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‘निगमों को ज्यादा धन मिले’

उत्तराखण्ड की आर्थिक राजधानी हल्द्वानी से जोगेंद्र रौतेला दूसरी बार मेयर चुने गए हैं। कैमिकल साइंस से पीएचडी रौतेला मानते हैं कि आडंबर से हटकर लो प्रोफाइल रहते हुए ही जनप्रतिनिधि जनता के निकट रह सकता है। पेश है मेयर डॉ. जोगेंद्र पाल सिंह रौतेला से ‘दि संडे पोस्ट’ संवाददाता संजय स्वार की खास बातचीत

नगर निगम के चुनावों में कौन-कौन सी चुनौतियां थी। खासकर अपनी ही पार्टी के अंदर आपको कई दावेदारों की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ऐसे में आपने कैसे सामंजस्य?

दलीय राजनीति व खासकर अंतर दलीय राजनीति में टिकट के अन्य दावेदार भी होते हैं। सभी दावेदारों द्वारा जोर आजमाइश की जाती है। लेकिन मेरा मामनना है कि दावेदारी साफ मन और नैतिकता के आधार पर की जानी चाहिए। मैंने हमेशा दावेदारी साफ मन व बिना प्रपंच के की है। मैंने अपने कार्यों के आधार पर दावेदारी की और जनता से मत मांगा। मैं भाजपा का सच्चा सिपाही हूं। भाजपा से जुड़ने के बाद मैंने सच्चे मन से पार्टी की सेवा की है और पार्टी ने मुझे बहुत कुछ दिया है। जितने भी अन्य प्रतिस्पर्द्धी थे उनका मान मनौव्वल किया। कुछ लोग मान गए कुछ नहीं माने। चुनावी राजनीति में ये सब चलता रहता है।

हल्द्वानी काठगोदाम नगर पालिका, नगर निगम की समग्र रूप से बात करें तो आप उन चुनिंदा लोगों में शामिल हो गए हैं जिन्हें इस निकाय का दो बार प्रतिनिधित्व करने का मौका मिल रहा है। कैसा महसूस कर रहे हैं?
पूर्व में जब हल्द्वानी काठगोदाम नगर पालिका थी मुझे तीन बार सभासद रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। आज जब दूसरी बार मुझे नगर निगम का नेतृत्व करने का मौका मिला है सबसे ज्यादा हल्द्वानी की जनता का आभारी हूं। अपने केंद्रीय नेतृत्व, राज्य नेतृत्व अजय भट्ट, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, यशपाल आर्य, बंशीधर भगत, नवीन चंद्र दुमका, अपने जिला एवं मंडल स्तर के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताआें का आभारी हूं। मैं एक बड़ी जिम्मेदारी महसूस करता हूं। जिन नए 36 गांवों को नगर निगम में शामिल किया गया उनमें शहर की सी सुविधाएं देने की मेरी जिम्मेदारी बढ़ गई है।

अपने पिछले कार्यकाल का आकलन आप किस रूप में करते हैं या कहें कितना संतुष्ट थे आप?
जहां तक पिछले कार्यकाल का प्रश्न है, नगर निगम के बोर्ड द्वारा बहुत से जनहित के कार्य किए गए थे। एक पारदर्शी एवं ईमानदार बोर्ड का कार्यकाल रहा। जहां तक शहर के अंदर सुविधाएं प्रदान करने का सवाल है सीवरेज व्यवस्था का सुधार किया। सीवर ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण की निविदा प्राक्रिया तक हम पहुंच गए थे। एस डब्ल्यू एम प्लांट, घर-घर से कूड़ा उठाना, दुकानों और आवासों का नामांतरण, शहर का सौंदर्यीकरण, स्वकर प्रणाली लागू करना हमारी बोर्ड की उपलब्धियां रहीं। मैं सोचता हूं कि अपने घोषणा पत्र के कुछ बिंदुओं को छोड़ दें तो हमने अपने सभी वादे पूरे किए जिसके लिए मैं पूर्ववर्ती बोर्ड के सभी सदस्यों का आभारी हूं। निवर्तमान बोर्ड के जो कार्य लंबित हैं या पाइपलाइन में हैं उनको भी पूरा किया जाएगा।

