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The Sunday Post Special Uttarakhand

कोरोना संकट में अपना दायित्व निभाने में असफल हुई सरकार : इंदिरा हृदयेश

उत्तराखण्ड की नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश कोरोना संक्रमण काल में अपने पुत्र सुमित हृदयेश व कांग्रेस नेताओं के सहयोग से अपने विधानसभा क्षेत्र और आस-पास के गरीब व असहाय लोगों के लिए निरंतर भोजन, दवाई की व्यवस्था में जुटी हुई हैं। इस आपदा के समय सरकार की भूमिका से खिन्न इंदिरा हृदयेश का कहना है कि ऐसे समय में सरकार को बड़ा दिल दिखाकर विपक्ष से भी बात कर उसके सुझावों को लेग चाहिए। राजनीति करने का जिम्मा सरकार को अपनी पार्टी पर छोड़ प्रदेश की जनता के हित में सोचना चाहिए। नेता प्रतिपक्ष का मानना है कि प्रत्येक जनप्रतिनिधि का दायित्व है कि उसके क्षेत्र में इस संकट की घड़ी में कोई भूखा न सोए। डॉ. इंदिरा हृदयेश से विशेष बातचीत के कुछ अंश :

कोविड-19 संक्रमण में आप केंद्र और राज्य सरकार भी भूमिका से कितना संतुष्ट हैं?

देखिए, कोविड संक्रमणकाल में जो स्थिति देश व प्रदेश की हुई है और सरकार ने इसमें जो असंवेदनशील व्यवहार अपनाया है उसने मुझे काफी निराश किया है। गरीब मजदूर वर्ग जिसे हम ‘राष्ट्र निर्माता’ की संज्ञा देते हैं वो भूखा- प्यासा पैदल सड़कों पर चलकर अपने घर को जा रहा है। जो ट्रेन उन्हें लेकर चल रही है उसमें न उनके खाने की व्यवस्था है, न पानी की। स्टेशन पर भी जब वो पानी मांगते हैं तो उन्हें खौलता गर्म पानी नसीब हो रहा है। इस प्रकार देशभर का मजदूर वो चाहे बिहार का हो या उत्तर प्रदेश का या फिर अन्य जगहों का, वो सरकार की संवेदनहीनता का शिकार हो गया। पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण सभी जगहों के कई मजदूर असमय मौत के मुंह में समा गये, कई परेशान हैं। मैं ही नहीं देश के प्रधानमंत्री और प्रदेशों के मुख्यमंत्री ये नजारा देख रहे हैं, लेकिन सरकार में बैठे लोग इसका अब तक समाधान नहीं निकाल पाए हैं। ये कष्ट का विषय है। सरकार में बैठे लोगों का ही दायित्व है कि वे इस स्थिति से निपटने के लिए समाधान लेकर आएं, लेकिन दुःखद है कि इस संकटकाल में सरकार अपने दायित्व को निभाने में असफल रही।

क्या आपको नहीं लगता कि नोटबंदी की तरह लॉकडाउन की अचानक घोषणा एक अव्यवहारिक कदम था जिसका दुष्परिणाम गरीब आदमी को भोगना पड़ा?

बिल्कुल सही, जैसे रातोंरात अचानक नोटबंदी की घोषणा कर गरीब की अपने संकट के समय के लिए जमा की पूंजी को बैंकों में जमा करवा दिया गया वैसे ही अचानक लॉकडाउन की घोषणा ने आम आदमी खासकर गरीब तबके को परेशानी में डाला है। अगर विचार- विमर्श के बाद लॉकडाउन की घोषणा की जाती तो बेहतर होता। इस निर्णय से पूरे देश में अव्यवस्था का माहौल बना। जल्दबाजी में लागू कर दिए गये इस अव्यवहारिक निर्णय से पूरा देश परेशान है। अब सरकार को भी शायद इसका एहसास हो गया है।

जब फरवरी में ही राहुल गांधी ने सरकार को कोरोना के संक्रमण की चेतावनी दे दी थी, तो फिर सरकार ने इसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया। क्या सरकार को ऐसे में विपक्ष के सुझावों को सुन उससे विमर्श नहीं करना चाहिए था?

देखिये, ये ऐसा समय होता है जब संकटकाल में पूरा देश एक हो जाता है। युद्ध हों या कोरोना जैसा संकट पूरा देश एक होता है। राजनीतिक दल भी इस संकट के समय अपने राजनीतिक विरोध को एकतरफ रख सरकार के साथ खड़े हैं। स्वयं सेवी संगठन भी आगे आए हैं। सरकार का भी दायित्व है कि संकट की इस घड़ी में विपक्ष के सुझावों का सम्मान करे उन पर विचार करे, हमारी पार्टी ने सुझाव दिया कि गरीबों के खाते में दस हजार रुपए डालकर उनकी आर्थिक मदद की जाए। सरकार ने सभी सुझावों की अपेक्षा की और जो सरकारें प्रतिपक्ष के ऐसे सुझावों की उपेक्षा करती हैं उन्हें कल्याणकारी सरकार नहीं कहा जा सकता।

कोरोना संक्रमण के इस दौर में राजनीतिक दल व स्वयं सेवी संस्थाएं आगे आई, पर कहीं सरकार पर आरोप लगा कि राहत सामग्री बांटने में दल विशेष के लोगों का हस्तक्षेप ज्यादा रहा। उसमें भी पक्षपात बरता गया, यह कितना सही है?

