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अर्धकुम्भ-2027जमीनी तैयारी अब तक अधूरी

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की दो समीक्षा बैठकों और 200 करोड़ से अधिक की योजनाओं के शिलान्यास के बावजूद मेला क्षेत्र में कर्मचारियों की अधूरी तैनाती, मेला आईजी की नियुक्ति में देरी, स्वास्थ्य तंत्र की अस्पष्ट स्थिति और पूर्व में हुई भगदड़ की घटनाएं प्रशासनिक तैयारियों पर गम्भीर प्रश्न खड़े कर रही हैं। अर्धकुम्भ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की प्रशासनिक क्षमता की अग्नि परीक्षा है


वर्ष 2027 में धर्मनगरी हरिद्वार में प्रस्तावित अर्धकुम्भ मेले की तैयारियों को लेकर एक ओर राज्य सरकार और प्रशासन की सक्रियता दिखाई देती है तो दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर व्यवस्थाओं की अधूरी तस्वीर कई गम्भीर प्रश्न भी खड़े करती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा दो बार समीक्षा बैठकें करना और 21 फरवरी को 200 करोड़ रुपए से अधिक की विकास योजनाओं का शिलान्यास करना निश्चित रूप से प्रशासनिक तत्परता का संकेत है किंतु केवल घोषणाएं और शिलान्यास किसी भी विशाल आयोजन की सफलता की गारंटी नहीं होते, विशेषकर तब जब आयोजन का स्वरूप धार्मिक, सांस्कृतिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो जैसा कि अर्धकुम्भ मेले का है।

हरिद्वार में कुम्भ और अर्धकुम्भ का आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक समागम और प्रशासनिक दक्षता की कसौटी भी माना जाता है। गंगा स्नान को मोक्षदायिनी मान्यता प्राप्त है और देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु इस अवसर पर गंगा में स्नान के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में प्रशासनिक चूक केवल अव्यवस्था ही नहीं बल्कि सुरक्षा और जनजीवन के लिए गम्भीर खतरा बन सकती है। पूर्व में हुई घटनाएं इसका जीता-जागता उदाहरण रही हैं। 2010 में कुम्भ के दौरान बिरला घाट पुल पर हुई भगदड़ में कई श्रद्धालुओं को जान गंवानी पड़ी थी।

मुख्यमंत्री द्वारा की गई समीक्षा बैठकों को सकारात्मक पहल माना जा सकता है। उच्च स्तर की माॅनिटरिंग विभागों पर समयबद्ध कार्य पूर्ण करने का दबाव बनाती है। जिन योजनाओं का शिलान्यास किया गया है, उनमें सड़क चैड़ीकरण, घाटों का सुदृढ़ीकरण, पेयजल व्यवस्था, सीवर लाइन, अस्थायी आवासीय ढांचे, विद्युत आपूर्ति, प्रकाश व्यवस्था, शौचालय निर्माण और पार्किंग स्थल जैसी आधारभूत सुविधाएं शामिल हैं। लेकिन अर्धकुम्भ के प्रारम्भ होने में केवल आठ माह का समय शेष है और आधारभूत ढांचा अभी पूरी तरह सुदृढ़ नहीं है। ऐसे में शिलान्यास और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच की दूरी चिंता का विषय बनती जा रही है। टेंडर प्रक्रिया, ठेकेदारों की उपलब्धता, सामग्री आपूर्ति, मौसम की बाधाएं और विभागीय समन्वय की कमी समय सीमा को प्रभावित कर सकती है।

सबसे बड़ी चिंता कर्मचारियों की तैनाती को लेकर है। वर्तमान स्थिति में मेला अधिकारी सोनिका के अतिरिक्त पूर्ण प्रशासनिक तंत्र की तैनाती नहीं हो पाई है। अर्धकुम्भ जैसे आयोजन में राजस्व, स्वास्थ्य, सिंचाई, लोक निर्माण, विद्युत, परिवहन, खाद्य आपूर्ति, अग्निशमन, स्वच्छता और सूचना विभागों के सैकड़ों अधिकारियों-कर्मचारियों की आवश्यकता होती है। यदि समय रहते इनकी नियुक्ति नहीं होती तो योजना निर्माण, निगरानी और समन्वय बाधित हो सकता है। प्रत्येक विभाग के लिए नोडल अधिकारी और नियमित रिपोर्टिंग व्यवस्था अनिवार्य है, अन्यथा निर्णय प्रक्रिया धीमी और जवाबदेही अस्पष्ट हो सकती है।

सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। मेला पुलिस की तैनाती, मेला आईजी की नियुक्ति और सुरक्षा ढांचे का खाका अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की भीड़, वीआईपी मूवमेंट, ट्रैफिक प्रबंधन, सम्भावित आतंकवादी खतरे, भगदड़ की आशंका, महिला सुरक्षा और साइबर निगरानी जैसे विषय अत्यंत संवेदनशील हैं। पिछले वर्षों में उत्तराखण्ड में हुए आयोजनों से यह स्पष्ट हुआ है कि भीड़ प्रबंधन में छोटी सी चूक भी बड़ा हादसा बन सकती है। 2010 के हरिद्वार कुम्भ के दौरान ललताराव पुल पर भगदड़ की घटना ने प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया था। 2011 में शांतिकुंज द्वारा आयोजित गायत्री कुम्भ के दौरान हुई भगदड़ में 20 श्रद्धालुओं की मृत्यु हुई थी। वर्ष 2025 में मनसा देवी मंदिर मार्ग पर दर्शन को जा रहे श्रद्धालुओं के बीच हुई भगदड़ में 6 लोगों की जान चली गई।

इतिहास गवाह है कि हरिद्वार में 1912, 1927 और 1950 के कुम्भ मेलों में भगदड़ की घटनाओं में अनेक श्रद्धालुओं की मृत्यु हुई। 1966 के कुम्भ में 12, 1986 में 52 और 1996 में सोमवती अमावस्या स्नान के दौरान रोटी बेलवाला क्षेत्र में 22 तीर्थ यात्रियों की मौत हुई थी। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया है कि भीड़ नियंत्रण और संरचनात्मक मजबूती सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

विकास कार्यों की गुणवत्ता भी प्रश्नों के घेरे में है। हाल ही में गंगा तट पर बनाए जा रहे कुछ अस्थायी घाट हल्की बारिश में बह गए, जिससे निर्माण गुणवत्ता पर सवाल उठे। अर्धकुम्भ में अस्थायी ढांचे लाखों लोगों का भार झेलते हैं। यदि जल्दबाजी में निर्माण हुआ तो उसकी मजबूती संदिग्ध हो सकती है। निर्माण कार्यों में पारदर्शिता, तकनीकी आॅडिट और तीसरे पक्ष का निरीक्षण अत्यंत आवश्यक है।

स्वास्थ्य और स्वच्छता व्यवस्था भी अभी अधूरी प्रतीत होती है। न तो मेला स्वास्थ्य अधिकारी की नियुक्ति हुई है और न ही मुख्य चिकित्सा अधिकारी मेला की तैनाती। अस्थायी अस्पताल, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, एम्बुलेंस नेटवर्क, जलजनित रोगों की रोकथाम, खाद्य सुरक्षा जांच और स्वच्छता की निरंतर निगरानी अनिवार्य है। कोविड महामारी के अनुभव ने यह सिखाया है कि बड़े आयोजनों में स्वास्थ्य प्रबंधन कितनी बड़ी चुनौती बन सकता है। यदि डाॅक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ और सफाई कर्मियों की समय पर तैनाती नहीं हुई तो स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा सकती हैं।

यातायात और भीड़ प्रबंधन की चुनौती भी कम नहीं है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, पार्किंग स्थलों और शहर की आंतरिक सड़कों पर भारी दबाव पड़ना तय है। आधुनिक तकनीक जैसे ड्रोन निगरानी, रियल टाइम
माॅनिटरिंग, मोबाइल एप और डिजिटल सूचना बोर्ड उपयोगी हो सकते हैं परंतु इनके संचालन के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन आवश्यक है।

राजनीतिक इच्छाशक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है किंतु किसी भी विशाल आयोजन की सफलता प्रशासनिक क्षमता और समयबद्ध क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। यदि मेला आईजी की नियुक्ति, पुलिस बल की तैनाती, स्वास्थ्य अधिकारियों की पोस्टिंग और विभागीय समन्वय शीघ्र सुनिश्चित नहीं किया गया तो अर्धकुम्भ की तैयारियों पर प्रश्नचिह्न लग सकते हैं।

अर्धकुम्भ केवल एक धार्मिक मेला नहीं बल्कि उत्तराखण्ड की प्रशासनिक क्षमता की परीक्षा है। समीक्षा बैठकों और शिलान्यास से सकारात्मक संदेश अवश्य जाता है परंतु वास्तविक सफलता जमीनी तैयारी, पारदर्शिता, गुणवत्ता और समन्वय पर निर्भर करती है। यदि प्रशासन तत्परता और जवाबदेही के साथ कार्य करे तो 2027 का अर्धकुम्भ राज्य की छवि को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ कर सकता है, अन्यथा इतिहास की पुनरावृत्ति किसी भी सरकार के लिए गम्भीर चुनौती बन सकती है।

बात अपनी-अपनी

इस समय मेरा अधिष्ठान में लगभग 40-50 अधिकारियों-कर्मचारियों का स्टाफ है। उम्मीद है कि अगले महीने कुछ और कर्मचारी मिलेंगे। पीडब्ल्यूडी और सिंचाई विभाग अपना कार्य कर रहे हैं। हमने मेला सम्बंधी कार्य 31 अक्टूबर तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है और कार्य समय से पूरा कर लिया जाएगा जहां तक पुलिस व्यवस्था का सवाल है पुलिस कर्मचारियों की मेला अधिष्ठान में तैनाती की प्रक्रिया गतिमान है। उम्मीद करती हूं मार्च में मेला डीआईजी की भी नियुक्ति हो जाएगी।