इस बार ऐसा कौन सा एक कार्य है जो आपकी प्राथमिकता में है?
देखिए एक खास प्राथमिकता आप तय नहीं कर सकते। नगर निगम मेयर के रूप में जिम्मेदारियां इतनी व्यापक हैं कि सब कुछ प्राथमिकता ही है। हां, चित्रशिला घाट का जीर्णोद्धार जिसमें चित्रशिला घाट को थोड़ा ऊपर स्थानांतरित करते हुए उसमें विद्युत शवदाह गृह की स्थापना मेरा लक्ष्य है। जिसकी धनराशि स्वीकृत हो चुकी है। दूसरा सीवर ट्रीटमेंट प्लांट को शहर की आवश्यकता है। सॉलिड बेस्ट मैनेजमेंट के अंतर्गत कम्पोस्ट प्लांट, पेयजल, पुनर्गठन, अच्छा हैबिटेट सेंटर बनाना हमारी प्राथमिकताओं में है। हम इन्हें शीघ्र एवं अवश्य करेंगे।

25 वार्डों का नगर निगम अब 60 वार्डों का हो चुका है जिसमें 36 नए गांव जुड़ चुके हैं। शहर एवं नये जुड़े ग्रामीण क्षेत्रों में आप कैसे एकरूपता लाएंगे?
नगर निगम में जो 36 गांव सम्मिलित हुए हैं उनको सुविधा देने की हमारी जिम्मेदारी है। नगर निगम में इसका प्रबंधन है। उचित मार्ग व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट, पेयजल समस्या के निदान के लिए पेयल पुनर्गठन, सीरवेज इत्यादि के कार्य किए जाएंगे। खाली पड़ी सरकारी भूमि पर नए पार्क विकसित कर उस क्षेत्र का भी सौंदर्यीकरण किया जाएगा।

नगर निगमों को छोटी सरकार भी कहा जाता है। क्या आपको नहीं लगता कि सत्ता के विकेंद्रीकरण की दिशा में पहल करते हुए मेयर के अधिकारों में और वृद्धि की जानी चाहिए?
नगर निगम में महापौर को कई अधिकार प्राप्त हैं। राज्य बने 12 वर्ष हो गए, लेकिन आज भी उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश के निगम एक्ट से संचालित हो रहा है। हम अपना नगर निगम एक्ट नहीं बना पाए हैं। वर्तमान में भाजपानीत उत्तराखण्ड सरकार नगर निगम एक्ट उत्तराखण्ड के परिप्रेक्ष्य में बना रही है। जहां तक महापौर के अधिकारों की बात है उसके अधिकार असीमित हैं। लेकिन कुछ अधिकारों को बढ़ाया जाना जरूरी है। मेयर शहर का नेतृत्व करता है। आपने निगम को छोटी सरकार कहा, उस छोटी सरकार को सशक्त करना जरूरी है। उसे सशक्त करने से विकास की प्रक्रिया विकेंद्रीकृत होगी। सत्ता का विकेंद्रीकरण बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसी से विकास की किरण शहर के मोहल्ले एवं गली तक पहुंचेगी।

सामन्य अवधारणा है कि निगमों में भ्रष्टाचार है। पारदर्शिता का अभाव है। भ्रष्टाचार को खत्म करने और निगम को पारदर्शी बनाने के लिए आपकी क्या योजना है?
जहां तक निगमों में भ्रष्टाचार का प्रश्न है, ये व्यक्ति पर निर्भर करता है। निगम का नेतृत्व उस समय के बोर्ड और निगम प्रशासन पर निर्भर करता है। नेतृत्व, प्रशासन जवाबदेह और पारदर्शी हो तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश नहीं रहती। हल्द्वानी नगर निगम के संदर्भ में कहूं तो हमने स्वच्छ एवं पारदर्शी बोर्ड देने का प्रयास किया है जिसमें हम सफल भी रहे। कहीं कुछ गलतियां हुई भी तो उन्हें दंडित भी किया है। कई प्रक्रियाओं का सरलीकरण किया है। जनसामान्य से जुड़ी शिकायतों एवं समस्याओं के निदान के लिए सिटीजन चार्टर लागू किया है और निश्चित समयावधि के अंतर्गत उनका निस्तारण सुनिश्चित किया है। जनता का निगम है। जनता की सरकार जनता के सुझावों, राय से चले एवं जनता को सरल, सुलभ एवं त्वरित सेवा मिले, हमारा ऐसा प्रयास रहेगा।

