भारतीय हाॅकी टीम की नई केसरिया जर्सी ने खेल और राजनीति के रिश्ते पर बहस छेड़ दी है। रंग को लेकर मतभेद हो सकते हैं लेकिन किसी टीम की असली पहचान उसकी जर्सी नहीं बल्कि उसका प्रदर्शन, विरासत और देश के लिए खेलने का जज्बा होता है
खेलों को हमेशा राजनीति से अलग रखने की बात की जाती है लेकिन इतिहास गवाह है कि दोनों का रिश्ता कभी पूरी तरह अलग नहीं रहा। ओलम्पिक बहिष्कार से लेकर द्विपक्षीय खेल श्रृंखलाओं के रद्द होने तक कई उदाहरण बताते हैं कि खेल और राजनीति अक्सर एक-दूसरे से टकराते रहे हैं। अब भारतीय हॉकी टीम की नई केसरिया जर्सी ने इसी बहस को फिर हवा दे दी है। 20वें एशियाई खेलों और आगामी हाॅकी विश्व कप से पहले हाॅकी इंडिया ने भारतीय पुरुष टीम की नई जर्सी जारी की। इसके बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक विवाद छिड़ गया है। एक पक्ष इसे आधुनिक ब्रांडिंग और डिजाइन का हिस्सा बता रहा है जबकि दूसरा इसे खेलों के ‘भगवाकरण’ की दिशा में उठाया गया कदम मान रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या पहले भी बदली है हॉकी टीम की जर्सी? क्या जर्सी का रंग प्रदर्शन तय करता है? क्या राष्ट्रीय टीम की जर्सी का रंग बदलना केवल खेल से जुड़ा फैसला है या इसके राजनीतिक मायने भी हैं जैसे तमाम प्रश्न सुर्खियों में हैं।
हाॅकी इंडिया ने 15 अगस्त से नीदरलैंड और बेल्जियम में शुरू होने वाले हाॅकी विश्व कप तथा 19 सितम्बर से 4 अक्टूबर तक जापान के आइची-नागोया में होने वाले 20वें एशियाई खेलों के लिए भारतीय टीम की घोषणा की है। हरमनप्रीत सिंह कप्तान होंगे जबकि अनुभवी मिडफील्डर मनप्रीत सिंह भी टीम में शामिल हैं। भारत 2023 हांगझोऊ एशियाई खेलों में जीते स्वर्ण पदक का बचाव करने मैदान में उतरेगा लेकिन खिलाड़ियों से अधिक चर्चा उनकी नई जर्सी की हो रही है। दशकों से भारतीय हाॅकी की पहचान रही नीली जर्सी की जगह केसरिया रंग को प्रमुखता दिए जाने पर विपक्षी दलों के साथ-साथ कई पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों ने भी सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने इसे राष्ट्रीय संस्थाओं की पहचान बदलने की कोशिश बताते हुए सरकार पर निशाना साधा। उनका कहना है कि देश के इतिहास और परम्पराओं से जुड़े प्रतीकों में बदलाव की लगातार कोशिश की जा रही है। विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी इसे वैचारिक राजनीति से जोड़ते हुए सवाल उठाए।
धनराज पिल्लै ने क्यों जताई आपत्ति?
