ÓñƒÓÑìÓñ░ÓÑçÓñí ÓñíÓÑÇÓñ▓ ÓñòÓÑç Óñ¼Óñ¥Óñª Óñ©ÓñéÓñòÓñƒ Óñ«ÓÑçÓñé ÓñòÓñÂÓÑìÓñ«ÓÑÇÓñ░ÓÑÇ ÓñòÓñ┐Óñ©Óñ¥Óñ¿ Óñ¼Óñ¥Óñ£Óñ¥Óñ░ Óñ«ÓÑçÓñé Óñ¬Óñ╣ÓÑüÓñéÓñÜÓñ¿ÓÑç ÓñòÓÑï ÓññÓÑêÓñ»Óñ¥Óñ░ Óñ©ÓÑçÓñ¼ ÓñàÓñ¼ ÓñòÓÑìÓñ»Óñ¥ Óñ╣ÓÑïÓñùÓñ¥ Óñ¡Óñ¥Óñ░ÓññÓÑÇÓñ» ÓñòÓñ┐Óñ©Óñ¥Óñ¿ÓÑïÓñé ÓñòÓñ¥?

खतरे में भारतीय सेब

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत आयातित अमेरिकी सेबों पर शुल्क में कटौती ने जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के बागवानों के सामने गहरी अनिश्चितता खड़ी कर दी है। आर्थिक दबाव, राजनीतिक निर्णय और किसानों की जमीनी सच्चाई के बीच भारतीय सेब उद्योग ऐसे मोड़ पर है जहां आने वाला सीजन निर्णायक साबित हो सकता है


भारत विश्व का सातवां सबसे बड़ा सेब उत्पादक देश है। देश में प्रतिवर्ष लगभग 25 लाख मीट्रिक टन सेब की मांग है जबकि उत्पादन 20 से 21 लाख मीट्रिक टन के बीच रहता है। इस उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा जम्मू और कश्मीर से आता है जबकि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड शेष उत्पादन करते हैं। मांग और उत्पादन के बीच जो चार से पांच लाख मीट्रिक टन का अंतर है, वह आयात से पूरा किया जाता है।

पिछले एक दशक के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिकी सेबों का आयात समय-समय पर नीति बदलावों से प्रभावित होता रहा है। 2015 में अमेरिका से लगभग 1.05 लाख मीट्रिक टन सेब आयात हुए थे जो 2018 में बढ़कर 1.47 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गए। 2019 में जब भारत ने प्रतिशोध स्वरूप आयात शुल्क 70 प्रतिशत तक बढ़ाया तो आयात में गिरावट आई और 2022 में यह घटकर लगभग 5,000 मीट्रिक टन रह गया लेकिन 2023 के बाद शुल्क ढांचे में नरमी आने से आयात दोबारा बढ़ने लगा और 2025 में यह लगभग 60,000 टन के आसपास पहुंच गया। अब जब शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया है तो आशंका है कि आयात फिर तेजी से बढ़ सकता है।

वर्तमान में अमेरिकी सेब भारतीय बाजार में 140 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम के दायरे में बिकते हैं। शुल्क कम होने के बाद कीमत लगभग 95 से 105 रुपये प्रति किलो तक आ सकती है। दिल्ली की आजादपुर मंडी में पहले से ही ईरानी सेब 60 से 70 रुपए प्रति किलो बिकते हैं। ऐसे में यदि अमेरिकी सेब मध्यम दाम पर बेहतर पैकेजिंग और चमकदार रूप के साथ उपलब्ध होंगे तो घरेलू सेबों पर मूल्य दबाव बनना स्वाभाविक है। अनुमान है कि यदि बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो स्थानीय सेबों के दाम 15 से 20 प्रतिशत तक गिर सकते हैं जिसका सीधा असर किसान की आय पर पड़ेगा। भारतीय बागवान पहले ही बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं। उर्वरक, कीटनाशक, मजदूरी, पैकिंग सामग्री और परिवहन खर्च में लगातार वृद्धि हुई है। पहाड़ी राज्यों में सड़क सम्पर्क और लाॅजिस्टिक्स महंगे हैं जिससे उत्पादन लागत और बढ़ जाती है। यदि मंडी में कीमतें टूटती हैं तो छोटे और सीमांत किसानों के लिए लागत निकालना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
 