केंद्र में नरेंद्र, प्रदेश में त्रिवेंद्र, हल्द्वानी में जोगेंद्र, ये नारा मेयर चुनावों में काफी लोकप्रिय रहा। क्या इस नारे की भावना के अनुरूप हल्द्वानी को लाभ भी मिलेगा?
हल्द्वानी कुमाऊं का प्रवेश द्वार एवं आर्थिक राजधानी है। सांस्कृतिक नगर भी है। यहां विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना किसी भी जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है। लोगों को जनसुविधाएं देना हमारी जिम्मेदारी है। केंद्र एवं राज्य की योजनाओं से हमें कई मदों में विकास के लिए धन मिलता है तो इसका सकारात्मक पहलू हल्द्वानीवासी अवश्य महसूस करेंगे।

स्थानीय निकाय हमेशा फंड की कमी से जूझते हैं। वेतन के अतिरिक्त विकास कार्यों की बाध्यता होती है। अब जब निगम का क्षेत्र काफी विस्तृत हो चुका है तो निगम को आर्थिक रूप से कैसे मजबूत करेंगे?
निगम का अपना आर्थिक ढांचा है। निगम की करों से आय होती है। राज्य वित्त आयोग एवं केंद्रीय वित्त आयोग से भी एक निश्चित राशि मिलती है। तीनों मद से वेतन एवं विकास कार्यों के लिए धन की व्यवस्था होती है। मेरा मानना है और हमेशा कहता आया हूं कि नगर निगमों को, ‘सेवा प्रदाता’ सर्विस प्रोवाइडर के रूप में देखा जाना चाहिए। इनका वित्त पोषण राज्य एवं केंद्र सरकार से अधिकतम होना चाहिए। वर्तमान सरकार से राज्य वित्त आयोग की राशि 12 करोड़ से बढ़कर 27 करोड़ हो गई। केंद्रीय वित्त आयोग से सहायता में तीन गुना वृद्धि हुई है। नए सम्मिलित गांवों का जो पैसा राज्य एवं केंद्रीय वित्त आयोग से आता था, अब वो भी नगर निगम को मिलेगा। पेयजल योजनाओं के लिए केंद्र से पैसा मिलता है। एडीबी जैसी संस्थाओं से विकास के लिए सहायता मिलती है। निगमों को और ज्यादा धन मिले, साथ ही आवश्यकता निष्ठा से कार्य करने की है।

आपने अपने पिछले कार्यकाल में कुछ प्रयास किए निगम की आय बढ़ाने के, परंतु आपको अपनी ही पार्टी के अंदर से विरोध का सामना करना पड़ा था, क्या कहेंगे?
सरकार चाहे छोटी हो या बड़ी आत्मनिर्भर तो होनी ही चाहिए। कई शुल्क वर्षों में पुनर्निर्धारित नहीं हुए थे। हमने इन्हें तर्कसंगत तरीके से बढ़ाने का प्रयास किया। इसका विरोध भी हुआ। कुछ सुझाव भी आए। हम जनप्रतिनिधि हैं सदैव सामंजस्य से चलना पड़ता है।

पिछले कार्यकाल में आपको कांग्रेस सरकार से शिकायत थी कि सरकार सहयोग नहीं कर रही। आज जब उत्तराखण्ड में आपकी ही पार्टी की सरकार है, क्या अपेक्षा रखते हैं?
सरकार की अहम भूमिका होती है, स्थानीय विधायक की अहम भूमिका होती है? लोकतंत्र का ये सबसे स्याह चेहरा है सरकार के बीच में जनप्रतिनिधि पार्टी लक्ष्य से ऊपर नहीं बढ़ पाते। वे निजी राजनीतिक लाभ के लिए विकास कार्यों को बाधित करते हैं। मेरा मानना है जनप्रतिनिधि किसी भी दल का हो उसे जनहित से सोचना चाहिए पिछले बोर्ड में भाजपा व कांग्रेस पार्षदों के क्षेत्रों में हमने बिना भेदभाव से कार्य किया। पिछले डेढ़ वर्षों से भाजपानीत सरकार से भरपूर सहयोग मिला है।

