लीज की टीस में उलझे बीस गांव

ऊधमसिंह नगर जिले की बाजपुर विधानसभा में भूमि अधिकारों से जुड़ा ‘20 गांव भूमि प्रकरण’ पिछले कई वर्षों से एक बड़े सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक मुद्दे के रूप में सामने है। यह विवाद केवल जमीन के स्वामित्व का मामला नहीं रह गया है बल्कि इससे जुड़े हजारों परिवारों के भविष्य, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न भी बन चुका है। प्रभावित लोगों का दावा है कि जिस भूमि पर वे पीढ़ियों से रह रहे हैं, खेती कर रहे हैं और जिसके आधार पर उन्होंने अपना जीवन खड़ा किया, आज उसी भूमि के अधिकारों पर प्रश्नचिन्ह लग गया है

उत्तराखण्ड के ऊधमसिंह नगर की बाजपुर विधानसभा क्षेत्र में एक ऐसा जमीनी विवाद है जिसकी जड़ें ब्रिटिश शासनकाल तक जाती हैं। वर्ष 1920 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने तराई क्षेत्र में बीस गांवों की भूमि को लाला खुशी राम को लीज पर दिया था। वर्ष 1926 में उनकी मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने इस लीज का संचालन जारी रखा। लीज की शर्तों के अंतर्गत भूमि को बेचने और सब लीज पर देने का अधिकार भी शामिल था। इसी आधार पर बड़ी संख्या में लोगों को भूमि सब-लीज पर दी गई और समय के साथ हजारों परिवार इस भूमि पर बस गए। राजस्व अभिलेखों में भी मुख्य लीजधारकों के साथ-साथ सब- लीजधारकों के नाम दर्ज होते रहे।

विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण चरण वर्ष 1966 में आया, जब तत्कालीन कानूनों के तहत इस लीज को समाप्त कर दिया गया। प्रभावित पक्षों का कहना है कि लीज समाप्त होने के बाद भूमि पर काबिज लोगों को कानून के अनुसार मरूसी काश्तकार के अधिकार प्रदान किए गए। सीलिंग सीमा के अंतर्गत भूमि रखने वाले लोगों को खेती और कब्जे के अधिकार मिले जबकि अतिरिक्त भूमि सरकार के अधीन जानी थी। इसके बाद भूमि पर रहने वाले हजारों लोग कानूनी रूप से काश्तकार की श्रेणी में आ गए।

स्थानीय लोगों का कहना है कि गेटा एक्ट में यह भी प्रावधान था कि किसी भी लीज की समाप्ति के तीन महीने के भीतर उस भूमि पर उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम (यूपी जेडए एक्ट) लागू किया जाना आवश्यक था। इसी क्रम में 16 अक्टूबर 1970 को उत्तर प्रदेश सरकार ने एक शासनादेश जारी किया। इस आदेश में तराई-भाबर क्षेत्र के 35 ठेकेदारी गांव और 53 मुश्ताजली गांव शामिल किए गए थे। बाजपुर के विवादित 20 गांव भी इन्हीं 35 ठेकेदारी गांवों में शामिल थे।

प्रभावित लोगों के अनुसार शासनादेश लागू होने के बाद भूमि पर काबिज लोगों को मरूसी काश्तकार से आगे बढ़कर ‘सिरदार’ के अधिकार प्राप्त हुए। यूपी जेडए एक्ट के तहत सिरदारों को यह अधिकार था कि वे निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार 20 गुना लगान जमा कराकर भूमिधरी अधिकार प्राप्त कर सकते थे। बड़ी संख्या में लोगों ने यह प्रक्रिया पूरी की और भूमिधर बन गए। बाद में कानून में संशोधन होने के बाद कई सिरदारों को स्वतः भूमिधर का दर्जा भी मिल गया। इसके बाद दशकों तक भूमि की खरीद- फरोख्त, बंटवारा और हस्तांतरण की प्रक्रिया सामान्य रूप से चलती रही।

इसी बीच वर्ष 2020 में यह मामला एक बार फिर चर्चा में आया। तत्कालीन जिला प्रशासन ने भूमि अधिकारों की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कार्यवाही शुरू की। प्रशासन का मत था कि लीज समाप्त होने के बाद बड़ी मात्रा में भूमि सरकार में निहित होनी चाहिए थी और सीलिंग नियमों के अनुसार उसका पुनर्वितरण होना चाहिए था। इसी आधार पर लाला खुशी राम के वारिसों को नोटिस जारी किए गए और सीलिंग सम्बंधी कार्यवाही प्रारम्भ की गई।

यहीं से विवाद ने नया मोड़ ले लिया। प्रभावित पक्षों का कहना है कि लगभग पांच दशक तक भूमि पर अधिकार मान्य रहने, सरकारी अभिलेखों में नाम दर्ज होने और वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत भूमिधरी अधिकार मिलने के बाद अचानक इन अधिकारों को चुनौती देना न्यायसंगत नहीं है। उनका तर्क है कि यदि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा से पारित शासनादेश और उसके आधार पर दिए गए भूमिधरी अधिकार वैध थे तो उन्हें किसी प्रशासनिक आदेश के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता।

