिया गया है। 15 वर्षों से तो गणेश जोशी जी ही विधायक हैं, उनके कार्यकाल में सबसे ज्यादा मसूरी को ही नुकसान पहुंचा है, चाहे वह पर्यावरण का नुकसान को या फिर मसूरी की बदहाल व्यवस्था हो। पर्यटकों को मसूरी लाने की बात करते हैं लेकिन एक भी नया पार्किंग प्रोजेक्ट मसूरी के लिए नहीं बनाया गया है।’’
कुल मिलाकर मसूरी बदहाल हो चली है। पर्यटक नगरी होने के चलते अतिक्रमण और मुख्य मार्ग पर निर्माण इसकी सुंदरता को बदसूरत कर रही है। जगह-जगह रेस्टोरेंट और होटल आदि का निर्माण होने से सड़कों पर वाहनों की पार्किंग सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। वरिष्ठ पत्रकार और राज्य आंदोलनकारी जय प्रकाश उत्तराखण्डी कहते हैं कि ‘‘आज मसूरी सबसे बुरी स्थिति में है। इसमें कांग्रेस हो या भाजपा किसी एक को दोषी नहीं कह सकते, सभी ने मसूरी को सिर्फ पर्यटक नगरी के तौर पर देखा और उसका दोहन किया है। अनियोजित विकास और निर्माण से मसूरी तबाह हो चुकी है। दिल्ली से देहरादून ढाई घंटे में आ सकते हैं लेकिन देहरादून से मसूरी जो कि सिर्फ 30 किमी दूर है, को 6 घंटे में भी नहीं पहुंच सकते। मुख्य मार्ग कोल्हू खेत से लेकर मसूरी पिक्चर पैलेस तक निर्माण हो चुके हैं। सड़कें आवागमन की जगह पार्किंग में बदलती जा रही हैं जबकि पहले इसके लिए कठोर नियम थे जिन्हें सरकार और सरकारी तंत्र ने अनदेखा कर दिया। मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण का गठन तो राज्य बनने से कई साल पूर्व हो चुका है बावजूद इसके मसूरी को भी देहरादून के समान रख दिया जबकि मसूरी कोई एक नगर भर नहीं है। यह अंग्रेजों के पर्यावरण और जैव विविधता को संरक्षित रखने के लिए मसूरी को एक माॅडल के रूप में बसाया था और इसके लिए कड़े कानून बनाए गए जिसमें आबादी की बसावट पर रोक थी क्योंकि मसूरी की क्षमता दो-ढाई हजार से ज्यादा नहीं थी लेकिन अब 50 हजार आदमी रोज मसूरी में बाहर से आ रहा है और कई हजार मसूरी की आबादी हो गई है। इससे मसूरी का जो इको सिस्टम बना हुआ था, संरक्षित किया हुआ था उसे हमने उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद तबाह कर दिया।
सीवर लाईन योजना में भी भ्रष्टाचार की बू
मसूरी में सीवर लाईन के निर्माण में भी जमकर अनियमितता के आरोप लग रहे हैं। सीएजी भी इस योजना पर गम्भीर सवाल उठा चुका है। 45 करोड़ की लागत से सीवर लाईन बनाई गई लेकिन इसका नगरवासियांे को पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। नगर के कई इलाकों में सीवर का पानी सड़कों और गलियों में फैलता आम समस्या बन गई है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता उपेंद्र थापली कहते हैं कि ‘‘डबल इंजन की सरकार काम करने की बजाए काम का ढिंडोरा ज्यादा पीटती रही है। मसूरी जैसे विख्यात नगर में करोड़ों की सीवर लाईन योजना में जिस तरह से बंदरबांट की गई है उसका ही परिणाम है कि लोगों को सीवर लाईन का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। स्थानीय विधायक जो कि कैबिनेट मंत्री भी हैं, उनका मसूरी के प्रति कोई फोकस कभी रहा ही नहीं। योजनाएं बनाई गई है तो वह सिर्फ दिखाने के लिए और सरकारी पैसों की बंदरबांट के लिए ही बनाई जा रही है।’’

