जहां निराशा मिली, वहीं उम्मीद भी जगी

हालिया सम्पन्न कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने 39 पदकों के साथ पिछले 24 वर्षों का अपना सबसे
कमजोर ­प्रदर्शन किया। इसकी बड़ी वजह कुश्ती, बैडमिंटन और हाॅकी जैसे भारत के मजबूत खेलों का इस बार शामिल न होना रहा। इसके बावजूद खिलाड़ियों ने बाॅक्सिंग, एथलेटिक्स और वेटलिफ्टिंग में दमदार प्रदर्शन किया। भविष्य में भारत को पारम्परिक खेलों के साथ अन्य ओलम्पिक खेलों में भी अपनी ताकत बढ़ानी होगी ताकि प्रतियोगिता के स्वरूप में बदलाव का असर उसके प्रदर्शन पर न पड़े

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का समापन 2 अगस्त को स्कॉटलैंड के ग्लासगो में हो गया। इन खेलों में ऑस्ट्रेलिया ने 170 पदकों के साथ एक बार फिर अपना दबदबा कायम रखा जबकि इंग्लैंड ने भी 100 से अधिक पदक जीतकर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। दूसरी ओर भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीतकर पिछले 24 वर्षों का अपना सबसे कमजोर प्रदर्शन किया। आंकड़ों के लिहाज से यह प्रदर्शन निराशाजनक जरूर रहा लेकिन इसके पीछे की परिस्थितियों को समझे बिना इस नतीजे का आकलन करना उचित नहीं होगा।

भारत के लिए सबसे सफल खेल एथलेटिक्स रहा जहां खिलाड़ियों ने सर्वाधिक पदक जीते। इसके बाद बाॅक्सिंग और वेटलिफ्टिंग का स्थान रहा। सबसे बड़ी उपलब्धि भारतीय मुक्केबाजों का प्रदर्शन रहा, जिन्होंने सात स्वर्ण पदक जीतकर नया इतिहास रच दिया। इससे स्पष्ट हुआ कि विश्व स्तर पर भारतीय बाॅक्सिंग लगातार मजबूत हो रही है। वहीं एथलेटिक्स में भी कई खिलाड़ियों ने उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन करते हुए भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत दिए। हालांकि यह भी सच है कि जिन खेलों में भारत ने हिस्सा लिया, उनमें कुछ जगह अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हो सका। कई अनुभवी खिलाड़ी अपनी क्षमता के अनुरूप नहीं खेल पाए जबकि कई युवा खिलाड़ियों ने पहली बार बड़े मंच का अनुभव हासिल किया। कुल मिलाकर इन खेलों ने यह भरोसा जरूर दिलाया कि भारत की पदक क्षमता भविष्य में और मजबूत हो सकती है। विशेष रूप से बाॅक्सिंग में मिली ऐतिहासिक सफलता लाॅस एंजिलिस ओलम्पिक 2028 की तैयारियों के लिहाज से भी उत्साह बढ़ाने वाली है।
पहली बार टूटा 50 पदकों का सिलसिला
भारत ने 2002 के मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स से लगातार हर संस्करण में 50 या उससे अधिक पदक जीतने का रिकॉर्ड बनाए रखा था। 2002 में 69, 2006 मेलबर्न में 50, 2010 नई दिल्ली में रिकॉर्ड 101, 2014
ग्लासगो में 64, 2018 गोल्ड कोस्ट में 66 और 2022 बर्मिंघम में 60 पदक जीतकर भारत ने अपनी मजबूत स्थिति कायम रखी थी लेकिन ग्लासगो 2026 में यह सिलसिला टूट गया और भारत केवल 39 पदकों तक सिमट गया। पहली नजर में यह प्रदर्शन निराशाजनक लगता है लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ी वजह खिलाड़ियों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रतियोगिता के स्वरूप में हुआ बदलाव था।
आखिर क्यों घट गई पदकों की संख्या?
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 मूल रूप से ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य में आयोजित होने थे। तैयारियां शुरू हो चुकी थीं लेकिन 2023 में विक्टोरिया सरकार ने आयोजन लागत 6 से 7 अरब डॉलर तक पहुंचने का हवाला देते हुए मेजबानी से हाथ खींच लिए। इसके बाद लगभग एक वर्ष तक मेजबान शहर का संकट बना रहा। आखिरकार 2024 में स्काॅटलैंड के ग्लासगो ने सीमित संसाधनों और कम समय में आयोजन की जिम्मेदारी स्वीकार की। तैयारियों के लिए पर्याप्त समय नहीं होने के कारण आयोजकों ने खेलों का आकार छोटा करने का फैसला किया और कई पारम्परिक प्रतियोगिताओं को कार्यक्रम से बाहर कर दिया। सबसे बड़ा असर उन खेलों पर पड़ा, जिनमें भारत लगातार शानदार प्रदर्शन करता रहा है। कुश्ती, बैडमिंटन और हॉकी जैसे खेल इस बार कार्यक्रम में शामिल ही नहीं किए गए। इसके अलावा कुछ अन्य स्पर्धाओं की संख्या भी घटा दी गई, जिससे कुल पदकों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई।
भारत के मजबूत खेल ही नहीं हुए आयोजित यदि र्बिंमघम 2022 के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। भारत ने उस संस्करण के कुश्ती में 12, टेबल टेनिस में 7, बैडमिंटन में 6 और हाॅकी में 2 पदक जीते थे। इन खेलों का भारत के कुल पदक अभियान में महत्वपूर्ण योगदान रहा था। 2026 में भी ये प्रतियोगिताएं आयोजित होतीं और भारतीय खिलाड़ी पिछला प्रदर्शन दोहराते तो उनके खाते में 25 से 30 अतिरिक्त पदक जुड़ सकते थे। ऐसे में कुल पदकों की संख्या 60 से 70 के बीच पहुंच सकती थी। इसलिए 39 पदकों के आधार पर खिलाड़ियों के प्रदर्शन को पूरी तरह असफल कहना उचित नहीं होगा।
क्या भविष्य में बदलेगा कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वरूप?
ग्लासगो 2026 ने काॅमनवेल्थ गेम्स के भविष्य को लेकर भी कई सवाल खड़े किए हैं। बढ़ती आयोजन लागत और मेजबानी के संकट के कारण खेलों का पारम्परिक स्वरूप लगातार चुनौती का सामना कर रहा है। यदि भविष्य में भी खर्च कम करने के लिए खेलों की संख्या घटाई जाती रही तो कई देशों के पदक समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि उसके कई पारम्परिक मजबूत खेल काॅमनवेल्थ कार्यक्रम का अहम हिस्सा रहे हैं। ऐसे में भारतीय खेल प्रशासन को केवल चुनिंदा खेलों पर निर्भर रहने के बजाए एथलेटिक्स, तैराकी, जिम्नास्टिक, साइकिलिंग और अन्य ओलम्पिक खेलों में भी मजबूत आधार तैयार करना होगा। यही रणनीति भविष्य में भारत को किसी भी बदलाव के बावजूद प्रतिस्पर्धी बनाए रख सकती है।

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