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‘अपनी ही नीति पर फेल सरकार’

जीरो टॉलरेंस की नीति पर उठ रहे सवालां को लेकर सदन के उपनेता करण महरा से ‘दि संडे पोस्ट’ की बातचीत

  • भ्रष्टाचार पर नेता प्रतिपक्ष की चुप्पी पर उपनेता ने साधा निशाना

सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति लागू होने के शुरुआती दौर में लगा था कि सरकार इस पर बेहतर काम करेगी लेकिन ढाई वर्ष के कार्यकाल में स्थितियों में ज्यादा फर्क नहीं दिख रहा है। आप इसको कैसे देखते हैं?
पूरी तरह से फेल। एब्सल्यूटली फेल है सरकार। जीरो टॉलरेंस कहीं नहीं है। स्वयं मुख्यमंत्री के नजदीकी मित्रों और परविवार के लोगों पर ही जब आरोप लग रहे हों तो जीरो टॉलरेंस कहां दिखाई देगा। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को सरकार और शासन संरक्षण दे रहा है। कार्यवाही के नाम पर दिखावा किया जा रहा है। बाद में सब को माफ कर दिया जा रहा है। यही इस सरकार के कार्यकाल में देखने को मिल रहा है तो आप कैसे कह सकते हैं कि राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार लड़ रही है। जीरो टॉलरेंस की नीति चला रही है।

आप तो सरकार के खिलाफ कुछ ज्यादा ही आरोप लगा रहे हैं। सरकार ने बड़ी-बड़ी कार्यवाहियां भी तो की हैं?
यह भी एक सबसे बड़ा झूठ है जो सरकार द्वारा दिखाया जा रहा है। अरे जो सरकार 57 विधायकों का बहुमत होने के बावजूद प्रदेश को एक लोकायुक्त नहीं दे पाई हो वह कैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की बात कह सकती है। सौ दिनों में लोकायुक्त कानून लाने का वादा तो मुख्यमंत्री जी ने ही किया था। ढाई साल होने को हैं, कहां है आपका मजबूत और ताकतवर लोकायुक्त कानून। जब सरकार ही भ्रष्टाचार में डूबी हुई हो तो क्यों लोकायुक्त कानून लाएगी।

एनएच 74 के मामले का देखें तो पहली बार किसी सरकार ने उच्चाट्टिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की है। कम से कम कुछ तो संदेश सरकार ने दिया ही है?
यह भी सफेद झूठ है। आपको याद होगा कि स्वयं मुख्यमंत्री जी ने कहा था कि एनएच 74 के मामले में सीबीआई जांच होगी। आदेश भी जारी कर दिया लेकिन केंद्र सरकार के मंत्री का पत्र मुख्यमंत्री जी को मिलता है जिसमें लिखा गया कि अगर सीबीआई जांच होगी तो वे उत्तराखण्ड में सभी प्रोजेक्ट बंद कर देंगे। बस, पत्र मिलते ही मुख्यमंत्री जी ने अपना वादा और निर्णय बदल लिया। आज तक सीबीआई जांच नही हो पाई है। रही बात कार्यवाही करने की तो कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सरकार को मजबूर होना पड़ा। लेकिन इसमें भी सरकार ने पूरा खेल किया और अपने अधिकारियों को बचाब के रास्ते दिखा दिए। आज जो अधिकारी जेल में थे उनको बहाल कर दिया और अच्छे और बड़े पदों पर तेनात कर दिया गया। अगर सरकार और मुख्यमंत्री जी में दम है तो करो सीबीआई जांच। लेकिन न तो सरकार में दम है और न मुख्यमंत्री में ऐसी ताकत है।