भाजपा के निकाय चुनावों में 20 पार्षद जीते हैं। 40 पार्षद अन्य दलों से हैं। कैसे सामंजस्य बिठाएंगे?
नेतृत्व को सामानता की दृष्टि से सोचना चाहिए। मेयर के रूप में मेरी जिम्मेदारी बड़ी है। एक अभिभावक के रूप में मेरी जिम्मेदारी है कि मैं सबको साथ लेकर चलूं। किसी भी क्षेत्र को दलीय दृष्टि से न देखूं। मेरे अंतर्मन में समानता होगी। विकास कार्यों के प्रति सोच होगी दलीय राजनीति से ऊपर उठकर मेरी प्राथमिकता आम जनमानस को लेकर होगी। पार्षद भी इस बात को समझते हैं। वो अपने क्षेत्रों के प्रतिनिधि हैं और लंबे संघर्षों के बाद चुनकर आते हैं। लोग उन्हें लामबंद करने का प्रयास करते हैं। इससे बोर्ड एवं जनता का ही अहित होता है।

पिछले बोर्ड के समय सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भाजपा की पूरा कार्यकाल डिप्टीमेयर के बिना ही गुजर गया। क्या आपको लगता है कि उप महापौर का चुनाव एक नियत समय के अंदर हो जाना चाहिए?
उप महापौर एक महत्वपूर्ण पद है। निगम एक्ट में इसका प्रावधान है। उसे पूर्ण किया जाना चाहिए। इन पदों की अपनी गरिमा होती है और इससे सदन की गरिमा बढ़ती है। प्रश्न ये नहीं है कि उप महापौर कौन बनेगा। लेकिन डिप्टी मेयर का चुनाव अवश्य होना चाहिए।

ट्रंचिंग ग्राउंड निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। फिर भी कूड़ा प्रबंधन एक बड़ी समस्या है खासकर सफाई व्यवस्था हमेशा से चुनौती रही है। पहले 25 वार्ड संभालना मुश्किल था। अब 60 वार्डों में कैसे प्रबंध करेंगे सफाई व्यवस्था का?
शहर के अंतर जो वर्तमान वार्ड थे उनमें कूड़ा उठाने का कार्य चल रहा है। अब 60 वार्डों के लिए अधिक मानव संसाधन और उपाकरणां की आवश्यकता होगी जिसके लिए हमने सरकार से मांग की है। सरकार ने इसे गंभीरता से लिया है। नए जुड़े क्षेत्रों में शहरीकरण की सी व्यवस्था हो। इसलिए इन क्षेत्रों को नगर निगम में शामिल किया गया है। सफाई व्यवस्था की चुनौती जरूर है। इसके लिए हमें जनसहयोग की भी आवश्यकता होगी। स्वच्छता अभियान के प्रति लोगों को जागरूक करने के साथ निगम अपना दायित्व भी निभाएगा।

आपके निजी जीवन के बारे में लोगों की बहुत कम जानकारी है। दूसरी बार मेयर चुने जाने के बाद इतना लो प्रोफाइल कैसे रह पाते हैं?
हल्द्वानी में ही पला बढ़ा हूं। पीएचडी कैमिकल साइंस से की है। कुछ समय निजी स्कूल में अध्ययापन का कार्य किया, ट्यूशन क्लासेस भी ली हैं। पिताजी स्व बसंत सिंह रौतेला सेना में मेजर पद से सेवानिवृत्त हुए थे। माताजी गृहणी हैं। छोटा भाई आर्मी में मेजर था। अब अपना स्वयं का व्यवसाय करता है। पत्नी नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में डीन हैं। लो प्रोफाइल रहने की बात है तो जीवन में सादगी से रहने के बड़े लाभ हैं। बहुत ज्यादा आपको आडंबर नहीं करने पड़ते। कहीं भी उठ बैठ जाएं तो कुछ तकलीफ नहीं रहती। मेरा मानना है कि जनप्रतिनिधि लो प्रोफाइल रहकर ही जनता के ज्यादा निकट रह सकता है।

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