चार ओलम्पिक खेल चुके और भारत के लिए 339 अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले दिग्गज खिलाड़ी धनराज पिल्लै ने कहा कि केसरिया रंग तिरंगे का सम्मानित रंग है लेकिन भारतीय हाॅकी की पहचान हमेशा नीली जर्सी रही है। उन्होंने कहा, ‘15 वर्षों तक मैंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। उस दौरान गहरे और हल्के नीले रंग की जर्सी ही भारतीय हाॅकी की पहचान थी। यह आईपीएल या फ्रेंचाइजी लीग नहीं है जहां हर सीजन जर्सी बदलती रहे। राष्ट्रीय टीम की अपनी ऐतिहासिक पहचान होती है।’ उन्होंने यह तर्क भी खारिज किया कि नीले टर्फ के कारण नीली जर्सी खिलाड़ियों के लिए समस्या बनती है। उनका कहना है कि यदि ऐसी कोई तकनीकी दिक्कत होती तो अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (एफआईएच) इसकी आधिकारिक सिफारिश करता।
पूर्व कप्तान परगट सिंह ने इस फैसले को ‘भगवा ब्रांडिंग’ से जोड़ते हुए कहा कि शिक्षा और इतिहास के बाद अब खेलों में भी वैचारिक रंग दिखाई देने लगा है। उनके मुताबिक खेल धर्म और राजनीति से ऊपर होने चाहिए। उन्होंने पूछा कि यदि नीले टर्फ को ही समस्या बताया जा रहा है तो फिर केसरिया रंग ही क्यों चुना गया? परगट ने यह भी कहा कि जर्सी के रंग खिलाड़ियों की सलाह से तय नहीं होते बल्कि एफआईएच के नियमों के तहत पहले से पंजीकृत रहते हैं।
विरेन रास्किन्हा की प्रतिक्रिया
पूर्व भारतीय कप्तान विरेन रास्किन्हा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि हाॅकी इंडिया ने भारतीय हाॅकी के लिए कई अच्छे काम किए हैं लेकिन जर्सी बदलने का फैसला निराशाजनक है। उनके अनुसार नीला रंग भारतीय हाॅकी की विरासत और पहचान है तथा करोड़ों प्रशंसक टीम को उसी रंग में देखना चाहते हैं।
हॉकी इंडिया ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि नई जर्सी का डिजाइन पूरी तरह तकनीकी और पेशेवर मानकों के आधार पर तैयार किया गया है। संगठन के अनुसार इसमें आधुनिक फैब्रिक, बेहतर दृश्यता और अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग को ध्यान में रखा गया है। किसी भी प्रकार का राजनीतिक संदेश देने का उद्देश्य नहीं है। हॉकी इंडिया का कहना है कि टीम की पहचान उसके प्रदर्शन से बनती है, न कि जर्सी के रंग से।
क्या पहले भी बदली है जर्सी?
भारतीय हॉकी टीम की जर्सी समय-समय पर बदलती रही है। आजादी के शुरुआती वर्षों में टीम सफेद और हल्के नीले रंग की जर्सी पहनती थी। बाद में प्रायोजकों, डिजाइन और अंतरराष्ट्रीय जरूरतों के अनुसार इसमें कई बदलाव हुए। हालांकि पिछले तीन दशकों में नीला रंग भारतीय हॉकी की सबसे मजबूत पहचान बन गया। यही कारण है कि इस बार केसरिया रंग को प्रमुखता मिलने पर विवाद गहरा गया।
सबसे ज्यादा सफलता किस जर्सी में मिली?
भारतीय हाॅकी का स्वर्णिम दौर सफेद जर्सी के साथ जुड़ा रहा। 1928 से 1956 के बीच भारत ने लगातार छह ओलम्पिक स्वर्ण पदक जीतकर विश्व हाॅकी पर अपना दबदबा कायम रखा। वहीं आधुनिक दौर में नीली जर्सी भारतीय हाॅकी की पहचान बनी। इसी जर्सी में भारत ने टोक्यो ओलम्पिक 2020 में 41 वर्षों बाद कांस्य पदक जीता। इसके अलावा एशियाई खेलों, एशियन चैम्पियंस ट्रॉफी और एफआईएच प्रो लीग में भी उल्लेखनीय सफलताएं मिलीं।
क्या जर्सी का रंग प्रदर्शन तय करता है?
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि किसी टीम की सफलता उसके खिलाड़ियों की क्षमता, रणनीति, फिटनेस और मानसिक मजबूती पर निर्भर करती है, न कि जर्सी के रंग पर। हालांकि राष्ट्रीय टीम की जर्सी केवल एक पोशाक नहीं होती बल्कि वह देश की खेल विरासत, पहचान और करोड़ों प्रशंसकों की भावनाओं का प्रतीक भी होती है। इसलिए उसमें बदलाव होने पर बहस स्वाभाविक है।