मुख्यमंत्री पर सीट्टो भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। मीडिया में और विट्टानसभा सत्र में भी आपने मुख्यमंत्री पर गंभीर आरोप लगाए है। इन आरोपों की क्या सच्चाई है?
हमने कई बार मीडिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके प्रमाण सबके सामने रखे थे। हमने मुख्यमंत्री के नजदीकी मित्र संजय गुप्ता के स्टिंग ऑपरेशन दिखाए जिसमें वह धनराशि के कम होने की बात कह रहा है। मुख्यमंत्री की पत्नी और संजय गुप्ता की पत्नी के बीच पार्टनरशिप करके जमीन खरीदी गई। हमारी इस बात का भाजपा प्रवक्ता मुन्ना सिंह चौहान ने भी माना कि पार्टनरशिप में जमीन खरीदी गई लेकिन वह जमीन सूर्यधार नहीं सहस्त्रधारा में खरीदी गई। यानी हम सही थे कि मुख्यमंत्री और संजय गुप्ता के बीच पारिवारिक रिश्ता और पार्टनरशिप है। सदन में हमने विधानसभा पीठ को पेन ड्राइव सौंप दी है और मांग की है कि सरकार इस पर एक कमेटी बनाकर जांच करवाए। सरकार ने हमारी बात नहीं मानी है तो हमने वाकआउट किया।

सरकार का कहना है कि स्टिंग ऑपरेशन का मामला हाईकोर्ट में चल रहा है फिर इस पर सदन में चर्चा नहीं हो सकती। जो मामला न्यायालय में लंबित हो उस पर चर्चा नहीं हो सकती है यह आप भी जानते हैं तो फिर इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है?
पहली बात न्यायालय में जो स्टिंग ऑपरेशनों पर सुनवाई चल रही है वह तो एक पत्रकार और मुख्यमंत्री जी का अन्य मामलों के स्टिंग ऑपरेशन से जुड़ा है। मैंने तो नए स्टिंग ऑपरेशनों को तीन बार प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मीडिया में दिखाया है। अगर मैं गलत होता तो अभी तक न्यायालय मुझे अवमानना का दोषी करार दे चुका होता। दिखाए गए ये स्टिंग ऑपरेशन नए हैं और हाईकोर्ट में सुनवाई पर नहीं चल रहे हैं। इसमें एक स्टिंग तो मुख्यमंत्री के मित्र संजय गुप्ता का है जिसके बारे में यह कहते रहे है ंकि उससे इनका कोई लेना देना नहीं है। लेकिन जब मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके स्टिंग ऑपरेशन दिखाया तक साफ हो गया कि संजय गुप्ता मुख्यमंत्री का बेहद करीबी मित्र है। और यह आदमी आबकारी विभाग की नीति को भी बदला रहा है। स्टिंग में संजय गुप्ता कह रहा है कि फीस बहुत ज्यादा है इसे कम करवा दूंगा। हमें हैरानी तब होती है कि इस स्टिंग के 22 दिन के बाद सरकार बार लाइसेंसों को 6 लाख से 3 लाख कर देती है। इससे यह साफ है कि मुख्यमंत्री सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप के लिए संजय गुप्ता पर मेहरबान हैं। दूसरा स्टिंग भी इसी तरह का ही है जिसमें मुख्यमंत्री से कोई भी काम करवा लेने की बात हो रही है। हमने सदन में इन्हीं स्टिंगों की पेन ड्राइव दी है। सरकार चाहे तो इसकी एक कमेटी बना कर जांच कर ले।

स्टिंग ऑपरेशन तो पहले भी सामने आए थे उसमें भी तो कुछ ऐसे ही मामले थे फिर नया क्या?
आप समझ नहीं रहे हैं कि मामला कितना गंभीर है। एक मुख्यमंत्री का खास मित्र मुख्यमंत्री से मिलवाने के लिए दस लाख रुपए की घूस ले रहा है और ‘इसमें तो तीन लाख कम है’ कहता हुआ दिखाई दे रहा है। फिर अपनी पत्नी का एकाउंट नंबर देता हुआ दिख रहा है। जिसमें तीन लाख रुपए नोएडा से डल रहे हैं। मुख्यमंत्री के मित्र को यह अधिकार कैसे हो सकते हैं कि वह सरकारी नीतियों को बदलवाने की बात करता हो। ठीक है मुख्यमंत्री जी और उनकी कैबिनेट को यह अधिकार है कि वह फीस को कम या ज्यादा कर सकते हैं लेकन उनके मित्र को यह अधिकार किसने दिए। फिर 22 दिन के बाद सरकार 3 लाख फीस में कम कर देती है तो मामला गंभीर है कि मुख्यमंत्री के आस-पास के लोग पूरी तरह से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और उनको स्वयं मुख्यमंत्री जी ने संरक्षण दिया हुआ है।