ऐसे अवसरों पर सेवा भाव की भावना होनी चाहिए राजनीति को यहां पर दूर ही रखा जाना चाहिए। मैं स्वयं हल्द्वानी से विधायक हूं और पांच हजार भोजन किट बांटे जा चुके हैं। एक हजार भोजन किट की और व्यवस्था करवा रही हूं, लेकिन ये किसी पर एहसासन नहीं है। मैं क्षेत्र की निर्वाचित प्रतिनिधि हूं तो क्षेत्र के लोगों के प्रति ये मेरा दायित्व है। लोगों के सहयोग एव स्वयं के संसाधनों से मैं व्यवस्था देख रही हूं कि कोई परिवार भूखा न सोए। कांग्रेस उसके अनुसांगिक संगठन और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने व्यक्तिगत स्तर पर पका भोजन व राशन वितरित किया है। मुस्लिम क्षेत्र में भी दो रसोइयां चलाकर गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई। जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि वो ये सुनिश्चित करें कि उनके क्षेत्र में कोई भूखा न सोये।

कांग्रेस का आरोप है कि सरकार इस संकटकाल में विपक्ष को विश्वास में लिए बिना एकतरफा निर्णय ले रही है, क्या कहेंगी?

ये आरोप सही है। जैसे कि मंत्रिमंडल ने एक निर्णय लिया कि विधायकों के वेतन में 30 प्रतिशत की कटौती होगी। निर्णय लेने से पूर्व सरकार को चाहिए था कि वो नेता प्रतिपक्ष को बुलाकर राय लेते फिर हम अपनी पार्टी के विधायकों की बैठक बुलाकर उनकी राय लेते। हालांकि नीतिगत मुद्दों पर सरकार ने विपक्ष से से विमर्श न कर एक गलत परम्परा स्थापित की है। न ही मुझसे न ही हमारे प्रदेश अध्य्क्ष से बात करने की सरकार ने आवश्यकता महसूस की, लेकिन मैंने और हमारे विधायकों ने अपने वेतन भत्तों से तीस प्रतिशत कटौती की सहमति का पत्र सरकार और विधानसभा अध्यक्ष को प्रेषित कर दिया है। ये उनका सदकार्य नहीं है। जबकि ऐसे अवसरों पर विपक्ष के नेताओं को विश्वास में लेकर निर्णय लिए जाते हैं। मुख्यमंत्री स्वयं मेरे अनुभवों का लाभ लेने की बात करते हैं, लेकिन उन्होंने स्वयं इस बार ऐसा नहीं किया। हम तो इस आपदा के समय सरकार के साथ खड़े ही हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर शब्द की व्याख्या आप कैसे करेंगी?

इस आत्मनिर्भर शब्द का अर्थ तो प्रधानमंत्री ही बेहतर समझा सकते हैं। जो रेहड़ीवाला ठेला लगाकर अपनी आजीविका कमाता था उनकी आजीविका तो कोरोना ने छीन ली। अब प्रधानमंत्री बताएं कि वो इन्हें कैसे आत्मनिर्भर बनाएंगे। रेहड़ी वालों को दस हजार का भरण उपलब्ध कराने की बात कहकर उन्हें कहां आत्मनिर्भर बना रहे हैं? हमने कहा उनके खाते में आप ऋण का नहीं सहायता का दस हजार रुपया डालिए जिससे वो पुनः कारोबार खड़ा कर सकें। किसान को ऋण के जाल में मत उलझाइये उसकी फसल को खरीदने की व्यवस्था कर दीजिए। गौलापार क्षेत्र में काश्तकारों को प्याज व लहसुन का लागत मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है। मैंने तो स्वयं मुख्यमंत्री को सुझाव दिया था कि इन किसानों की फसल स्वयं राज्य सरकार खरीद कर किसानों को आर्थिक परेशानी से बचाए पर सरकार सुनती कहां है।

इस आर्थिक सुस्ती के दौर में आप आने वाले वर्षों में प्रदेश में विकास की क्या स्थिति देखती हैं?

विकास तो पहले भी कहां दिखाता था। हम निकले थे दिन के उजाले में टार्च से विकास ढूंढ़ने हमें तो कहीं दिखा नहीं। कोविड के कारण आर्थिक सुस्ती नहीं अर्थतंत्र ध्वस्त होने के कगार पर है। जब किसी के पास कमाने के साधन नहीं हैं तो पैसा आएगा कहां से। मुझे तो डर है कि अब तक सरकारी कर्मचारियों को जो वेतन मिल रहा है उसमें रुकावट न आ जाए और ऊपर से उसके वेतन से 1 प्रतिमाह की कटौती का प्रस्ताव घोर निंदनीय है। मैंने सरकार से मांग की है कि सफाई कर्मचारी, चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को इस कटौती से मुक्त रखा जाए और न ही उपनल के कर्मचारियों को हटाया जाए।

नैनीताल जिले को रेड जोन में डाले जाने पर आप क्या कहेंगी?
नैनीताल जिले को रेड जोन में डालने पर मुझे घोर आपत्ति है और मैं इसकी निंदा करती हूं। काठगोदाम अंतिम रेलवे स्टेशन है सभी प्रवासी नैनीताल जिले से ही पर्वतीय जिलों को जा रहे हैं ऐसे में दूसरे जिले के सक्रमितों को नैनीताल जिले के खाते में डाल देना गलत है। इससे प्रशासनिक अधिकारियों जनता व व्यापारियों को परेशानी हो रही है।

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