स्थानीय लोगों का दावा है कि इस विवाद का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव कम से कम 30 हजार लोगों पर पड़ रहा है। इनमें किसान, भूमिधर, भूमि क्रेता, उनके परिवार और आने वाली पीढ़ियां शामिल हैं। कई परिवार ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पूरी जीवनभर की कमाई भूमि खरीदने, मकान बनाने और खेती विकसित करने में लगाई है। अब उन्हें अपने स्वामित्व और भविष्य को लेकर असमंजस का सामना करना पड़ रहा है।
मामला जिला स्तर पर सुनवाई के बाद न्यायालय तक पहुंचा। प्रभावित पक्षों का कहना है कि जिलाधिकारी न्यायालय में उनकी आपत्तियों पर सुनवाई हुई लेकिन प्रशासन ने अपनी कार्यवाही को सही बताया और सीलिंग प्रक्रिया जारी रखने की बात कही। इसके बाद प्रभावित लोग उच्च न्यायालय पहुंचे। वर्तमान में यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है और सभी पक्ष अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने इस विषय को मुख्यमंत्री, प्रशासनिक अधिकारियों और विभिन्न जनप्रतिनिधियों के समक्ष भी उठाया है। उनके अनुसार मामले की जांच के लिए समितियों का गठन किया गया, जिला स्तर पर रिपोर्ट तैयार हुई और बाद में प्रकरण उच्च स्तरीय समिति तक भी पहुंचा। प्रभावित पक्षों को कई बार आश्वासन मिले लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान सामने नहीं आ सका है।

क्षेत्रीय विधायक एवं नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य द्वारा भी समय-समय पर इस मुद्दे को उठाने और समाधान के प्रयास किए जाने की बात कही जाती रही है। हालांकि प्रभावित लोगों का कहना है कि जब तक सरकार और प्रशासन स्पष्ट नीति बनाकर स्थायी समाधान नहीं निकालते, तब तक हजारों परिवारों की चिंता समाप्त नहीं होगी।
भूमि विवाद से प्रभावित परिवारों का दर्द केवल स्वामित्व तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि आज किसानों को अपनी ही जमीन से जुड़ी कई गतिविधियों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यदि कोई किसान अपने खेत की मिट्टी ट्रैक्टर-ट्राॅली में ले जाना चाहता है तो उसे विभिन्न अनुमतियों की आवश्यकता पड़ती है। मकान निर्माण के लिए रेत या अन्य निर्माण सामग्री लाने में भी प्रशासनिक प्रक्रियाओं और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। किसानों का आरोप है कि वे लगातार अनिश्चितता और प्रतिबंधों के वातावरण में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि पिछले डेढ़ दशक से उन्हें केवल आश्वासन ही मिले हैं। चुनावी मंचों पर समाधान के वादे किए जाते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। उनका मानना है कि भूमि अधिकारों का यह विवाद केवल कानूनी प्रश्न नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और हजारों परिवारों के भविष्य से जुड़ा विषय है।
बाजपुर के 20 गांवों का यह प्रकरण आज भी न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच उलझा हुआ है। अंतिम निर्णय चाहे जो भी हो लेकिन यह स्पष्ट है कि इस विवाद ने हजारों लोगों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है। क्षेत्र के लोग अब न्यायालय के फैसले और सरकार की आगामी भूमिका की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक इस लम्बे विवाद का स्थायी और न्यायसंगत समाधान नहीं निकलता, तब तक हजारों परिवार अपने भूमि अधिकारों और भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना में जीते रहेंगे।

शासनादेश बड़ा या डीएम?
बीस गांव की जमीन एक लीज थी जो ब्रिटिश सरकार द्वारा सन 1920 में लाला खुशी राम जी को दी गई थी। उनकी मृत्यु सन 1926 में हो गई, जिसके बाद उनके वारिस इस लीज को आगे चलाते रहे। इस लीज के अंतर्गत हमें यह अधिकार भी था कि हम इस जमीन को बेच सकते थे और इसकी सब-लीज भी कर सकते थे। इसलिए
अधिकांश जमीन हमने लोगों को उन्हीं शर्तों पर सब-लीज में दे दी, जिन शर्तों पर वह हमारे पास थी। लेकिन सन 2020 में तत्कालीन जिलाधिकारी ने कहा कि यह सब गलत हुआ है। उनका कहना था कि यह जमीन सरकार में निहित होनी चाहिए थी तथा केवल मुख्य ठेकेदार को सीलिंग सीमा के अंतर्गत भूमि मिलने के बाद शेष भूमि सरकारी हो जानी चाहिए थी। इसी आधार पर उन्होंने लाला खुशी राम के वारिसों को गेटा एक्ट के तहत सीलिंग का नोटिस जारी कर दिया। सवाल यह है कि लगभग 50 वर्षों बाद जबकि लोग उस भूमि पर रह रहे हैं, भूमिधर के अधिकार प्राप्त कर चुके हैं और जमीनों की खरीद-बिक्री भी होती रही है तो उन्हें अचानक हटाने के लिए नोटिस क्यों जारी किया गया? हमारे अनुसार उत्तर प्रदेश विधानसभा के शासनादेश से लोगों को जो भूमिधारी अधिकार प्राप्त हुए थे, उन्हें एक जिलाधिकारी के आदेश से दरकिनार नहीं किया जा सकता।

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