विभागीय स्तर पर देखा जा रहा है कि भ्रष्टाचार में संलिप्त और जांच में कार्यवाही की संस्तुति के बावजूद उन अट्टिकारियों -कर्मचारियों को प्रमोशन दिया जा रहा है। लेकिन विपक्ष इस पर चुप्पी साट्टो हुए है। ऐसा क्यों?
पहली बात विपक्ष चुप नहीं है। आपने जो बताया है वह पूरी तरह से सच है। सरकार भ्रष्टाचारियों को न सिर्फ सरंक्षण दे रही है, बल्कि उनको प्रमोशन भी दे रही है। समूह ग की भर्तियों को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया था। मैंने सदन में इस बात को रखा था तो सरकार ने कहा था करण महरा सही कह रहे हैं। लेकिन सरकार ने इस पर कोई कार्यवाही तक नहीं की। मामला न्यायालय में गया तो मजबूर होकर सरकार को कार्यवाही करना पड़ी। लेकिन आज भी कार्यवाही की फाइल सचिवालय में ही दबी हुई है। तो कैसे जीरो टॉलरेंस को हम मान लें।

कांग्रेस सरकार के खिलाफ आरोप तो लगा रही है लेकिन आप और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश जी, दोनों अलग-अलग काम कर रहे हैं। भ्रष्टाचार पर एक साथ क्यों नहीं साथ आ रहे हैं। क्या यह राजनीतिक मामला भी है जो कांग्रेस एक साथ नहीं है?
मैं कांग्रेस का सिपाही हूं। मुझे जैसे ही कोई तथ्य और प्रमाण मिलता है मैं तुरंत उस पर कांग्रेस का सिपाही होने के नाते काम करता हूं। नेता प्रतिपक्ष इंदिरा जी क्यों चुप हैं यह मैं नहीं कह सकता। मुख्यमंत्री जी ने इंदिरा जी को चुनौती दी थी कि अगर उनके पास कोई स्टिंग ऑपरेशन है तो उनको परेड ग्राउंड में दिखाएं मैं अनुमति दे दूंगा। लेकिन इंदिरा जी ने फिर भी नहीं दिखाया। वे मुझसे बड़ी हैं, मैं बहुत छोटा आदमी हूं। मैं इस पर कुछ नहीं कह सकता कि ऐसा क्यों हुआ? जहां तक सवाल मेरा तो मैंने दो मामले तो आपके अखबार ‘दि संडे पोस्ट’ के माध्यम से ही सदन में उठाए हैं। जिसमें एक तराई बीज निगम वाला मामला। इस मामले का आपके अखबार ने ही खुलासा किया था। मैंने सदन में उठाया तो सरकार ने कार्यवाही करने की बात कही। कार्यवाही भी हुई लेकिन कर्मचारियों और अधिकारियों पर ही कार्यवाही हुई। उस व्यक्ति के खिलाफ सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की जो उस समय अध्यक्ष था। वह राजनीतिक व्यक्ति था। हो सकता है कि सभी के राजनीतिक हित चाहे कांग्रेस के हों या भाजपा के हों उससे जुड़े रहे हो इसलिए उसके गिरेबान तक सरकार के हाथ नहीं पहुंच रहे है।
दूसरा मामला भी आप ही के माध्यम से हमने उठाया था जिसका जिक्र अभी मैं करना नहीं चाहता उसमें भी हम तो बोले। इंदिरा जी तो सभी मामलों में चुप रही हैं, क्यों चुप रही है, मैं कह नहीं सकता हैं।

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