व्यापारिक संतुलन या कृषि पर समझौता

सरकार का कहना है कि यह व्यापार समझौता व्यापक रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा है और इससे दीर्घकाल में आर्थिक लाभ होंगे। साथ ही 80 रुपए प्रति किलोग्राम का न्यूनतम आयात मूल्य घरेलू उत्पादकों की रक्षा करेगा लेकिन किसान संगठनों का तर्क है कि एमआईपी का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना ही सबसे बड़ी चुनौती है। उनका कहना है कि अतीत में घोषित न्यूनतम मूल्य और वास्तविक बाजार मूल्य के बीच अंतर देखा गया है, जिससे आयातित फल अपेक्षा से सस्ते में बाजार तक पहुंच जाते हैं।

विपक्षी दलों ने इस निर्णय को बागवानी उद्योग के हितों की अनदेखी बताया है। उनका कहना है कि कृषि क्षेत्र, विशेषकर पहाड़ी राज्यों की अर्थव्यवस्था, पहले से संवेदनशील है और ऐसे में आयात शुल्क में कटौती का निर्णय राजनीतिक दृष्टि से भी संवेदनशील मुद्दा बन सकता है। जम्मू-कश्मीर में बागवानी क्षेत्र लगभग सात लाख परिवारों की आजीविका से जुड़ा है और क्षेत्रीय सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसलिए यह केवल व्यापार नीति का प्रश्न नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा विषय भी है।

हिमाचल प्रदेश में किसान संगठनों ने विरोध की चेतावनी दी है जबकि कश्मीर में कई व्यापारिक संगठन स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि आने वाले सीजन में कीमतों में गिरावट दर्ज हुई तो यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर बहस का केंद्र बन सकता है।
 
किसान की जमीनी हकीकत: आजीविका और असुरक्षा

कश्मीर के बारामूला, शोपियां और पुलवामा जैसे इलाकों में सेब केवल एक फसल नहीं बल्कि जीवन का आधार है। हिमाचल प्रदेश के शिमला, कुल्लू और किन्नौर में भी सेब अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं जिनके पास एक से दो हेक्टेयर जमीन है। उनके पास सीमित भंडारण सुविधा है और वे अक्सर बिचौलियों पर निर्भर रहते हैं।

जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। चिलिंग आवर्स में कमी, अनियमित बर्फबारी, ओलावृष्टि और कीट प्रकोप से उत्पादन प्रभावित हो रहा है। ऐसे में यदि बाजार मूल्य गिरता है तो किसान के पास जोखिम सहने की क्षमता सीमित है। वह अपनी फसल लम्बे समय तक रोक नहीं सकता क्योंकि उसे तत्काल नकदी की आवश्यकता होती है। यदि कीमतें टूटती हैं तो इसका प्रभाव केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। बागवानी से जुड़े मजदूर, ट्रांसपोर्टर, पैकिंग हाउस कर्मचारी और मंडी व्यापारी भी प्रभावित होंगे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह कम होगा, जिसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय व्यापार पर पड़ेगा। विशेषकर जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में आर्थिक अस्थिरता सामाजिक प्रभाव भी डाल सकती है।
 