बात अपनी-अपनी

गणेश जोशी जी का कार्यकाल क्षेत्र के लिए संतोषपूर्ण नहीं रहा है। वे विधायक के साथ-साथ सरकार में मंत्री भी हैं। इसके बाद भी क्षेत्र में विकास के कार्य नहीं करवा पाए। ये विधायक और जनप्रतिनिधि का काम होता है, उनके क्षेत्र में विकास की जो योजनाएं स्वीकृत हुई हैं वे रूकी पड़ी हैं, उनको शुरू करवाएं। मसूरी जैसा नगर जो राज्य आंदोलन से जुड़ा रहा, यहां गोली कांड हुआ और 6 लोग मारे गए। राज्य बन गया लेकिन मसूरी को विकास योजनाओं से नहीं जोड़ा गया, यह दुखद है। मसूरी में यमुना पम्पिग पेयजल योजना कांग्रेस सरकार ने शुरू की थी जो आज भी काम चलाऊ ही है। पम्पिंग योजना के लिए रिजर्व वाटर सिस्टम होता है परंतु करोड़ों की योजना के लिए एक भी नया रिजर्व वाटर टैंक नहीं बनाए गए, पुराने टैंकों से ही योजना चलाई जा रही है। सड़कें जो कई साल पहले स्वीकृत हुई थी वे भी पूरी नहीं बन पाई हैं। शिक्षा के लिए कोई नया काम नहीं हो रहा है। करोड़ों की सीवर लाईन योजना बनाई गई लेकिन आज भी आधे नगर को इसका फायदा नहीं मिल रहा है। मैं इतना कह सकता हूं कि गणेश जोशी जी का कार्यकाल न तो स्वयं उनके लिए संतुष्टि भरा है और न जनता के लिए संतोषजनक हैं।
जोत सिंह गुनसोला, पूर्व विधायक, मसूरी

मसूरी विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : गणेश जोशी (अवधि : 4 वर्ष)

क्र. क्षेत्र                                        मुद्दा / जमीनी स्थिति             अंक  (10 में)

  1. जनसम्पर्क व उपलब्धता क्षेत्र में सक्रिय लेकिन कई स्थानीय मुद्दों पर जनता में असंतोष 4
  2. स्वास्थ्य सेवाएं उप जिला अस्पताल आज भी रेफरल सेंटर जैसा, विशेषज्ञ डॉक्टर व सुविधाओं का अभाव 2
  3. सड़क एवं आधारभूत ढांचा नई सड़कें और रोपवे परियोजनाएं लेकिन गुणवत्ता और देरी पर गम्भीर सवाल 4
  4. पर्यटन विकास रोपवे, पार्किंग व सैन्य धाम जैसी बड़ी परियोजनाएं, पर्यटन को बढ़ावा 8
  5. पर्यावरण एवं नियोजन अनियोजित विकास, अवैध निर्माण और पर्यावरणीय क्षति पर नियंत्रण कमजोर 2
  6. पेयजल एवं सीवर यमुना पेयजल योजना और सीवर परियोजना पर विवाद, समस्याएं बरकरार 2
  7. अतिक्रमण एवं अवैध कब्जे वन भूमि, नदी-नालों और अवैध बस्तियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं 1
  8. सामाजिक न्याय व पुनर्वास शिफन कोर्ट विस्थापितों का पुनर्वास वर्षों बाद भी अधूरा 3
  9. रोजगार एवं स्थानीय हित पर्यटन से अवसर बढ़े लेकिन स्थानीय हितों और नियोजित विकास पर सवाल 4
  10. समग्र विकास बड़ी परियोजनाएं दिखीं लेकिन बुनियादी व्यवस्थाओं और नियोजन में गम्भीर कमियां 2

कुल अंक :  3.2/10                                    फाइनल ग्रेड : फेल

‘नया टूरिस्ट डेस्टीनेशन बनेगी मसूरी’
कृषि, उद्यान और सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी 2007 में पहली बार राजपुर सीट से विधायक बने। इसके बाद 2012 से वे मसूरी विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। 14 वर्षों के कार्यकाल में विकास कार्यों और योजनाओं के साथ-साथ क्षेत्र की विभिन्न समस्याओं को लेकर ‘दि संडे पोस्ट’ के विशेष संवाददाता कृष्ण कुमार ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के अंश

आपके 14 वर्ष के कार्यकाल में कौन-कौन सी विकास योजनाएं धरातल पर उतरी हैं?
मसूरी के निवासियों के लिए यमुना पम्पिग पेयजल योजना मेरे ही कार्यकाल में लाई गई है जिसका निर्माण पूरा हो चुका है और उसका लाभ मसूरी की जनता को मिल रहा है। मसूरी के लिए पुरूकुल मसूरी रोपवे योजना लगभग पूरी होने वाली है और पांच नई रोपवे योजनाएं स्वीकृत हो चुकी हैं। मसूरी के जीरो प्वाइंट पर एक बड़ी पर्किंग की योजना पर काम शुरू हो चुका है और शेष का प्रस्तावित हैं। मेरे कार्यकाल के दौरान मसूरी के हाॅस्पिटल में पर्याप्त सुविधाएं हैं। मरीजों को समय पर इलाज मिल रहा है। पहले छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए देहरादून जाना पड़ता था लेकिन आज मेजर ऑपरेशन तक यहां के अस्पताल में हो रहे हैं। जाॅर्ज एवरेस्ट का हमने 22 करोड़ की लागत से सौंदर्यीकरण किया है जिससे मसूरी में पर्यटक गतिविधियां बढ़ी हैं। मसूरी और उसके आस-पास में जिनके भी धार्मिक महत्व के मंदिर हैं उनका सौंदर्यीकरण करने के लिए बजट भी स्वीकृत हो चुका है और काम भी शुरू कर दिया गया है। मसूरी विधानसभा की लाइफ लाइन समझे जाने वाले ब्रिज थे जो आपदा में टूट चुके थे, उनका पुनर्निर्माण किया जा चुका है। दौ नए वैली ब्रिजों का निर्माण पूरा हो चुका है। मसूरी की गलोगी में हमेशा लैंड स्लाइड होने के कारण मार्ग बंद हो जाता था उसे हमने 22 करोड़ की लगात से स्थाई समाधान किया गया है। 33 केबी का सब स्टेशन सुवाखोली में बनाया जा रहा है। उत्तराखण्ड में 12 करोड़ की लगात से सबसे बड़ा सामुदायिक भवन गढ़ी कैंट में बनाया जा चुका है जिसका लाभ जनता को मिल रहा है। उत्तराखण्ड का पांचवा धाम सैन्यधाम 92 करोड़ की लागत से देहरादून में बन कर तैयार हो चुका है। इसके उद्घाटन के लिए हमने केंद्रीय नेतृत्व से समय मांगा है, जल्द ही इस ‘सैन्य धाम’ को जनता को समर्पित कर दिया जाएगा। बुरांशखडा को विकसित करके पर्यटन क्षेत्र के लिए तैयार किया जा रहा है। ऐसे ही मसूरी में कई अनेक क्षेत्र हैं जो उपेक्षित रहे हैं, उनको भी मसूरी पर्यटन सर्किट से जोड़ने की योजना स्वीकृत करवाई गई है।

आपके क्षेत्र में सरकारी जमीनों, नदी-नालों यहां तक कि वन विभाग की भूमि पर अवैध कब्जे करके आवासीय बस्तियां बसाई जाती रही हैं। वोट बैंक के चलते इन पर कार्यवाही नहीं हो पा रही है?
मेरा बयालीस सालों का राजनीतिक करियर रहा है। चार बार में विधायक का चुनाव जीता हूं, तीन बार लगातार मसूरी सीट से विधायक हूं। अगर कोई व्यक्ति यह कह दे कि मैंने किसी एक भी व्यक्ति को कहीं बसाया हो, यह सिद्ध कर दे तो मैं राजनीति से ही सन्यास ले लूंगा। ठीक है जो लोग पुराने बसे हुए हैं, जो नगर निगम के खातों में आते हैं जैसे ब्राह्मावाला खाला, बापू नगर है वहां पर हमने उनको सुविधाएं उपलब्ध करवाई हैं। इसमें हमने विधायक निधि फंड से मानवता के नाते सुविधाएं दी हैं। नगर निगम की जो भी मान्यता प्राप्त बस्तियां हैं उनको सुविधाएं नियमों के अनुसार ही दी है, जैसे दी जाती रही हैं।
मसूरी में सीवर लाइन पूरी नहीं है?
मसूरी में जो क्षेत्र सीवर लाइन से छूटे हैं उनको हमने नए प्रोग्राम में शामिल किया है। मसूरी का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं रहेगा जो सीवर लाइन से आच्छादित नहीं होगा, यह मेरा वादा है। रही बात मेरे अन्य क्षेत्रों की जहां हमने कई क्षेत्रों में सीवर लाइन बिछाने का काम किया है। पथरिया पीर में आज तक सीवर लाइन नहीं थी वहां हमने सीवर लाइन स्वीकृत करवा दी है जिस पर काम चल रहा है। साकेत काॅलोनी जो बारीघाट का हिस्सा है वहां पर भी सीवर लाइन का काम चल रहा है। शक्ति काॅलोनी और अहीर मंडी में सीवर लाइन का काम चल रहा है। गढ़ी कैंट में आज तक सीवर सुविधा तक नहीं थी वहां आज 53 करोड़ की लागत से सीवर का काम चल रहा है। जो भी क्षेत्र सीवर लाइन से छूटे हुए हैं मैंने अधिकारियों को सभी का प्रस्ताव बनाकर देने का आदेश दिया हुआ है। जैसे-जैसे प्रस्ताव आएगा हम पूरे क्षेत्र को सीवर सुधिाओं से जोड़ देंगे, यह हमारा संकल्प है।
सड़कों के निर्माण में भारी अनियमितता के आरोप लग रहे हैं?
यह कहना कि सड़क निर्माण में धांधलियां हो रही है, पूरी तरह से गलत है। अगर सड़क के कटान के समय ढांग गिर जाती है तो धांधली कैसे हो गई। बरसात में निर्माण में ऐसा होता ही है। हम पर पब्लिक का प्रेशर था कि काम शुरू करवाइए जबकि काम सितम्बर में शुरू होना चाहिए था। कच्ची मिट्टी है तो बरसात में ऐसा होता ही है।
मसूरी-डोम गांव के लिए सड़क अधूरी ही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कागजों में यह सड़क पूरी बन चुकी है और इसका भुगतान भी हो चुका है। इस पर आप क्या कहेंगे?
मसूरी डोम गांव की सड़कों के लिए पूर्व में 90 लाख स्वीकृत हुए थे। दूसरे फेस में इसको पक्का करने का प्रस्ताव हमने शासन को भेजा हुआ है। जल्द ही यह सड़क पूरी हो कर पक्की हो जाएगी।
लम्बीधार किमाड़ी मोटर मार्ग का 15 वर्षों में स्थाई समाधान क्यों नहीं हो पाया है?
लम्बीधार किमाड़ी मोटर मार्ग के लिए 14 करोड़ रुपए स्वीकृत करवा दिए हैं। इसमें कुछ फाॅरेस्ट लैंड भी है जिसके लिए हमने 8 करोड़ रुपए स्वीकृत करवाया है। कुल 22 करोड़ रुपए लम्बीधार किमाड़ी मोटर मार्ग के लिए स्वीकृत किए गए हैं। इससे सड़क की मरम्मत और चैड़ीकरण किया जाएगा। इसके बाद इस समस्या का पूरा समाधान हो जाएगा।
मसूरी का शिफन कोर्ट का मामला कई वर्षों से अधर में है?
नगर पालिका ने जमीन दे दी है। ‘हंस फाउंडेशन’ द्वारा इसमें आवास बनाए जाने थे लेकिन इसमें कई ऐसे भी लोग हैं जिनके अपने मकान मसूरी में है और वे दबाव बनाकर नए आवास भी लेना चाहते हैं। इस विवाद के बाद माता मंगला जी ‘हंस फाउंडेशन’ ने कहा कि पहले विवाद समाप्त कीजिए फिर हम फंड रिलीज करेंगे।
मसूरी का सिविल अस्पताल अब उप जिला अस्पताल बना दिया गया है लेकिन आज उसमें समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा है?
मैं अभी खुद वहां गया और मैंने जानकारी ली तो मुझे बताया गया कि प्रतिदिन करीब ढाई सौ से तीन सौ मरीजों की ओपीडी सिविल अस्पताल में रहती है। 50-60 अल्ट्रासाउंड वहां पर होते हैं। गायनी के डॉक्टर वहां इमरजेंसी मे उपलब्ध होते हैं। ऐसे में यह कहना कि मसूरी के सिविल अस्पताल में इलाज नहीं मिल पा रहा है पूरी तरह से गलत है।
मसूरी के लिए यमुना पम्पिग पेयजल योजना में कमियां बताई जा रही हैं। इस योजना का लाभ देहरादून से सटे हुए होटलों को मिल रहा है जबकि यह योजना मसूरी के लिए ही बनाई गई है?
यह योजना 144 करोड़ की बनी है। आज मसूरी को 14 एमएसडी पानी की आवश्यकता है। 7 एमएलडी पानी पुरानी व्यवस्था से मिल रहा है और 7 एमएलडी पानी यमुना पम्पिग पेयजल योजना से मिल रहा है तो यह बात गलत है कि योजना से पूरा लाभ नहीं मिल रहा है।
मसूरी का मास्टर प्लान आज तक नहीं बन पाया क्यों?
मास्टर प्लान तो देहरादून तक का नहीं बना है। अभी इसके लिए काम चल रहा है, जन सुनवाई चल रही है। मसूरी मंे सबसे बड़ी परेशानी तो एनजीटी की है। तमाम कार्यों पर रोक लगाई हुई है जिसकी वजह से समस्याएं आ रही हैं और मास्टर प्लान में देरी हो रही है। इसके लिए हमने भारत सरकार को प्रत्यावेदन दिया हुआ है कि मसूरी में नोटिफाइड और डी नोटिफाईड का निस्तारण किया जाए जिससे मसूरी की जनता को राहत मिले।
दिल्ली से देहरादून ढाई घंटे में आ सकते हैं लेकिन देहरादून से मसूरी जाने के लिए पांच-छह घंटे ट्रैफिक जाम के कारण लग जाते हैं?
चाहे देहरादून हो या मसूरी हो जो हमारी कैरिंग कैपेसिटी है उससे दस गुणा अधिक आदमी यहां पहुंच रहा है। हर घर में चार गड़ियां हैं। जब तक नया देहरादून नहीं बसेगा तब तक समाधान नहीं हो सकता। टैम्परेरी सोल्युशन तो है लेकिन नया शहर बसाना ही इसका समाधान है।
देहरादून के सैन्य धाम पर सवाल उठ रहे हैं, निर्माण कार्य पूरा हो गया है तो इसका उद्घाटन अभी तक क्यों नहीं हो पा रहा है?
भारत माता के वीर शहीद सैनिकों की स्मृति में हमने देहरादून में भव्य सैन्य धाम बनाया। इसमें हमने 1734 शहीद परिवारों के घरों के आंगन की मिट्टी, 28 नदियों का जल निर्माण में शामिल किया गया है। बाबा जसवंत सिंह और बाबा हरदीप सिंह के मंदिर इसमें बनाए गए हैं। इनका मुख्य द्वार भारत माता के अमर सपूत और पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत जी के नाम रखा गया है। आज तक उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री चार धाम हैं तो प्रदेश का पांचवा धाम सैन्य धाम माना जाएगा। इस सैन्य धाम में भारतीय सैन्य परम्परा और सैन्य ताकत से जुड़े सभी का म्यूजियम बनाया गया है। थिएटर है जिसमें भारतीय सैनिकों की वीरता की कहानियां प्रदर्शित की जाएंगी। लाइट एंड साउंड सिस्टम भी सैन्य धाम में है। आरोप तो लगाने वाले लगाते ही हैं, यह उनका काम है। हमारे समय में बना तो हम अपने हिसाब से काम करेंगे। जो विपक्षी, खासकर कांग्रेसी आरोप लगा रहे हैं तो मैं उनसे कहना चाहते हूं कि आप में हिम्मत थी तो क्यों नहीं अपने कार्यकाल में बना दिया?
आप पर आय से अधिक सम्पत्ति का आरोप लग रहे हैं, इस पर आप क्या कहेंगे?
मुझ पर यह आरोप एक आरटीआई एक्टिविस्ट ने लगाया है। उसने कहा है कि सोलह साल में पांच करोड़ की सम्पत्ति अर्जित की है और अपनी तन्ख्वाह और पेंशन से जो मंैने आईटीआर में सम्मिट किया वह 15 करोड़ 13 लाख है।
आपके ऊपर कई विवाद रहे हैं, आपके क्षेत्र में कई समस्याएं भी हैं फिर भी आप लगातार तीन बार से मसूरी विधानससभा से विधायक का चुनाव जीते हैं। इसका क्या कारण हैं?
देखिए, इसका एक बड़ा कारण है मेरा क्षेत्र की जनता से सीधा जुड़ाव। अक्सर यह देखने में आता है कि कोई भी जनप्रतिनिधि जो चुनाव जीतता है, वह क्षेत्र से गायब हो जाता है। चुनाव के समय पांच-छह महीने में ही सक्रियता दिखाता है। मंै हमेशा अपने क्षेत्र की जनता के साथ खड़ा रहता हूं। मैं आपको बताता हूं कि सितम्बर में मेरे क्षेत्र में आपदा आई तब मैं दिल्ली में था जैसे ही मुझे खबर मिली मैं तुरंत चार घंटे में देहरादून पहुंचा और सीधा आपदा क्षेत्र में गया। वहां आपदा राहत के कामों को सुचारू करवाया जिनका नुकसान हुआ उन्हें आपदा राहत से मदद दिलवाई। कई काम विधायक निधि से तुरंत स्वीकृत करवाए।
2027 के विधानसभा चुनाव में अगर आप फिर से चुनाव जीतते हैं तो क्षेत्र के लिए आपकी कोई एक बड़ी प्राथमिकता जो आप पूरा करेंगे?
मसूरी के अगल-बगल के क्षेत्रों को नए टूरिस्ट क्षेत्रों में विकसित करके नया टूरिस्ट डेस्टिनेशन और हब बनाना मेरी प्राथमिकता रहेगी। मसूरी को प्रदेश का सबसे विकसित और इकोसिस्टम को बरकरार रखते हुए उसका विकास करना मेरी अगली प्राथमिकता है।

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