निर्णायक मोड़ पर बागवानी अर्थव्यवस्था

दरअसल यह पूरा विवाद केवल आयात शुल्क के प्रतिशत का नहीं है बल्कि उस विश्वास, संतुलन और नीति-दृष्टि का है जो कृषि अर्थव्यवस्था को स्थिर रखती है। सेब की बागवानी कोई तात्कालिक फसल नहीं है जिसे एक मौसम में बदला जा सके। एक पौधे को पूर्ण उत्पादन क्षमता तक पहुंचने में पांच से सात वर्ष लगते हैं। किसान भूमि तैयार करता है, पौधरोपण करता है, सिंचाई व्यवस्था बनाता है, कीट प्रबंधन करता है और वर्षों तक निवेश करता रहता है। यह एक दीर्घकालिक पूंजी निवेश है जिसमें धैर्य और भरोसा दोनों की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि बाजार की दिशा अचानक वैश्विक समझौतों के कारण बदलती है तो इसका प्रभाव केवल एक सीजन तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी बागवानी संरचना को प्रभावित करता है।

विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि आयातित सेबों की मात्रा नियंत्रित नहीं रही और मूल्य निगरानी प्रभावी नहीं हुई तो स्थानीय मंडियों में कीमतों की अस्थिरता बढ़ सकती है। कीमतों में बार-बार उतार-चढ़ाव होने से किसान भविष्य की योजना बनाने में असमर्थ हो जाता है। बैंक ऋण, सहकारी समितियों की उधारी और निजी निवेश, सभी इनका आधार स्थिर आय की अपेक्षा पर टिका होता है। यदि आय अनिश्चित हो जाती है तो बागवानी क्षेत्र में निवेश की गति धीमी पड़ सकती है। इससे नई पौध किस्मों का रोपण, उच्च घनत्व (हाई-डेंसिटी) बागवानी और तकनीकी उन्नयन की योजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

इसके सामाजिक आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों में बागवानी ने दशकों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिरता दी है। सेब की आय से घर बनते हैं, बच्चों की शिक्षा होती है, स्थानीय व्यापार चलता है और हजारों मौसमी मजदूरों को काम मिलता है। यदि यह आय घटती है तो उसका प्रभाव गांव से लेकर शहर तक महसूस होगा। युवा पीढ़ी, जो पहले ही खेती से विमुख हो रही है, वह और तेजी से अन्य क्षेत्रों की ओर रुख कर सकती है। इससे पारम्परिक कृषि ज्ञान और स्थानीय किस्मों का संरक्षण भी चुनौती में पड़ सकता है।

दूसरी ओर सरकार और कुछ व्यापार विशेषज्ञों का तर्क है कि प्रतिस्पर्धा अंततः गुणवत्ता सुधार की दिशा में धकेलती है। यदि घरेलू उद्योग आधुनिक पैकेजिंग, ब्रांडिंग, नियंत्रित वातावरण भंडारण और निर्यात नेटवर्क विकसित करता है तो भारतीय सेब केवल घरेलू बाजार ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी पहचान मजबूत कर सकते हैं। ‘कश्मीरी एप्पल’ और ‘हिमाचली एप्पल’ को भौगोलिक संकेतक (GI) और प्रीमियम ब्रांड के रूप में स्थापित करने की सम्भावनाएं भी चर्चा में हैं लेकिन इन सम्भावनाओं को वास्तविकता में बदलने के लिए नीति-निर्माण में स्पष्टता, पारदर्शिता और समयबद्ध क्रियान्वयन आवश्यक है। न्यूनतम आयात मूल्य की सख्त निगरानी, बाजार सूचना प्रणाली की मजबूती, किसानों के लिए मूल्य जोखिम प्रबंधन तंत्र और बागवानी अवसंरचना में निवेश, ये सब समानांतर रूप से लागू होने चाहिए। केवल शुल्क घटाने या बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। अंततः यह प्रश्न प्रतिस्पर्धा बनाम संरक्षण का नहीं बल्कि संतुलन का है। यदि संतुलन साधा गया तो यह समझौता भारतीय बागवानी को अधिक सक्षम बना सकता है। यदि संतुलन बिगड़ा तो यह पहाड़ी अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक अस्थिरता का कारण बन सकता है। फिलहाल बागानों में खिले फूलों के बीच उम्मीद और आशंका साथ- साथ खड़ी हैं। आने वाला सीजन तय करेगा कि भारतीय सेब उद्योग इस चुनौती को अवसर में बदलता है या इसे संकट की शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा।